अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
धार्मिक आस्थाओं के मान्य होने का एक आधार यह है कि धर्म एक सामाजिक वस्तु है और धार्मिक आस्थाएं सामाजिक आस्थाएं होती हैं। कोई वर्ग धार्मिक आस्थाओं को किसी व्यक्ति पर उसी प्रकार और उसी आधार पर आरोपित करता है, जिस प्रकार और जिस आधार पर वह अपने अन्य गैर-धार्मिक तथा विशुद्ध सामाजिक आस्थाएं आरोपित करता है। उद्देश्य उस वर्ग की अखंडता को बनाए रखना होता है। चूंकि वर्ग की अखंडता और उसकी धार्मिक आस्थाओं का आपस में चोली-दामन का संबंध होता है, अतः जितना प्रचंड और कठोर दंड धार्मिक आस्थाओं के उल्लंघन के लिए दिया जाता है, वह प्रायः उस दंड से अधिक कठोर तथा प्रचंड होता है, जो गैर-धाम्रिक आस्थाओं के उल्लंघन करने पर दिया जाता है। समाज की शक्ति आदेश स्वरूप होती है और उसके सामने व्यक्ति प्रायः बेबस होता है। धार्मिक आस्था के मामले में समाज की शक्ति का आदेशात्मक रूप इस भावना और अधिक प्रबल हो जाता है कि उसका उल्लंघन अधिक गंभीर कोटि का उल्लंघन है और वह धार्मिक आस्था को कोरी सामाजिक आस्था की अपेक्षा कहीं अधिक शक्ति देता है।
धार्मिक मान्यता को कर्मकांड पुष्ट करता है। इस कर्मकांड का मूल उद्गम व्यक्ति, और समाज उसका गौण उद्गम होता है। धार्मिक मानवता के उद्गम के संबंध में समाज की वह भूमिका बड़ी विचित्र है। कर्मकांडीय आस्था व्यक्ति को धार्मिक आस्था से पालन के लिए तैयार करती है। उसके कारण यह आवश्यक नहीं रह जाता कि समूह अपने प्रभाव का उपयोग करे। यही कारण है कि धार्मिक मान्यता के मूल में स्थित कर्मकांडीय आस्था उसे इतना उच्च आसन प्रदान कर देती है कि वह अन्य सभी मान्यताओं को इतना लांघ जाती है कि वास्तव में उनकी जरूरत ही नहीं पड़ती। यही कारण है कि केवल धार्मिक मान्यता ही धार्मिक आस्थाओं की अखंडता को कायम रखने के लिए इतनी पर्याप्त हो जाती है कि काल और परिस्थितियां भी उस पर प्रभाव डालने में अक्षम सिद्ध हुई हैं। यह किस प्रकार होता है, उसे आसानी से समझा जा सकता है। पवित्रता व्यक्ति के मानस में आदर और श्रद्धा पैदा करती है। निश्चय ही अपिवत्रता के प्रति उसके मन में वैसा भाव पैदा हो ही नहीं सकता। प्रो. डर्कहीम के शब्दों में :
महान कर्म करने वाले व्यक्तियों के चारों ओर स्वतः एक सीमा रेखा बन जाती है, जो ( पवित्र के प्रति) धार्मिक श्रद्धा भावना से स्वभावतः भिन्न नहीं होती। दोनों ही स्थितियों में प्रत्येक व्यक्ति की प्रतिक्रिया एक समान होती है। वह (व्यक्ति) महान व्यक्तियों और अपने बीच कुछ अंतर समझता है, वह उनसे व्यवहार करते समय सावधान रहता है, वह उनसे बातचीत करते समय साधारण मनुष्यों के प्रति व्यक्त व्यवहार से भिन्न भावभंगिमा और भाषा का प्रयोग करता है।
पवित्रता श्रद्धा का भाव पैदा करती है। वह ऐसा भाव भी पैदा करती है, जिसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता। जब कोई विश्वास किसी पवित्र वस्तु में आस्था के रूप में प्रतिष्ठित हो जाता है, तो न तो उसका स्पर्श किया जा सकता है और न ही उसका खंडन अथवा प्रतिवाद किया जा सकता है। पवित्र वस्तु की आलोचना भी नहीं की जा सकती। पवित्रता संस्पर्श और विवाद से परे है। जब किसी व्यक्ति में ये भाव नख से शिख कर कूट-कूट कर भर दिए जाते हैं, जब ये भाव उसके रोम-रोम में रम जाते हैं तो वह स्वयं उस वस्तु का पक्षधर वं संरक्षक बन जाता है, जिसके बारे में उसे सीख दी जाती है कि वह पवित्र है।
