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अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट -  लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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18 ऑक्टोबर 2023
Book
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     ऐसी है जाति और ऐसी है जाति व्यवस्था । सवाल यह है कि हिंदू समाज - संगठन को जानने के लिए क्या इतनी जानकारी पर्याप्त है? हिंदू समाज संगठन के रूढ़ स्वरूप को समझने के लिए जाति और जाति-व्यवस्था का ज्ञान पर्याप्त है। हमें इन तथ्यों से अधिक की जानकारी आवश्यक नहीं कि हिंदू जातियों में बंटे हैं और जातियां ऐसी व्यवस्था का गठन करती हैं, जिसमें सब एक ऐसे धागे पर टंगे रहते हैं, जो व्यवस्था में इस प्रकार पिरोया जाता है कि एक जाति को दूसरी जाति से लपेटते और अलग करते समय वह उन्हें इस प्रकार धारण करे, जैसे वह टेनिस की ऐसी गेंदों की माला हो, जो एक-दूसरे के ऊपर टंगी हो। लेकिन जाति के चेतन स्वरूप को समझने के लिए इतना पर्याप्त नहीं होगा। जाति के ढांचे के मूर्त रूप को समझने के लिए जाति-व्यवस्था के अलावा जाति के एक अन्य विशिष्ट लक्षण पर ध्यान देना जरूरी है और वह है, वर्ग व जाति-व्यवस्था ।

vah Samaj se hinduon Ne Banaya - asprishy ka vidroh - Gandhi aur Unka anshan - Poona pact - author B R Ambedkar     जाति और वर्ग की धारणाओं का आपसी रिश्ता दिलचस्प विवाद का विषय रहा है। कुछ कहते हैं कि जाति और वर्ग, दोनों एक जैसे हैं और दोनों में कोई भेद नहीं है। पर कुछ अन्य कहते हैं कि जाति की संकल्पना वर्ग की संकल्पना के मूलतः प्रतिकूल है। जाति के इस पहलू के बारे में अब आगे और प्रकाश डाला जाएगा। फिलहाल जाति-व्यवस्था के उस प्रमुख लक्षण पर जोर देना जरूरी है, जिसका उल्लेख इससे पूर्व नहीं किया गया है। वह यह है : यद्यपि जाति की धारणा वर्ग- धारणा से भिन्न और उसके प्रतिकूल है, फिर भी जाति से भिन्न जाति-व्यवस्था एक ऐसी वर्ग-व्यवस्था को मान्यता देती है, जो उपरोक्त क्रमबद्ध दर्जे से कुछ भिन्न है। जिस प्रकार हिंदू अनेक जातियों में बंटे हुए हैं, उसी प्रकार जातियां भी विभिन्न वर्गों में बंटी हुई हैं। हिंदू में जाति-भावना होती है। उसमें वर्ग- भावना भी होती है। उसमें जाति - भावना या

     वर्ग-भावना इस बात पर निर्भर करती है कि उसका टकराव किस जाति से होता है। जिस जाति से उसका टकराव होता है, यदि वह उसके वर्ग की ही जाति है, तो उसमें अपनी जाति - श्रेष्ठता की भावना होती है। यदि जाति उसके वर्ग के बाहर की होती है तो उसमें वर्ग श्रेष्ठता आ जाती है। इस बारे में यदि कोई प्रमाण चाहता है तो वह मद्रास और बंबई प्रेसिडेंसी में गैर-ब्राह्मणों के आंदोलन का अध्ययन कर सकता है। ऐसे अध्ययन से कोई संशय नहीं रह जाएगा कि हिंदू के लिए जाति की परिधि, वर्ग परिधि जैसी ही यथार्थ है और जाति- उच्चता, वर्ग उच्चता जैसी ही यथार्थ है।

     कहा जाता है कि जाति वर्ग-व्यवस्था का विकसित रूप है। आगे मैं यह सिद्ध करूंगा कि यह निरी बकवास है। जाति वर्ण का विकृत रूप है, जो भी हो, यह विकास विपरीत दिशा में हुआ है। लेकिन जहां जाति ने वर्ण-व्यवस्था को पूर्णत: विकृत कर दिया है, वहां उसने वर्ण-व्यवस्था से वर्ग-व्यवस्था उधार ले ली है। वास्तव में वर्ग, जाति-व्यवस्था, वर्ण-व्यवस्था के वर्ग-विभेदों का बहुत कुछ अनुसरण करती है।

