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अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट -  लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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18 ऑक्टोबर 2023
Book
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     मलाबार के इस राज्य में बियाबरे नामक एक और जाति भी है। वे भारतीय व्यापारी हैं और इस प्रदेश के मूल निवासी हैं। जब विदेशी लोग समुद्र के रास्ते भारत पहुंचे थे, उससे भी पूर्व वे वहां थे। चाहे बंदरगाह हो या देश का भीतरी भाग, वे दोनों स्थानों पर हर प्रकार के माल का व्यापार करते हैं। जहां उन्हें अधिक-से-अधिक मुनाफा मिलता है, वहां वे व्यापार करते हैं। वे काली मिर्च और अदरक थोक में नायरों और काश्तकारों से एकत्र कर लेते हैं। अक्सर वे नई फसलें तैयार होने से पूर्व ही खरीद लेते हैं और बदले में सूती कपड़े और अन्य चीजें दे देते हैं, जो वे बंदरगाहों पर रखते हैं। बाद में वे खरीदे गए माल को पुनः बेच देते हैं और भारी मुनाफा कमाते हैं। उनके कुछ विशेषाधिकार होते हैं, जैसे कि वे जिस देश में रहते हैं, उसका राजा भी उन्हें कानून द्वारा प्राण-दंड नहीं दे सकता है।

vah Samaj Jise hinduon Ne Banaya - Asprishy ka vidroh - Gandhi aur Unka anshan - Poona pact - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar     इस प्रदेश में कुइआवेम नामक लोगों की एक और जति है। ये भारतीय व्यापारी हैं और यहां के मूल निवासी हैं। वे नायरों से भिन्न नहीं हैं, लेकिन वे अपनी एक त्रुटि के कारण उनसे अलग रहते हैं। उनका धंधा मिट्टी के बर्तन और राजमहलों तथा मंदिरों की छत के लिए ईंटें बनाना है, जिन पर खपरैल के स्थान पर इंटें बिछाई जाती हैं। मैं बता चुका हूं कि अन्य घरों की छतों पर टहनियां बिछाई जाती हैं। मूर्तिपूजा का उनका अपना अलग ढंग और अलग मूर्तियां होती हैं।

     एक और मूर्तिपूजक जाति है, जिसे मेनाटोस कहते हैं। उनका धंधा है कि वे राजाओं, ब्राह्मणों तथा नायरों के कपड़े धोते हैं। उनकी गुजर-बसर का केवल एक यही धंधा है। अन्य कोई धंधा वे नहीं कर सकते।

     एक और नीची जाति है, जिसे लोग केलेटिस कहते हैं। वे जुलाई होते हैं। केवल यही उनकी रोजी-रोटी का साधन है। वे सूती तथा रेशमी कपड़े बुनते हैं। वे नीची जाति के लोग हैं। पैसा उनके पास नहीं होता। अतः वे नीची जातियों के लिए कपड़ा तैयार करते हैं। वे सबसे अलग-थलग हैं और उनका मूर्तिपूजा का अपना अलग ढंग है।

     ऊपर वर्णित जातियों के अलावा उनसे निम्न स्तर की ग्यारह और जातियां हैं, जिनसे अन्य जातियां संबंध नहीं रखती हैं और मृत्यु के भय से उनका स्पर्श भी नहीं करतीं। उनमें एक-दूसरे से भारी भिन्नताएं हैं, और वे एक-दूसरे से नहीं घुलती मिलतीं। इन निम्न स्तर के सीधे-सादे लोगों में से सर्वाधिक शुद्ध को 'तिय्या' कहा जाता है। उनका मुख्य धंधा ताड़ की खेती करना है। वे उनके फल एकत्र करते हैं और उन्हें पीठ पर लादकर बेचने के लिए ले जाते हैं, क्योंकि इस प्रदेश में माल ढोने के लिए कोई सवारी नहीं होती ।

     इनमें भी निम्न स्तर की एक और जाति है, जिसे लोग मनान (मंकू) कहते हैं। वे दूसरों से न तो मेलजोल रखते हैं और न दूसरों को स्पर्श करते हैं, और न ही दूसरे उन्हें स्पर्श करते हैं। वे आम लोगों के धोबी होते हैं और सोने के लिए चटाइयां बुनते हैं। उनके अलावा अन्य लोग ये धंधे नहीं कर सकते। हारकर उनके पुत्रों को भी वही धंधा अपनाना होगा। उनकी अपनी अलग मूर्तिपूजा- प्रणाली है।

     इनमें भी निम्न स्तर की एक और जाति है, जिसे वे कानाकुस कहते हैं। वे बक्सुए और छतरियां बनाते हैं। ज्योतिष विद्या के लिए वे अक्षर ज्ञान प्राप्त करते हैं। वे महान ज्योतिषी होते हैं और भविष्य के बारे में सच्ची भविष्यवाणियां करते हैं। इस प्रयोजन के लिए कुछ सामंत उनका भरण-पोषण करते हैं।

