फुले - शाहू - आंबेडकर
ब्राह्मणवाद और उसके अन्याय के विरुद्ध क्यों नहीं हुआ, इसके कारणों में से एक कारण का आधार केवल वर्गीकृत असमानता का सिद्धांत है। यह लूट-खसोट में हिस्सा देने की प्रणाली है जिससे अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए समर्थक जुटाए जा सकें। यह घटिया दर्जे की चालाकी है जो आदमी अन्याय को बरकरार रखने और उससे अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए अब तक ईजाद कर सका है। यह और कुछ नहीं, अन्याय में अपना-अपना हिस्सा लेने के लिए लोगों को न्यौता देना है, जिससे कि वे सब लोग अन्याय के समर्थक बन जाएं।
ब्राह्मणवाद के इस नाटक के अंतिम अंक का पर्दा उठाना बाकी रह गया है।
ब्राह्मणवाद को प्राचीन वैदिक धर्म से चातुर्वर्ण्य पद्धति दाय के रूप में प्राप्त हुई थी। चातुर्वर्ण्य पद्धति, जिसे हिंदू अपने आर्य पूर्वजों की अद्वितीय सृष्टि मानते हैं, किसी भी अर्थ में ऐसी नहीं है। इसमें कोई भी मौलिकता नहीं है। यह संपूर्ण प्राचीन विश्व में व्याप्त थी। वह मिस्र के निवासियों में थी और प्राचीन फारस के लोगों में भी थी। प्लेटो इसकी उत्कृष्टता से इतना अभिभूत था कि उसने इसे सामाजिक संगठन का आदर्श रूप कहा था। चातुर्वर्ण्य का आदर्श त्रुटिपूर्ण है। कुछेक व्यक्तियों को एक में मिलाकर उनका एक अलग-अलग वर्ग बनाना मनुष्य और उसकी शक्तियों को जैसे बाहर - बाहर देखना है। प्राचीन आर्यों ने और प्लेटो ने भी हर व्यक्ति की विलक्षणता, दूसरों के साथ अतुलनीयता और हर व्यक्ति अपने आप में एक पृथक वर्ग है, इसकी कोई कल्पना नहीं की थी। उन्होंने इस पर विचार नहीं किया कि व्यक्ति की प्रवृत्तियां अनंत होती हैं और एक व्यक्ति में भी कई तरह की प्रवृत्तियां होती हैं। उन्होंने प्रतिभा या शक्ति के प्रकार के आधार पर व्यक्ति को वर्गीकृत किया। स्पष्टतः यह गलत है। आधुनिक विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि कुछेक व्यक्तियों को मिलाकर और उनके अलग-अलग वर्ग बनाकर प्रत्येक को कुछ खास क्षेत्रों में निहित कर देने से व्यक्ति और समाज, दोनों के प्रति अन्याय होता है। वर्ग और व्यवसाय के आधार पर समाज को स्तरों में विभाजित करने से समाज की क्षमता का पूर्ण उपयोग, जो प्रगति के लिए आवश्यक है, नहीं होता और यह व्यक्ति की सुरक्षा के साथ-साथ सामान्यत: समाज के कल्याण और उसकी सुरक्षा के लिए भी असंगत है।¹

प्राचीन हिंदुओं और प्लेटो ने एक और गलती की। संभवतः इस बात में कुछ सच्चाई हो कि जिस तरह कीड़े-मकोड़ों में द्विरूपता या बहुरूपता पाई जाती है, उसी तरह यह विशेषता मनुष्यों में भी है यद्यपि इनमें यह केवल मनोवैज्ञानिक रूप में ही मिलती है। अभी हम यह मान लें कि मनुष्यों में मनोवैज्ञानिक द्विरूपता या बहुरूपता है तो भी इनको वर्गों में इस प्रकार बांटना कि अमुक तो अमुक कार्य