अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
जब भी ब्राह्मणों को जाति का विरोध करने वालों की आलोचना का उत्तर देने के लिए चुनौती दी गई, तब-तब उन्होंने उसके पक्ष में यही बातें कहीं कि जाति एक दैवी और पवित्र विधान है, तथा उसे सनातन रहना चाहिए। जाति संबंधी यह दृष्टिकोण उस विवाद में और भी स्पष्ट हो जाता है, जिसमें एक ओर ब्राह्मण और दूसरी ओर बुद्ध और उनके अनुयायी थे¹ :
यदि एक बार यह आस्था जड़ जमा ले कि न केवल ऋषियों के सहज उद्गारों, बल्कि ब्राह्मणों के प्रखर सिद्धांतों पर भी जन्म दैवी स्रोत से हुआ और इस कारण वे मानवीय तर्क से परे हैं, तो स्पष्ट है कि वेदों के पवित्र प्रमाण के आधार पर ब्राह्मणों ने अपने लिए जिन विशेषाधिकारों की मांग की, उनका विरोध धर्मद्रोह हो गया और जहां ब्राह्मणों के सिद्धांत लोक-धर्म या यूं कहें कि राज-धर्म बने तो राज्य के परंपरागत कानूनों के सामने ऐसा विरोध होना असंभव है। ब्राह्मणों ने स्वयं इस बात की सावधानी बरती कि लोग श्रुति की दैवी सत्ता को स्वीकार करें, बजाए इसके कि ऋषियों के सिद्धांत अपनी मूल सहजता और शुद्धता के कारण स्थापित हो जाएं । दर्शनिक चर्चाओं में उन्होंने अधिक-से-अधिक स्वतंत्रता दी। यद्यपि पहले पहल केवल तीन दर्शन-प्रणालियों को (दो मीमांसाएं और न्याय) शास्त्र - सम्मत माना गया, पर शीघ्र ही उनकी संख्या बढ़ाकर छह की दी गई, ताकि उनमें वैशेषिक, सांख्य और योग- प्रशाखाओं का भी समावेश हो सके । महत्वपूर्ण मुद्दों पर विरेधी विचारों को उस सीमा तक सहन किया गया, जिस सीमा तक उनके व्याख्याता किसी प्रकार अपने सिद्धांतों का मेल वेदों की ऋचाओं से मिला देते थे। यदि इतना भी स्वीकार कर लिया जाता कि इंद्रियों की अनुभूति और तर्क के प्रतिपादन के अलावा वेदोक्त उद्घाटन (श्रुति) भी मानव - ज्ञान के लिए सच्चा आधार प्रस्तुत करता है तो अन्य सभी मुद्दे गौण हो जाते थे। लौकिक तथा अलौकिक जगत, सृजनहार और सृजित दैवी तथा मानवीय प्रकृति के बीच क्या रिश्ता है, इस बारे में दार्शनिकों को सभी संभव दृष्टिकोण प्रस्तुत करने की पूरी छूट दी गई। ऐसा पांडित्यपूर्ण रचनाओं से ब्राह्मण जाति को कोई खतरा पैदा नहीं हो सकता था। न ही उन्हें बुद्ध शाक्य मुनि के दार्शनिक सिद्धांतों में प्रचुरता से उपलब्ध उस नास्तिकता से कोई भय था, जिसके सूत्र कपिल के कट्टर निरीश्वरवाद में मिलते हैं। उनका वास्तविक अपराध यह था कि उन्होंने ब्राह्मणों के विशेषाधिकारों तथा उनकी कुरीतियों का विरोध किया था। इन कुरीतियों को वेदों की दैवी सत्ता ने मान्यता प्रदान की थी। बुद्ध ने अधिकारो तथा कुरीतियों के मूलाधार दैवी सिद्धांत पर प्रहार किया। उनके विरुद्ध संक्षिप्त-सा आरोप था वह नास्तिक बहिष्कृत आदि हैं।
1. पृ. 88 तक निम्नलिखित उद्धरणों के स्रोत मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में नहीं दिए गए हैं- संपादक
