अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
अत: ऐसा लगता है कि जाति से बहिष्कृत व्यक्ति के मामले को छोड़कर दायभाग की अयोग्यता केवल वैयक्तिक है। कहा जा सकता है कि हर बहिष्कृत व्यक्ति को अधिकार है कि उसका पालन-पोषण किया जाए और वह कभी भी अपने पहले के अधिकारी को फिर से प्राप्त कर सकता है। इन प्रावधानों के पीछे जो भी सूझबूझ हो, यह नहीं कहा जा सकता कि ये सर्वत्र न्याय-रहित हैं या पूर्णतः मानवीयता - रहित हैं। हमें इस देश के कानून की तुलना अपने देश के कानून से करते समय यह नहीं भूलना चाहिए कि हमने ऐसा कोई कानून नहीं बनाया है कि वसीयत के द्वारा बच्चों को दायभाग से पूर्णतः वंचित न किया जा सके।
अगले अध्याय में यह बताया गया है कि इन दोनों धर्मों में किसी में भी दीक्षा प्राप्त व्यक्ति (जैसे हमारे यहां प्रत्येक धार्मिक क्रांति से पूर्व दीक्षा प्राप्त व्यक्ति) सामाजिक दृष्टि से मृत समझ लिया जाता है और उसकी संतान उसके जीवन-काल में ही उत्तराधिकार ग्रहण कर लेती है, मानो उसकी स्वाभाविक मृत्यु हो गई हो, और जिस प्रकार वह व्यक्ति स्वयं सांसारिक कार्यों से अपने को मुक्त कर लेता है, वह दायभाग के अयोग्य घोषित कर दिया जाता है, वैसे ही वह व्यक्ति भी जो शुरू में भक्त होने का दंभ भरता है और बाद में भक्त बन भी जाता है। पहली श्रेणी में वे व्यक्ति भी शामिल हैं जो दिखावा करते हैं, बहुरूपिए होते हैं और जो पवित्र चिह्नों व प्रतीकों को धारण करते हैं, कृष्छ साधना करते हैं, लेकिन उनकी दृष्टि स्वार्थपूर्ण होती है।
बहिष्कार का शेष कारण है अनुचित विवाह, अर्थात् वह विवाह, जिसमें पति और पत्नी एक ही वंश के हों। ऐसा विवाह बेमेल होता है। अतः उसके फलस्वरूप जो संतान होगी, वह दायभाग प्राप्त नहीं कर सकती, जो शूद्रों में होता है। और वही परिणाम उस विवाह का होता है, जहां विवाह वर्ग क्रम के अनुसार नहीं हुआ हो।
अब देखना यह है कि ऐसी स्थिति में क्या उसका उत्तराधिकारी यदि उस पर कोई रोक न हो, दायभाग प्राप्त कर सकता है? क्या जाति को धर्म की धार्मिक मान्यता प्राप्त है? वेद जाति को मान्यता देते हैं।
'ऋगवेद' जाति को मान्यता देता है और निम्नलिखित छंदों में उसकी व्याख्या मिलती है :
1. इस पुरुष को एक सहस्त्र शीर्ष हैं, एक सहस्त्र नेत्र हैं, एक सहस्त्र चरण हैं। यह पृथ्वी को चारों ओर से आवृत्त किए हुए हैं, यह पृथ्वी से दस अंगुल ऊपर है।
2. यह पुरुष स्वयं समस्त (ब्राह्मंड) है, जो वर्तमान में तथ्य जो भी भविष्य में होगा। यह पुरुष अमरत्व का स्वामी है, जो अन्न से समृद्ध होता है।
3. ऐसी उसकी विराटता है, पुरुष इससे श्रेष्ठ जो कुछ अस्तित्व में है वह इसका चतुर्थांश है, उसका तीन चौथाई यह अमर्त्य आकश है।
4. पुरुष का तीन-चौथाई भाग ऊपर स्थित है। इसका चौथाई भाग इस पुरुष से पुन: उत्पन्न हुआ। उसके बाद यह सभी में विकीर्ण हो गया, उनमें जो भोजन करते हैं और उनमें जो भी भोजन नहीं करते।
