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ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म (भाग 12) - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

     मनु ने यह निश्चित करने के बाद कि शूद्र का जन्म दास बनने के लिए हुआ है, तद्नुसार अपने नियम बनाए जिससे उसे नीच बने रहने के लिए बाध्य किया जा सके। बौद्ध काल में शूद्र न्यायाधीश, पुजारी और यहां तक कि राजा बनने की इच्छा कर सकता था जो उच्चतम पद था और जहां तक पहुंचने की उसकी इच्छा हो सकती थी। इसकी तुलना उस आदर्श से कीजिए जो मनु शूद्र के सम्मुख प्रस्तुत करता है तो आपको ब्राह्मणवाद के अंतर्गत उसके लिए नियम किए गए भाग्य का अंदाजा लग जाएगा।

     10.121. यदि कोई ब्राह्मणों की सेवा करके अपना जीवन निर्वाह करने में असमर्थ है। तब वह क्षत्रिय की सेवा करे या वह किसी धन वैश्य की सेवा कर अपना जीवन-निर्वाह करे |

     10.122. लेकिन शूद्र ब्राह्मण की सेवा स्वर्ग अथवा दोनों इस जीवन और इसके बाद जीवन के लिए करे क्योंकि जो ब्राह्मण का सेवक कहलाता है, वह कृतकृत्य हो जाता है।

     10.123. शूद्र का उत्तम कर्म केवल ब्राह्मणों की सेवा करना कहा गया है, क्योंकि इसके अतिरिक्त वह जो कुछ करता है, उसका उसे कुछ भी फल नहीं मिलता। 10.124. ब्राह्मणों को चाहिए कि वह उस शूद्र की योग्यता, उसके उत्साह और उनकी संख्या पर विचार कर जिनको उसे आश्रय देना है, अपने परिवार (संपत्ति) में से उसकी जीविका निश्चित करें।

brahmanvad ki Vijay Raja Hatya Athva Prati Kranti ka Janm - dr Bhimrao Ramji Ambedkar

     10.125. उसके लिए बचा हुआ अन्न और पुराने खाट बर्तन आदि दिए जाएं। मनु जितना शूद्र के प्रति कठोर है, स्त्रियों के प्रति वह उससे कम कठोर नहीं है। वह स्त्रियों के बारे में ऊंची धारणा नहीं रखता। मनु कहता है:

     2.213. इस संसार में स्त्रियों का स्वभाव पुरुषों को मोहित करना है। इस कारण बुद्धिमान स्त्रियों के बीच अरक्षित नहीं रहते।

     2.214. क्योंकि स्त्रियां इस संसार में केवल मूर्ख को ही नहीं, बल्कि विद्वानों को भी पथभ्रष्ट करने और उन्हें काम और क्रोध का दास बना देने में सक्षम हैं।

     2.215. कोई किसी की माता, बहन या पुत्री के साथ एकांत में न बैठे, क्योंकि इंद्रियां शक्तिशाली होती हैं और विद्वान को भी अपने वश में कर लेती हैं।

     9.14. स्त्रियां रूप की अपेक्षा नहीं करतीं, न उनका ध्यान आयु पर रहता है। वह यह सोचकर कि (यह ही पर्याप्त है कि) वह पुरुष है, सुंदर या कुरूप के साथ संभोग कर बैठती हैं।

     9.15. चाहे इस संसार में जितनी भी रक्षा क्यों न की जाए, पुरुषों के प्रति अपनी काम - भावना, अपनी चंचल प्रकृति और अपनी स्वाभाविक हृदयहीनता के कारण वह अपने पति के प्रति निष्ठारहित हो जाती हैं।

     9.16. उनका ऐसा स्वभाव जानकर, जो ब्रह्मा ने उन्हें अपनी सृष्टि के समय दिया है, प्रत्येक मनुष्य को उनकी रक्षा के लिए विशेष अमल करना चाहिए।

     9.17. मनु ने स्त्रियों की सृष्टि करते समय इनमें (अपनी ) शैया, (अपने) स्थान और (अपने ) आभूषणों के लिए प्रेम, वासना, क्रोध, बेइमानी, ईर्ष्या और दुराचरण निहित किया है।

     स्त्रियों के प्रति मनु के ये नियम अकाट्य हैं। स्त्रियां किसी भी परिस्थिति में स्वतंत्र नहीं हैं। मनु के 'मतानुसार

     9.2. स्त्रियों को उनके परिवारों के पुरुषों द्वारा दिन-रात अधीन रखा जाना चाहिए और यदि वे अपने को विषयों में आसक्त करें तो उन्हें अपने नियंत्रण में अवश्य रखें।