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जाति के मामले में भी हिंदुओं ने भी हूबहू यही किया है। उन्होंने वेदों में जाति को स्थान दिया है। वेद पवित्र हैं, अतः जाति पर भी पवित्रता की मोहर लग गई है। यह कहना गलत होगा कि वेद पवित्र हैं, क्योंकि वे धर्म-सम्मत हैं। स्थिति यह है कि वे धर्म-सम्मत हैं, क्योंकि वे पवित्र हैं।
ऐसा प्रतीत हो सकता है कि हिंदुओं में वेदों के प्रति जो पवित्र भावना है, उसके लिए उन्होंने प्रत्यक्षतः कोई नाम नहीं दिया । वेद का सीधा अर्थ है, ज्ञान । हो सकता है कि ऐसा हो। लेकिन इस बारे में कोई संशय नहीं हो सकता कि वे वेदों को पवित्र मानते हैं। वास्तविकता तो यह है कि उन्होंने वेदों के लिए उस भाव से जो पवित्र शब्द से व्यक्त होता है, कहीं अधिक श्रद्धा तथा सम्मान जताने वाले शब्द का प्रयोग किया है। वे वेदों को 'श्रुति' कहते हैं। 'श्रुति' का अर्थ है, ईश्वर का वह शब्द, जिसे मनुष्य ने सुना ( या ईश्वर द्वारा जिसे व्यक्त किया गया था)। आदिम धर्म में पवित्र उसे कहा गया है, जिसका निर्माण मनुष्य ने किया है। हिंदू धर्म में जो ईश्वर द्वारा निर्धारित किया गया, वह पवित्र है ।
हिंदू वेदों को अपने धर्म का पवित्र ग्रंथ मानते हैं। वे वेदों को एक विशिष्ट स्थान देते हैं। हिंदुओं की मान्यता¹ है कि सृष्टि के चक्र होते हैं। इन्हें 'कल्प' कहते हैं। चक्र के अंत में, जल-प्रलय होती है और एक नए सृष्टि चक्र का आरंभ होता है। हर कल्प के अंत में जल प्रलय में वेदों का विनाश हो जाता है। हर कल्प के प्रारंभ में वे ईश्वर द्वारा व्यक्त किए जाते हैं। तदनुसार पिछले कल्प के अंत में प्रलय में वेद नष्ट हो गए थे और वर्तमान कल्प के प्रारंभ में जो कृत युग से हुआ, ईश्वर ने वेदों को ऋषियों को व्यक्त किया। हिंदू वेदों को नित्य (सनातन), अनादि (प्रारंभ - रहित) और अपौरुषेय (अमानवीय) मानते हैं। संक्षेप में, वेद ईश्वर के शब्द हैं और वे मानव के लिए ईश्वर के आदेश हैं।
1. एम. कृष्णमाचारियर, क्लासिकल संस्कृत लिटरेचर, इंट्रोडक्शन, पृ. VII VIII और 836
वेदों को यदि 'श्रुति' न कहा जाता, तो भी वे अनिवार्यतः पवित्र कहे जाते। प्रो. मैक्स मूलर¹ ने धर्मों का विभिन्न प्रकार से वर्गीकरण किया है। उनका एक वर्गीकरण है, प्रकृत तथा व्यकत । एक अन्य वर्गीकरण है, व्यक्तिगत तथा राष्ट्रीय । उनका एक तीसरे प्रकार से, अर्थात् उन्हें अनीश्वरवादी, देववादी, द्वैतवादी, बहुदेववादी, एकेश्वरवादी, एकैकाधिदेववारी और जड़ात्मवादी के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। उन्हें सत् या असत् के रूप में भी वर्गीकृत किया जा सकता है। इसके दो और वर्ग हो सकते हैं, जैसे ग्रंथाधीन धर्म या ग्रंथहीन धर्म । इस प्रकार धर्मों के वर्गीकरण की सूची संभवतः सर्वांग दृष्टि से पूर्ण नहीं हो सकती, क्योंकि इनका एक और प्रकार से भी वर्गीकरण किया जा सकता है, अर्थात् वे धर्म जिनके कोई संस्थापक हैं और वे धर्म जिनके कोई संस्थापक नहीं हैं।