     आगिरिस नामक एक और मूर्तिपूजक छोटी जाति भी है। वे राज - मिस्त्री, बढ़ई, लुहार, धातुकर्मी होते हैं। उनमें से कुछ सुनार भी होते हैं। वे सब एक ही कुल - गोत्र के होते हैं। उनकी अलग जाति है और उनके देवता अन्य लोगों से अलग होते हैं। वे विवाह करते हैं। उनके उत्तराधिकारी उनके बेटे होते हैं और वे अपने पिता का व्यवसाय सीखते हैं।

     इस प्रदेश में मोगेरे नामक एक और भी छोटी जाति होती है। वे लगभग तिय्या जैसे होते हैं, लेकिन वे एक-दूसरे को स्पर्श नहीं करते। जब राजा एक स्थान से दूसरे स्थान को जाता है तो वे उसका सामान ढोते हैं, लेकिन इस प्रदेश में अब वे इने-गिने ही रह गए हैं। उनकी अलग जाति होती है। विवाह संबंधी उनका कोई कानून कायदा नहीं होता। उनमें से अधिकांश समुद्र से अपनी जीविका चलाते हैं। वे नाविक होते हैं। उनमें से कुछ मछेरे भी होते हैं। उनकी कोई मूर्तियां नहीं होतीं। वे नायरों के भी दास होते हैं।

     इनसे भी एक छोटी जाति होती है, जिन्हें मनकुअर कहते हैं। वे मछेरे होते हैं। इसके अलावा वे और कोई धंधा नहीं करते। फिर भी उनमें से कुछ मूरों तथा अन्य मूर्तिपूजकों के जहाजों में काम करते हैं और वे अति कुशल नाविक होते हैं। यह जाति बड़ी निर्दयी होती है। वे निर्लज्ज चोर होते हैं। वे विवाह करते हैं और उनके पुत्र उनके उत्तराधिकारी होते हैं। उनकी स्त्रियां बदचलन होती हैं। वे किसी से भी यौन संबंध स्थापित कर लेती हैं और उसे बुरा नहीं माना जाता । उनकी अपनी अलग मूर्तिपूजा होती है।

     मलाबार के इस प्रदेश में इनसे भी निम्न स्तर की एक और मूर्तिपूजक जाति होती है। उसको बेटुन कहते हैं। वे नमक बनाते हैं और धान की खेती करते हैं। उसके अलावा वे कुछ नहीं करते।

     वे सड़कों से दूर खेतों में अलग-थलग घरों में रहते हैं। वहां सभ्य-जनों का आना-जान नहीं होता। उनकी अपनी अलग मूर्तिपूजा होती है। वे राजाओं और नायरों के गुलाम होते हैं और बड़े गरीब होते हैं। वे नायरों से काफी फासले पर चलते हैं और नायर उनसे काफी दूरी से बात करते हैं। उनका अन्य जातियों से कोई संपर्क नहीं होता ।

     इनसे भी निम्न स्तर की और असभ्य एक और मूर्तिपूजक जाति होती है, जिन्हें पाणीन कहा जाता है। वे बड़े कुशल जादू-टोने वाले ओझा होते हैं। वे केवल यही धंधा करते हैं।

     इनमें भी निम्न स्तर की और असभ्य एक और जाति है, जिसे रेवोलीन कहते हैं। वे बड़े ही गरीब होते हैं। वे बस्ती में बेचने के लिए घास और जलाने के लिए लकड़ी ले जाते हैं। न तो वे किसी को स्पर्श करते हैं और न ही मृत्यु के भय से उन्हें कोई स्पर्श करता है। वे नंगे रहते हैं। वे अपने गुप्तांगों को गंदे चिथड़ों, अधिकांशतः पेड़ों की पत्तियों से ढांपे रहते हैं। उनकी स्त्रियां अपने कानों में पीतल की अनेक बालियों पहनती हैं। वे अपनी गर्दन, बांहों और पैरों में मनकों की कंठी और कंगन पहनती हैं।

     इनसे भी निम्न स्तर की और असभ्य एक और जाति है, जिसे लोग पुलय कहते हैं। वे मूर्तिपूजक होते हैं। वे औरों की भांति ही अन्त्यज और बहिष्कृत समझे जाते हैं। वे खेती में या खोह खंदकों में रहते हैं, हां सभ्य जाति के लोग कभी भूले-भटके ही जाते हैं। वे बड़ी ही छोटी-मोटी झोपड़ियों में रहते हैं। वे भैंसों तथा बैलों की मदद से धान के खेत जोतते हैं। वे नायरों से दूर रहकर ही बात करते हैं और इतनी जोर से चिल्लाते हैं कि उन्हें सुना जा सके। जब वे सड़कों पर चलते हैं तो वे वे जोर-जोर से चिल्लाते हैं, ताकि उनके लिए रास्ता छोड़ दिया जाए और जो भी उनकी आवाज सुन ले, वह सड़क से हट जाए और उनके वहां से गुजरने तक वृक्षों की ओट में खड़ा हो जाए। यदि कोई स्त्री- पुरुष उन्हें छू लेता है तो जिसको स्पर्श किया जाए, उस व्यक्ति को कत्ल कर देता है। अतः प्रतिशोध में वे पुल्लयन को कत्ल कर देते हैं और उन्हें कोई दंड नहीं भोगना पड़ता।

