अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
अस्पृश्यों की तुलना में स्पृश्यों के आपसी संबंधों की चर्चा अचरज का विषय हो सकती है। यह अचरज अकारण नहीं है। स्पृश्य वर्ग स्वयं में कोई पृथक वर्ग नहीं है, जिसमें सभी स्पृश्यों को एक साथ रखा जा सके। वे स्वयं अनगिनत जातियों में बंटे हुए हैं। हर हिंदू में अपनी जाति के उच्च होने की भावना रहती है। यदि इस विषमता को हम स्वीकार कर लें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि सभी स्पृश्य जातयों को एक समूह में शामिल करना और उन्हें अस्पृश्यों के विरुद्ध एक पृथक वर्ग के रूप में स्वीकार करना एक ऐसा विभाजन करना है, जिसका कोई अर्थ नहीं हो सकता। अस्पृश्यों की तुलना में स्पृश्यों के इस विभाजन के कुछ कारण हो सकते हैं, पर जहां तक आधुनिक भारत का संबंध है, यह विभाजन बहुत ही वास्तविक और महत्वपूर्ण है।

अगर हम चारों वर्गों के आपसी संबंधों पर एक बार पुनः विचार करें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि किस प्रकार स्पृश्यों का एक पृथक वर्ग बन गया है और किस प्रकार उसमें अस्पृश्यों से भिन्न और उच्च होने का भाव पैदा हो गया।
सर्वप्रथम तो हमें इस बात को ध्यान में रखना होगा कि श्री गांधी की भांति जो लोग चातुर्वर्ण्य को समाज का एक आदर्श रूप स्वीकार करते हैं, वे या तो चारों वर्णों के आपसी संबंधों के इतिहास को नहीं जानते अथवा किसी भ्रम में हैं या फिर उस प्रयोजन के लिए एक पृष्ठभूमि तैयार कर रहे हैं, जिसे पूरा करना ही उनका उद्देश्य है। क्योंकि तथ्य यह है कि चारों वर्णों ने कभी ऐसे समाज का गठन नहीं किया, जो स्नेहसिक्त भाईचारे पर या सरकारी प्रयास पर टिके आर्थिक संगठन पर आधारित हो। चारों वर्ण केवल आपसी विद्वेष की भावना से अनुप्राणित हैं। इसमें तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं होगी, यदि कहा जाए कि हिंदुओं का सामाजिक इतिहास न केवल वर्ग संघर्ष का सामाजिक इतिहास है, बल्कि यह इतनी कट्टरता से लड़ा गया वर्ग युद्ध है कि मार्क्सवादी भी उसकी जोड़ के समानांतर दृष्टांत आसानी से प्रस्तुत नहीं कर सकेंगे।
ऐसा लगता है कि जो सर्वप्रथम वर्ग संघर्ष हुआ, उसमें एक पक्ष ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों का था और दूसरा शूद्रों का था ।
कात्यायन के श्रौत-सूत्रों में कहा गया है कि जो लोग मंद बुद्धि हैं, जिन्होंने वेदों का अध्ययन नहीं किया है, जो नपुंसक हैं, जो शूद्र हैं, उनके अलावा अन्य लोगों को यज्ञ करने का अधिकार है। वेद के अनुसार ( केवल ) ब्राह्मणों, राजन्यों तथा वैश्यों को यह (विशेषाधिकार प्राप्त है ) ।
मनु यह भी कहता है कि (मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में उद्धरण नहीं दिया गया है*)।
मनु यह भी कहता है कि (मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में उद्धरण नहीं दिया गया है) ।
इनकी तुलना वैदिक साहित्य में शूद्रों के दर्जे से संबंधित उस काल के निम्नलिखित उदाहरणों तथा विवरणों से कीजिए, जो मनु तथा कात्यायन के काल से भी पुराना है।
प्रो. मैक्स मूलर ने दो उदाहरणों की ओर ध्यान दिलाया है। उनमें दर्शाया गया है कि शूद्रों को ‘गवेधुकाचारू' जैसे बड़े यज्ञों में शामिल किया जाता था। एक रथकार का है और दूसरा निषादस्थपति का। दोनों ही शूद्र थे ।
हम यह कह सकते हैं कि यह महत्व शूद्रों में असाधारण लोगों को दिया जाता रहा होगा। यह निर्विवाद है कि यह केवल रियायत नहीं थी, बल्कि शूद्रों द्वारा भोगा जाने वाला अधिकार था। वेद के ही एक अंग 'शतपथ ब्राह्मण' में वह सूत्र दिया गया है, जो ब्राह्मण पुरोहित द्वारा यज्ञकर्ता को बुलाने के बारे में है और वह हवि देने के लिए कहता है । ब्राह्मण के लिए वह कहता है, 'एहि' यानी आओ, वैश्य के लिए वह कहता है ‘अगाहि' (यहां आओ), क्षत्रिय के लिए वह कहता है 'आद्रव' (झटपट यहां आओ) और शूद्र के लिए वह कहता है 'आधाव' (दौड़कर यहां आओ)।'
यह सूत्र बड़े ही महत्व का है। यह जताता है कि कभी शूद्र भी यज्ञ करने का अधिकारी था। अन्यथा वैदिक निर्देश में शूद्र यज्ञकर्ता के लिए संबोधन - सूत्र को स्थान नहीं मिल सकता था। यदि शूद्र यज्ञ करने का अधिकारी था तो निश्चय ही वह वेद के अध्ययन का भी अधिकारी रहा होगा।
* लेकिन पाठक का ध्यान वर्तमान ग्रंथ माला के खंड 7 के अध्याय 12 की ओर दिलाया जाता है, जिसमें मनु के उन नियमों की चर्चा की गई है, जो शूद्रों के अवक्रमण से संबंधित हैं। वे इस स्थान पर संगत दीख पड़ते हैं - संपादक ।