फुले - शाहू - आंबेडकर
शूद्रों और स्त्रियों के बारे में इन नियमों का कठोर होना यह प्रमाणित करता है कि बौद्ध-काल में इन वर्गों के अभूतपूर्व अभ्युदय ने ब्राह्मणों को रुष्ट ही नहीं किया, बल्कि उनकी स्थिति इन्हें असहनीय हो गई थी। यह ऊपर से नीचे तक उनकी पवित्र सामाजिक व्यवस्था को पूरी तरह उलट देना था। जिसका स्थान प्रथम था, वह अंतिम हो गया और जो अंतिम स्थान पर था, वह प्रथम स्थान पर आ गया था। मनु के नियम से यह भी स्पष्ट होता है कि ब्राह्मणों ने किस प्रकार जान-बूझकर शूद्रों और स्त्रियों को पदावनत कर उनकी स्थिति पर लाने के लिए अपनी राजनैतिक शक्ति का उपयोग किया। विजयोन्मत्त ब्राह्मणों ने पुराने आदर्श के अनुसार अर्थात् इनको दसावत बनाए रखकर शूद्रों और स्त्रियों के विरुद्ध जोरदार अभियान शुरू किया और वे इनको पराधीन बनाने में सफल भी हुए। शूद्र तीनों उच्च वर्ण के दास और स्त्रियां अपने-अपने पतियों की गुलाम बना दी गई बौद्ध धर्म पर विजय पाने के बाद ब्राह्मण वाद ने जो काले कारनामे किए, उनमें सबसे ज्यादा काला कारनामा यही था । इतिहास में इसके जोड़ की कोई मिसाल नहीं मिलती जहां बलपूर्वक अधिकार जमाने वाली किसी सत्ता ने अपने वर्ग के आधिपत्य को बनाए रखने के लिए किसी को इस प्रकार पदावनत करने के इतने घृणित कार्य किए हों। ब्राह्मणवाद ने पददलित करने का जो कार्य किया, उसे दुर्भाग्यवश उसमें पूरी सफलता नहीं मिली। यह 'स्त्री' और 'शूद्र' जैसे शब्दों तक रह गई। जो लोग अपने पातक कर्म की थोड़ी बहुत झलक पाना चाहते हैं, वह इन दोनों शब्दों के पीछे खड़ी भीड़ को देखें। ये शब्द जनसंख्या के कितने बड़े भाग को अपने में समेट लेते हैं? स्त्रियां सारी जनसंख्या का आधा भाग हैं। जो कुछ बचा, उसमें दो तिहाई तक शूद्र हैं। ये दोनों मिलकर सारी जनसंख्या का 75 प्रतिशत तक होते हैं। यह वह विशाल जनसमूह है जिसे ब्राह्मणवाद पर पदावनत कर 75 प्रतिशत लोगों से उनके जीने का, उनकी आजादी का और उनके सुख-चैन से रहने का अधिकार छीन लिया गया, जिसके कारण अगर भारत एक मृत राष्ट्र नहीं तो ह्रासशील राष्ट्र बनकर रह गया।
वर्गीकृत असमानता का सिद्धांत सारी मनुस्मृति में छाया हुआ है। जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां मनु ने वर्गीकृत असमानता के सिद्धांत को आधार न बनाया हो । इस सिद्धांत की पूरी व्याख्या करने के लिए सारी मनुस्मृति को पुनः उद्धृत करना होगा। मनु के कारण वर्गीकृत असमानता का सिद्धांत किस तरह सामाजिक जीवन में रच-पच गया है, इसे स्पष्ट करने के लिए मैं कुछ ही क्षेत्रों की चर्चा करूंगा। विवाह को लीजिए और मनु के नियमों को देखिए
3.13. शूद्र स्त्री केवल शूद्र की पत्नी बन सकती है, वह और वैश्य स्त्री वैश्य पुरुष की, शूद्र और वैश्य स्त्री क्षत्रिय पुरुष की, तथा यह तीनों वर्णों की स्त्रियां तथा ब्राह्मणी- ब्राह्मण की पत्नी हो सकती है।