बुद्ध क्षत्रिय थे। उनका गोत्र उच्च था। वह राज परिवार के थे। वह अपनी जात में पहले व्यक्ति नहीं थे, जिसने ब्राह्मणों के आधिपत्य का विरोध किया था। बुद्ध से सदियों पूर्व विश्वामित्र को भी, जो बुद्ध की भांति क्षत्रिय जाति के थे, ब्राह्मणों के एकाधिकार के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ा था। लेकिन उस प्राचीन काल में ब्राह्मणों की स्थिति अजेय नहीं थी और विश्वामित्र ने क्षत्रिय होने पर भी संघर्ष करके स्वयं अपने तथा अपने परिवार के लिए वे अधिकार प्राप्त किए जो उससे पूर्व केवल ब्राह्मण जाति की ही बपौती थे। ब्राह्मण ग्रंथों में विदेह राजा जनक की कथा दी गई है। उन्होंने भी ब्राह्मणों के परंपरागत अधिकार को स्वीकार नहीं किया और पुरोहितों की मध्यस्था के बिना यज्ञ करने के अपने अधिकार पर आग्रह किया था। इन दो व्यक्तियों तथा बुद्ध के व्यक्तिगत आचरण में कितना भी महान अंतर क्यों न रहा हो, पर उनके विरोध का मुख्य सिद्धांत तो एक जैसा था। वे स्वार्थी पुरोहित वर्ग के एकाधिकार के विरुद्ध समान रूप से संघर्ष कर रहे थे।
लेकिन जहां विश्वामित्र ने केवल अपने समूचे जाति - वंश और अपने परिवार के अधिकारों के लिए संघर्ष किया था और ज्यों ही उन्हें पौरोहित्य का अधिकार मिल गया। वे संतुष्ट हो गए थे और जहां जनक, याज्ञवल्क्य और अन्य ब्राह्मणों से सत्कार मिलने मात्र से संतुष्ट हो गए थे, वहां उनके बाद होने वाले सुधारकों को लगता है कि ऐसी कोई सफलता नहीं मिली और वे परास्त होकर ब्राह्मणों के पक्षधर हो गए, तथापि लोगों के मन में असंतोष पनपते रहे। भारत के इतिहास में एक काला अध्याय मिलता है। बताया गया है कि परशुराम ने सभी क्षत्रियों का विनाश कर दिया। यह ब्राह्मणों की वर्चस्वता का श्रीगणेश था। जहां तक हम भारत के इतिहास और उसकी परंपराओं को जानते हैं, भले ही लगता हो कि ब्राह्मणों ने कभी भी राजसत्ता की कामना नहीं की, लेकिन उनकी जाति वास्तव में सदा ही शासक जाति रही। उनकी पुरोहिताई को दैवी अनुकंपा प्राप्त करने का एकमात्र साधन होने का गौरव प्रदान किया गया, उनके सिद्धांतों को अकाट्य माना गया, उनके देवी-देवताओं को सच्चे देवी-देवता माना गया और उनकी वाणी इतनी सशक्त समझी गई कि वह ऋषियों की सीधी-सादी अभिव्यक्तियों और ब्राह्मण लेखकों की बेतुकी रचनाओं को दैवी कहकर प्रमाणित करने लगे। लेकिन इसके बाद ब्राह्मणवाद का ह्रास होने लगा। किसी अन्य देश की भांति भारत में भी लोग सत्य पर अपना एकाधिकार घोषित करने वाले के आगे घुटने क्यों टेकते और उन्हीं लाखों लोगों ने, जो बड़े धीरज के साथ राजनीतिक तानाशाही का बोझ ढो रहे थे, बौद्धिक बर्बरता की बेड़ियों के बंधन को तोड़कर फेंक दिया। विश्व के एक प्राचीनतम धर्म का जुआ उतार कर फेंकने के लिए यह पर्याप्त था कि कोई एक व्यक्ति पृथ्वी के देवताओं (भूदेव ) की सत्ता को चुनौती दे और ईश्वर के घृणित तथा पददलित प्राणियों के बीच इस सहज सत्य का प्रचार करे कि पुरोहितों की पुरोहिताई और उन ग्रंथों में आस्था रखे बगैर भी मोक्ष संभव है, जिन्हें इन्हीं पुरोहितों ने श्रुति की संज्ञा दी है। यह व्यक्ति था 'बुद्ध', एक शाक्य मुनि । अब यदि हम देखें कि किस प्रकार बुद्ध के सिद्धांतों का प्रतिकार ब्राह्मणों ने किया है, तो यह सच है कि