अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
प्रत्येक जाति के लिए अलग नाम होने का महत्व यह है कि उसके कारण जाति एक संगठित और अनिवार्य वर्ग बन जाती है। विशिष्ट नाम होने के कारण जाति एक निकाय बन जाती है, उसका स्थाई अस्तित्व हो जाता है और वह एक स्वतंत्र इकाई हो जाती है। जिन विद्वानों ने जाति पर लिखा-पढ़ा है, उन्होंने जातियों के अपने-अपने नामों के महत्व को भली-भांति हृदयंगम नहीं किया है। इस प्रकार उन्होंने जाति पर आधारित उन सामाजिक वग्ों के एक अति विशिष्अ लक्षण को नजरअंदाज कर दिया है। इस प्रकार के सामाजिक वर्ग हर समाज में हैं और उनका होना अस्वाभाविक नहीं। बहुत से देशों के विभिन्न सामाजिक वर्गों की तुलना भारत की विभिन्न जातियों से की जा सकती है और उन्हें समकक्ष कहा जा सकता है। कुम्हार, धोबी, विद्वान जैसे सामाजिक वर्ग सर्वत्र पाए जाते हैं। लेकिन अन्य देशों में वे असंगठित तथा स्वैच्छिक वर्ग हैं, जब कि भारत में वे संगठित और अनिवार्य बन गए हैं, उन्होंने जातियों का रूप ले लिया है। अन्य देशों में समाज के वर्गों को विशिष्ट नाम नहीं दिया गया, जब कि भारत में ऐसा किया गया है। जाति पर नाम की जो मोहर लगा दी गई है, वह उसे स्थिरता, निरंतरता और विशिष्टता प्रदान करती है। नाम ही यह स्पष्ट करता है कि कौन लोग उसके सदस्य हैं और अधिकांशतः जो व्यक्ति जिस जाति में पैदा होता है, वह अपने नाम के आगे अपनी जाति का नाम जोड़ता है। विशिष्ट नाम होने के कारण किसी जाति के लिए अपने नियमों का सिक्का चलाना आसान हो जाता है। यह काम दो प्रकार से सरल हो जाता है। एक तो यह कि उपनाम के रूप में जाति का नाम आगे लगे होने से वह किसी अन्य जाति को नहीं अपना सकता और जाति के घेरे में बंधा रहता है। दूसरे, इससे अपराधी और उसकी जाति को पहचानने में और जाति के नियमों को तोड़ने के लिए उसे आसानी से पहचान कर दंडित करने में आसानी होती है।
यह है, जाति का अर्थ । अब जाति-व - व्यवस्था के बारे में कहूंगा। इसके लिए जरूरी है कि विभिन्न जातियों के आपसी संबंधों का अध्ययन किया जाए। जाति - समूह की दृष्टि से देखा जाए जो जाति-व्यवस्था ऐसे अनेक खास लक्षण प्रस्तुत करती है, जो तुरंत ध्यान आकर्षित करते हैं। सर्वप्रथम तो यह कि विभिन्न जातियों के बीच वह आपसी संबंध नहीं होता, जो व्यवस्था का आधार होता है। हर जाति अलग व थलग है। अपने आंतरिक मामलों को निपटाने तथा जातीय विनियमों को लागू करने में वह स्वाधीन और संप्रभु है। जातियां परस्पर रहती हैं, पर वे एक-दूसरे में प्रवेश नहीं करतीं। दूसरा लक्षण एक जाति के संदर्भ में दूसरी जाति के अनुक्रम से संबंधित है। यह अनुक्रम सम स्तर का नहीं, ऊपर-नीचे का है।
हम कह सकते हैं कि जातियों का दर्जा समान नहीं है। उनका दर्जा असमानता पर आधारित है। एक जाति दूसरी जाति की तुलना में ऊची अथवा नीची है। कोई जाति सर्वोच्च है तो कोई सबसे नीची है। फिर इनके बीच की जातियां है। उनमें भी कोई किसी से ऊंची और किसी से नीची है। इस प्रकार जाति - व्यवस्था में एक अनुक्रम है। उसमें सर्वोच्च और निम्नतम को छोड़कर हर जाति दूसरी जाति से ऊंची और बड़ी है।
इस पूर्वता और श्रेष्ठता का निर्णय कैसे किया जाता है? उच्चता, बड़प्पन या अधीनता के क्रम का निर्णय वे नियम करते हैं, जो (1) धार्मिक संस्कारों से, और (2) सहभोजिता से संबंधित हैं।
पूर्वता के नियमों का आधार धर्म स्वयं तीन प्रकार से उजागर होता है। एक, धार्मिक संस्कारों के द्वारा, दो धार्मिक समारोहों से जुड़े मंत्रों द्वारा, और तीन, पुजारी की स्थिति के द्वारा।