करने के लिए और अमुक कोई दूसरा ही कार्य करने के लिए पैदा हुआ है, कुछ शासन करने, अर्थात् स्वामी बनने और कुछ आज्ञा का पालन करने अर्थात् दास बनने के लिए पैदा हुए हैं। यह अनुमान करना भी गलत है कि किसी विशिष्ट व्यक्ति में कुछ गुण हैं और अन्य में इनका अभाव है। बल्कि सच तो यह है कि प्रत्येक व्यक्ति में सभी गुण होते हैं और यह सच उस बात से नकारा नहीं जा सकता । कुछ प्रवृत्ति इस सीमा तक प्रबल हो जाती है कि उसके अलावा कोई दूसरी प्रवृत्ति नहीं दिखाई पड़ती।
हमने अक्सर देखा है कि मनुष्य में किसी एक क्षण में उसकी जो प्रवृत्ति प्रधान होती है, वह उस प्रवृत्ति से भिन्न या उस प्रवृत्ति की बिल्कुल ही उल्टी होती है जो उसी मनुष्य में किसी क्षण प्रधान थी। प्रो. बर्गसां "मनुष्य² और 'दास' के संबंध में नीत्शे की झूठी प्रतिस्थापना के बारे में लिखते हुए कहते हैं: हमने क्रांति के दिनों में इस (झूठ ) को बेनकाब होते देखा है। सीधे-सादे नागरिक, जो उस क्षण तक विनम्र और आज्ञाकारी थे, लोगों का नेतृत्व करने के लिए एक दिन जाग उठते हैं।" मुसोलिनी और हिटलर का चरित्र आर्यों के और प्लेटो के भी सिद्धांत झुठला देता है।
चातुर्वर्ण्य की बौद्धिक प्रणाली एक आदर्श बनने के बजाए उन परिवर्तनों से और भी बदतर हो गई जो ब्राह्मणों ने किए। इन परिवर्तनों का वर्णन किया जा चुका है। निस्संदेह इनमें हर परिवर्तन कुटिलतापूर्ण था। भिक्षुओं का बौद्ध संघ और ब्राह्मणों की वैदिक प्रणाली एक समान उद्देश्य के लिए बनी थी। उन्होंने समाज में विशिष्ट वर्ग का निर्माण किया जिसका काम समाज को सही रास्ते पर ले जाना था। हालांकि बौद्ध भिक्षु से वही काम अपेक्षित था जो ब्राह्मण से था, तो भी वह अपेक्षाकृत अधिक अच्छी स्थिति में था। इसका कारण यह है कि बुद्ध ने जो एक शर्त निर्धारित की उनसे पहले
1. इस विषय पर और अधिक चर्चा के लिए हिंदी के खंड 1 में 'जातिप्रथा उन्मूलन' शीर्षक मेरा लेख देखिए ।
2. टू सोर्सेज ऑफ मोरेलिटी, (होल्ट), पृ. 267
या उनके बाद किसी ने नहीं किया था। बुद्ध ने यह आवश्यक समझा कि समाज को सही रास्ता दिखाने वाले और उसके विश्वसनीय मार्गदर्शक व्यक्ति को मानसिक दृष्टि से स्वतंत्र होना चाहिए और जो बात अधिक महत्वपूर्ण है, वह यह कि उसकी कोई निजी संपत्ति नहीं होनी चाहिए। यदि उसके ऊपर निजी संपत्ति का दायित्व है, तब वह सही रास्ते से समाज का नेतृत्व करने और उसका मार्गदर्शन करने के कर्तव्य को पूरा करने में अवश्य असफल होगा। बुद्ध ने इसलिए सतर्क हो भिक्षुकों की आचरण संहिता में एक नियम यह रखा कि भिक्षुक के लिए निजी संपत्ति का होना निषिद्ध है। ब्राह्मणों की वैदिक प्रणाली में इस प्रकार का कोई निषेध नहीं था। ब्राह्मण निजी संपत्ति रखने के लिए स्वतंत्र था। इस अंतर ने बौद्ध भिक्षु और वैदिक ब्राह्मण के आचरण और दृष्टिकोण में गहरा