नागपुर शहर में ओबीसी समाज के बीच मराठा आरक्षण विवाद ने एक नया मोड़ ले लिया है, जहां राष्ट्रीय ओबीसी मुक्ति मोर्चा ने मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ में राज्य सरकार के विवादास्पद शासन निर्णय (जीआर) के खिलाफ याचिका दाखिल की है। यह जीआर मराठा समाज को कुणबी प्रमाणपत्र देकर ओबीसी आरक्षण में 'शॉर्टकट' से शामिल करने का प्रयास करता है, जिसे मोर्चा ने घटनात्मक उल्लंघन का नाम देते हुए अवैध करार दिया है। मोर्चा के नेताओं का आरोप है कि सरकार ने कानूनी प्रक्रिया, वंशावली जांच और ऐतिहासिक दस्तावेजों की सत्यता को दरकिनार कर मराठा समाज को सीधे ओबीसी प्रमाण पत्र दिलाने का रास्ता खोला है, जो ओबीसी के 19 प्रतिशत आरक्षण की संरचना को ध्वस्त करने वाला है। इस निर्णय से न केवल ओबीसी युवाओं के शिक्षा और नौकरी के अवसर कम होंगे, बल्कि सामाजिक न्याय की मूल भावना पर भी प्रहार होगा। इसी संदर्भ में कुणबी समाज और विभिन्न ओबीसी संगठनों ने संयुक्त बैठक में गांव-गांव जाकर जनसुनवाई अभियान शुरू करने का ऐतिहासिक फैसला लिया है, जो ओबीसी हितों की रक्षा के लिए एक व्यापक जनआंदोलन का रूप लेगा। यह याचिका और अभियान महाराष्ट्र के आरक्षण विवाद को नई ऊंचाई देने वाले हैं, जहां मराठा समाज की मांग और ओबीसी हक की टक्कर ने राज्य की राजनीति को प्रभावित किया है। नागपुर की यह घटना विदर्भ से मराठवाड़ा तक ओबीसी समाज को एकजुट करने वाली साबित हो रही है, और सरकार पर दबाव बढ़ा रही है।

याचिका दाखिल करने का फैसला राष्ट्रीय ओबीसी मुक्ति मोर्चा के प्रमुख नेताओं ने लिया है, जो लंबे समय से ओबीसी आरक्षण की रक्षा के लिए संघर्षरत हैं। मोर्चा के प्रवक्ता ने बताया कि जीआर में मराठा समाज के सदस्यों को उनके पूर्वजों की कुणबी नोंद के आधार पर मात्र एक हलफनामा (अफिडेविट) जमा कर ओबीसी प्रमाणपत्र दिलाने की प्रक्रिया निर्धारित की गई है, जो वंशावली और ऐतिहासिक दस्तावेजों की जांच को पूरी तरह नजरअंदाज करती है। "यह शॉर्टकट ओबीसीकरण है, जो मंडल आयोग की सिफारिशों का अपमान है। ओबीसी आरक्षण सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन पर आधारित है, न कि राजनीतिक दबाव पर। मराठा समाज, जो ऐतिहासिक रूप से सवर्ण और प्रभावशाली रहा है, को ओबीसी कोटे में घुसपैठ करने का यह रास्ता अन्यायपूर्ण है," उन्होंने कहा। सर्वोच्च न्यायालय ने 2021 में मराठा आरक्षण को असंवैधानिक घोषित किया था, क्योंकि यह 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा का उल्लंघन करता था। उसके बाद 2024 में राज्य सरकार ने नया कानून लाकर 10 प्रतिशत आर्थिक आरक्षण देने का प्रयास किया, लेकिन अब कुणबी प्रमाणपत्र के जरिए ओबीसी कोटे में समावेश का यह कदम ओबीसी समाज को अस्वीकार्य है। याचिका में जीआर को रद्द करने, ओबीसी आरक्षण की संरचना को बहाल करने और मराठा घुसपैठ रोकने की मांग की गई है। नागपुर खंडपीठ में दाखिल यह याचिका तत्काल सुनवाई की मांग के साथ है, और मोर्चा ने वकीलों की एक टीम तैयार की है जो इस लड़ाई को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने को तैयार है।
