अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
उक्त वाद-विवाद से यह स्पष्ट हो जाएगा कि जाति का जन्म धर्म से हुआ है। धर्म ने उसको प्रतिष्ठित किया और उसे पवित्रता प्रदान की। इस कारण यह कहना उचित है कि धर्म ही वह पक्की नींव है, जिस पर हिंदुओं ने अपना सामाजिक ढांचा खड़ा किया है।
क्या इससे पता नहीं चलता कि जाति एक अति निराली संस्था है और उसकी तुलना अन्य सामाजिक संस्थाओं से नहीं की जा सकती। मैं यह कहने की धृष्टता करता हूं कि जो भी यह धारणा व्यक्त करता है कि जातिप्रथा में कुछ भी विचित्रता नहीं है, वह जातिप्रथा को बिल्कुल भी नहीं जानता। मैं पुनः कहता हूं कि जाति एक पवित्र संस्था है, यही उसकी विशिष्टता है। जाति एक पवित्र संस्था है, उसकी यही विशेषता उसे बाध्यकारी बनाती है।
सामाजिक प्रगति पर पवित्र ग्रंथों वाले धर्म के प्रभावों के बारे में प्रो. मैक्स मूलर कुछ बड़ी शिक्षाप्रद बाते कहीं हैं। वह कहते हैं :
किंतु इतिहास हमें एक और सबक सिखाता है, अर्थात् यह ठीक ही है कि कानून की संहिताएं एक प्रकार की पूजनीय वस्तुएं बन जाती हैं। वे अपेक्षा करती हैं कि निर्विवाद रूप से उनका अंधानुकरण किया जाए। उनके ऐतिहासिक अथवा नैसर्गिक उद्गम को प्रायः पूर्णतया भुला दिया जाता है। सद्-असद् उचित - अनुचित संबंधी पुरानी धारणाओं को एक संकल्पना में जो लिखित और कानूनी होती हैं, निहित कर दिया जाता है, उनकी पृथक सत्ता को समाप्त कर दिया जाता है।
पौर्वात्य धर्मों का अध्ययन भी हमें यही शिक्षा देता है। पवित्र ग्रंथ प्रायः एक प्रकार की पूजनीय वस्तु बन जाते हैं। यह अपेक्षा होने लगती है कि उनमें लोगों की स्वतः श्रद्धा होगी और यह श्रद्धा अटूट होगी। उनके ऐतिहासिक अथवा नैसर्गिक उद्गम को प्राय: पूर्णतया भुला दिया जाता है। सद् तथा दैवी संबंधी पुराने विचारों को एक ही लिखित तथा शास्त्र सम्मत विचार में लगभग आत्मसात् कर लिया जाता है।
इतिहास हमें एक तीसरी शिक्षा भी देता है। यदि कानून व्यवसाय बन जाता है और उसे यांत्रिक कठोरता से लागू किया जाता है तथा उसमें सद् और असद् की प्रबल मानवीय अनुभूति का ध्यान नहीं रखा जाता, तो जिस कानून के अधीन कोई नागरिक रहता है, उसके प्रति उसके दायित्व बोध के मृत हो जाने की शंका रहती है। इसी तरह इस बात का भी खंडन नहीं किया जा सकता है कि यदि कानून व्यवसाय बन जाता है और उसे औपचारिक कठोरता से लागू किया जाता है। और उसमें सद् और असद् की प्रबल मानवीय अनुभूति का ध्यान नहीं रह जाता, तो जिस धर्म के अधीन कोई व्यक्ति रहता है, उसके प्रति उसके दायित्व - बोध को भी मृत हो जाने का वैसा की खतरा नहीं रहता ।
लेकिन मेरा उद्देश्य पवित्र ग्रंथों से पैदा होने वाले खतरों को दर्शाना नहीं है, अपितु उस पूर्वाग्रह का प्रतिरोध करना है, जो कि उन धर्मों के प्रति व्यापक रूप से प्रचलित है, जिनके कोई पवित्र ग्रंथ नहीं हैं।
लिखित तथा अलिखित धर्मों के बीच भारी अंतर है और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से यह अंतर विभाजन का एक वास्तविक आधार प्रस्तुत करता है, लेकिन चूंकि लिखित धर्मों के कुछ लाभ हैं, अतः हमें यह नहीं सोच लेना चाहिए कि अलिखित धर्म केवल बहिष्कृत धर्म हैं। इसमें संदेह नहीं कि उनके कुछ दोष हैं, पर उनके कुछ गुण भी हैं।
