अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
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वह समाज जिसे हिंदुओं ने बनाया
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हिंदू समाज - संगठन में क्या कोई विलक्षणता है? साधारण हिंदू जिसे शोधकर्ताओं के शोध की जानकारी नहीं है, वह तो यही कहेगा कि उसके समाज संगठन में तो कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसे विलक्षण, असाधारण या अस्वाभाविक कहा जा सके। यह स्वाभाविक भी है। जो लोग अकेलेपन में अपना जीवन बिताते हैं, उन्हें अपने तौर-तरीकों की विलक्षणता के बारे में जानकारी ही नहीं होती है। लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले जा रहे हैं। लेकिन हिंदू जो हिंदू नहीं हैं, बाहर वाले हैं, उन्हें हिंदू समाज-संगठन कैसा लगता है? क्या उन्हें वह सहज एवं स्वाभाविक लगा ?
कोई 305 ई.पू. के लगभग ग्रीक राजा सेल्यूकस निकातोर का राजदूत मेगस्थनीज भारत में चंद्रगुप्त मौर्य के राज दरबार में आया था। उसे हिंदू समाज - संगठन अत्यंत विलक्षण लगा। अन्यथा वह इतने गहन ध्यान से हिंदू समाज संगठन की निराली बातों का उल्लेख न करता । उसने लिखा है :
भारत के लोग सात वर्गों में बंटे हुए हैं। क्रम की दृष्टि से पुरोहित का वर्ग सर्वप्रथम है, पर संख्या की दृष्टि से उनका सबसे छोटा वर्ग है। लोग उनकी सेवाओं का लाभ यज्ञ अथवा अन्य धार्मिक अनुष्ठान के अवसर पर उठाते हैं सार्वजनिक रूप से उन्हें राजा बृहद धर्म सभा में आमंत्रित करते हैं। वर्ष के प्रारंभ में सभी पुरोहित महल के द्वार पर एकत्र होते हैं। इस अवसर पर एक-एक कर पुरोहित सार्वजनिक रूप से घोषणा करते हैं - मैंने अमुक ग्रंथ लिखा है या मैंने फसल और पशु- - संवर्धन के लिए अमुक आविष्कार किया है या मैंने लोक-कल्याण के लिए विधि खोज निकाली है। यदि किसी के बारे में तीन बार यह पता चलता है कि उसने कोई गलत सूचना दी है तो कानून में उसे दंड दिए जाने का विधान है कि वह शेष जीवन भर मौन रहे। लेकिन जो भौतिक सलाह देता है, उसे कर आदि देने से मुक्त कर दिया जाता है।
दूसरा वर्ग कृषिकर्मियों का है। वे बहुसंख्यक हैं। ये अति विनम्र होते हैं। वे सेना में भर्ती होने से मुक्त होते हैं। वे निडर भाव से खेती-बाड़ी करते हैं। वे न तो नगर में वहां के कार्यकलापों में भाग लेने के लिए और न ही किसी अन्य प्रयोजन से वहां कभी जाते हैं। अतः बहुधा ऐसा होता है कि देश के एक ही भाग में एक ही अवधि में लोग युद्ध क्षेत्र मे अपनी जान की परवाह न करते हुए लड़ रहे होते हैं, तो उसके अति निकट ही दूसरे लोग इन सैनिकों के संरक्षण में निडर होकर हल चला रहे होते हैं संपूर्ण भूमि राजा की संपत्ति होती है। किसान उसे इस शर्त पर जोतता है कि उसे उपज का एक चौथाई भाग प्राप्त होगा।
तीसरा वर्ग पशुपालकों और शिकारियों का है। शिकार करने, पशुपालन करने और भार ढोने वाले पशुओं को बेचने या मंगनी पर देने की अनुमति केवल उन्हीं की होती है। फसल को नष्ट करने वाले पशु-पक्षिओं से खेती की रक्षा करने के बदले में उन्हें राजा उन्हें अनाज देता है। वे घुमक्कड़ होते हैं और तंबुओं में रहते हैं।
पशुपालकों और शिकारियों के बाद चौथा वर्ग उन लोगों का है, जो व्यापार करते हैं, बर्तन आदि बेचते हैं और शारीरिक श्रम करते हैं। इनमें से कुछ कर अदा करते हैं और कुछ राज्य द्वारा निर्दिष्ट सेवाएं करते हैं। लेकिन शस्त्रास्त्र और जहाजों का निर्माण करने वाले लोग वेतन और रसद राजा से प्राप्त करते हैं, जिसके अधीन वे काम करते हैं। सेनापति सैनिकों को शस्त्रास्त्रों को सप्लाई करते हैं। पोताध्यक्ष यात्री तथा माल ढोने के लिए जहाजों को किराए पर देते हैं।
