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ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म (भाग 11) - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

     मनु के प्रतिलोम विवाह को रोक दिया और इस प्रकार उच्च वर्ण के आने पर रोक लगा दी। यह चाहे जितना भी खेदजनक क्यों न हो, जब तक अनुलोम विवाह और पितृ-सवर्ण्य का नियम व्यवहृत होता रहा, तब तक कोई अधिक क्षति नहीं हुई। इन दोनों ने मिलकर एक बहुत ही उपयोगी व्यवस्था का निर्माण किया। अनुलोम विवाह पद्धति ने परस्पर संबंध की बनाए रखा और पितृ-सवर्ण्य नियम ने उच्च वर्णों की स्वयं को पर्याप्त सुगठित रखने में सहायता की। वे निम्न वर्ण में जा नहीं सकते थे, लेकिन वे विभिन्न वर्णों की माताओं से जन्मते रहे। ब्राह्मणवाद विभिन्न वर्गों के बीच संबंध के इस द्वार को खुला रखने का इच्छुक नहीं था। यह उसे बंद कर देने पर तुला बैठा था। उसने इसे ऐसी रीति से किया जो अप्रतिष्ठाजनक है। सीधा और सच्चा रास्ता अनुलोम विवाह को रोक देना था। लेकिन ब्राह्मणवाद ने ऐसा नहीं किया। उसने अनुलोम विवाह पद्धति को जारी रखा। उसने जो कुछ किया, वह यह कि उसने शिशु की स्थिति का निर्णय करने वाले नियम को बदल दिया । उसने पितृ-सवर्ण्य नियम के स्थान पर मातृ-सवर्ण्य नियम लागू किया, जिससे शिशु की स्थिति मां की स्थिति के आधार पर निर्धारित की जाने लगी। इस परिवर्तन से विवाह परस्पर सामाजिक संपर्क का वह साधन नहीं रह गया, जो वह मुख्य रूप से है। इससे उच्च वर्ण के पुरुष अपने बच्चों के प्रति अपने उत्तरदायित्व से सिर्फ इसलिए मुक्त हो गए कि ये बच्चे निम्न मां से पैदा हुए हैं। इसने अनुलोम विवाह का सिर्फ भाग, निम्न वर्गों को सताने और अपमानित करने और उच्च वर्णों को निम्न वर्ण की स्त्रियों के साथ कानूनी रूप में वेश्या कर्म करने, का एक साधन बना दिया। और व्यापक सामाजिक दृष्टि से इसने वर्णों को एक-दूसरे से पूरी तरह अलग-अलग कर दिया। वर्णों में परस्पर यही अलगाव हिंदू समाज के लिए शाप हो गया है। इस सबके बावजूद कट्टर हिंदू अभी भी यह विश्वास करता है कि जाति व्यवस्था एक आदर्श व्यवस्था है। लेकिन कट्टर हिन्दुओं की ही चर्चा क्यों करें। ऐसे लोग तो प्रबुद्ध राजनीतिज्ञों और इतिहासकारों में भी मिल जाएंगे। राजनीतिज्ञों और इतिहासकारों, दोनों में ही ऐसे भारतीय आसानी से मिल जाते हैं जो जोरदार शब्दों से इसका खंडन करते हैं कि जाति-व्यवस्था राष्ट्र-प्रेम के आड़े आती है। यह मानते हैं कि भारत एक राष्ट्र है और जब कोई भारत राष्ट्र न कहकर भारत देश कहता है, तब वे | बहुत गुस्सा हो जाते हैं जैसे कि उनके विरुद्ध कोई खराब बात कह दी गई हो। समझ में नहीं आता कि यह दृष्टिकोण क्यों है । राजनीतिज्ञों और इतिहासकारों में ज्यादातर लोग ब्राह्मण हैं और उनसे यह आशा नहीं हो सकती कि वे अपने पूर्वजों के कुकृत्यों को स्वीकार कर लें। किसी से भी यह सवाल कीजिए, क्या भारत एक राष्ट्र न कहकर भारत देश कहता है, तब वे बहुत गुस्सा हो जाते हैं जैसे कि उनके विरुद्ध कोई खराब बात कह दी गई हो। समझ में नहीं आता कि यह दृष्टिकोण क्यों है। राजनीतिज्ञों और इतिहासकारों में ज्यादातर लोग ब्राह्मण हैं और उनसे यह आशा नहीं हो सकती कि वे अपने पूर्वजों के कुकृत्यों का पर्दाफाश करने का साहस करें या उनके कुकृत्यों को स्वीकार लें। किसी से भी यह सवाल कीजिए, क्या भारत एक राष्ट्र है और वे एक स्वर में 'हां' कहें। आप इसके कारण पूछिए। वे कहेंगे कि भारत एक राष्ट्र है, पहला कारण तो यह कि भारत एक भौगोलिक इकाई है और दूसरा कारण यहां की संस्कृति में मूलभूत एकता का होना है। यह सब तो तर्क के लिए स्वीकार किया जा सकता है, फिर भी सच बात तो यह है कि इससे यह निष्कर्ष  निकालना कि भारत एक राष्ट्र है, भ्रांति को पाले रखना है। राष्ट्र क्या? राष्ट्र उस अर्थ में कोई देश नहीं होता, जिसकी भौतिक सीमाएं होती हैं, चाहे ये कितनी ही दूर तक क्यों न फैली हुई हों। राष्ट्र वह जनसंख् नहीं होती जो एक भाषा, एक धर्म या एक प्रजाति होने के कारण परस्पर संश्लिष्ट रहती है। मैंने इस बारे में एक जगह कहा है :