     यदि जाति-व्यवस्था पर इस दृष्टिकोण से विचार करें तो हमें अनेक वर्ग मिलेंगे, जो जाति-व्यवस्था के इस पिरामिड में बड़े-बड़े शिला खंडों की तरहत आर-पार एक के ऊपर एक व्यवस्थित हैं। पहला वर्ग उस व्यवस्था का है, जिसे चातुर्वर्ण्य कहा जाता है। चातुर्वर्ण्य की प्राचीन व्यवस्था में प्रथम तीन वर्णों अर्थात् ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों को एक वर्ग तथा चौथे वर्ण अर्थात् शूद्र को दूसरे वर्ग में रखकर दोनों के बीच अंतर मिलता है। प्रथम तीन वर्गों को द्विज वर्ग माना गया है। शूद्र को द्विज वर्ग नहीं माना गया। विभेद का आधार यह है कि प्रथम तीन को यज्ञोपवीत धारण करने और वेद के अध्ययन का अधिकार है। शूद्र को दोनों में से कोई भी अधिकार नहीं है। इसी कारण उसे द्विज वर्ग में नहीं माना गया। यह अंतर अब भी है। यह वर्तमान वर्ग-भेद का आधार है। उसने जातियों को दो वर्गों में बांट दिया है। एक वर्ग वह है, जो शूद्रों के विशाल वर्ग से जन्मा है और दूसरा वर्ग वह है, जो ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा वैश्यों के तीन वर्गों से पैदा हुआ है। वर्ग-भेद की यही परतें उच्च जाति और निम्न जाति कही जाती हैं, और जो उच्च वर्ण की जाति तथा निम्न वर्ण की जाति के क्रमशः लघु रूप हैं

     इस पिरामिड में चट्टान की एक परत और है। यह चतुर्थ वर्ण की जाति के ठीक नीचे स्थित है। यह परत चार वर्णों अर्थात् पहले तीन अर्थात् ऊंची जाति तथा चतुर्थ वर्ण से अर्थात् नीति जाति से उत्पन्न सभी जातियों के बाद की जातियों की परत है, जिन्हें मैं अवशिष्ट कहता हूं। यह अपने से ऊपर वाली परत की जातियों को उच्च मानती है। यह भी एक वास्तविक परत है। यह उस सुपरिभाषित विभेद का अनुसरण करती है, जो चातुर्वर्ण्य का मूल सिद्धांत था। जैसा कि बताया गया है, चातुर्वर्ण्य ने चार वर्णों के बीच विभेद किया। उसने तीन वर्णों को चौथे से उच्च माना। लेकिन उसने वैसा ही स्पष्ट विभेद उन जातियों के बीच किया, जो चातुर्वर्ण्य के भीतर और जो चातुर्वर्ण्य के बाहर थीं। इस विभेद को व्यक्त करने के लिए उसके पास शब्दावली थी। जो चातुर्वर्ण्य के भीतर थे, चाहे उच्च थे या नीच, ब्राह्मण थे अथवा शूद्र, वे सवर्ण कहलाए अर्थात् उन पर वर्ण की मुहर नहीं लगी थी। चारों वर्णों से उत्पन्न जातियों को सवर्ण हिंदू कहा जाता है। अंग्रेजी मे उसे 'कास्ट हिंदूज' कहा जाता है। 'शेष' अवर्ण हैं, जिन्हें आजकल यूरोपीय 'नान- कास्ट हिंदूज' कहते हैं, यानी वे जो चार मूल जातियों अथवा वर्णों से बाहर हैं।

     जाति-व्यवस्था के बारे में जो अधिकतर लिखा- पढ़ा गया है, उसका संबंध अधिकांशतः सवर्ण हिंदुओं की जाति व्यवस्था से है। अवर्ण हिंदुओं के बारे में बहुत थोड़ी जानकारी है। ये अवर्ण हिंदू कौन हैं, हिंदू समाज में उनका क्या स्थान है, सवर्ण हिंदुओं से उनका क्या संबंध है, ये ऐसे प्रश्न हैं, जिनकी ओर अभी तक कोई ध्यान नहीं दिया गया है। मेरा विश्वास है कि इन प्रश्नों का विचार किए बिना हमें हिंदुओं द्वारा बनाए गए सामाजिक ढांचे की सही तस्वीर नहीं मिल सकती । सवर्ण हिंदुओं तथा अवर्ण हिंदुओं के बीच के वर्ग विभेद को निकाल देना, ग्रिम की परी कथा में से डाइनों, बैतालों और राक्षकों के वर्णन को निकाल देना जैसा है।

