अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
हिंदू चार वर्णों के हर व्यक्ति को उसके पेशे और जीवन-शैली के अनुसार खास नाम देते हैं, जैसे ब्राह्मण को सामान्यतः ब्राह्मण तभी कहा जाता है, जब तक वह अपने घर पर रह कर अपना काम करता है। जब वह कहीं यज्ञ करता है तो उसे 'इष्टिन' कहते हैं। जब वह तीन यज्ञ कराने में रहता है तो उसे अग्नहोत्री कहते हैं। जब वह यज्ञ कराने के अतिरिक्त उसमें हवि भी देता है, तो वी दीक्षित कहलाता है। जो स्थिति ब्राह्मण की है, वहीं स्थिति अन्य जातियों की भी है, जातियों के नीचे जो वर्ग है, उनमें हादी सबसे अच्छे माने जाते हैं, क्योंकि वे सदा स्वच्छ रहते हैं। उसके बाद डोम का नंबर है। वे गाने-बजाने का काम करते हैं। उनसे भी निचले वर्ग वे हैं, जो वध करते हैं और न्यायिक दंडों को पूरा करते हैं। सबसे घटिया बधताऊ हैं। वे न केवल मृत पशुओं का, बल्कि कुत्तों तथा अन्य पशुओं का मांस भी खाते हैं।
भोज में हर जाति के लोग अलग-अलग अपनी जाति वालों के साथ बैठते हैं और एक वर्ग में दूसरी जाति वाला सम्मिलित नहीं हो सकता। अगर ब्राह्मण वर्ग में कोई ऐसे दो व्यक्ति हों, जो आपस में वैमनस्य रखते हों और उन्हें अलग-अलग बैठना पड़े, तो वे अपने बीच खंपच्ची रखकर या अंगोछा बिछाकर या किसी अन्य तरीके से एक-दूसरे से पृथक अपना चौका बना लेते हैं। आसनों के बीच एक रेखा के भी खींच दिए जाने पर उन्हें अलग-अलग समझा जाता है। चूंकि जूठन खाने की मनाही है, अतः हर व्यक्ति को अपनी-अपनी थाली में अपना भोजन करना चाहिए, क्योंकि जो बाद में भोजन के लिए बैठता है, उसे अपने से पहले वाले की थाली में बचे अन्न को खाने की मनाही होती है, क्योंकि उस बचे अन्न को जूठन समझा जाता है ।
अलबरूनी को हिंदू समाज संगठन में जो कुछ विशेषता मिली, उसने वही सब नहीं लिखा, बल्कि उसने यह भी लिखा :
हिंदुओं में इस प्रकार जातियों की भरमार है । निश्चय ही हम मुसलमान लोग अन्य मामलों में इसके सर्वथा विपरीत आचरण करते हैं। धर्म के प्रति निष्ठा को छोड़ बाकी हर तरह से हम सभी को एक-दूसरे के बराबर मानते हैं। यही सबसे बड़ी अड़चन है, जो हिन्दुओं और मुसलमानों को एक-दूसरे को समझने और एक-दूसरे के करीब आने में रुकावट पैदा होती है।
दुआर्ते बारबोसा 1500 से 1517 तक भारत में पुर्तगाली सरकार की सेवा में पुर्तगाली अधिकारी रहा। उसने हिंदू समाज के बारे में अपने विचार व्यक्त किए हैं। वह लिखता है :
जब गुजरात राज्य पर मूरों का आधिपत्य हुआ, उससे पहले यहां मूर्तिपूजकों की एक प्रजाति रहती थी। उसे मूर रेस्बुतोस कहते थे। उन दिनों वे इस प्रदेश के सरदार थे। आवश्यकता पड़ने पर वे युद्ध करते थे। ये लोग भेड़ को मारकर उसका मांस खाते हैं। वे मछली आदि भी खाते हैं। पर्वतों में भी उनकी पर्याप्त संख्या है। वहां उनके बड़े-बड़े गांव हैं। वे गुजरात के राजा के शासन को नहीं मानते हैं, बल्कि हर रोज उसके विरुद्ध युद्ध करते हैं। राजा एड़ी-चोटी का जोर लगाने पर भी अभी तक उन पर हावी नहीं हो सका है और न हो सकेगा। वे बढ़िया घुड़सवार और बढ़िया तीरंदाज हैं। वे अच्छे गोताखोर हैं और उनके पास अपनी रक्षा के लिए तरह-तरह के और भी हथियार हैं। वे लगातार युद्ध करते रहते हैं, फिर भी उनका न कोई राजा है और न ही कोई स्वामी ।
और इस राज्य में एक और भी प्रकार के मूर्तिपूजक हैं, जिन्हें वे बनिए कहते हैं। ये बनिए बड़े-बड़े सौदागर और व्यापारी हैं। वे मूरों के बीच रहते हैं और उनके साथ सभी प्रकार का व्यापार करते हैं। ये लोग मांस-मछली को छूते नहीं। वे किसी जीव को नहीं खाते। वे हत्या नहीं करते और न ही किसी पशु की हत्या होते देखना चाहते हैं। इस प्रकार वे इतने कट्टर मूर्तिपूजक हैं कि कहते नहीं बनता। अक्सर ऐसा होता है कि मूर जिंदा कीड़े या छोटे परिन्दे उनके पास ले जाते हैं और उनके सामने उन्हें मारने का नाटक करते हैं। बनिए उन्हें खरीदते हैं और उनकी फिरौती के लिए रकम देते हैं। जितनी कीमत होती