अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
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हिंदू समाज की आधार - शिला
हिंदू समाज जातियों का घरौंदा है। हिंदुओं की कोई एक जाति नहीं है। ये जातियां विभिन्न वर्गों में गठित जन-समुदाय है। यही उसकी विशेषता है। यह धारणा उन विदेशियों की है, जो इतिहास के विभिन्न कालों में भारत आते रहे हैं। तथापि ऐसे लोग भी हैं, जो यह कहते हैं कि यह जाति का कोई असामान्य गुण नहीं है। उदाहरणार्थ प्रो. बेन्स का मत है:
इस व्यवस्था में ऐसा कोई विलक्षण गुण नहीं है, जो अन्य देशों में, यहां तक कि पश्चिम के देशों में भी कभी-न-कभी न रहा हो या न मिल सकता हो, भले ही वह वहां अन्य प्रभावों के कारण काफी अर्से पहले ही समाप्त हो चुका है। कुछ समुदायों का धीरे-धीरे संप्रदाय अथवा वर्गों के रूप में बदल जाना सामान्य अथवा सार्वभौमिक प्रवृत्ति है और उनमें कुछ का आनुवांशिक या सबसे पृथक या परिस्थितिवश उच्च हो जाना कोई अस्वाभाविक बात नहीं कही जानी चाहिए।
अगर हम आदिम जातियों के सामाजिक संगठन के संदर्भ में विचार करें, तो इस तर्क की पुष्टि हो जाती है। आदिम समाज में मनुष्य कभी भी अकेला नहीं रहा।
अतः मनुष्यों की सर्वाधिक सामान्य और सर्वाधिक सहज प्रवृत्ति यह है कि वे वर्गों में रहते हैं। ऐतिहासिक कालक्रम में इन सामाजिक वर्गों के अनेक रूप बनते गए। परिवार एक ऐसा ही सामजिक वर्ग है । वह सर्वत्र पाया जाता है और अब भी है। परिवार के तुरंत बाद उससे बड़ा वर्ग है, कुल। कम-से-कम शब्दों में कहा जाए तो यह कुल (वंश या गोत्र भी ) ऐसे व्यक्तियों का वर्ग समझा जाता है, जो एक-दूसरे से अपनी-अपनी मां या अपने-अपने पिता के जरिए संबंध की ओर से एक-दूसरे से संबंधित हों। दूर के रिश्ते के लोगों को भी भाई-बहन, आदि समझा जाता है। और उन्हें उस कुल का सदस्य माना जाता है। हो सकता है कि यह संबंध बिल्कुल बनावटी हो, पर सामाजिक दृष्टि से यह उतना ही यथार्थ संबंध होता है जितना कि वह संबंध, जो समान रक्त पर आधारित होता है। वे कुल आपस में मिलकर समाज बन जाते हैं। जब कुलों को दो वर्गों में संगठित किया जाता है तो प्रत्येक वर्ग मोती कहलाता है। जब कुलों को दो से अधिक वर्गों में संगठित किया जाता है, तो हरेक को प्रात्री कहते हैं। यह विभाजन विश्व में हर जगह देखने में नहीं आया। मोइती या प्रात्री के कार्यकलापों के बारे में सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन इस बारे में कोई संदेह नहीं है कि हर मोड़ती और फ्रात्री एक सामाजिक वर्ग था और इस प्रकार जो वर्ग बने, उनमें आपस में भाईचारे की भावना होती थी। उसके बाद आते हैं, जनजातीय वर्ग। जनजातियों के स्वभाव, चरित्र और गठन में भारी अंतर होता था। हो सकता है कि जनजातीय ग्राम समुदायों से बनी हों और वे मोइती या कुल के रूप में न बंटी हों। हो सकता है कि उनमें कुल होते हों और मोइती न होते हों, अथवा मोती हों, कुल न हों, अथवा कुल भी हों और मोइती भी हों। जनजातीय चेतना कभी प्रबल होती थी और कभी निर्बल। भले ही वर्गों के रूप में जनजातियों का गठन किसी निश्चित नियम के आधार पर न हुआ हो, अथवा इनका विकास किसी विशिष्ट दृष्टिकोण के आधार पर नहीं हुआ हो, पर उनमें कुछ समानता होती थी, जैसे एक-सी बोली, एक से रीति-रिवाज, कमोबेश निश्चित भू-क्षेत्र और कोई ऐसी शासन-प्रणाली, जिसके अधीन समूची जनजाति रहती थी। जनजाति के वर्ग से बड़ा जनजातियों का संघ या महासंघ होता था। लेकिन यह विरले थे। किसी खतरे का सामना करने के लिए जनजातियां परस्पर अनौपचारिक गठजोड़ से कोई एक संघ बना लेती होंगी। आदिम जातियों में परस्पर एक होने के दृष्टांत प्रायः नहीं मिलते। प्रसिद्ध इरोक्वोई (उत्तरी अमरीका की इंडियन जनजातियां) महासंघ ऐसी ही एक अपवाद है।