एक उत्तरी अमरीकी मूल निवासी ने बहस के दौरान ईसाई मिशनरी को अपने धर्म और श्वेत मानव के धर्म के बीच जो अंतर बताया, वह इस प्रकार है :
परमात्मा ने दो धर्म बनाए, जिनमें एक लिखित है। यह लिखित धर्म श्वेत लोगों के पथ-प्रदर्शन के लिए है, जो उसके उपदेशों का पालन करके श्वेत मानव के स्वर्ग में जाएंगे। दूसरा धर्म हमारे हाथों में है, हमारा यह धर्म आकाश, चट्टानों, नदियों और पर्वतों में है और हम लोग जो उसे प्रकृति में देखते हैं, उसकी वाणी को सुनते हैं और अंततः उसे स्वर्ग के उस पार जाकर खोज लेते हैं।
अब जो धर्म दिल व दिमाग में है, आकाश, चट्टानों, नदियों और पर्वतों में है, उसी को हम नैसर्गिक धर्म कहते हैं। उसकी जड़ें होती हैं प्रकृति में, मानवीय प्रकृति में और उस बाह्य प्रकृति में जो हमारे लिए अवगुंठन भी है और अभिव्यक्ति भी। वह उन्मुक्त है। वह मानव मन के विकास के साथ-साथ पनपता है और स्वयं को हर युग की जरूरतों के अनुकूल ढाल लेता है। वह नहीं कहता, 'तू ऐसा ही करेगा', बल्कि कहता है, 'मैं करूंगा।' ऐसा नहीं है कि इन नैसर्गिक अथवा अलिखित धर्मों में निश्चित सिद्धांत और रीति-रिवाज नहीं होते। आस्था, नैतिकता और अनुष्ठान संबंधी मामलों में सामान्यतः उनमें भी कोई-न-कोई पुरोहित होता है। लेकिन उनमें कुछ भी कठोर और अपरिवर्तनीय नहीं होता। उनमें चिंतन का कोई बंधन नहीं होता। त्रुटि का पता लगने पर उसका परिष्कार होता है, नए सत्य का बोध होने पर उसे स्वीकार किया जाता है, उसकी परीक्षा होती है। लेकिन यदि एक बार उसे पुस्तक का आकार मिल जाए, श्वेत पर कुछ काला अंकित हो जाए तो प्रलोभन भारी ही नहीं, बल्कि अति सम्मोहक हो जाता है। मानवीय प्राधिकार के साथ उसे लागू करने का प्रलोभन बढ़ जाता है। ताकि उसे अजेय और मानव तर्क से परे ठहराया जा सके। हम भली-भांति समझ सकते हैं कि क्यों प्राचीन वैदिक कवियों ने अपनी ऋचाओं को ईश्वर प्रदत्त अथवा श्रुतियां अथवा अपौरुषेय कहा। लेकिन नई पीढ़ी ने इन अभिव्यंजनाओं को एक नया अर्थ दे डाला और अंततः वेद के हर विचार, शब्द और अक्षर पर 'ईश्वर - प्रदत्त' अथवा 'श्रुति' का ठप्पा लगा दिया। वैदिक धर्म पर यह सैधांतिक प्रहार था, क्योंकि जो पनप और बदल नहीं सकता, उसका विनाश निश्चित है। अलिखित धर्मों को इस प्रकार का कोई खतरा नहीं होता ।
ऐसे ही उदगार सर विलियम म्यूर के हैं। इस्लाम की चर्चा करते समय उन्होंने धर्म की पवित्र संहिताओं से उत्पन्न होने वाले खतरों को सशक्त अभिव्यक्ति दी है। वह कहते हैं¹ :
मुहम्मद का धर्म चारों ओर से इस तरह ढका हुआ है कि वह कभी उभर ही नहीं सकता। आरंभ के दिनों उसमें जितनी सुनम्यता थी, उससे अधिक की अब उसमें कोई गुंजाइश नहीं है। अब वह अत्यंत कड़ा हो गया है। अब वह मानव-जाति की विभिन्न परिस्थितियों, आवश्यकताओं और विकास-क्रमों के अनुरूप न तो स्वयं को, न ही अपने अनुयायियों को ढाल सकता है, और न उन्हें उनके अनुरूप स्वयं को ढालने के लिए विवश कर सकता है।