5. उससे विराट और विराट से पुरुष पैदा हुआ। जब वह उत्पन्न हो गया तब पृथ्वी से परे, उसके आगे और उसके पीछे विस्तृत हो गया ।
6. जब देवताओं ने नव पुरुष की बलि देकर यज्ञ किया तब वसंत घृत था, ग्रीष्म समिधा थी और शरद ( उसके साथ) नैवेध बनी।
7. उन्होंने इस बलि, अर्थात् पुरुष को जो आरंभ में जन्मा था, यज्ञ की समिधा में भस्म कर दिया। देवताओं, साध्यों और ऋषियों ने उससे यज्ञ किया ।
8. उस विराट यज्ञ के साथ दही और घृत प्राप्त हुआ। उससे वायु में उड़ने वाले पक्षी तथा जंगली एवं पालतू पशु बने ।
9. उस विराट यज्ञ से ऋचाएं, साम, छंद और यजुः उत्पन्न हुए।
10. उससे घोड़े और दोनों ओर दांत वाले सभी सभी पशु पैदा हुए। उसी से गाएं उत्पन्न हुई और उसी से बकरियां तथा भेड़ें पैदा हुई ।
11. जब (देवों ने) पुरुष कों विभक्त किया तो उन्होंने उसे कितने भागों में बांटा ? उसका मुख क्या था? उसकी भुजाएं क्या थीं? किन (दो) को उसकी जंघाएं और पैर कहा गया ?
12. ब्राह्मण उसका मुख था; राजन्य (क्षत्रिय) उसकी भुजाएं थीं, जिन प्राणियों को वैश्य कहा जाता है, वे उसकी जंघाएं थीं और उसके चरण से शूद्र उत्पन्न हुए।
13. उसकी आत्मा (मानस) से चंद्रमा, उसकी आंख से सूर्य, उसके मुख से इंद्र और अग्नि उसके श्वास से वायु पैदा हुए।
14. उसकी नाभि से अंतरिक्ष, उसके सिर से लोक पैरों से भूमि, उसके कानों से चारों दिशाएं पैदा हुई इस तरह ( देवों ने) लोकों की रचना की।
15. जब देवताओं ने यज्ञ करते हुए पुरुष को बलि के रूप मे बांधा तब ( अग्नि के चारों ओर) उसके लिए सात समिधाएं रखी गई और उसमें इक्कीस समिधाओं का ईंधन तैयार किया गया।
16. देवताओं ने बलि देकर यज्ञ किया। उन महान शक्तियों ने स्वर्ग को प्राप्त किया जहां पूर्ववर्ती साध्य, देवता हैं।
ब्राह्मण-ग्रंथ भी जाति को मान्यता प्रदान करते हैं। 'शतपथ ब्राह्मण' में जाति का उल्लेख इस प्रकार किया गया है :
23. ब्रह्म (यहां टीकाकार के अनुसार अग्नि और ब्राह्मण के प्रतिनिधि के रूप में विद्यमान) पहले यह (ब्रह्मांड ) था, केवल एक। एक अकेला होने के कारण, उसका विस्तार नहीं हुआ। उसने अपने ओज से एक अद्भुत रूप ‘क्षात्र’ उत्पन्न किया, अर्थात् देवों में से जो शक्तियां ( क्षत्राणी) हैं, यथा इंद्र, वरुण, सोम, रुद्र, पर्जन्य, यम, मृत्यु, ईशान । अतः 'क्षात्र' से बढ़कर कोई नहीं है। इसीलिए राजसूय यज्ञ में ब्राह्मण क्षत्रिय से नीचे आसन ग्रहण करता है, वह 'क्षात्र' (राज शक्ति) को गौरव प्रदान करता है। यह ‘ब्रहम' ही क्षात्र का उद्गम है। अतः यद्यपि राजा प्रधानता प्राप्त कर लेता है, पर अंततः ब्राह्मण के आश्रित रहता है, जो उसका मूल है। जो उसे (ब्राह्मण को) नष्ट करता है, वह अपने ही मूल को नष्ट करता है। जो अपने से श्रेष्ठ को आहत करता है, उसकी स्थिति अति दयनीय हो जाती है।