यत्र-तत्र अपनी दार्शनिक रचनाओं में उन्होंने तर्क की दुहाई देकर उनकी कुछ तात्विक सूक्तियों का प्रतिकार करने का प्रयास किया है, जैसे इसी प्रकार का एक प्रयास वेदांत सूत्रों पर अपनी टिप्पणी में वाचस्पति मिश्र ने किया है। बुद्ध के इन सिद्धांतों पर कि 'अस्ति' और 'नास्ति' आदि जैसी धारणाएं विवाद योग्य नहीं हैं, टिप्पणी करते हुए वाचस्पति कहते हैं कि इन धारणाओं की चर्चा में ही उनकी संकल्पना की संभावना निहित है। इतना ही नहीं, इस बात को दृढ़ता से कहने में कि तर्क उन्हें स्वीकार नहीं करता, यह निहित है कि वे यथार्थ में तर्कपरक हैं और यह सिद्ध होता है कि मन 'नास्ति' से विपरीत 'अस्ति' की कल्पना कर सकता है।
लेकिन ये वे सामान्य हथियार नहीं थे, जिन्हें बौद्ध धर्म से लड़ने के लिए ब्राह्मणवाद ने अपनाया। मुख्य आपत्ति सदा ही यह रही है कि बुद्ध के उपदेश सत्य नहीं हो सकते, क्योंकि उन्हें श्रुति अथवा ईश्वरीय मान्यता नहीं मिली है। ब्राह्मण, जाति के रूप में 'अस्ति और नासित' तथा बुद्ध के संपूर्ण दर्शन को तुरंत स्वीकार कर लेते हैं, जैसा कि उन्होंने इस सांख्य दर्शन के बारे में किया, जो अति महत्वपूर्ण मुद्दों के बारे में वेदांत का खुला विरोध करता है। लेकिन जहां सांख्य मत के संस्थापक कपिल ब्राह्मणीय कसौटी को स्वीकार कर लेते हैं और खुलेआम कहते हैं कि श्रुति की सत्ता तर्क और अनुभव से परे हैं, वहां बुद्ध या तो अपने अभिधर्म (दर्शन) के कारण या फिर कुछ और अधिक महत्वपूर्ण नैतिक तथा धार्मिक सिद्धांतों (विनय) के कारण ऐसा नहीं करते। निस्संदेह उनके लिए यह दर्शाना सरल होता है कि उनके कुछ सिद्धांत वेद की ऋचाओं में मिलते हैं। इसका कारण यह है कि वेद में मानव मन के सभी संभव रंग-रूपों की सहज अभिव्यक्ति हुई है। यदि उन्होंने केवल अपने कुछ नीति वचनों के बारे में ऐसा कर लिया होता, जैसे ‘तू हत्या नहीं करेगा', 'तू मद्यपान नहीं करेगा', 'तू खड़े होकर खाएगा', तो ब्राह्मण तुरंत अन्य सिद्धांतों की उपेक्षाकर देते, उनकी जो भी बुद्ध के निर्वाण के बाद व्यवहार में आए, जैसे 'जो स्वर्ग की कामना करता है, उसे प्रेत-पूजा करनी होगी', 'उसे अपने सिर का मुंडन करना होगा', आदि। चूंकि उन्होंने ऐसा नहीं किया, अतः ब्राह्मण श्रुति को साक्ष्य बनाकर बुद्ध के सिद्धांतों की सत्यता को नकारते रहे।
तर्क की यह पद्धति निश्चय की कुछ आकर्षक रही होगी, क्योंकि हम देखते हैं कि बाद में बौद्धों ने भी अपनी पवित्र रचनाओं को वैसे ही दैवी रचनाएं बताने का प्रयास किया, जैसा कि ब्राह्मणों ने वेदों के संबंध में किया था। इसका एक मजेदार उदाहरण निम्नलिखित चर्चा में मिलता है। यह कुमारिल की 'तंत्र - वर्तिका ' उद्धृत है। यहां प्रतिवादी (पूर्व पक्ष ) कहता है कि जिस तर्क से यह सिद्ध किया जाता है कि वेद मनुष्यों की कृतियां नहीं हैं, उसी तर्क से यह सिद्ध किया जा सकता है कि शाक्य के उपदेश भी दैवी उपदेश नहीं हैं। वह कहता है कि शाक्य की प्रामाणिकता निर्विवाद है, क्योंकि उनके उपदेश स्पष्ट और बोधगम्य हैं। शाक्य उनके अन्वेषक नहीं हैं, वे तो केवल