अब अतिथियों के सत्कार के बारे में मनु के नियम लीजिए:
3.110. लेकिन क्षत्रिय जो ब्राह्मण के घर आता है, अतिथि नहीं कहलाता, न वैश्य, न शूद्र और न कोई मित्र, न संबंधी, न ही गुरु ।
3.111. लेकिन क्षत्रिय अगर ब्राह्मण के घर अतिथि के रूप में आ जाए, तब गृहस्थ उसे उक्त ब्राह्मणों के भोजन करने के बाद अपनी इच्छानुसार भोजन कराए।
3.112. यदि कोई वैश्य और कोई शूद्र उसके घर अतिथि के रूप में आ जाए, तब वह उसे दया भाव से अपने सेवकों के साथ भोजन करा सकता है।
ब्राह्मण के घर में ब्राह्मण के अतिरिक्त किसी और को अतिथि बनने का गौरव नहीं मिल सकता।¹ अगर कोई क्षत्रिय अतिथि के रूप में ब्राह्मण के घर आता है, तब उसे सभी ब्राह्मणों के बाद भोजन कराना चाहिए और अगर वैश्य और शूद्र अतिथि के रूप में आएं, तब उन्हें सब लोगों के बाद और केवल नौकरों के साथ भोजन कराना चाहिए।
संस्कारों के बारे में मनु के नियम देखिए :
10. 126. शूद्र को यह अधिकार नहीं है कि उसका संस्कार हो ।
10.68. यह विधान है कि इन दोनों (अर्थात् जो मिश्रिम जाति के हैं) में से कोई भी संस्कार के योग्य नहीं है, पहला वह जो नीच माता-पिता से उत्पन्न होने के कारण जातियों के क्रम के प्रतिलोम हैं और नीच हैं।
2.66. स्त्रियों के सारे संस्कार² उनकी काया को पवित्र करने के लिए उचित समय पर तथा उचित क्रम से किए जाने चाहिए। लेकिन यह पवित्र मंत्रों के उच्चारण के बिना हो ।
मनु और आगे निर्धारित करता है:
6.1. द्विज स्नातक जो इस प्रकार गृहस्थाश्रम के नियमों के अनुसार जीवनयापन कर चुका है, संकल्प-मन हो और अपनी इंद्रियों को अपने अधीन कर (नीचे दिए गए नियमों का विधिवत् पालन करते हुए) वन में रहे।
6.33. और इस प्रकार ( पुरुष की सामान्य आयु) का तृतीयांश वन में बिताने के बाद वह सभी सांसारिक विषयों में आसक्ति को त्याग कर अपनी आयु का चतुर्थांश संन्यासी के रूप में व्यतीत करे।
मनु ने वर्गीकृत असमानता को न्याय व्यवस्था का भी आधार बनाया है। उदाहरण के लिए केवल दो, मानहानि व दुर्व्यवहार और मारपीट संबंधी कानून लीजिए:
8.267. ब्राह्मण से कटु वचन बोलने वाले क्षत्रिय को सौ पण, वैश्व को डेढ़ सौ या दो सौ पण का दंड और शूद्र को शारीरिक दंड दिया जाए।
8.268. क्षत्रिय से कटु वचन बोलने वाले ब्राह्मण को पचास पण, वैश्य के मामले में पच्चीस पण और शूद्र के मामले में बारह पण का दंड दिया जाए।
1. मनु अतिथि शब्द का प्रयोग पारिभाषिक अर्थ में करता है और इसका अर्थ उस ब्राह्मण से है, जो केवल एक रात्रि के लिए रुकता है। देखिए 3.102
2. उपनयन के अतिरिक्त सभी संस्कार, जो स्त्रियों के लिए वर्जित हैं।
8.269. समान जाति (वर्ण) वाले से कटु वचन बोलने वाले द्विज को बारह पण तथा ऐसे वचन बोलने पर जो उच्चारण योग्य नहीं है, प्रत्येक अपराध के लिए दुगना दंड दिया जाना चाहिए।
8.276. ब्राह्मण और क्षत्रिय द्वारा एक-दूसरे को अपवचन कहने पर विवेकशील राजा ब्राह्मण को सबसे कम आर्थिक दंड और क्षत्रिय को सबसे मध्यम आर्थिक दंड दे।
