ग्वालियर शहर में ओबीसी समाज की आवाज ने एक नया जोर पकड़ा है, जहां अखिल भारतीय ओबीसी महासभा की राष्ट्रीय कोर समिति ने राज्य सरकार के आरक्षण नीति पर तीखा हमला बोला है। राष्ट्रीय कोर समिति सदस्य एडवोकेट धर्मेंद्र कुशवाहा और राष्ट्रीय प्रवक्ता एडवोकेट विश्वजीत रतौनिया ने प्रेस वार्ता में स्पष्ट किया कि मध्य प्रदेश सरकार ने ओबीसी के 27 प्रतिशत आरक्षण को होल्ड कर रखा है, जबकि राज्य की 52 प्रतिशत आबादी इस वर्ग की है। केवल 14 प्रतिशत आरक्षण मिलने के बावजूद, कई विभागों में यह भी पूरा नहीं हो रहा, जो ओबीसी युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। महासभा ने चेतावनी दी है कि यदि तत्काल 27 प्रतिशत आरक्षण लागू नहीं किया गया, तो राजधानी भोपाल को चारों ओर से घेरकर अनिश्चित कालीन धरना दिया जाएगा। यह आंदोलन जेपी आंदोलन की तर्ज पर निर्वाचित तानाशाही के खिलाफ होगा, जो ओबीसी हक की लड़ाई को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाएगा। प्रेस वार्ता में कुशवाहा और रतौनिया के अलावा रविंद्र गुर्जर और मोहन कुशवाहा ने भी संबोधन किया, जहां उन्होंने करणी सेना और परशुराम सेना जैसे संगठनों पर सरकार के इशारे पर आरक्षण विरोध करने का आरोप लगाया। यह आंदोलन न केवल मध्य प्रदेश के ओबीसी समाज को एकजुट करेगा, बल्कि पूरे देश में सामाजिक न्याय की मिसाल बनेगा। ग्वालियर से शुरू हुई यह लहर भोपाल पहुंचेगी, और सरकार को मजबूरन कदम उठाने पड़ेंगे।

प्रेस वार्ता में एडवोकेट धर्मेंद्र कुशवाहा ने ओबीसी आरक्षण की वर्तमान स्थिति पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, "मध्य प्रदेश में ओबीसी की आबादी 52 प्रतिशत है, लेकिन उन्हें केवल 14 प्रतिशत आरक्षण मिल रहा है, जो भी कई विभागों में पूरी तरह लागू नहीं हो रहा। यह न केवल अन्याय है, बल्कि संवैधानिक अधिकारों का हनन भी है। मंडल आयोग की सिफारिशों के अनुसार 27 प्रतिशत आरक्षण का अधिकार है, लेकिन सरकार इसे होल्ड करके रखी हुई है। आखिर क्या दिक्कत आ रही है? क्या ओबीसी वोट बैंक को खुश करने के लिए यह दबाव डाला जा रहा है?" कुशवाहा ने पुढे सांगितले की, राज्य सरकार ने एससी/एसटी आरक्षण को 13 प्रतिशत होल्ड कर रखा है, लेकिन ओबीसी के लिए भी यही नीति अपनाई जा रही है। "ओबीसी युवा शिक्षा और नौकरियों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन आरक्षण की कमी से उनका भविष्य अंधकारमय हो रहा है। सरकारी नौकरियों में ओबीसी प्रतिनिधित्व 10 प्रतिशत से भी कम है, जो अस्वीकार्य है।" उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि पुलिस, शिक्षा और स्वास्थ्य विभागों में ओबीसी के लिए आरक्षित सीटें खाली पड़ी हैं, क्योंकि सरकार फुलिंग (भराई) की बजाय होल्डिंग पर जोर दे रही है। यह नीति ओबीसी समाज को हाशिए पर धकेल रही है, और महासभा इसे बर्दाश्त नहीं करेगी। कुशवाहा ने युवाओं से अपील की कि वे इस आंदोलन में शामिल हों, क्योंकि यह केवल आरक्षण की लड़ाई नहीं, बल्कि सामाजिक समानता की जंग है।