उनका आदेश करते हैं। शाक्य के सिद्धांतों के साथ किसी रचनाकर का नाम नहीं जोड़ा गया है, अतः वेदों की भांति ही उनमें वह अस्थिरता नहीं है, जो मनुष्यों की कृतियों में मिलती है। निष्कर्ष के रूप में वह कहता है कि वास्तव में वेद की प्रमाणिकता को सिद्ध करने के लिए जो तर्क मीमांसकों ने प्रस्तुत किए हैं, उसी प्रकार बुद्ध के सिद्धांत की प्रामाणिकता भी सिद्ध होती है। इस पर पुरातनपंथी कुमारिल क्रुद्ध हो जाते हैं और कहते हैं :
ये शाक्य वैशेषिक तथा अन्य विधर्मी जिनकी बोलती निष्ठावान मीमां. सकों ने बंद कर दी है, हमारे शब्दों को तुतला कर बोलते हैं, मानो वे छाया को पकड़ने का प्रयास कर रहे हों। वे कहते हैं कि उनके पवित्र ग्रंथ शाश्वत हैं, लेकिन उनके दिमाग खोलने हैं, और वे केवल घृणा के कारण वेद को अत्यंत प्राचीन ग्रंथ नहीं मानते। और ये भावी तार्किक यह भी कहते हैं कि उनके लिए कुछ सिद्धांत (जिन्हें उन्होंने हमसे चुराया है) वेद से नहीं लिए गए है, जैसे सबके प्रति दया का सिद्धांत, क्योंकि बुद्ध की अधिकांश उक्तियां वेद के नितांत प्रतिकूल हैं। अतः इस मुद्दे पर भी वे अपनी सत्यता सिद्ध करना चाहते हैं। उन्हें मालूम है कि नैतिक अलौकिक विषयों में मानवीय निर्देशों का कोई प्राधिकार नहीं है, अतः वे वेद की सनातनता के बारे में हमारे तर्क की नकल करके अपनी कठिनाई को ढांपना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि मीमांसकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि मानवों की कोई भी उक्तियां अलौकिक विषयों पर कोई प्राधिकार नहीं कर सकतीं। ये भी जानते हैं कि वेद के प्राधिकार का खंडन नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसके दैवी उद्गम के संबंध में प्रस्तुत प्रमाणों के विरुद्ध उनके पास कोई प्रमाण नहीं हैं। दैवी - - उद्गम ने मानवीय उद्गम की समूची संभावना का निराकरण कर दिया है। अतः उनके हृदय उनके अपने ही शब्दों से विदीर्ण हो रहे हैं। उनके शब्द बच्चों के बचकाने ज्ञान जैसे हैं और उनके पास कोई उत्तर नहीं है, क्योंकि उनके बेतुके तर्कों के छलावे का पर्दाफाश कर दिया गया है। अब वे उस मूर्ख विवाहार्थी जैसी वाणी बोलने लगे हैं, जो वधू पक्ष से कहता है, 'मेरा परिवार भी उतना ही उत्तम है, जितना कि आपका।' इसी प्रकार वे बंदर की भांति अन्य लोगों की वाणियों की नकल करके अपने ग्रंथों के सनातन अस्तित्व को बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं। और यदि उन्हें चुनौती दी जाती है और उनसे कहा जाता है कि यह तो हमारा तर्क है, तो वे उपद्रव मचाते हैं और कहते हैं कि हमने, अर्थात् मीमांसकों ने, उनसे चुरा लिया है। जिस व्यक्ति की समूची योजना चौपट हो गई है, जो व्यक्ति बेतुकी बातें करने लगता है, और जो अपने प्रतिद्वंदी को धोखा देने का प्रयास करता है, वह कभी भी नहीं थकता और उसे कभी भी शांत नहीं किया जा सकता।
इस लंबे-चौड़े भाषण के अंत में कुमारिल कहते हैं, 'अधिक संगत बात यह है : जो बौद्ध हर वस्तु को केवल अस्थाई मानते हैं, उनका किसी सनातन उद्घाटन से क्या वास्ता ?'