     इनसे भी दीन-हीन एक और जाति होती है। इस जाति के लोगों को परयन कहते हैं। वे अन्य सभी जातियों से दूर अलग-थलग अति निर्जन स्थानों में रहते हैं। न वे किसी अन्य व्यक्ति से और न ही कोई अन्य व्यक्ति उनसे संबंध रखता है। उन्हें शैतान से भी बदतर और प्रताड़नीय समझा जाता है। उन्हें देखने मात्र से ही आदमी अपवित्र और जाति - बहिष्कृत हो जाता है। वे रतालू और अन्य जंगली कंद-मूल खाते हैं। वे अपने तन के मध्य भाग को पत्तियों से ढांपते हैं। वे जंगली पशुओं का मांस भी खाते हैं।

     मूर्तिपूजकों के बीच जाति-भेद की इतनी ही कथा है। कुल मिलाकर ये अठारह जातियां हैं। वे सब अलग-अलग हैं। न वे आपस में एक-दूसरे को छू सकती हैं और न ही शादी विवाह कर सकती हैं। मलाबार की जिन अठारह मूर्तिपूजक जातियों का मैंने अभी वर्णन किया है, इनके अलावा मूल निवासी के रूप में कुछ अन्य लोग भी हैं, जो बाहर से आए हैं। ये व्यापारी और साहूकार

लोग हैं। उनके अपने-अपने मकान और अपनी जागीरें हैं। वे मूल निवासियों की भांति रहते हैं, पर उनके रीति-रिवाज अलग होते हैं।

     इन विदेशियों ने जाति की पूरी और ब्यौरेवार कोई तस्वीर पेश नहीं की है। वे इसमें असमर्थ रहे हैं। इसका कारण यह है कि हर विदेशी के लिए हिंदू का निजी जीवन प्रच्छन्न रहता है और उसके लिए उसके भीतर झांकना संभव भी नहीं है। इसके अलावा भारत का सामाजिक ताना-बाना, उसकी गतिविधि सदा से रीति-रिवाजों पर आधारित रही है। यह स्थान - भेद के अनुसार भी बदलती रहती है। उसकी जटिलता देखकर माथा चकराने लगता है। उसके पीछे कोई कानूनी सूत्र नहीं होता, जिसे किसी कानूनी पाठ्य-पुस्तक मे से खोजकर निकाला जा सके। लेकिन निस्संदेह ही विदेशियों को ऐसा लगा कि जाति भारतीय समाज का एक सर्वाधिक अनोखा और इसलिए एक विशिष्ट गुण है। अन्यथा वे जब भारत आए और उन्होंने जो देखा, अपने विवरणों में उन्होंने जाति के अस्तित्व को नोट न किया होता।

     अतः हिंदू समाज संगठन में जाति की एक विशिष्टता है, जो हिंदुओं को अन्यों से अलग करती है। जाति एक वर्धमान संस्था रही है। वह सदा सर्वदा ज्यों की त्यों नहीं रही। मेगस्थनीज ने जब अपना विवरण लिखा, उस समय जाति का जो स्वरूप था, वह अलबरूनी के आगमन काल से बहुत भिन्न था। पुर्तगालियों को जाति को जो स्वरूप दीख पड़ा, वह अलबरूनी के काल से भिन्न था। लेकिन जाति को समझने के लिए हमें उसकी प्रकृति के विषय में और अधिक सटीक जानकारी प्राप्त करनी होगी, जितनी कि हमें इन विदेशियों के वर्णन से मिलती है।

     जाति विषयक चर्चा को समझने के लिए पाठकों को उन कुछ बुनियादी संकल्पनाओं से परिचित कराना आवश्यक है, जो हिंदू समाज संगठन में निहित है। हिंदुओं में प्रचलित समाज - संगठन की मूल संकल्पना उस वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति से प्रारंभ होती है, जिसके बारे में विश्वास किया जाता है कि उससे हिंदू समाज का विभाजन हुआ। ये चार वर्ण हैं: ( 1 ) ब्राह्मण पुजारी और शिक्षित वर्ग, (2) क्षत्रिय, सैनिक वर्ग, (3) वैश्य, व्यापारी वर्ग, और (4) शूद्र, दास वर्ग। कुछ काल तक वे केवल वर्ग थे। कुछ काल बाद जो केवल वर्ग (वर्ण) थे, वे जातियां बन गईं। चार जातियां चार हजार जातियां बन गईं। इस प्रकार आधुनिक जाति-व्यवस्था प्राचीन वर्ण-व्यवस्था का ही विकसित रूप है।

     निस्संदेह जाति-व्यवस्था वर्ण-व्यवस्था का ही विकसित रूप है, लेकिन वर्ण-व्यवस्था के अध्ययन से हम जाति व्यवस्था की कोई जानकारी प्राप्त नहीं कर सकते। जाति का अध्ययन वर्ण को अलग रखकर करना होगा।