     9.3. स्त्री की रक्षा उसके बचपन में उसका पिता करता है, युवावस्था में उसका पति, जब उसका पति दिवंगत हो जाता है, तब उसके पुत्र ( उसकी रक्षा करते हैं)। स्त्री कभी भी स्वतंत्र रहने योग्य नहीं है।

     9. 5. स्त्रियों की विशेषकर रक्षा दुष्प्रवृत्ति से की जानी चाहिए, जो चाहे कितनी भी नगण्य ( क्यों न प्रतीत हों), क्योंकि यदि उनकी रक्षा नहीं की गई तो वे दोनों परिवारों के क्लेश का कारण बनती हैं।

     9.6. इसे सभी वर्णों का उत्तम धर्म समझते हुए, दुर्बल पतियों को भी अपनी पत्नी की रक्षा करने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए ।

     5.147. लड़की को नवयुवती को या वृद्धा को भी अपने घर में कोई काम स्वतंत्रतापूर्वक नहीं करना चाहिए ।

     5.148. स्त्री को बचपन में अपने पिता, युवावस्था में अपने पति और जब उसका पति दिवंगत हो जाए तब अपने पुत्रों के अधीन रहना चाहिए, स्त्री को कभी भी स्वतंत्र नहीं रहना चाहिए।

     5.149. स्त्री को अपने पिता, पति या पुत्रों से अपने को अलग करने की इच्छा नहीं करनी चाहिए, इनको त्याग कर वह दोनों परिवारों (उसका परिवार और पति का परिवार) को निंदित कर देती है। स्त्री को अपना पति छोड़ देने का अधिकार नहीं मिल सकता।

     9.45. पति अपनी पत्नी के साथ एक इकाई है। इसका तात्पर्य यह है कि स्त्री का एक बार विवाहित होने के बाद कोई विच्छेद नहीं हो सकता।

     बहुत से हिंदू यहीं रुक जाते हैं, मानों विवाह विच्छेद के बारे में मनु के नियम का यही सब कुछ सार हो और इसे आदर्श कहते रहते हैं। वह यह सोचकर अपने विवेक पर पर्दा डाल देते हैं कि मनु ने विवाह को संस्कार की तरह माना है और इसलिए उसने विच्छेद की अनुमति नहीं दी। यह बात निश्चय ही सत्य से कोसों दूर है। मनु के विच्छेद-नियम का बिल्कुल भिन्न उद्देश्य था । वह पुरुष को स्त्री से बांध देने की बात नहीं, बल्कि यह स्त्री को पुरुष से बांध देने और पुरुष को स्वतंत्र रखने की बात थी, क्योंकि मनु पुरुष को अपनी पत्नी को त्याग देने से नहीं रोकता। वस्तुतः वह उसे अपनी पत्नी को केवल छोड़ देने की अनुमति नहीं, बल्कि उसे बेच देने की भी अनुमति देता है। वह पत्नी को स्वतंत्र न रहने का नियम बनाता है। देखिए, मनु क्या कहता है:

     9.46. न तो बेचने और न त्याग देने से कोई स्त्री अपने पति से मुक्त होती है ।

     इसका अर्थ यह है कि कोई स्त्री बेचे या त्याग दिए जाने से किसी दूसरे व्यक्ति की, जिसने उसे खरीद लिया है या त्याग देने के बाद प्राप्त किया है, वैध पत्नी नहीं हो सकती। अगर यह असंगत नहीं है, तो कुछ भी असंगत नहीं हो सकता। लेकिन मनु अपने नियम के परिणामस्वरूप होने वाले न्याय या अन्याय के बारे में चिंतित नहीं था। वह स्त्री को उस स्वतंत्रता से वंचित कर देना चाहता था जो उसे बौद्ध काल में थी। वह यह जानता था कि स्त्री द्वारा अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने या शूद्र के साथ विवाह करने की उसकी इच्छा होने से वर्ण-व्यवस्था नष्ट हो गई थी। मनु स्त्री की स्वतंत्रता से क्रुद्ध था और इसे रोक कर उसने उसे उसकी स्वतंत्रता से वंचित कर दिया।

     संपत्ति के मामले में पत्नी का स्थान मनु द्वारा दास के स्तर पर लाकर पटक दिया गया।

     9.146. पत्नी, पुत्र और दास, इन तीनों के पास कोई संपत्ति नहीं हो। वे जो संपत्ति अर्जित करें, वह उसकी होती हैं, जिसकी वह पत्नी / पुत्र / दास हैं।

     परिवार में रहते हुए अगर वह विधवा हो जाए, तब मनु उसके लिए निर्वाह-योग्य व्यय की अनुमति देता है। और अगर उसका पति अपने परिवार से अलग था, तब उसे उसके पति की संपत्ति में से विधवा को संपत्ति मिलेगी। लेकिन मनु उसे संपत्ति पर अधिकार की अनुमति नहीं देता।