अंतर ला दिया। भिक्षुओं का वर्ग बौद्धिक बन गया। दूसरी ओर ब्राह्मणों का वर्ग शिक्षितों का वर्ग बन गया। बौद्धिक वर्ग और शिक्षित वर्ग में बड़ा भेद होता है। किसी वर्ग या किसी काम से जुड़ने के कारण उस पर कोई बंदिश नहीं होती। दूसरी ओर, शिक्षित वर्ग कोई बौद्धिक वर्ग नहीं होता, हालांकि उसमें तर्क करने, समझने और सोचने की अपनी शक्ति होती है। इसका कारण यह है कि शिक्षित वर्ग की दृष्टि का आयाम और नई विचारधारा के प्रति उसका रवैया उस वर्ग के हित में नियंत्रित होता है जिससे वह पहले से ही जुड़ा होता है।
इसलिए ब्राह्मण शुरू से ही केवल शिक्षित वर्ग रहा जिसके पास बुद्धि तो थी, लेकिन वह स्वार्थ-प्रेरित थी। ब्राह्मणों की इस वैदिक प्रणाली में यह दोष पुरानी वैदिक प्रणाली में किए गए परिवर्तनों के कारण चरम सीमा तक पहुंच गया। शासन करने के अधिकार और अन्य विशेषाधिकारों ने ब्राह्मणों को और अधिक स्वार्थी बना दिया और उनमें ऐसी प्रेरणा भर दी कि वे अपनी शिक्षा का उपयोग ज्ञान की संवृद्धि के लिए न कर, अपने समुदाय के उपयोग के लिए और समाज की उन्नति के विरुद्ध करने लगे।
उनकी समस्त शक्ति और उनकी शिक्षा जनता के हित के बजाए अपने ही विशेषाधिकारों को बरकरार रखने पर खर्च हुई। अधिकांश हिंदू लेखकों का यह दावा रहा है कि भारत की सभ्यता विश्व में प्राचीनतम सभ्यता है। वह इसी बात पर जोर देंगे कि ज्ञान की कोई ऐसी शाखा नहीं है जिसमें उनके पूर्वज अग्रणी नहीं थे। आप प्रो. विनय कुमार सरकार की दि पोजिटिव बैकग्राउंड ऑफ हिंदू सोशियोलोजी या डॉ. बृजेन्द्र नाथ शील की दि पोजिटिव साइंसेज ऑफ दि एनसिएंट हिंदूइज्म जैसी कोई भी पुस्तक लीजिए। उन्होंने विभिन्न वैज्ञानिक विषयों में पूर्वजों के ज्ञान के बारे में जो आंकड़े दिए हैं, उनसे हर कोई चमत्कृत हो जाता है। इन पुस्तकों से यह पता चलेगा कि प्राचीन भारतवासी खगोल विज्ञान, ज्योतिष विज्ञान, जीव-विज्ञान, रसायन विज्ञान, गणित, चिकित्सा, खनिज विज्ञान, भौतिक विज्ञान और यहां तक कि जैसा कि बहुत से लोगों का विश्वास है। विमानन भी जानते थे। हो सकता है कि यह सब कुछ बहुत सच हो। अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि प्राचीन भारतीयों ने इन प्रत्यक्ष विज्ञानों की खोज कैसे की। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि प्राचीन भारतीयों ने उन विज्ञानों में कोई प्रगति क्यों नहीं की जिनमें वे अग्रणी थे? प्राचीन भारत में विज्ञान की प्रगति अचानक अवरुद्ध क्यों हो गई और इस बात पर जितना आश्चर्य होता है, उतना ही खेद होता है। विज्ञान की दुनिया में भारत का स्थान है। यह स्थान आदिम देशों में भले ही पहला हो, लेकिन सभ्य देशों में अंतिम है। यह कैसे हुआ कि जिस देश ने विज्ञान में प्रगति करनी शुरू की, वह क्योंकर प्रगति करते-करते रह गया, रास्ते में रुक गया और उसने उसे प्रारंभिक अवस्था में और अपूर्ण छोड़ दिया? यह एक ऐसा प्रश्न है, जिस पर विचार करना और जिसका उत्तर दिया जाना आवश्यक है, न कि यह कि प्राचीन भारतीय क्या-क्या जानते थे।