brahmanvad ki Vijay Raja Hatya Athva Prati Kranti ka Janm - dr Bhimrao Ramji Ambedkar

     “राष्ट्रीयता व्यक्तिनिष्ठ मनोवैज्ञानिक अनुभूति है । यह अनुभूति जिसमें होती है, वे सब यह अनुभव करते हैं कि वे एक-दूसरे के सगे-संबंधी हैं। राष्ट्रीयता की भावना दुधारी तलवार की तरह होती है। यह अपने संबंधियों के प्रति मैत्री भाव, और जो लोग संबंधी नहीं हैं, उनके प्रति अमैत्री भाव जागृत करती है। यह 'वर्ण चेतना' की भावना, जो उन सभी लोगों को परस्पर एकसूत्र में बांधती है जो खून के रिश्ते की सीमा में आते हैं और जो इस सीमा में नहीं आते उनसे पृथक कर देती है। यह अपने वर्ग से जुड़े रहने की इच्छा है। यह दूसरे वर्ग से न जुड़ने की इच्छा है। जिसे राष्ट्रीयता या राष्ट्रीय भावना कहा जाता है, उसका यही सार है। अपने ही वर्गों से जुड़े रहने की इच्छा है। यह दूसरे वर्ग से न जुड़ने की इच्छा है। जिसे राष्ट्रीयता की भावना कहा जाता है, उसका यही सार है। अपने ही वर्गों से जुड़े रहने की यह इच्छा, जैसा कि मैंने कहा, व्यक्तिनिष्ठ मनोवैज्ञानिक भावना है और जो बात खासतौर से याद रखने की है, वह यह है कि अपने ही वर्ग से जुड़े रहने की इच्छा का भूगोल - संस्कृति या आर्थिक या सामाजिक संघर्ष से कोई सरोकार नहीं होता। कहीं भौगोलिक एकता हो सकती है, लेकिन तो भी जुड़ने की इच्छा नहीं हो सकती । आर्थिक संघर्ष और वर्ग विभाजन हो सकते हैं, लेकिन जुड़े रहने की इच्छा रहे। कहना यह है कि राष्ट्रीयता मुख्यतः भूगोल, संस्कृति का विषय नहीं है। "