है, उससे कहीं अधिक वे देते हैं। वे उनका जीवन बचा लेते हैं और उन्हें मुक्त कर देते हैं। यदि प्रदेश का राजा या उसका कोई अधिकारी किसी व्यक्ति को उसके अपराध के लिए मृत्यु-दंड देता है तो वे एकजुट होकर उसे मृत्यु से बचाने के लिए न्यायालय से छुड़ा लेते हैं, बशर्ते वह उसे छोड़ने के लिए तैयार हो। इसके अलावा मूर भिखारी जब इन लोगों से भिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं तो वे अपने कंधों तथा पेट को बड़े-बड़े पत्थरों से कूटते हैं, मानो कि वे उनके सामने अपनी हत्या कर डालेंगे। वे ऐसा न करें और वहां से शांति के साथ चले जाएं, इसके लिए बनिए उन्हें ढेर सारी भीख देते हैं। बहुत से और भिखारी चाकुओं से अपनी बांहें और टांगे चीरते हैं। इन्हें भी वे हत्या से बचाने के लिए भारी मात्रा में भीख देते हैं। अन्य प्रकार के भिखारी उनके द्वार पर जाते हैं और उनके लिए चूहे और सांप मारने का नाटक करते हैं और उन्हें भी वैसा करने से रोकने के लिए वे बड़ी-बड़ी रकमें देते हैं। इस प्रकार मूर उनकी बड़ी इज्जत करते हैं।
जब सड़क पर इन बनियों के सामने चींटियों का कोई झुंड आ जाता है तो वे पीछे हट जाते हैं और प्रयास करते हैं कि उन पर पैर न पड़ने पाए। अपने घरों में वे दिन के उजाले में ही खाना खा लेते हैं। न दिन और न रात में वे लैम्प जलाते हैं। इसका कारण यह है कि कुछ छोटी-छोटी मक्खियां उसकी लौ में जलकर भस्म हो जाएंगी। यदि रात को रोशनी की जरूरत आ ही पड़े तो उनके पास वार्निश किए गए कागज या कपड़े की लालटेन होती है, ताकि कोई जीवित प्राणी उसमें घुसकर लौ का ग्रास न बन जाए। यदि इन लोगों के सिर में जूं पैदा हो जाएं तो वे उन्हें मारते नहीं, लेकिन यदि वे उन्हें बहुत ज्यादा सताने लगें तो वे खास आदमियों को बुला लेते हैं। वे भी मूर्तिपूजक होते हैं। वे भी उन्हीं के बीच रहते हैं और उन्हें वे पुण्यात्मा लोग मानते हैं। वे बड़े जती सती और तपस्वी जैसे होते हैं। अपने देवताओं के प्रति उनकी गहरी भक्ति होती है। ये लोग उनके सिरों से जुएं बीनते हैं। जितनी जुएं वे बीनते हैं, उन्हें वे अपने सिर में डालते जाते हैं और उन्हें वे अपने रक्त पर पनपने देते हैं। उनकी धारणा है कि इस प्रकार वे अपने 'आराध्य देव' की महती सेवा करते हैं। इस प्रकार वे सबके सब बड़े आत्म-संयम के साथ अपने अहिंसा के नियम का पालन करते हैं। दूसरी ओर वे पक्के सूदखोर होते हैं। वे मापतोल तथा अन्य अनेक प्रकार के माल व सिक्कों में भारी हेराफेरी करते हैं। वे परले सिरे के झूठे होते हैं। गेहुंए वर्ण के ये मूर्तिपूजक लंबे और देखने में सुंदर और मृदु होते हैं। वे चटख रंग के वस्त्र पहनते हैं। उनका भोजन सात्विक एवं स्वादिष्ट होता है। उनका प्रिय भोजन है दूध, मक्खन-शक्कर, भात और विविध प्रकार के अनेक मुरब्बे । उनके खाने में फल-साग और सब्जी की भरमार रहती है। जहां-जहां वे रहते हैं, वहां-वहां उनके फलों के उद्यान, बगीचे और तालाब होते हैं। इन तालाबों में स्त्री-पुरुष दिन में दो बार स्नान करते हैं। उनका कहना कि जब स्नान कर लेते हैं तो उस समय तक के उनके सारे पाप धुल जाते हैं। हमारी स्त्रियों की भांति ये बनिए लंबे-लंबे केश रखते हैं। वे उन्हें लपेट कर सिर पर गांठ की शक्ल दे देते हैं, और उसके ऊपर पगड़ी पहनते हैं। इस प्रकार उनके केश सदा जूड़े के रूप में रहते हैं। अपने केशों में वे फूल तथा सुगंधित इत्र आदि लगाते हैं।
सफेद चंदन के साथ केसर तथा अन्य सुगंधित द्रव्यों को मिलाकर वे उसका लेप अपने शरीर पर करते हैं। वे बड़े श्रृंगार प्रिय लोग होते हैं। वे सूती अथवा रेशमी लंबे कुर्ते और लंबी नोक वाले कामदार जूते पहनते हैं उनमें से कुछ रेशम और जरी के छोटे कोट पहनते हैं। वे हथियार नहीं रखते। हथियार के नाम पर उनके पास केवल सोने और चांदी के काम वाले नन्हे चाकू होते हैं। इसके दो कारण होते हैं। एक तो यह कि उनका हथियारों से बहुत कम वास्ता पड़ता दूसरा यह कि उनकी रक्षा तो मूर करते हैं।