इस प्रश्न का केवल एक उत्तर है और यह बहुत ही आसान है। प्राचीन भारत में केवल ब्राह्मण शिक्षित वर्ग होता था। यही वह वर्ग था, जो अन्य सभी वर्गों से उच्च होने का दावा करता था। बुद्ध ने ब्राह्मणों की उच्चता के दावे का विरोध किया और उनके विरुद्ध संघर्ष किया था। ब्राह्मणों ने बौद्धिक वर्ग से भिन्न एक शिक्षित वर्ग के रूप में वैसा ही कार्य किया, जैसा शिक्षित वर्ग करता है। इसने ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में काम करना छोड़ दिया और अपनी उच्चता के दावे की रक्षा करने और अपने वर्ग के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक हितों की रक्षा करने में जुट गया। विज्ञान पर पुस्तकें लिखने के बजाए, ब्राह्मणों ने स्मृतियां लिखने का काम हाथ में ले लिया। भारत में विज्ञान की प्रगति के रुक जाने का यही कारण है। सामाजिक समानता के बौद्ध सिद्धांत का प्रतिरोध करने के लिए ब्राह्मणों ने स्मृतियां लिखना अधिक महत्वपूर्ण और अधिक आवश्यक समझा।
ब्राह्मणों ने कितनी स्मृतियां लिखीं?
श्री काणे ने, जो स्मृति साहित्य के बहुत बड़े मर्मज्ञ हैं इनकी संख्या 128 बताई है। ये किसलिए? स्मृतियां नियम- पुस्तक कहलाती हैं, किंतु इन पुस्तकों की विषयवस्तु कुछ और है। ये वस्तुतः टीकाएं हैं, जिनमें ब्राह्मणों की सर्वोच्चता और उनके विशेषाधिकारों की व्याख्या की गई है। ब्राह्मणवाद की रक्षा करना विज्ञापन की प्रगति से अधिक महत्त्वपूर्ण था। ब्राह्मणवाद ने अपने विशेषाधिकारों की रक्षा नहीं की, बल्कि इन विशेषाधिकारों का आगे इस प्रकार विस्तार किया कि कोई भी सभ्य व्यक्ति लज्जित हुए बिना नहीं रहेगा । ब्राह्मणों ने विशेष रूप से कुछ ऐसे विशेषाधिकारों का विस्तार करना शुरू किया, जो उनके लिए मनु ने स्वीकृत किए थे।
मनु ने ब्राह्मणों को दान प्राप्त करने का अधिकार दिया है। यह हमेशा धन या चल संपत्ति के रूप में होता था। लेकिन कुछ समय बाद दान की अवधारणा का विस्तार किया गया, जिससे स्त्री- दान भी शामिल किया जा सके और जिसे ब्राह्मण अपनी स्त्री के रूप में रख सकें या जिसे ब्राह्मण धन लेकर वापस कर सकें। ¹
मनु ने ब्राह्मणों को भू-देव अर्थात् पृथ्वी के देवता की संज्ञा दी है। ब्राह्मणों ने इस कथन को व्यापक बनाया और वे अन्य वर्गों की स्त्रियों के साथ संभोग करना अपना अधिकार समझने लगे। रानियां - महारानियां भी इस अधिकार से न बच सकीं। लुडोविको डि वर्थेमा ने, जो भारत में सन् 1502 के आसपास यात्री के रूप में आया था, कालीकट के ब्राह्मणों के विषय में निम्नलिखित वृत्तान्त लिखा है:
“ये जानना उचित है कि ये ब्राह्मण कौन हैं। इनका यहां के धर्म में वही स्थान है जो हमारे यहां पादरियों का है। जब राजा विवाह करता है, तब वह इन ब्राह्मणों में सबसे अधिक योग्य और सबसे अधिक पूजित ब्राह्मण को चुनता है और उससे अपनी पत्नी के साथ पहली रात सोने का आग्रह करता है ताकि वह उसके कौमार्य को भंग कर सकें"|²
इसी प्रकार एक दूसरा लेखक हैमिल्टन³ लिखता है:
“जब सैमोरिन विवाह करे तब उसे तब तक अपनी पत्नी के साथ संभोग न करना चाहिए जब तक नम्बूद्री (नम्बूद्री ब्राह्मण) या प्रधान पुरोहित उसके साथ संभोग न कर ले और यह पुरोहित यदि चाहे तो उसके साथ तीन रात तक सहवास कर सकता है, क्योंकि उस स्त्री की पहली संतान उस देवता का नैवेद्य होनी चाहिए, जिसकी वह आराधना करती थी। "
बंबई प्रेसिडेंसी में वैष्णव संप्रदाय के पुरोहितों ने यह दावा किया कि उन्हें अपने संप्रदाय की स्त्रियों के साथ उनके विवाह की पहली रात संभोग करने का अधिकार है। यह मामला सन् 1869 में बंबई उच्च न्यायालय में किन्हीं करसोनदास मुलजी के विरुद्ध इस संप्रदाय के प्रधान पुरोहित द्वारा दायर किए गए महाराजा मानहानि मुकदमे की सुनवाई के वक्त उठा था। इससे पता चलता है कि इस समय तक पहली रात का लाभ उठाने का अधिकार अमल में था।
अगर पहली रात का संभोग करने का अधिकार निचले वर्ग पर लागू किया जा सकता था तो ब्राह्मण इसका विस्तार करने से नहीं चूके। उन्होंने खासतौर से यह मलाबार
1. मुझे एक ऐसे केस की रिपोर्ट पढ़ने के लिए मिली जिसमें एक ब्राह्मण ने जिसे एक विवाहित स्त्री दान के रूप में मिली और जिसने उस स्त्री के पति द्वारा धन देने पर भी उसे वापस करना अस्वीकार कर दिया था।
2. दि ट्रैवल्स ऑफ लुडोविको डि वर्थेमा (प्रकाशक हकयट सोसायटी), पृ. 141; वर्थेमा आगे लिखते हैं, 'आप यह मत समझिए कि ब्राह्मण स्वेच्छया यह काम करने जाता है। राजा को उसे चार सौ या पांच सौ डुकैट देना पड़ता है।'
3. ए न्यू एकाउंट ऑफ दि ईस्ट इंडीज (1744) खंड 1, पृ. 310
में किया। मनु ने ब्राह्मणों को भू-देव, पृथ्वी के स्वामी की संज्ञा दी थी। ब्राह्मणों ने इस कथन को व्यापक बनाया और अन्य वर्गों की स्त्रियों के साथ स्वच्छंद होकर संभोग करने का अधिकार जताने लगे। यह खासतौर से मलाबार में हुआ। वहां ¹
“ब्राह्मण जातियां मक्त्यम पद्धति का अनुसरण करती हैं, अर्थात् वह पद्धति जिसके अनुसार बच्चा अपने पिता के परिवार का होता है। जातियां अपनी ही जाति में विवाह करती हैं और सभी कानूनी और धार्मिक प्रतिबंधों और अधिकारों का पालन करती हैं। लेकिन ब्राह्मण पुरुष अक्सर निचली जाति की स्त्रियों के साथ भी विवाह (संबंधन) करते हैं।"
केवल इतना ही नहीं है। जरा और देखिए, लेखक आगे क्या लिखता है:
“इस विवाह (संबंधन) में कोई भी पक्ष दूसरे परिवार का सदस्य नहीं हो जाता और पति-पत्नी से उत्पन्न बच्चा मां के परिवार का कहलाता है। जहां तक कानून की बात है, इस बच्चे का अपने पिता की संपत्ति का अंश या उससे अपने पालन-पोषण के लिए खर्च प्राप्त करने का कोई अधिकार नहीं होता । "