8.277. वैश्य और शूद्र को भी इसी प्रकार उनकी अपनी जातियों के अनुसार दंड देना चाहिए लेकिन उसकी (शूद्र की) जीभ नहीं काटनी चाहिए, यही निर्णय है। 8.279. नीची जाति का व्यक्ति अपने जिस किसी भी अंग से (तीन उच्च जातियों के) व्यक्ति को क्षति पहुंचाए, वह अंग ही काट दिया जाए, यह मनु का आदेश है।
8.280. जो अपना हाथ उठाए या लाठी या छड़ी ले, उसका हाथ काट दिया जाए, अगर वह क्रुद्ध हो अपने पैर से मारे, तब उसका पैर काट दिया जाए । यह मनु का आदेश है।
वर्गीकृत असमानता का सिद्धांत सभी जगह मिलता है । यह सामाजिक व्यवस्था के लिए इतना पक्का हो गया कि जहां कहीं मनु इसे अपना आधार बनाने से चूक गया वहां उनके अनुयायियों ने इसे ला देने में कोई भी चूक नहीं की । उदाहरणार्थ, मनु ने दास प्रथा को मान्यता दी थी, लेकिन वह यह सुनिश्चित नहीं कर पाया था कि वर्गीकृत असमानता का सिद्धांत दास प्रथा का आधार बन सकता है या नहीं।
कहीं यह समझ जाएं कि वर्गीकृत असमानता दासत्व का आधार नहीं बन सकती और ब्राह्मण शूद्र का दास बन सकता है। याज्ञवल्क्य इस संदेह को शीघ्र ही स्पष्ट कर देते हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था :
14.183. दासत्व का आधार वर्णों का अवरोही क्रम है न कि आरोही क्रम ।
याज्ञवल्क्य स्मृति की शंका में प्रज्ञानेश्वर ने अपना एक उदाहरण देकर उक्त कथन की पुष्टि की है। वह लिखते हैं:
ब्राह्मण और शेष वर्णों आदि में दासत्व का आधार अवरोही क्रम में अनुलोम्येन होगा। इस प्रकार क्षत्रिय और शेष वर्ण ब्राह्मण का दास हो सकता है, वैश्य और शूद्र क्षत्रिय का, और शूद्र वैश्य का दास हो सकता है। इस प्रकार दास प्रथा अवरोही क्रम में व्यवहृत होगी।
समानता और असमानता की भाषा में कहा जाए तो इसका अर्थ है कि चूंकि ब्राह्मण किसी का भी दास नहीं हो सकता और उसे किसी भी वर्ग के व्यक्ति को अपने दास के रूप में रखने का अधिकार है अतः वह उच्चतम है। चूंकि शूद्र को हर वर्ग अपने दास के रूप में रख सकता है और वह शूद्र के अतिरिक्त किसी को भी अपना दास नहीं बना सकता अतः वह निम्नतम है। क्षत्रिय और वैश्य को जो स्थान दिया गया है, उससे वर्गीकृत असमानता की प्रणाली लागू हो जाती है। चूंकि क्षत्रिय ब्राह्मण से हीन है इसलिए वह उन्हें अपना दास बनाकर रख सकता है, वैश्यों और शूद्रों को क्षत्रिय को अपने दास के रूप में रखने का कोई अधिकार नहीं है। इसी प्रकार वैश्य, जो ब्राह्मणों और क्षत्रियों से हीन है और जिसे वे अपना दास बना सकते हैं। लेकिन वह इनमें से किसी को भी अपना दास नहीं बना सकता, वह गर्व कर सकता है कि वह कम से कम शूद्र से तो श्रेष्ठ है और उसे वह अपना दास बना सकता है। लेकिन शूद्र वैश्य को अपना दास नहीं बना सकता ।