     वैदिक काल की अवनति¹ के दिनों शूद्रों और स्त्रियों का स्थान बहुत नीचे हो गया था। बौद्ध धर्म के अभ्युदय ने इन दोनों की स्थिति में एक महान परिवर्तन ला दिया। संक्षेप में कहें तो यह कि बौद्ध काल में शूद्र संपत्ति, विद्या अर्जित कर सकता था और यहां तक कि वह राजा भी बन सकता था। बल्कि वह समाज में सर्वोच्च स्थान तक पहुंच सकता था, जो वैदिक शासन में ब्राह्मण के अधिकार में होता था। बौद्ध भिक्षु-व्यवस्था वैदिक ब्राह्मण-व्यवस्था का प्रतिरूप थी। ये दोनों ही व्यवस्थाएं अपने-अपने धर्म की व्यवस्थाओं में पद और प्रतिष्ठा की दृष्टि से एक-दूसरे के समान थीं। वैदिक काल में शूद्र ब्राह्मण बनने की कभी आकांक्षा नहीं कर सकता था, लेकिन वह भिक्षु बन सकता था और उसी पद और प्रतिष्ठा को प्राप्त कर सकता था, जो ब्राह्मण को प्राप्त थी। वेदों के ब्राह्मणवाद में शूद्रों का प्रवेश वर्जित था, लेकिन भिक्षुओं के बौद्ध धर्म के द्वार शूद्रों के लिए खुले हुए थे। बहुत से शूद्रों ने जो वैदिक काल में ब्राह्मण नहीं बन सके, बौद्ध


1. अवनति के दिनों से मेरा तात्पर्य उस समय से है, जब ब्राह्मणों ने चातुर्वर्ण्य के संतुलन को अपनी श्रेष्ठता का दावा कर बिगाड़ना शुरू कर दिया था।


धर्म में भिक्षु बने और उन्होंने ब्राह्मण के समान पद प्राप्त किया। इसी प्रकार के परिवर्तन स्त्रियों के संबंध में भी मिलते हैं। बौद्ध धर्म के अधीन उसे स्वतंत्र स्थान मिला। विवाह हो जाने पर भी उसका स्थान स्वतंत्र रहा। बौद्ध धर्म में विवाह एक संविदा था। बौद्ध धर्म के अनुसार वह संपत्ति अर्जित कर सकती थी। वह विद्या अर्जित कर सकती थी और जो सबसे विलक्षण बात थी, वह यह कि बौद्ध धर्म में भिक्षुणी बन सकती थी और उसी पद और प्रतिष्ठा को प्राप्त कर सकती थी, जो ब्राह्मण को प्राप्त थी। शूद्रों और स्त्रियों को ऊंचा स्थान दिलाने में बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का इतना अधिक प्रभाव पड़ा कि बौद्ध धर्म के विरोधी इसे शूद्र धर्म (अर्थात् निम्न वर्ग के लोगों का धर्म ) कहते थे।

     निस्संदेह इस सबसे ब्राह्मणों को बड़ी खीज होती होगी। इससे ब्राह्मणों को कितनी अधिक खीज हुई, यह उनके उस बर्बर व्यवहार से स्पष्ट है, जो उन्होंने बौद्ध धर्म पर विजय पाने के बाद शूद्रों और स्त्रियों की उस उच्च स्थिति को पूर्ण ध्वस्त करने के लिए अपनाया जहां ये बौद्ध धर्म के जीवनदायी सिद्धांतों के आधार पर क्रांतिकारी परिवर्तन के कारण प्रतिष्ठित हुए थे।

     इस पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर अगर हम शूद्रों के बारे में मनु के बनाए गए नियमों पर विचार करें, तो इनकी अमानवीयता और निर्दयता को देखकर कंपकंपी आ जाती है। मैं यहां उनमें से कुछ को कुछ फुटकर शीर्षकों के अंतर्गत उद्धृत कर रहा हूं।

     मनु ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ग के गृहस्थों से कहता है:

     4.61. वह उस देश में न रहें, जहां के शासक शूद्र हैं। ....

     इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य उस देश को छोड़कर चले जाएं जहां शूद्र शासक है। इसका यही अर्थ हो सकता है कि अगर शूद्र शासक बन जाए तो उसे मार डालना चाहिए। शूद्र को न केवल राजा होने के अयोग्य समझना चाहिए, बल्कि उसे आदर के भी योग्य नहीं समझना चाहिए। मनु नियम बनाता है:

     11.24. ब्राह्मण यज्ञ के लिए (अर्थात् धार्मिक कार्यों के लिए) शूद्र से भिक्षा नहीं मांगेगा।