जिस किसी व्यक्ति को मानवता की प्रगति में रुचि है, वह धर्म की पवित्र संहिताओं के सामाजिक दुष्परिणामें के बारे में ऐसी ही प्रतिक्रिया किए बिना नहीं रहेगा। लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि पवित्र संहिताओं वाले धर्मों के वर्ग के पुनः वर्ग बन सकते हैं। खेद है कि प्रो. मैक्स मूलर ने इस मामले पर और आगे विचार नहीं किया। इस पर और अधिक विचार होना चाहिए, क्योंकि यह एक बहुत ही असली भेद को उद्घाटित करता, जो धर्म की पवित्र संहिता वाले हिंदुओं को उन अन्य लोगों से अलग करता है, जिनके पास भी वैसी ही धर्म की पवित्र संहिता है । यह तब और स्पष्ट हो जाएगा, जब हम विभिन्न धर्मों की जांच कर उन विषयों को ढूंढ निकाले, जिन्हें इन धर्मों ने पूजा और श्रद्धा की वस्तु बना दिया।
इस खोज से पता चलेगा कि ऐसे कई प्रसंग हैं, जब समाज ने जड़ पदार्थों को पूजा और श्रद्धा की वस्तु बना दिया और अपने लोगों के मानस में यह धार्मिक विश्वास बिठाया है कि वे जड़ पदार्थ पवित्र हैं। ऐसी मिसालें हैं, जहां पत्थरों, नदियों, पेड़ों को देवता और देवियां बनाया गया है। ऐसी मिसालें हैं, जहां समाज ने चेतन पदार्थों को पूजनीय कर दिया है और अपने लोगों के मन में यह धार्मिक विश्वास बिठाया है कि वे पदार्थ पवित्र हैं। ऐसे पशुओं की मिसालें हैं, जो कबीले के गण - चिह्न बन गए हैं। ऐसी भी मिसालें हैं, जहां समाज ने मानव-प्राणियों का पवित्रीकरण किया है और लोगों के मन में यह धार्मिक विश्वास बिठाया है कि वे पवित्र हैं। लेकिन ऐसा कोई उदाहरण नहीं है, जहां धर्म द्वारा किसी विशेष समाज व्यवस्था का पवित्रीकरण किया गया हो और उसे पवित्र बनाया गया हो। आदिम जगत में कबीले और जनजाति की व्यवस्था थी। लेकिन कबीले अथवा जनजाति की व्यवस्था केवल सामाजिक व्यवस्था थी। उसका कभी भी पवित्रीकरण धर्म ने नहीं किया। न ही उसे पवित्र और अलंय बनाया। मिस्र, फारस, रोम, यूनान आदि जैसे प्राचीन विश्व के देशों में हरेक में ऐसी सामाजिक व्यवस्था थी, जिसमें कुछ लोग स्वतंत्र थे तो कुछ गुलाम थे, कुछ नागरिक थे तो कुछ विदेशी थे, कुछ एक जाति के थे तो कुछ दूसरी जाति के थे । यह वर्ग-व्यवस्था भी केवल समाज-व्यवस्था थी। कभी भी उसका पवित्रीकरण धर्म ने नहीं किया। न ही उसे पवित्र और अलंघ्य बनाया। आधुनिक विश्व की अपनी व्यवस्था है। कुछ देशों में लोकतंत्र है तो कुछ देशों में फासिज्म, कुछ में नाजीवाद और 'कुछ में बोल्शेववाद है। यहां भी व्यवस्था केवल समाज व्यवस्था है। धर्म द्वारा पवित्रीकरण करके उसे न तो पवित्र और न ही अलंघ्य बनाया गया।
1. एशियाटिक क्वार्टली रिव्यू, अप्रैल 1889 में पृ. 287 पर मुहम्मद' स प्लेस इन दि चर्च' नामक लेख में ई डे बुन्सेन द्वारा उद्धृत।
कहीं भी समाज ने अपने व्यवसायों, यानी रोजी-रोटी के साधनों का पवित्रीकरण नहीं किया। आर्थिक गतिविधि सदैव धार्मिक पवित्रता के दायरे से बाहर रही है। शिकारी समाज धर्मविहीन नहीं था, पर धंधे के रूप में आखेट का धर्म द्वारा पवित्रीकरण करके उसे पवित्र नहीं बनाया गया। पशुचारी समाज धर्मविहीन नहीं था। लेकिन पशुचारण का धर्म द्वारा पवित्रीकरण करके उसे पवित्र नहीं बनाया गया। काश्तकारी के धंधे का भी धर्म द्वारा पवित्रीकरण करके उसे पवित्र नहीं बनाया गया। सामंतवाद में भी उसके वर्ग थे। उसमें सामंत थे। कृषि दास और दास थे, पर वे विशुद्ध सामाजिक स्वरूप के थे। उस पर पवित्रता का कोई ठप्पा नहीं था ।
