अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
अवर्ण जातियों का आपस में क्या संबंध है? क्या वे केवल जातियों के समूह हैं या उनके बीच कोई वर्ग विभेद है? निश्चय ही वे केवल जातियों के समूह हैं। निश्चय ही अवर्ण जातियों के इस समूह में वर्ग विभेद हैं। पर इस बारे में कुछ संशय हो सकता है कि आदिम जातियों तथा जरायम- पेशा जातियों के बीच कोई वर्ग - विभेद है या नहीं। संभवतः यह अंतर अत्यंत क्षीण है। लेकिन इनमें कोई संदेह नहीं कि आदिम जातियों व जरायम- पेशा जातियों और अस्पृश्यों के बीच स्पष्ट और व्यापक वर्ग - विभेद है। प्रथम दो के मन में यह अति स्पष्ट धारणा है कि अवर्ण जातियों के इस समूह में उच्च जातियां हैं और अस्पृश्य निम्न स्तर की जातियां हैं।
अब तक की चर्चा से पता चलता है कि हिंदू समाज संगठन की तीन विशिष्टताएं हैं : (1) जाति, (2) जातियों का क्रम, और (3) जाति-व्यवस्था को भेदती हुई वर्ग-व्यवस्था। इसमें संदेह नहीं कि यह ढांचा बड़ा ही जटिल है और जो इसके ताने-बाने का अंग न हो, उसके लिए अपने मन में इस बारे में सही तस्वीर बना लेना शायद कठिन हो । संभव है कि इसे एक डायग्राम की सहायता से समझा जा सके। मैं नीचे एक ऐसा ही डायाग्राम दे रहा हूं, जो मेरे विचार में हिंदुओं के इस सामाजिक ढांचे की कुछ झलक दे सकता है।
| क | ग | ङ | छ |
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सवर्ण हिंदू सवर्ण जातियां |
सवर्ण हिंदू सवर्ण जातियां |
सवर्ण हिंदू सवर्ण जातियां |
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प्रथम वर्ग उच्च जाति के द्विज-ब्राह्मणों, क्षत्रियों वैश्यों के तीन वर्णों से उत्पन्न जातियां
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द्वितीय वर्ग निम्न जाति के शूद्र- चौथे वर्ण अर्थात् शूद्रों से उत्पन्न जातियां |
तृतीय वर्ग आदि जातियां जरायम- पेशा जातियां |
चतुर्थ वर्ग अस्पृश्य |
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अंग्रेजी की मूल पांडुलिपि में इस डायाग्राम को खाली छोड़ रखा है - संपादक ।
यह डायाग्राम हिंदुओं की वर्ग, जाति-व्यवस्था को प्रस्तुत करता है। इसमे उनके सामाजिक संगठन को सही तथा पूरी तस्वीर पेश करने की कोशिश की गई है। वह उसके अनेक महत्वपूर्ण लक्षणों को प्रस्तुत करता है। इसमें यह स्पष्ट होता है कि हिंदुओं की दो शाखाएं हैं: (1) सवर्ण हिंदु, और (2) अवर्ण हिंदू । प्रथम शाखा अर्थात् सवर्ण हिंदुओं में जातियों के दो वर्ग हैं: (1) द्विजों का, और (2) शूद्रों का। दूसरी शाखा अर्थात् अवर्ण हिंदुओं में जातियों के दो वर्ग हैं: (1) आदिम और जरायम- पेशा जातियों का, और (2) अस्पृश्य जातियों का। दूसरी बात यह है कि हर जाति का एक घेरा होता है और वह बाकी से अलग होती है। यह बात डायाग्राम में नहीं दर्शाई गई है। जातियों के चारों वर्गों में से हरेक का समूह है और उसे एक घेरे में रख दिया जाता है। घेरे में यह रेखा जाति को वर्ग में विभाजित करती है और उसे दूसरे वर्ग से अलग करती है। जाति का वर्ग, जाति जितना संगठित नहीं होता। लेकिन वहां वर्ग की भावना होती है। तीसरी बात ध्यान देने योग्य यह है कि किस आधार पर यह घेरा बना। ये अनेक हैं। कुछ स्थाई हैं और कुछ अस्थाई । द्विज जातियों और शूद्र जातियों के बीच कोई विभाजन है ही नहीं। वह तो केवल पर्दा भर है। यह विभाजन है ही नहीं। इसका उद्देश्य उन्हें अकेले रखना है। उसका उद्देश्य विभाजन नहीं है। शूद्र जातियों तथा प्रथम दो अवर्ण जातियों के बीच विभेद एक नियमित विभाजनं है। लेकिन वह क्षीण भी है और थोड़ा भी । उसे लांघा जा सकता है। यह विभाजन दोनों को अलग करता है, पर पूर्ण पृथक नहीं करता। लेकिन इन तीन वर्गों और अस्पृश्यों के बीच विभाजन, वास्तविक विभाजन है और उसे हटाया नहीं जा सकता। वह कंटीले तार की बाढ़ जैसा है और उसका उद्देश्य होता है, स्पष्ट अलगाव करना। इसी बात को एक भिन्न प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है कि प्रथम तीन घेरे इस प्रकार रखे गए हैं कि वे एक-दूसरे के भीतर हैं। द्विजों तथा शूद्र जातियों के बीच पहले विभाजन को हटाया जा सकता है और वे दोनों अलग-अलग घेरों के बजाए एक घेरे में रखे जा सकते हैं। इसी प्रकार दूसरे विभाजन को हटाया जा सकता है और उस दशा में द्विज, शूद्र, आदिम तथा जरायम- पेशा जातियां यदि एक इकाई नहीं, तो एक समूह बना सकते हैं और एक ही घेरे में रह सकते हैं। लेकिन तीसरे विभाजन को कभी भी हटाया नहीं जा सकता, क्योंकि जातियों के ये तीनों वर्ग एक मुद्दे के बारे में एकमत हैं कि वे कभी भी अस्पृश्यों के साथ लोगों की एक इकाई के रूप में एक नहीं होंगे (अंग्रेजी की मूल पांडुलिपि की टंकित प्रति में यह स्थान खाली छोड़ दिया गया है। 'एक' शब्द अंग्रेजी खंड में उनके सं. मंडल द्वारा जोड़ा गया है। संपादक) यह एक जघन्य बाधा है, जो अस्पृश्यों को 'शेष' से अलग करती है। और उन्हें अलग-थलग होने के लिए विवश करती है।