     अवर्ण हिंदुओं के तीन भाग हैं: (1) आदिम जातियां (2) जरायम - पेशा जातियां, और (3) अस्पृश्य जातियां इन तीनों जातियों के लोगों की संख्या किसी भी प्रकार थोड़ी नहीं कही जा सकती। 1931 की जनगणना के अनुसार भारत में आदिम जातियों के लोगों की संख्या ढाई करोड़ बताई गई है। जरायम- पेशा के रूप में अनुसूचित लोगों की कुल आबादी कोई 45 लाख के लगभग है। 1931 में अस्पृश्यों की कुल आबादी कोई पांच करोड़ थी। इन तीनों की कुल संख्या सात करोड़ 95 लाख होती है।

     सवर्ण जातियों के साथ अवर्ण जातियों का क्या संबंध है? सवर्ण जातियों तथा अवर्ण जातियों के बीच विभेद एक-सा नहीं है। अतः इस अंतर को आसानी से नहीं समझा जा सकता । सवर्ण जातियों तथा दो अवर्ण जातियों अर्थात् आदिम जातियों और जरायम- पेशा जातियों के बीच जो संबंध है, वह उस संबंध से भिन्न है जो सवर्ण जातियों तथा तीसरी अंतिम अवर्ण जातियों अर्थात् अस्पृश्यों के बीच है। सवर्ण जातियों तथा प्रथम दो अवर्ण जातियों के बीच विभेद जाति - भाई तथा मित्रों जैसा है। दोनों के बीच मैत्रीपूर्ण तथा सम्मानजनक शर्तों पर संपर्क संभव है। सर्वण जातियों तथा अस्पृश्यों के बीच विभेद भिन्न प्रकार का है। यह दो विजातीय तथा विरोधी समूहों के बीच का विभेद है। वहां सम्मानजनक शर्तों पर मैत्रीपूर्ण संपर्क की कोई संभावना नहीं है।

     इस विभेद का क्या महत्व है? इसका आधार क्या है? भले ही विभेद निश्चित है, पर उसके आधार की व्याख्या नहीं की गई है। लेकिन ऐसा लगता है कि विभेद का आधार वैसा ही है, जैसा कि द्विजों तथा शूद्रों के बीच का है। शूद्रों की भांति अवर्ण जातियां भी द्विज वर्ग में नहीं आतीं। वे द्विज नहीं होते और उन्हें यज्ञोपवीत धारण करने का कोई अधिकार नहीं है। इससे भी दो तथ्य उभर कर सामने आते हैं, जिनकी प्रायः अनेदेखी कर दी जाती है। पहला तथ्य यह है कि सवर्ण शाखा की शूद्र जातियों तथा अवर्ण शाखा की आदिम तथा जरायम पेशा जातियों के बीच अंतर बहुत मामूली-सा है। दोनों ही अस्पृश्य हैं और दोनों ही द्विज-वर्ग में नहीं आतीं। यह अंतर सांस्कृतिक विकास का है। हालांकि रूढ़िवादी की दृष्टि से इन दो के बीच अधिक सांस्कृतिक अंतर है, जैसा कि सुसंस्कृत तथा ठेठ बर्बर के बीच होता है, लेकिन अंतर मात्रा- भेद का है। इस सांस्कृतिक अंतर को स्पष्ट करने के लिए हिंदुओं ने एक नई शब्दावली गढ़ी है। वह शूद्रों के दो वर्ण मानती हैं : ( 1 ) सत्शूद्र अथवा सुसंस्कृत शूद्र, और (2) शूद्र। उसने शूद्रों के प्राचीन वर्ग को सत्शूद्र अथवा सुसंस्कृत शूद्र कहा और आदिम जाति सहित उन लोगों के लिए शूद्र शब्द प्रयोग किया, जो हिंदू सभ्यता की परिधि मे आ गए थे। नई शब्दावली का आशय यह नहीं है कि शूद्रों के अधिकारों तथा कर्तव्यों में कोई अंतर है। विभेद केवल इतना है कि कुछ शूद्र द्विजों के साथ सहजीवन के लिए उपयुक्त हैं और कुछ कम उपयुक्त हैं।