पांचवां वर्ग युद्ध करने वालों का है। जब वे युद्ध क्षेत्र में नहीं होते, तब वे कोई काम नहीं करते और आमोद-प्रमोद में अपना जीवन बिताते हैं। उनका खर्च राजा उठाता है। अतः जब भी अवसर आता है, तब वे तुरंत युद्ध के लिए कूच करते हैं, क्योंकि अपने शरीर के अतिरिक्त उनके पास कोई भी माल-मता नहीं होता।
छठा वर्ग निरीक्षकों का है। उनका काम खोज-खबर करना और राजा को गुप्त रूप से सारे समाचार देते रहना है। कुछ को नगर और कुछ को सेना के संबंध में सूचना लाने का काम सौंपा जाता है। नगर निरीक्षक और सेना निरीक्षक अपने कार्यों में क्रमशः नगर वासियों और सेना के सैनिकों का आमोद-प्रमोद करने वाली वेश्याओं से सहायता लेते हैं। इन पदों पर सबसे ज्यादा योग्य तथा सबसे ज्यादा विश्वस्त व्यक्तियों को नियुक्त किया जाता है।
सातवां वर्ग राजा के सलाहकारों तथा कर निर्धारकों का है। उन्हें सरकारी प्रशासन, अदालतों तथा सामान्य लोक - प्रशासन के ऊंचे-से-ऊंचे पद दिए जाते हैं। किसी को भी अपनी जाति से बाहर विवाह करने की अनुमति नहीं दी जाती है। कोई भी अपना काम नहीं बदल सकता है। कोई भी एक से अधिक व्यवसाय नहीं कर सकता। केवल पुरोहित पर ऐसा कोई बंधन नहीं होता। उसे यह विशेष अधिकार उसके सद्गुण के कारण दिया जाता है।
अलबरूनी ने भी 1310 ई. के लगभग अपनी भारत यात्र का विवरण लिखा है। उसने भी हिंदू समाज-संगठन में विलक्षणता देखी। उसने भी इसका वर्णन किया है। वह लिखता है :
हिंदू अपनी जातियों को वर्ण अर्थात् रंग कहते हैं। वे जातक की जाति उसके जन्म की जाति के आधार पर करते हैं। ये जातियां आरंभ से ही केवल चार हैं।
I. सबसे ऊंची जाति ब्राह्मणों की है। उनके बारे में हिंदू-ग्रंथ कहते हैं कि उनका जन्म ब्रह्मा के सिर से हुआ है। ब्राह्मण उस शक्ति का पर्याय है, जिसे प्रकृति कहते हैं। सिर चूंकि शरीर का सबसे ऊंचा हिस्सा है, अतः ब्राह्मण समस्त जातियों में सर्वोत्तम है। अतः हिंदू उन्हें श्रेष्ठ मानव-जाति मानते हैं ।
II. दूसरी जाति क्षत्रियों की है। कहा जाता है कि उनकी उत्पत्ति ब्रह्मा की भुजाओं को कंधों से हुई है। उनकी श्रेणी ब्राह्मण की श्रेणी से अधिक निम्न नहीं है।
III. उनके बाद वैश्य आते हैं। उनकी उत्पत्ति ब्रह्मा की जांघ से हुई है।
IV. शूद्र, जिनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के पैरों से हुई। वैश्यों और शूद्रों के बीच कोई बहुत बड़ी दूरी नहीं है। फिर भी यह वर्ग एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं, पर वे एक ही नगर और गांव में मिल-जुलकर रहते हैं।
शूद्र के बाद वे लोग हैं, जो अन्त्यज कहलाते हैं। वे तरह-तरह की सेवा करते हैं। उनकी गिनती किसी जाति में नहीं होती। वे अपने-अपने व्यवसाय के नाम से जाने जाते हैं। उनके आठ वर्ग हैं और, धोबी, मोची व जुलाहों को छोड़कर, वे बिना किसी संकोच के आपस में शादी-विवाह करते हैं। इसका कारण यह है कि कोई उनसे कोई संबंध रखना नहीं पसंद करता। ये आठ वर्ग हैं- धोबी, मोची, बाजीगर, टोकरी और ढाल बनाने वाले, मल्लाह, मछुआरे, जंगली पशु-पक्षियों का शिकार करने वाले और जुलाहे । ये लोग गांवों व कस्बों के बाहर रहते हैं, जब कि गांवों और कस्बों में उक्त चारों वर्गों के लोग रहते हैं।
हादी, डोम (डोम्ब), चांडाल और बधताऊ की गिनती किसी जाति या वर्ग में नहीं होती। उन्हें गंदा काम करना पड़ता है, जैसे गांवों में सफाई आदि । उन्हें अलग वर्ग के रूप में माना जाता है और प्रत्येक का नाम उसके काम के आधार पर होता है। वस्तुतः उन्हें नाजायज औलाद की भांति समझा जाता है, क्योंकि प्रायः लोग यही समझते हैं कि वे शूद्र पिता और ब्राह्मणी माता के अवैध संबंध से उत्पन्न लोग हैं। अतः उन्हें पतित और जाति - बहिष्कृत माना जाता है।