इस डायाग्राम में जातियों के विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे से ऊंचे दिखाया गया है। यह ऊंच-नीच के क्रम को स्पष्ट करने के लिए किया गया है, जो जाति-व्यवस्था का एक प्रमुख लक्षण है। मैंने सवर्ण जातियों के दो वर्गों को उच्च वर्ग की जातियां और निम्न वर्ग की जातियां और निम्नतम वर्ग की जातियां नहीं बताया है। एक दृष्टि से यह ठीक ही होता । सामान्य सामाजिक क्रम में निस्संदेह वे निम्नतर और निम्नतम है। लेकिन एक अन्य दृष्टि से यह उचित नहीं होता। उच्च, निम्न, निम्नतर और निम्नतम की शब्दावली से यह ध्वनित होता है कि वे एक पूरी इकाई के अंग हैं। लेकिन क्या अवर्ण जातियां और सवर्ण जातियां एक पूरी इकाई की अंग है। वे नहीं हैं। अब वर्तमान जाति-व्यवस्था की जननी वर्ण-व्यवस्था की योजना तैयार की गई तो आदिम और जरायम- पेशा जातियों विचाराधीन नहीं थीं अतः वर्ण-व्यवस्था के नियमों में उनके दर्जे और स्थान के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया। लेकिन अस्पृश्यों के बारे में स्थिति ऐसी नहीं है। वे वर्ण व्यवस्था के समय विचाराधीन थे। अस्पृश्यों के बारे में वर्ण व्यवस्था के नियम अत्यंत स्पष्ट और अत्यंत सटीक हैं। हिंदू विधान के निर्माता मनु ने अपने नियम में कहा है कि वर्ण केवल चार हैं और पांचवां वर्ण नहीं होगा। जो सुधारक श्री गांधी के अस्पृश्यता निवारण आंदोलन में उनके समर्थक हैं, वे मनु की व्यवस्था को एक नया अर्थ देने का प्रयास कर रहे हैं। वे कहते हैं कि मनु को गलत समझा गया है। मनु के अनुसार कोई पांचवां वर्ण नहीं है और इस लिए उनका मंतव्य अस्पृश्यों अर्थात् शूद्रों को चौथे वर्ण में शामिल कर लेना था। लेकिन यह तो स्पष्टतः उल्टी व्याख्या है। मनु का जो आशय था, वह यह था कि मूलतः चार वर्ण हैं, और वे चार ही रहने चाहिएं। वह अस्पृश्यों को उस भवन में प्रवेश दिलाने को तैयार नहीं थे, जिसे प्राचीन हिंदुओं ने वर्ण-व्यवस्था में विस्तार कर उसे पांच वर्णों के लिए बनाया था। जब उन्होंने यह कहा था कि पांचवां वर्ण नहीं होगा, तब उनका यही आशय था। अस्पृश्यों को उन्होंने जो नाम दिया है, उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि वह यही चाहते थे कि अस्पृश्य हिंदू समाज - व्यवस्था से बाहर ही रहें। उन्हें वर्ण बाह्य (वर्ण-व्यवस्था से बाहर के लोग ) कहा गया है। आदिम व जरायम- पेशा जातियों और अस्पृश्यों के बीच यही विभेद है। आदिम व जरायम- पेशा जातियों के विरुद्ध हिंदू समाज में प्रवेश के लिए कोई निश्चित वर्जना नहीं है। वे कालांतर में उसके सदस्य बन सकते हैं। फिलहाल वे हिंदू समाज से जुड़े हैं और उसके बाद में उसमें घुलमिल सकते हैं तथा उसका अंग बन सकते हैं। लेकिन अस्पृश्यों की स्थिति अलग है। हिंदू समाज में उनके विरुद्ध निश्चित वर्जना है। उसमें सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्हें अलग-थलग ही रखना होगा और वे हिंदू समाज का अंग नहीं बन सकते। अस्पृश्य हिंदू समाज के अंग नहीं हैं, और यदि वे कुछ हैं, तो वे उसके अंग मात्र हैं, अंग नहीं। हिंदुओं और अस्पृश्यों के बीच क्या संबंध हैं, इसकी सटीक व्याख्या बंबई के एक सम्मेलन में सनातनी हिंदुओं के नेता ऐनापुरे शास्त्री ने की है। उन्होंने कहा कि हिंदुओं के साथ अस्पृश्यों का संबंध तो वैसा ही है, जैसा किसी मनुष्य का उसके जूतों के साथ होता है। आदमी जूते पहनता है । इस दृष्टि से वह मनुष्य के साथ हैं, और कहा जा सकता है कि वह मनुष्य के हैं। लेकिन वह शरीर का अंग नहीं हैं, क्योंकि जिन दो चीजों को किसी इकाई से अलग किया जा सकता है, उन्हें उस इकाई का अंग नहीं कहा जा सकता। जो कुछ भी हो, यह उपमा है बड़ी सटीक ।