इस विवाद की जड़ें महाराष्ट्र के आरक्षण इतिहास में हैं, जहां मराठा समाज (राज्य की 30 प्रतिशत आबादी) ने लंबे आंदोलनों के बाद 16 प्रतिशत आरक्षण की मांग की, लेकिन न्यायालयों ने इसे खारिज कर दिया। अब कुणबी (ओबीसी की एक उप-जाति) प्रमाणपत्र के जरिए मराठा समाज को ओबीसी कोटे में लाने का प्रयास हो रहा है, जो हैदराबाद गजेट (1918 का ब्रिटिश दस्तावेज) पर आधारित है। ओबीसी नेताओं का कहना है कि यह दस्तावेज ऐतिहासिक संदर्भ में सही हो सकता है, लेकिन आज के सामाजिक न्याय के मानदंडों से मेल नहीं खाता। मराठा समाज के अधिकांश सदस्यों की वंशावली में कुणबी नोंद नहीं है, फिर भी अफिडेविट पर प्रमाणपत्र देने से ओबीसी कोटे का दुरुपयोग होगा। "ओबीसी आरक्षण पिछड़ेपन के प्रमाण पर दिया जाता है, न कि जातिगत नाम पर। इससे ओबीसी युवकों को नौकरियों और शिक्षा में अवसर कम मिलेंगे, जो पहले से ही आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं," मोर्चा के एक नेता ने कहा। महाराष्ट्र में ओबीसी की आबादी 52 प्रतिशत है, लेकिन आरक्षण केवल 19 प्रतिशत है, और मराठा घुसपैठ से यह और कम हो सकता है। इस मुद्दे पर छगन भुजबळ जैसे ओबीसी नेता भी सरकार को चेतावनी दे चुके हैं, और अब न्यायालयीन लड़ाई तेज हो गई है। याचिका की सुनवाई पर नजरें टिकी हैं, और यदि स्थगिती मिली तो यह आंदोलन को बल देगी।
इसी बीच, कुणबी समाज और ओबीसी संगठनों ने संयुक्त बैठक में गांव-गांव जनसुनवाई अभियान शुरू करने का फैसला लिया है। यह अभियान ओबीसी हितों की रक्षा के लिए एक जनआंदोलन बनेगा, जहां ग्रामीण स्तर पर सभाएं आयोजित कर जीआर के नुकसान पर चर्चा होगी। "गांवों में जाकर हम ओबीसी भाइयों-बहनों को बताएंगे कि यह जीआर कैसे उनके बच्चों के भविष्य को छीन लेगा। जनसुनवाई में स्थानीय मुद्दों पर बात होगी, और हस्ताक्षर अभियान चलाकर सरकार को जवाब मांगा जाएगा," एक संगठन प्रतिनिधि ने कहा। यह अभियान विदर्भ से शुरू होकर पूरे महाराष्ट्र में फैलेगा, और इसमें महिलाओं व युवाओं का विशेष योगदान होगा। कुणबी समाज, जो ओबीसी का एक प्रमुख हिस्सा है, ने इस अभियान को समर्थन दिया है, क्योंकि उनके आरक्षण पर भी खतरा मंडरा रहा है। बैठक में 50 से अधिक प्रतिनिधि उपस्थित थे, और उन्होंने संकल्प लिया कि यह लड़ाई तब तक चलेगी जब तक ओबीसी हक सुरक्षित न हो। यह अभियान न केवल जागरूकता फैलाएगा, बल्कि राजनीतिक दबाव भी बनाएगा, जिससे सरकार को उपसमिति या संशोधन पर विचार करने को मजबूर होना पड़ेगा।
महाराष्ट्र का आरक्षण विवाद अब सामाजिक न्याय से इतर जातीय तनाव पैदा कर रहा है। मराठा आंदोलन ने राज्य की सड़कों को हिला दिया था, लेकिन ओबीसी विरोध ने अब इसे उलट दिया है। राष्ट्रीय स्तर पर भी यह मुद्दा गूंज रहा है, जहां विपक्षी दल ओबीसी एकता का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं। नागपुर में दाखिल याचिका इस लड़ाई का कानूनी पहलू मजबूत करेगी, जबकि जनसुनवाई अभियान इसे जनता तक ले जाएगा। ओबीसी समाज के नेता मानते हैं कि यह संघर्ष लंबा चलेगा, लेकिन एकजुटता से जीत संभव है। सरकार को अब संतुलन बनाना होगा, अन्यथा यह विवाद विधानसभा चुनावों को प्रभावित कर सकता है। ओबीसी युवा, जो नौकरी और शिक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं, इस लड़ाई के केंद्र में हैं, और उनकी आवाज अनसुनी नहीं रहनी चाहिए।
Satyashodhak, obc, dr Babasaheb Ambedkar, Bahujan, Mandal commission
फुले - शाहू - आंबेडकर