     शूद्र के साथ सभी विवाह संबंध गैर-कानूनी कर दिए गए। तीनों उच्च वर्गों में से किसी भी वर्ग की स्त्री के साथ विवाह निषिद्ध कर दिया गया। शूद्र उच्च वर्गों की स्त्री के साथ कोई संबंध नहीं रख सकता था और यदि कोई शूद्र उसके साथ जार कर्म करता है, तब मनु ने उसे ऐसा अपराध घोषित किया, जिसके लिए प्राण दंड दिया जाए।

     8.374. किसी शूद्र ने उच्च वर्ग की रक्षित¹ या अरक्षित स्त्री के साथ संभोग किया है, उसे निम्नलिखित रीति से दंड दिया जाए, यदि वह अरक्षित थी, तब इसका लिंग कटवा दिया जाए, यदि वह रक्षित थी तब उसे प्राण दंड दिया जाए और उसकी संपत्ति जब्त कर ली जाए।


1. रक्षित का अर्थ है संबंधियों के संरक्षण में अरक्षित का अर्थ है - अकेले ।



     मनु इस बात पर बल देता है कि शूद्र नीच रहेगा, पद के अयोग्य, अशिक्षित, संपत्ति-रहित और निंदित व्यक्ति रहेगा, उसे और उसकी संपत्ति का बलपूर्वक उपयोग किया जा सकेगा। पद के बारे में मनु निर्धारित करता है:

     8.20. कोई भी ब्राह्मण जो जन्म से ब्राह्मण है, अर्थात् जिसने न तो वेदों का अध्ययन किया है और न वेदों द्वारा अपेक्षित कोई कर्म किया है, वह राजा के अनुरोध पर उसके लिए धर्म का निर्वचन कर सकता है, अर्थात् न्यायाधीश के रूप में कार्य कर सकता है, लेकिन शूद्र यह कभी भी नहीं कर सकता ( चाहे वह कितना ही विद्वान क्यों न हो) ।

     8.21. जिस राज्य में उसका राजा दर्शक की भांति केवल देखता रहता है और उसी की ही उपस्थिति में शूद्र न्याय करता है, वह राज्य उसी प्रकार अधोगति को प्राप्त होता है जिस प्रकार गाय दलदल में नीचे धंस जाती है।

     8.272. अगर कोई शूद्र अभिमानपूर्वक ब्राह्मण को धर्मोपदेश देने का साहस करता है, तो राजा उसके मुंह और कानों में खौलता हुआ तेल डलवाएं।

     प्राचीन काल में वेदों के अध्ययन का तात्पर्य विद्या था । मनु घोषित करता है कि प्रत्येक व्यक्ति को वेदों के अध्ययन करने का अधिकार नहीं है और यह अधिकार कुछ लोगों को ही प्राप्त है। मनु शूद्रों को वेदों के अध्ययन करने का अधिकार नहीं देता । वह यह विशेषाधिकार केवल तीन उच्च वर्णों को देता है। वह शूद्रों को अध्ययन करने से वंचित ही नहीं करता बल्कि उन व्यक्तियों के विरुद्ध दंड की व्यवस्था भी करता है जो शूद्रों को वेदों का अध्ययन करने में सहायता करेगा। जिस व्यक्ति को वेदों के अध्ययन करने का विशेषाधिकार प्राप्त है, उसके लिए मनु निर्देश देता है:

     4.99. उसे शूद्रों की उपस्थिति में वेदों का कभी भी अध्ययन नहीं करना चाहिए।

     और निर्धारित करता है:

     3.156. जो शूद्र शिष्यों को शिक्षा देता है और जिसका गुरु कोई शूद्र है, वह श्राद्ध में निमंत्रित करने के अयोग्य हो जाता है।

     मनु के बाद के स्मृतिकार तो वेदों का अध्ययन करने पर शूद्रों के साथ किए जाने वाले निर्दय व्यवहार में उनसे भी आगे निकल गए। उदाहरण के लिए, कात्यायन का यह नियम है कि जो शूद्र किसी को वेद पढ़ते हुए सुन लेता है या वेद के एक शब्द का भी उच्चारण करने का साहस करता है, राजा उसकी जिह्वा को चिरवा देगा और उसके कानों में पिघलता हुआ जस्ता डलवाएगा।

     संपत्ति के विषय में मनु कोई दया का व्यवहार नहीं करता और वह हठी भी है। मनु की संहिता के अनुसार :