सबसे पहले पूर्वता क्रम के नियमों के स्रोत धार्मिक संस्कारों को लें। यह उल्लेखनीय है कि हिंदू धर्मग्रंथों में सोलह धार्मिक संस्कारों का विधान है। भले ही वे हिंदू संस्कार हैं, पर प्रत्येक हिंदू जाति यह अधिकार नहीं कर सकती कि वह सभी सोलह संस्कार कर सकती है। केवल कुछ ही यह अधिकार का दावा कर सकती है। कुछ को अनुमति है कि वे कतिपय संस्कार कर सकें। कुछ को अनुमति नहीं है कि वे कुछ संस्कार कर सकें। यथा उपनयन संस्कार को ही लें। कुछ जातियां उस पवित्र धागे को धारण नहीं कर सकतीं। संस्कार कर्म संबंधी अधिकार में भी पूर्वता क्रम चलता है। जो जाति समूचे संस्कार कर सकती है, उसकी हैसियत उस जाति से ऊंची होगी, जो केवल कुछ संस्कार कर सकती है।
अब मंत्रों को लें। वे भी पूर्वता संबंधी नियमों के उद्गम हैं। हिंदू धर्म के अनुसार एक ही संस्कार की तीन रीतियों से किया जा सकता है : ( 1 ) वेदोक्त रीति से, (2) शास्त्रोक्त रीति से, और (3) पुराणोक्त रीति से वेदोक्ति रीति में संस्कार वैदिक मंत्रों से किया जाता है। शास्त्रोक्त रीति में संस्कार शास्त्रीय मंत्रों से किया जाता है। पुराणोक्त रीति में संस्कार पौराणिक मंत्रों से किया जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों की तीन विशिष्ट श्रेणियां हैं: (1) चार वेद, (2) छह शास्त्र, और (3) अठारह पुराण । भले ही वे धर्मग्रंथ कहलाते हैं, पर उनकी मान्यता एक सी नहीं होती । वेदों को सर्वोच्च मान्यता है। मान्यता की दृष्टि से शास्त्रों का नंबर दूसरा है और सबसे निम्न मान्यता पुराणों की है। मंत्र किस प्रकार का सामाजिक पूर्वता को जन्म देते हैं, वह स्पष्ट हो जाएगा, यदि इस बात को ध्यान में रखा जाए कि हर जात को वेदोक्त रीति से संस्कार करने का अधिकार नहीं है। तीन जातियां सोलह में से किसी एक संस्कार को करने का अधिकार कर सकती हैं। लेकिन व्यवस्था है कि एक उसे वेदोक्त रीति से, दूसरी उसे शास्त्रोक्त रीति से और तीसरी उसे पुराणोक्त रीति से ही कर सकती है। पूर्वता क्रम का निर्धारण वह मंत्र करता है, जिसके प्रयोग का अधिकार किसी जाति को धार्मिक संस्कार के लिए है। जो जाति वैदिक मंत्र के प्रयोग की अधिकारी है, वह शास्त्रीय मंत्र का प्रयोग करने वाली जाति से ऊंची है। जो जाति शास्त्रीय मंत्र का प्रयोग करने की अधिकारी है, वह पुराणोक्त मंत्र का प्रयोग करने वाली जाती से ऊंची है।
हिंदू धर्म से जुड़े पूर्वता क्रम का तीसरा स्रोत है, पुजारी। धर्म अपेक्षा करता है कि यदि धार्मिक संस्कार का पूरा-पूरा लाभ प्रदान करना है तो उसे पुजारी के माध्यम से ही प्राप्त करना होगा। धर्मग्रंथों ने पुजारी के रूप में ब्राह्मण को नियुक्त किया है। अतः ब्राह्मण के बिना काम नहीं चल सकता। लेकिन धर्मग्रंथ यह अपेक्षा नहीं रखते कि किसी भी जाति का कोई भी हिंदू यदि ब्राह्मण को धार्मिक संस्कार में यजमानी के लिए बुलाए तो उसे वह स्वीकार करेगा ही। किस जाति के निमंत्रण को वह स्वीकार करे या न करे, यह बात ब्राह्मण की इच्छा पर छोड़ दी गई है। लंबी तथा सुस्थापित प्रथा द्वारा यह बात ब्राह्मण की इच्छा पर छोड़ दी गई है। लंबी तथा सुस्थापित प्रथा द्वारा अब यह तय कर दिया गया है कि किस जाति का निमंत्रण वह स्वीकार करेगा और किस का नहीं करेगा। यह तथ्य जातियों के बीच पूर्वता का आधार बन गया है। जिस जाति की यजमानी ब्राह्मण करेगा, वह उस जाति से ऊंची होगी, जिसकी वह यजमानी नहीं करेगा।