जो भी सामाजिक वर्ग बने, उनका आधार सगोत्रीयता या स्थानीयता रही। आदिम जातियों में विभिन्न वर्गों के निर्माण का आधार कुछ और है। यह लिंग, आयु या कोई अन्य आधार होता था। इस प्रकार जो सामाजिक वर्ग बने, उनको यदि हम ध्यान में रखें तो यह देखेंगे कि जाति नाम के इस सामाजिक वर्ग की उत्पत्ति में कोई नई या विलक्षण बात नहीं है। जाति एक प्रकार का कुल या कुनबा है और कुल या कुनबे की तरह यह भी यह प्रकार का सामाजिक वर्ग है।
यह स्वीकार किया गया है कि जाति और कुल में अनुरूपता है, दोनों एक ही तरह के वर्ग हैं, लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि जहां तक अर्थ और प्रयोजन का संबंध है, जाति और कुल परस्पर विरोधी हैं। कोई ऐसी कुल-व्यवस्था नहीं है, जिसकी जाति-व्यवस्था के साथ तुलना की जा सके। चूंकि कुल व्यवस्था जैसी कोई जाति-व्यवस्था नहीं है, इसलिए कुलों में से कोई श्रेणी नहीं होती। वास्तव में आदिम जातियों का कुल-संगठन हिंदुओं की वर्ण-व्यवस्था से सर्वथा विपरीत है । में अनुरूपता की बात को केवल अपनी बात कहने के लिए स्वीकार करता हूं। मेरे विचार में यह सवाल कि जाति-व्यवस्था स्वाभाविक है या अस्वाभाविक, असाधारण है या साधारण, एक बड़ा ही रोचक विषय है, इससे अनेक बातों की जानकारी होती है। लेकिन यह सवाल उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि यह सवाल, जिसे मैं उठाना चाहता हूं। यह सवाल है कि क्या कारण है कि जाति व्यवस्था अब भी जिंदा है, ज्यों-की-त्यों बनी हुई है, जब कि अन्य देशों में विद्यमान ऐसे ही सामाजिक वर्ग सभ्यता के विकास के साथ-साथ लुप्त हो गए हैं।
रोमनों का हिंदुओं जैसा ही सामाजिक संगठन था। जब ऐसी सभी संस्थाएं नहीं रहीं, तो केवल जाति-व्यवस्था ही क्यों बच गई है? लोग इसके नियमों को क्यों मानते हैं? जाति के लिए मान्यता क्या है।
सर्वत्र समाज के नियमों के पालन के लिए चार प्रकार का दंड विधान होता है। वह इस प्रकार हैं : (1) प्राकृतिक, (2) लोकापवाद, (3) कानूनी, और (4) धार्मिक। इनमें से कौन-सा दंड विधान जाति-व्यवस्था की पुष्टि करता है? इस प्रश्न पर विचार करने से पहले यह बताना उचित होगा कि यह दंड - विधान किसी प्रकार व्यवहृत होता है।
प्राकृतिक दंड विधान स्वभाव के द्वारा व्यवहृत होता है। जब कोई व्यक्ति किसी निश्चित तरीके से काम करने का आदी हो जाती है तो उस प्रकार कार्य करने के लिए उस पर कोई जोर नहीं डालना पड़ता। वह उसे स्वयं करने लगता है और रोजमर्रा के रूप में नियम से कार्य करना निश्चित हो जाता है।
लोकापवाद दंड-विधान लोकमत के माध्यम से व्यवहृत होता है। वह कतिपय तौर-तरीकों के बारे में समाज में प्रचलित स्वीकृति और अस्वीकृति की भावना है। कतिपय तौर-तरीका बन जाता है और सुस्थापित आम तरीके के अनुरूप किए गए कार्य स्वीकृति प्राप्त कर लेते हैं और उसके विरुद्ध किया गया कोई कार्य अस्वीकार कर दिया जाता है।
प्राकृतिक दंड-विधान और लोकापवाद, इन दोनों में कोई विशेषता नहीं होती । वे सर्वत्र और हर सामाजिक कहे जाने वाले कार्य की पृष्ठभूमि में रहते हैं। उनके प्रभाव के विषय में निश्चित रूप से कुछ कहना कठिन है, लेकिन जहां कहीं भी ये प्रभावपूर्ण होते हैं, वहां वे एक-दूसरे से पुष्ट होकर भी प्रभावपूर्ण होते हैं। केवल काननी और धार्मिक दंड - विधान ही ऐसे दंड विधान हैं, जो किसी संस्था को जीवित रख सकते हैं।