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महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत - डॉ. भीमराव अम्बेडकर

Maharashtra as a Linguistic Province Dr Bhimrao Ambedkar

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11 मे 2023
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भाषावार प्रांत आयोग को प्रस्तुत वक्तव्य
1948 में पहली बार प्रकाशित, 1948 में संस्करण का पुनर्मुद्रण

महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत

भाग I

भाषावार प्रांतों के निर्माण की समस्या

     भाषा के आधार पर प्रांतों के पुनर्गठन के सवाल से न केवल दलीय पूर्वाग्रहों और दलीय हितों से उत्पन्न अनेक प्रकार के वाद-विवाद उभर कर सामने आए हैं वरन् भाषावार प्रांतों के गठन की उपयोगिता के बारे में भी मतभेद दिखाई देता है। वाद-विवाद के मुख्य मुद्दों में ये बातें सम्मिलित हैं : परस्पर सटे हुए इलाकों के बारे में दावे या प्रति दावे संबंधी दो पड़ोसी प्रांतों के बीच झगड़े तथा उन इलाकों को किसी प्रांत में सम्मिलित करने संबंधी शर्तें। जहां तक ये दोनों मुद्दे महाराष्ट्र प्रांत के पुनर्गठन से संबंधित हैं, मैं इन पर अपने विचार आगे चलकर व्यक्त करूंगा। पहले मैं भाषावार प्रांतों के पुनर्गठन के प्रस्ताव के गुण-दोषों को लेता हूं।

भाषावार प्रांतों के पुनर्गठन की मांग का प्रयोजन

    2. भाषावार प्रांतों के पुनर्गठन की मांग का प्रयोजन क्या है? जो लागे भाषावार प्रांतों के निर्माण के समर्थक हैं, उनकी मान्यताओं का सार यह है कि प्रांतों की भाषाएं और संस्कृतियां अलग-अलग होती है। इसलिए उन्हें इस बात की खुली छूट होनी चाहिए कि वे अपनी-अपनी भाषाओं और संस्कृतियों का विकास कर सकें। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक प्रांत में विशिष्ट राष्ट्रीयता के सभी तत्व विद्यमान होते हैं और उन प्रांतों को इस बात की पूरी स्वतंत्रता दी जानी चाहिए, जिससे वे अपने-अपने राष्ट्रत्व का पूर्णतः विकास कर सकें।

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भाषावार प्रांतों के निर्माण से उत्पन्न होने वाली कठिनाइयां

    3. इस प्रकार के भाषावार प्रांतों के निर्माण के प्रश्न पर विचार करते समय यदि इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया जाता है कि भावी भारत सरकार का ढांचा द्विरूपी होगा, तो ऐसा करना अदूरदर्शिता पूर्ण होगा। द्विरूपी ढांचा इस प्रकार होगा (क) केंद्र सरकार और (ख) अनेक प्रांतीय सरकारें, जो अपने-अपने विधायी कार्यपालक और प्रशासनिक प्रकार्यों के निर्वाह में जटिल रूप से मिश्रित और परस्पर संबंधित होंगी। इसलिए भाषावार प्रांतों के निर्माण के विचार से सहमत होने के पहले हमें इस बात पर विचार कर लेना चाहिए कि केंद्र सरकार के कार्यकलाप पर भाषावार प्रांतों का क्या प्रभाव पड़ेगा?

    4. जिन अनेक प्रभावों की पूर्वकल्पना की जा सकती है, उनमें से कुछ स्पष्ट प्रभाव ये होंगे :

     (क) भाषावार प्रांतों के निर्माण के परिणामस्वरूप उतने ही राष्ट्र बन जाएंगे जितने ऐसे वर्ग होंगे, जिन्हें अपनी प्रजाति, भाषा और साहित्य पर गर्व होगा। केंद्रीय सभा राष्ट्रकुल जैसी बन जाएगी और केंद्रीय कार्यपालिका ऐसा समागम मात्र हो जाएगा, जिसमें अनेक अलग-अलग पर संगठित, राष्ट्र होंगे और जिनमें अपनी अलग संस्कृति एवं फलतः अपने अलग हितों के प्रति सजग चेतना कूट-कूटकर भरी होगी। उनमें राजनीतिक अवमानना, अर्थात् बहुमत के निर्णय की अवज्ञा अथवा बहिर्गमन कर जाने की प्रवृत्ति जैसी भावनाएं भी उभर सकती हैं। इस प्रकार की भावनाओं के उभार की बिल्कुल अनदेखी नहीं की जा सकती है। यदि ऐसी भावनाएं जाग खड़ी हुई तो फिर केंद्र सरकार का काम कर सकना असंभव हो जाएगा।

     (ख) भाषावार प्रांतों का निर्माण केंद्र सरकार और प्रांतीय सरकारों के बीच आवश्यक प्रशासनिक संबंधों के निर्वाह के लिए घातक सिद्ध होगा। मान लें, यदि हर प्रांत अपनी-अपनी भाषा को राजभाषा बना ले तो केंद्र सरकार को उनसे उतनी ही भाषाओं में पत्र-व्यवहार करना पड़ेगा, जितनी भाषावार प्रांतों की संख्या होगी। इसे एक असंभव काम माना जाना चाहिए। भाषावार प्रांतों के गठन से सरकारी कामकाज में किस तरह का भयानक गतिरोध उत्पन्न हो जाएगा, इसका अनुमान न्यायपालिका पर उसके होने वाले प्रभाव की कल्पना से ही किया जा सकता है। नए तंत्र के अनुसार प्रत्येक प्रांत में एक-एक उच्च न्यायालय होगा और नीचे कई अधीनस्थ न्यायालय होंगे। इन सभी उच्च न्यायालयों के ऊपर उच्चतम न्यायालय होगा, जिसे इन उच्च न्यायालयों के निर्णयों के खिलाफ की गई अपीलों की सुनवाई का अधिकार होगा। भाषावार प्रांतों के बन जाने पर प्रत्येक प्रांत के उच्च न्यायालय सहित सभी न्यायालय अपनी-अपनी कार्यवाही प्रांतीय भाषा में संचालित करेंगे। किसी उच्च न्यायालय की गलती को सुधरवाने के लिए जब कोई उच्चतम न्यायालय की शरण में जाएगा तो ऐसी स्थिति में उच्चतम न्यायालय क्या करेगा ? उच्चतम न्यायालय पर तो ताले डाल देने पड़ेंगे, क्योंकि उसे, अर्थात उच्चतम न्यायलय के प्रत्येक न्यायाधीश को अपना कार्य सुचारू रूप से करना है तो फिर उसे हर प्रांत की भाषा आनी चाहिए । ऐसा होना या इसके लिए व्यवस्था करना असंभव ही होगा । इस समय मैं केवल न्यायाधीशों की बात ही कर रहा हूं, न कि वकीलों या अधिवक्ताओं की ।

     ठंडा दिल और दिमाग रखते हुए कोई ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं कर सकता। ऐसी स्थिति से तो भारत टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा। ऐसी स्थिति में भारत एकजुट नहीं रह सकेगा, वह तो यूरोप बन जाएगा । उसमें चारों ओर अराजकता और अव्यवस्था का बोलबाला हो जाएगा ।

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