24. उसका विकास नहीं हुआ। उसने 'विश', अर्थात् वेदों के उस वर्ग को पैदा किया, जो वीर सैनिकों के रूप में जाने जाते हैं, जैसे वसु, रुद्र, आदित्य, विचदेव, मरुत आदि गण ।
25. उसका विकास नहीं हुआ। उसने शूद्र जाति, पूषण को पैदा किया। यह पृथ्वी है, क्योंकि वह चराचर का पोषण करती है।
26. उसका विकास नहीं हुआ। उसने अपने ओज से एक अद्भुत रूप न्याय (धर्म) को पैदा किया। यह शासकों का शासक ( क्षात्रों का क्षात्र), अर्थात् न्याय है। अतः न्याय से बढ़कर कुछ नहीं है। अत: निर्बल सबल पर विजय के लिए न्याय, अर्थात् राजा के द्वारा सहारा लेता है। यह न्याय ही सत्य है। अतः जो व्यक्ति सत्य कहता है, उसके बारे में कहा जाता है कि वह 'न्याय' कहता है, अर्थात् जो न्याय कहता है, वह सत्य कहता है क्योंकि इसके ये दोनों ही पक्ष हैं।
27. यह है ब्रह्म, क्षात्र, विश और शूद्र । अग्नि के द्वारा वह देवताओं में ब्रह्मा बना, मनुष्यों में ब्राह्मण (दिव्य) क्षत्रियों के द्वारा क्षत्रिय (मानव), (दिव्य) वैश्य के द्वारा वैश्य (मानव), (दिव्य) शूद्र के द्वारा शूद्र (मानव) बना। इसी कारण वे देवों के बीच अग्नि में और मानवों के बीच और ब्राह्मणों में आश्रय खोजते हैं।
तैत्तरीय ब्राह्मण (1) 2, 6, 7 दैव्यो वे वर्णों ब्राह्मण असूर्यौ शूद्रः । 'ब्राह्मणों की उत्पत्ति देवों से और शूद्रों की असुरों से हुई है।'
यह मानना पड़ेगा कि जाति की गाड़ी को आगे चलाते रहने वाले दो शक्तिशाली इंजन थे- कानून और धर्म, निस्संदेह इन दोनों में से धार्मिक मान्यता प्रमुख मान्यता थी और जाति को केवल धार्मिक मान्यता के बल पर जीवित रखा गया। यह दो कारणों से और भी स्पष्ट हो जाता है। यह मानना पड़ेगा कि कानूनी मान्यता का सहारा तो कभी-कभी ही लिया गया। इसका अर्थ है कि जाति को अन्य साधनों से जिंदा रखा गया। दूसरे, कानूनी मान्यता का उपयोग केवल 1850 तक किया गया। उस वर्ष ब्रिटिश सरकार ने जाति अयोग्यता निवारण अधिनियम (कास्ट डिसएबिलिटीज रिमूवल एक्ट) बनाकर इस पर वे कानूनी मान्यता उठा ली, या यूं कहें कि समाप्त ही कर दी गई थी। हालांकि कानूनी मान्यता वापस ले ली गई, पर जाति को बराबर मान्यता मिलती रही। उसमें कोई कमी नहीं आई । यदि जाति को कानूनी मान्यता के अलावा धार्मिक मान्यता न प्राप्त होती, जो उससे भी अधिक शक्तिशाली थी, तो जाति का बना रहना संभव नहीं था।
यह निर्विवाद है कि धार्मिक मान्यता से अधिक शक्तिशाली कोई और मान्यता नहीं हो सकती, जिसे कोई संस्था या आस्था अपने अस्तित्व को बनाए रखने और उसे पुष्ट करने के लिए अर्जित कर सकती है। उसकी शक्ति अनंत है और उसका शिकंजा फौलादी है। लेकिन यह बात कम ही समझ में आती है कि इस धार्मिक मान्यता को इतनी बढ़िया किस्म की अश्व-शक्ति कैसे और कहां से प्राप्त होती है ? इसे समझने के लिए इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि इस धार्मिक मान्यता को यह शक्ति दो स्रोतों से मिलती है।