विश्व में केवल हिंदू ही ऐसी जाति है, जिसने समाज व्यवस्था का, यानी मानव-मानव के आपसी संबंध का धर्म द्वारा पवित्रीकरण करके उसे पवित्र, शाश्वत और अलंघ्य बना दिया। विश्व में केवल हिंदुओं की ही ऐसी जाति है, जिसने अर्थ-व्यवस्था का, यानी कामगारों के आपसी संबंध का धर्म द्वारा पवित्रीकरण करके उसे पवित्र, शाश्वत और अलंघ्य बना दिया।
अतः यह कहना पर्याप्त नहीं है कि हिंदुओं की ही ऐसी जाति है, जिसके पास धर्म की पवित्र संहिता है वैसी ही संहिता पारसियों, इजराइलियों, ईसाइयों और मुस्लिमों से भी है। इन सबके पास पवित्र संहिताएं हैं। वे विश्वासों और अनुष्ठानों का पवित्रीकरण करके उन्हें पवित्र बनाते हैं। पर न तो वे आदेश थोपते हैं, और न ही वे समाज-व्यवस्था के किसी खास स्वरूप का, यानी मानवों के परस्पर संबंध के किसी मूर्त रूप का, पवित्रीकरण करते हैं और उसे पवित्र तथा अलंघ्य बनाते हैं। इस मामले में हिंदू बेजोड़ हैं। इस प्रवृत्ति ने जातिप्रथा को समय के थपेड़ों तथा समय के प्रहारों को झेलने की स्थाई शक्ति प्रदान की है।
हिंदुओं जैसे संहिताबद्ध धर्मों वाले अन्य लोगों से हिंदू एक अन्य दृष्टि से भी भिन्न हैं। हिंदू धर्म-संहिता ईश्वरीय वाणी है। इसी कारण वेदों को श्रुति (जिसे सुना गया हो) कहा गया है। पारसियों यहूदियों, ईसाइयों और मुस्लिमों को भेजी गई यह ईश्वरीय वाणी किस पर प्रकट की गई, ईश्वर की इस वाणी को किसने सुना? यहूदी कहेंगे कि इस वाणी को मूसा ने सुना, ईसाई कहेंगे कि उसे यीशु से सुना और मुस्लिम कहेंगे कि उसे मुहम्मद ने सुना। अब हिंदु से पूछिए कि वेदों में समाविष्ट ईश्वर की वाणी को किसने सुना, ईश्वर ने अपनी वाणी किसे सुनाई ? हिंदू के पास कोई उत्तर नहीं है। वह उस व्यक्ति का नाम नहीं बता सकता, जिसने ईश्वर की वाणी को सुना हो। स्वयं वेदों में इस बात का उल्लेख है कि किन-किन मंत्रों की रचना किन-किन ऋषियों ने की है। लेकिन हिंदू यह नहीं कहेंगे कि वेदों में निहित ईश्वर की अमुक वाणी को अमुक व्यक्ति ने सुना। यह अंतर वेदों के पवित्र स्वरूप को व्यापक संरक्षण प्रदान करता है, क्योंकि पवित्र ग्रंथ के रूप में 'बाइबिल' की आलोचना मूसा या यीशु के चरित्र की आलोचना करके की जा सकती है। इसी प्रकार पवित्र ग्रंथ के रूप में 'कुरान' की आलोचना मुहम्मद के चरित्र की अलोचना करके की जा सकती है। लेकिन वेदों की आलोचना संदेशवाहक या संस्थापक के चरित्र की आलोचना करके नहीं की जा सकती। इसका सीधा सा कारण है कि कोई ऐसा व्यक्ति है ही नहीं ।
जैसा कि मैं बता चुका हूं, धर्म ही वह चट्टान है, जिस पर हिंदुओं ने अपनी व्यवस्था का भवन खड़ा किया है। अब यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह कोई साधारण कोटि की कठोर चट्टान नहीं है। यह तो ग्रेनाइट की चट्टान है।