एडवोकेट विश्वजीत रतौनिया ने सरकार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा, "हाल ही में करणी सेना और परशुराम सेना जैसे संगठनों ने ओबीसी के 27 प्रतिशत आरक्षण का विरोध किया, जो स्पष्ट रूप से सरकार के इशारे पर था। ये संगठन सवर्ण हितों की रक्षा के नाम पर ओबीसी हक छीनने का प्रयास कर रहे हैं। मध्य प्रदेश सरकार को यह समझना चाहिए कि ओबीसी समाज अब चुप नहीं रहेगा। यदि 27 प्रतिशत आरक्षण तत्काल लागू नहीं हुआ, तो महासभा भोपाल को घेरकर अनिश्चित कालीन धरना देगी। यह जेपी आंदोलन की तरह निर्वाचित तानाशाही के खिलाफ होगा, जहां लोकतंत्र की रक्षा के लिए सड़क पर उतरना पड़ेगा।" रतौनिया ने पुढे जोर देकर कहा कि ओबीसी आरक्षण केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि लाखों परिवारों का भविष्य है। "ग्रामीण क्षेत्रों में ओबीसी युवा सरकारी नौकरियों के लिए तरस रहे हैं, लेकिन आरक्षण की कमी से वे आगे नहीं बढ़ पा रहे। सरकार को जातिगत जनगणना करानी चाहिए, ताकि ओबीसी की वास्तविक स्थिति सामने आए।" उन्होंने अन्य राज्यों के उदाहरण दिए, जहां बिहार और उत्तर प्रदेश में 27 प्रतिशत आरक्षण पूरी तरह लागू है, और मध्य प्रदेश पिछड़ क्यों रहा है? रतौनिया की इस अपील ने उपस्थित पत्रकारों और कार्यकर्ताओं में जोश भरा, और महासभा ने आंदोलन की रूपरेखा तैयार करने का संकल्प लिया।
प्रेस वार्ता में रविंद्र गुर्जर और मोहन कुशवाहा ने भी ओबीसी समाज की पीड़ा व्यक्त की। गुर्जर ने कहा, "ओबीसी समाज ने स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आजादी के बाद के निर्माण तक योगदान दिया, लेकिन आरक्षण में भेदभाव सहना पड़ रहा है। 14 प्रतिशत आरक्षण भी कई बार खाली रह जाता है, क्योंकि अधिकारी इसे भरने की बजाय अन्य वर्गों को दे देते हैं। महासभा इसकी निगरानी करेगी और कानूनी लड़ाई लड़ेगी।" कुशवाहा ने महिलाओं की भूमिका पर जोर देते हुए कहा, "ओबीसी महिलाएं शिक्षा और नौकरियों में पिछड़ रही हैं। आरक्षण लागू होने से उनकी सशक्तिकरण होगा। हम भोपाल घेराव में महिलाओं को आगे रखेंगे।" यह प्रेस वार्ता ग्वालियर प्रेस क्लब में आयोजित हुई, जहां 50 से अधिक पत्रकार और 100 कार्यकर्ता उपस्थित थे। महासभा ने आंदोलन की तैयारी शुरू कर दी है, जिसमें गांव-गांव जागरूकता अभियान, हस्ताक्षर संग्रह और रैलियां शामिल हैं। यदि सरकार ने 15 दिनों में कदम नहीं उठाया, तो भोपाल घेराव अनिवार्य होगा।
यह आंदोलन मध्य प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य को बदल सकता है। राज्य में भाजपा सरकार पर ओबीसी वोट बैंक का दबाव है, लेकिन आरक्षण नीति में सुधार न होने से असंतोष बढ़ रहा है। महासभा ने राष्ट्रीय स्तर पर अन्य ओबीसी संगठनों से समर्थन मांगा है, और यह आंदोलन उत्तर प्रदेश से कर्नाटक तक फैल सकता है। ओबीसी समाज के युवा, जो बेरोजगारी से जूझ रहे हैं, इस लड़ाई के केंद्र में हैं। सरकार को अब संतुलन बनाना होगा, अन्यथा यह आंदोलन विधानसभा चुनावों को प्रभावित करेगा। ओबीसी महासभा का यह संकल्प सामाजिक न्याय की नई मिसाल बनेगा, और 27 प्रतिशत आरक्षण की जीत सुनिश्चित करेगा।
Satyashodhak, obc, dr Babasaheb Ambedkar, Bahujan, Mandal commission
फुले - शाहू - आंबेडकर