यही वर्गीकृत असमानता का सिद्धांत है, जिसे ब्राह्मणवाद ने समाज की हड्डियों और मज्जा में घोल दिया। अन्याय को समाप्त करने के लिए समाज को पंगु बनाने के लिए इससे अधिक बुरा कुछ और नहीं किया जा सकता था। हालांकि इसके प्रभाव स्पष्ट रूप से नजर नहीं आते लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि इसके कारण हिंदू पंगु हो गए। समाज का अध्ययन करने वाले विद्यार्थी समानता और असमानता के बीच अंतर को पढ़कर संतुष्ट हो जाते हैं। कोई यह नहीं अनुभव करता कि समानता और असमानता के अलावा वर्गाश्रित असमानता जैसी भी एक चीज है। यह वर्गीकृत असमानता जितनी हानिकर है, उसकी आधी भी असमानता हानिकर नहीं होती। असमानता में उसके विनाश के बीज छिपे होते हैं। असमानता अधिक दिनों तक नहीं रहती । जहां केवल असमानता होती है, वहां दो बातें होती हैं। उससे असंतोष जन्म लेता है जो क्रांति का बीज होता है। दूसरे, यह त्रस्त लोगों को समान शत्रु और समान कष्ट के विरुद्ध संगठित कर देती है। लेकिन वर्गाश्रित असमानता की प्रकृति और परिस्थितियां कुछ ऐसी होती हैं जिसमें उक्त दोनों बातों में से किसी एक के भी होने की गुंजाइश नहीं होती। वर्गीकृत असमानता लोगों में अन्याय के विरुद्ध सामान्य असंतोष के पैदा होने में आड़े आती है। इसलिए यह क्रांति की प्रेरणा का आधार नहीं बन सकती। दूसरे, इस असमानता से त्रस्त लोग लाभ और हानि, दोनों ही मामलों में असमान होते हैं। इसलिए अन्याय के विरुद्ध सभी वर्गों के आमतौर पर एक-दूसरे के साथ संगठित होने की कोई संभावना नहीं होती। उदाहरणार्थ, विवाह के बारे में ब्राह्मणों के विवाह संबंधी नियम को लीजिए जो अन्याय से भरा हुआ है। ब्राह्मण का यह अधिकार कि वह अपने वर्ग से नीचे के वर्ग की लड़की तो ले सकता है लेकिन वह इन वर्गों को अपने वर्ग की लड़की नहीं देगा, अन्यायपूर्ण है। लेकिन इस अन्याय को समाप्त करने के लिए क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र परस्पर संगठित नहीं होंगे। क्षत्रिय ब्राह्मण के इस अधिकार के विरुद्ध कुढ़ता है, लेकिन वह दो कारणों से वैश्य या शूद्र के साथ संगठित नहीं होगा। पहला, वह तीनों वर्गों से लड़की लेने का ब्राह्मण के अधिकार से इसलिए संतुष्ट है कि उसे भी बाकी दो वर्गों से लड़की लेने का अधिकार मिला हुआ है उसे उतना नुकसान नहीं होता है जितना बाकी दो वर्गों को होता है। दूसरे, अगर वह इस अन्यायपूर्ण विवाह-पद्धति के विरुद्ध आम आंदोलनकारियों के बीच जा खड़ा होता है। तब भले ही वह ब्राह्मणों के स्तर पर पहुंच जाए, लेकिन दूसरी ओर सभी वर्ग एक समान हो जाएंगे जिसका अर्थ यह होगा कि वैश्य और शूद्र उसके स्तर पर पहुंच जाएंगे, अर्थात् इस वर्ग के लोग क्षत्रियों की लड़कियां लेने लग जाएंगे, जिसका अर्थ यह है कि वह गिर कर उनके स्तर पर पहुंच जाएगा। आप अन्याय का कोई दूसरा उदाहरण लीजिए और उसके विरुद्ध आंदोलन के बारे में अनुमान लगाइए। यही सामाजिक मनःस्थिति यह स्पष्ट करेगी कि इस अन्याय के विरुद्ध विद्रोह एक असम्भव बात है।