सर्वप्रथम तो यह कि जो धार्मिक है, वह सामाजिक भी है। इस बारे में प्रो. डर्कहीम के विचार निम्नलिखित हैं :
अगर कोई वर्ग कुछ मान्यताओं को स्वीकार कर उनसे जुड़े रीति-रिवाजों के पालन करने का संकल्प करता है तो वे धार्मिक आस्थाएं उस वर्ग के लिए समान होती हैं। उन्हें उस वर्ग के सदस्य अलग-अलग ग्रहण नहीं करते, वे उस समस्त वर्ग के लिए होती हैं, और इन्हीं के कारण वह वर्ग एक इकाई बनता है, उनमें परस्पर एकता की भावना उत्पन्न होती है, जो केवल इस कारण कि उनकी एक समान आस्था होती है। ¹
दूसरे, जो धार्मिक है, वह पावन है। मैं पुनः प्रो. डर्कहीम की साक्षी देता हूं। उनके विचार निम्नलिखित हैं ²:
विश्व में जो भी धर्म हैं, वे चाहे सरल हों या जटिल, उन सभी में एक बात समान मिलती है, और वह यह कि वे उन सभी वास्तविक अथवा काल्पनिक विषयों को जिनके बारे में मनुष्य सोच सकता है, दो वर्गों में बांट देती है, जो एक-दूसरे के विपरीत होते हैं। इन्हें अलग-अलग नाम दिए जाते हैं। हम इन्हें अपवित्र और पवित्र शब्दों से व्यक्त कर सकते हैं।.... मानव चिंतन के समूचे इतिहास में इन दो श्रेणियों के रूप में वर्गीकरण का ऐसा कोई अन्य उदाहरण नहीं मिलता, जो एक-दूसरे से इतना नितांत भिन्न हो या आमूलतः परस्पर इतना विपरीत हो । परंपरा से भला और बुरा कहकर वैपरीत्य का जो भाव व्यक्त किया जाता है, वह और कुछ नहीं है, क्योंकि अच्छा और बुरा एक ही वर्ग, यानी आचार-विचार के दो विभिन्न प्रकार हैं, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार स्वस्थता और अस्वस्थता एक ही तथ्य अर्थात् जीवन के दो अलग-अलग पहलू हैं। पर पवित्र और अपवित्र की कल्पना सर्वत्र सदा ही मानव-मन ने दो नितांत अलग-अलग श्रेणियों के रूप में की है। उनके संबंध में उसने दो अलग-अलग जगत की संकल्पनाएं की है, जिनका एक-दूसरे से कोई वास्ता नहीं । धार्मिक आस्थाएं वे रूप हैं, जो पवित्र वस्तुओं की प्रकृति और उन संबंधों को व्यक्त करते हैं, जो इन वस्तुओं में परस्पर या अपवित्र वस्तुओं के साथ इन वस्तुओं के होते हैं, (जब कि) आचार वे नियम हैं, जो यह निर्धारित करते हैं कि इन पवित्र विषयों के संदर्भ में किस प्रकार मनुष्य स्वतः सुख-शांति प्राप्त कर सकता है।
इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सामाजिक, धार्मिक तथा कर्मकांडीय आस्थाओं का आपस में गहरा संबंध है। जो धारणाएं धार्मिक हैं, वे सामाजिक हैं। पर जो सामाजिक हैं, वे सारी की सारी धार्मिक नहीं हैं। जो धारणाएं कर्मकांडीय है, वे सामाजिक हैं, भले ही जो सामाजिक हों वे सारी की सारी कर्मकांडीय न हों। दूसरी ओर, जो धार्मिक हैं, वह सामाजिक भी हैं और कर्मकांडीय भी ।
1. एलीमेंट्री फार्म्स ऑफ दि रिलिजस लाइफ, पृ. 37-40
2. वही, पृ. 43