पूर्वता के नियमों का दूसरो स्रोत है, सहभोज । इस ओर ध्यान देना होगा कि सहभोज के नियमों की भांति विवाह के नियमों ने पूर्वता के नियमों को जन्म नहीं दिया है। इसका कारण यह है कि अंतर्विवाह और सहभोज की वर्जना करने वाले नियमों में विभेद है। अंतर प्रत्यक्ष है। अंतर्विवाह संबंधी वर्जना ऐसी है कि उसका न केवल आदर किया जाना चाहिए, बल्कि अति कठोरता से उसका पालन भी किया जाना चाहिए, लेकिन सहभोज की वर्जना मुश्किलें उत्पन्न करती है। सभी स्थानों पर और सभी परिस्थितियों में उसका अति कठोरता से पालन नहीं किया जा सकता। आदमी बाहर निकलता है और एक स्थान से दूसरे स्थान पर उसे जाना ही होगा। हो सकता है कि जहां-जहां वह जाए, वहां-वहां उसके जाति - भाई न हों। हो सकता है कि वह अजनबियों के बीच फंस जाए। विवाह तो टाला जा सकता है, भोजन को नहीं। विवाह के लिए तब तक प्रतीक्षा की जा सकती है, जब तक वह जाति - भाइयों के समाज में न लौट जाए। लेकिन भोजन के मामलें में वह प्रतीक्षा नहीं कर सकता। भोजन तो कहीं से भी, किसी से भी प्राप्त करना ही होगा। सवाल उठता है कि यदि प्राप्त करना ही है तो वह किस जाति से प्राप्त करे। नियम है कि वह अपने से ऊंची जाति से भोजन प्राप्त करेगा, लेकिन अपनों से नीति जाति से प्राप्त नहीं करेगा। इस निर्णय के बारे में पता करने के लिए कोई उपाय नहीं है कि कैसे यह निर्णय किया गया कि कोई हिन्दू एक जाति से भोजन प्राप्त कर सकता है, दूसरी से नहीं । पूर्वोदाहरणों की लंबी परंपरा से हर हिंदू जानता है कि किस जाति के वह भोजन प्राप्त कर सकता है, और किससे नहीं। मुख्यतः इसका फैसला ब्राह्मणों से नियम करते हैं। जिस जाति से ब्राह्मण भोजन लेता है, वह ऊंची होती है, जिससे वह नहीं लेता, वह नीची होती है। खान-पान के बारे में ब्राह्मणों के नियम विशद् हैं: (1) वह कुछ से ही पानी लेगा और किन्हीं अन्य से नहीं, (2) ब्राह्मण किसी जाति से ऐसा भोजन नहीं लेगा, जो पानी में पकाया गया हो, और (3) कुछ जातियों से वह केवल तेल में छोंका गया भोजन लेगा । पुनः बर्तन के मामले में भी उसके नियम हैं। उसी के अनुसार वह भोजन तथा पानी ग्रहण करेगा । कुछ जातियों से वह मिट्टी के बर्तन में भोजन अथवा पानी ग्रहण करेगा, कुछ से वहकेवल धातु के बर्तन में और कुछ से वह केवल कांच के बर्तन में ग्रहण करेगा। इससे भी जाति के स्तर का निर्धारण होता है। यदि वह किसी जाति से तेल में छोंका गया भोजन ग्रहण करता है तो उसका दर्जा उस जाति से ऊंचा होता है, जिससे वह ग्रहण नहीं करता । जिस जाति से वह जल ग्रहण करता है, वह उस जाति से ऊंची होती है, जिससे वह जल ग्रहण नहीं करता। यदि वह धातु के बर्तन में जल ग्रहण करता है तो वह जाति उस जाति से ऊंची होती है, जिससे वह मिट्टी के बर्तन में जल ग्रहण करेगा। जिस जाति से वह मिट्टी के बर्तन में जल ग्रहण करेगा वह उस जाति से ऊंची होती है, जिससे वह कांच के बर्तन में जल ग्रहण करेगा। कांच एक ऐसा तत्व है, जिसे निर्लेप' (निर्दोष) कहते हैं। अतः उसमें ब्राह्मण सबसे नीति जाति से भी पानी ग्रहण कर सकता है। लेकिन अन्य धातुएं दोष ग्रहण करती हैं । दोष ग्राह्यता भी उपयोग करने वाले व्यक्ति के दर्जे पर निर्भर करती है। यह बर्तन में जल ग्रहण करने की ब्राह्मण की इच्छा पर निर्भर करता है।
ये कुछ ऐसी बातें हैं, जो परंपरा क्रम वाली इस हिंदू जाति व्यवस्था में जाति का स्थान और दर्जा निर्धारित करती हैं।