     10. 129. किसी भी शूद्र को संपत्ति का संग्रह नहीं करना चाहिए, चाहे वह इसके लिए कितना ही समर्थ क्यों न हो, क्योंकि जो शूद्र धन का संग्रह कर लेता है, उसे इसका मद हो जाता है और वह अपने उद्धृत या उपेक्षापूर्ण व्यवहार से ब्राह्मणों को कष्ट पहुंचाता है।

     इस नियम का प्रयोजन नियम की अपेक्षा कहीं अधिक उग्र था । वस्तुतः मनु को यह विश्वास नहीं था कि शूद्र को संपत्ति अर्जित करने से रोकने के लिए यह निषेधाज्ञा यथेष्ट होगी। शूद्र को संपत्ति एकत्र कर ब्राह्मण की अवज्ञा करने का अवसर ही न मिले, यह सुनिश्चित करने के लिए मनु ने अपनी संहिता में एक और खंड जोड़ दिया। इसमें उसने घोषित किया:

     8.417. यदि किसी ब्राह्मण का जीवन संकटग्रस्त हो, वह निस्संकोच शूद्र के धन को अधिग्रहीत कर ले।

     मनु निर्धारित करता है कि शूद्र का धन ही नहीं, बल्कि शूद्र का श्रम भी अधिग्रहीत किया जा सकेगा। मनु की निम्न व्यवस्था की तुलना करें:

     8.413. ब्राह्मण शूद्र को वेतन देकर या वेतन न देकर उसे दास कर्म करने के लिए बाध्य कर सकता है क्योंकि ब्रह्मा ने ब्राह्मणों की सेवा के लिए ही शूद्रों की सृष्टि की है।

     मनु शूद्र से यह अपेक्षा करता है कि वह बोल-चाल में नीच होगा। वह अपनी बोलचाल में किस सीमा तक नीच हो सकता है, यह मनु द्वारा की गई निम्नलिखित व्यवस्थाओं से देखा जा सकता है:

     8.270. जो शूद्र द्विज व्यक्ति की उसे दारुण वचनों से संबोधित कर अवमानना करता है, उसकी जीभ कटवा देनी चाहिए, क्योंकि वह नीच से उत्पन्न है।

     8.271. यदि वह (द्विज) और उसकी जाति का नाम धृष्टतापूर्वक लेता है, तब उसके मुख में दस अंगुल लंबी दहकती हुई लोहे की कील डाल देनी चाहिए ।

     मनु का उद्देश्य शूद्र को केवल नीच बनाकर ही नहीं, बल्कि पूरी तरह तिरस्कार के योग्य बना देना था। मनु शूद्र को अपने बड़े-बड़े नाम रखने की अनुमति नहीं देता । अगर मनु के ये अकाट्य प्रमाण नहीं उपलब्ध होते, तब यह विश्वास करना कठिन हो जाता कि ब्राह्मणवाद शूद्र पर अत्याचार करने में इतना अधिक कठोर और दया - शून्य था। विभिन्न वर्ग अपने-अपने बच्चों के नाम किस प्रकार रखें, इस संबंध में मनु के नियम पर विचार कीजिए:

     2.31. ब्राह्मण के नाम का पहला भाग ऐसा हो जो शुभ हो, क्षत्रिय का शक्ति से संबंधित, वैश्य का संपत्ति से और शूद्र का पहला नाम ऐसा हो जो तिरस्कारणीय भाव का सूचक हो ।

     2.32. ब्राह्मण के नाम का दूसरा भाग ऐसा हो जिसमें सुख का भाव निहित हो, क्षत्रिय का ऐसा हो जिसमें रक्षा का भाव और वैश्य का ऐसा हो जिसमें समृद्धि का भाव तथा शूद्र का ऐसा हो जो सेवा करने का भाव सूचित करे ।

     इन सारे अमानवीय नियमों का आधार वह सिद्धांत है, जिसका प्रतिपादन मनु ने शूद्रों के संबंध में किया था। स्मृति में आरंभ में मनु जोरदार शब्दों में और बिना हिचक कहता है:

     1.91. ब्रह्मा ने शूद्र के लिए केवल एक कर्म निर्धारित किया है कि वह विनम्र होकर इन तीन अन्य जातियों (अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ) की सेवा करे ।



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