इस प्रथा के उद्भव के बारे में गजेटियर के लेखक का कहना है कि इस प्रथा का जन्म:
“भू-देवों या (पृथ्वी के देवताओं) अर्थात् (ब्राह्मणों) और उसके बाद निचले वर्ग, अर्थात् क्षत्रियों का शासक वर्ग का यह अधिकार इस दावे से सिद्ध होता है कि निचली जाति की स्त्री अपने विवाह के बाद नजराने के रूप में सुहागरात उनके साथ मनाएगी । यह अधिकार यूरोप में सामंत या जागीरदार के तथाकथित इस अधिकार के समान है कि उसके आसामी की बहू विवाह के बाद उसके साथ अपनी सुहागरात मनाएगी।"
यदि यह कहा जाए कि सिर्फ नजराना लेने का अधिकार है जिसे यूरोप में 'पहली रात का नजराना' कहा जाता था, तो कुछ कम होगा। यह उससे अधिक है। यह निचली जाति पर ब्राह्मण का आम अधिकार होता है कि वह अपनी यौन पिपासा को बुझाने के लिए उस जाति की किसी भी स्त्री के साथ वैश्यावृत्ति कर सकता है और उस पर उससे विवाह करने की कोई जिम्मेदारी नहीं है।
ये वे अधिकार थे, जो आध्यात्म के उपदेशकों ने सामान्य जनता में अपने लिए सुनिश्चित किए। इतिहास में बोर्गीज के पोप लोगों को आध्यात्म के उपदेशकों की जाति में सबसे अधिक चरित्र - भ्रष्ट जाति कहा गया है, जिन्होंने पीटर के राज - सिंहासन को अपने अधीन किया था। कोई पूछ सकता है कि क्या वे लोग वास्तव में भारत के ब्राह्मणों से अधिक निकृष्ट थे ?
1. गजेटियर ऑफ मलाबार एंड एंजेंगो डिस्ट्रिक्ट, सी. ए. ईन्स, खंड 1, पृ. 95
बुद्ध ने एक शुद्ध वर्ग की कल्पना की थी, जो मुक्त होकर कल्याण की कामना करेगा और जिसका किसी वर्ग के हित में कोई स्वार्थ नहीं होगा। ऐसी कल्पना कहीं और नहीं मिलती। अभी कुछ दिनों तक लोग यही मानते आए हैं कि बौद्धिक चिंतन में लगे रहने वाले व्यक्ति की स्वतंत्रता उसकी निजी संपत्ति होने से सीमित हो जाती है। इस कारण बौद्धिक वर्ग को जो अभाव हो जाता है, उसकी पूर्ति अन्य देशों में कुछ इस प्रकार की गई है कि वहां समाज के हर स्तर का अपना एक शिक्षित वर्ग होता है। वहां समाज के विभिन्न स्तरों के शिक्षित वर्गों द्वारा विभिन्न प्रकार के मत व्यक्त किए जाते हैं। इससे हालांकि कोई निश्चित मार्गदर्शन नहीं मिलता तो भी सुरक्षा रहती है। इतने ढेर सारे विचारों के व्यक्त होते रहने से समाज को एक ही वर्ग के शिक्षित समुदाय के विचारों द्वारा मार्गदर्शन करने का भय नहीं रहता, क्योंकि वह वर्ग देश के हित की अपेक्षा स्वभावतः अपने ही वर्ग के हितों को सर्वोपरि मानता है। लेकिन ब्राह्मणवाद द्वारा जो परिवर्तन किए गए, उससे बौद्धिक वर्ग का सुरक्षित और सटीक मार्गदर्शन समाप्त हो गया। इससे भी ज्यादा बुरी बात यह हुई कि हिंदू अभय और सुरक्षित नहीं रह गए. क्योंकि वहां समाज के विभिन्न विचारों का वैविध्य नहीं रह गया।