     मनु के नियमों के अधीन स्त्री को शारीरिक दंड दिया जा सकता है और मनु पति को अपनी पत्नी को मारने पीटने की अनुमति देता है।

     8.299. स्त्री, पुत्र, दास, शिष्य और छोटा भाई यदि अपराध करे, तब रस्सी से या बांस की छड़ी से पीटना चाहिए ।

     अन्य परिस्थितियों में मनु स्त्री का स्थान शूद्र के स्थान के समान मानता है। उसे वेद का अध्ययन मनु द्वारा उसी प्रकार निषिद्ध किया गया जिस प्रकार शूद्र को ।

     2.66. स्त्री के लिए भी संस्कारों का किया जाना जरूरी है और वे किए जाने चाहिए। लेकिन ये वेद मंत्रों के बिना किए जाने चाहिए।

     9.18. स्त्रियों को वेद पढ़ने का कोई अधिकार नहीं है। इसलिए उनके संस्कार वेद मंत्रों के बिना किए जाएं। चूंकि स्त्रियों को वेद को जानने का अधिकार नहीं है इसलिए उन्हें धर्म का कोई ज्ञान नहीं हो पाप दूर करने के लिए वेद मंत्रों का पाठ उपयोगी है। चूंकि स्त्रियां वेद मंत्रों का पाठ नहीं कर सकतीं, वे उसी प्रकार अपवित्र हैं जिस प्रकार असत्य अपवित्र होता है।

     ब्राह्मण मत के अनुसार, यज्ञ करना धर्म का सार है, फिर भी मनु स्त्रियों को यज्ञ करने की अनुमति नहीं देता । मनु निदेश देता है:

     11.36. स्त्री वेद विहित दैनिक अग्निहोत्र नहीं करेगी।

     11.37. यदि वह करती है, तब वह नरक में जाएगी।

     मनु स्त्री को ब्राह्मण पुरोहित की सहायता व उसकी सेवा ग्रहण करने से वर्जित करता है, जिससे वह यज्ञ-कर्म न कर सके।

     4.205. ब्राह्मण उस यज्ञ कर्म में दिए गए भोजन को ग्रहण न करे, जो किसी स्त्री द्वारा किया गया हो ।

     4.206. जो यज्ञ कर्म स्त्रियों द्वारा किए जाते हैं, वे अशुभ और देवताओं को अस्वीकार्य होते हैं। अतः उसमें भाग नहीं लेना चाहिए।

     स्त्रियों को कोई बौद्धिक कार्य नहीं करना चाहिए, उनको स्वतंत्र इच्छा नहीं करनी चाहिए और न ही उन्हें अपने विचारों में स्वतंत्र होना चाहिए। वह कोई अन्य धर्म, जैसे बौद्ध धर्म स्वीकार नहीं कर सकतीं। यदि वह आजीवन उसका पालन करती हैं तब उन्हें जल का तर्पण नहीं किया जाएगा, जो अन्य मृतकों के लिए किया जाता है।

     अंत में, जीवन के उस आदर्श को भी देखिए जो मनु स्त्रियों के लिए निर्धारित करता है। इसे उसी के शब्दों में कहना उचित होगा:

     5.151. वह आजीवन उसकी आज्ञा का पालन करेगी जिसे उसका पिता, या उसका भाई अपने पिता की अनुमति से उसे सौंप देगा और जब वह दिवंगत हो जाए तब उसके श्राद्ध आदि कर्म का उल्लंघन नहीं करेगी।

     5.154. चाहे पति सदाचार से हीन हो, या वह अन्य स्त्री में आसक्त हो, या वह सद्गुणों से ही हीन हो, तो भी वह पतिव्रता स्त्री के द्वारा देवता के समान पूज्य होता है।

     5.155. स्त्री पति से पृथक कोई यज्ञ, कोई व्रत या उपवास न करे; यदि स्त्री अपने पति का अनुपालन करती है, तब वह इस कारण ही स्वर्ग में पूजित होती है।

     अब उन विशिष्ट सूत्रों पर ध्यान दीजिए, जो उस आदर्श के आधार हैं जिसे मनु ने स्त्रियों के लिए प्रस्तुत किया है।

     5.153. जिस पति ने किसी का वरण अपनी पत्नी के रूप में पवित्र मंत्रों के उच्चारण के बाद किया है, वह उसके लिए ऋतुकाल में तथा ऋतुभिन्न काल में भी नित्य ही इस लोक में तथा परलोक में सुख देने वाला होता है।

     5.150. उसे सर्वदा प्रसन्न, गृहकार्य में चतुर, घर में बर्तनों को स्वच्छ रखने में सावधान तथा खर्च करने में मितव्ययी होना चाहिए ।

     हिंदू लोग इसे स्त्रियों के लिए सर्वोच्च आदर्श समझते हैं।



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