इन वर्गीकरणों का दो प्रकार के वर्गीकरण को छोड़कर सामाजिक महत्व है। ये दो प्रकार हैं, प्रकृत व व्यक्त और लिखित धर्म व अलिखित धर्म । इनके कार्य अलग-अलग हैं, भले ही इनके कार्यों में जो अंतर है, उसकी ओर प्रायः ध्यान नहीं दिया जाता।
अलिखित धर्म की तुलना में लिखित ग्रंथबद्ध धर्म की स्थिति निस्संदेह अच्छी होती है। लिखित धर्म ऐसा धर्म होता है, जिसकी लिखित व्यवस्था होती है। जिस धर्म की व्यवस्था लिखित नहीं होती, वह अलिखित धर्म होता है। लिखित धर्म यह धारणा पैदा करता है कि वह सच्चा है, पर अलिखित धर्म ऐसा नहीं कर सकता । लिखित धर्म की तुलना में अलिखित धर्म झूठा होने की हीन भावना से ग्रस्त रहता है। मैक्स मूलर² बताते हैं, 'केवल लिखित धर्म ही सच्चे धर्म समझे जाते हैं। चाहे उनमें झूठे सिद्धांतों का समावेश ही क्यों न हो, फिर भी उनके प्रति ऐसा भावना रखी जाती है कि उनके बारे में बहुत कुछ क्षम्य समझा जाता है, जब कि अलिखित या निरक्षर धर्मों की भीड़ की तो बिल्कुल ही विचारणीय नहीं समझा जाता।' इससे यह सहज ही समझा जा सकता है कि अलिखित धर्म की अपेक्षा लिखित धर्म को श्रेष्ठ माना गया है। जब कोरे कागज पर लिखे काले अक्षरों को सत्य का पर्याय मान लिया गया है तो यह सहज की स्पष्ट हो जाता है कि जो धर्म लिखित है, जो सफेद पर कुछ लिखा है, वह असत् नहीं है। लेख सत्य का प्रमाण-पत्र बन जाता है। अलिखित धर्म के पास प्रमाण-पत्र नहीं होता ।
1. साइंस आफ रिलीजन में प्रस्तावना देखिए ।
2. नेचुरल रिलीजन, पृ. 549
लिखित धर्म का सामाजिक महत्व इस बात में है कि वह लोगों के मानस में यह धारणा जगाता है कि पुस्तक में लिखा धर्म सच्चा है और इस प्रकार लोगों के मन पर हावी हो जाता है। वह लोगों पर धर्म की सत्ता व शक्ति का सिक्का जमाता है और उनमें स्वेच्छापूर्वक आज्ञापालन का भाव जगाता है।
लेकिन कोई धर्म इस कारण कितना भी सच्चा क्यों न प्रतीत हो कि वह एक लिखित धर्म है, उसका यह रूप उसे पतन से नहीं रोक सकता, यदि उसमें अनुभव के आधार पर गलत आस्थाएं एवं अनुष्ठान घर कर गई हों। मनुष्य सिद्धांत को लेकर गलती कर सकता है, पर उसकी व्यावहारिक अनुभूतियां उसे लंबे अर्से तक गलत सिद्धांत के पीछे चलते रहने नहीं देंगी। अतः यदि किसी समाज की धार्मिक आस्थाएं सच्ची न हों, तो अंततः व्यवहार में धर्म को उसके रास्ते से हटना ही होगा।
यहीं पर प्रकृत धर्म और उद्घाटित धर्म के बीच के विभेद का सामाजिक महत्व सिद्ध होता है। उद्घाटित धर्म प्रकृत धर्म से श्रेष्ठ कहा जाता है। अनेक लेखकों ने कतिपय ऐतिहासिक प्रकार के धर्मों के संदर्भ में प्रकृत धर्म की चर्चा की है। एक ऐसा धर्म जो लोगों के विकास के साथ-साथ पनपा हो, जो लोगों की आवश्यकताओं के अनुसार परस्पर आदान-प्रदान से और जिस पर्यावरण में वे रहते हैं, उसमें से उपजा हो। प्रकृत धर्म का निर्माता है, मनुष्य । उसकी मान्यता है, मनुष्य में पाई जाने वाली सत्य की भावना और उसकी अंतरात्मा की आवाज । उद्घाटित धर्म मनुष्य के प्राधिकार पर नहीं टिका है। वह मानव की नहीं, बल्कि ईश्वर की कृति है । उसकी मान्यता का कारण है, ईश्वर जो परम सत्य है और परम शिव है। उद्घाटित धर्म का उद्देश्य धर्म को पवित्रता प्रदान करना है, जिससे उसका न उल्लंघन किया जा सके और न उसकी आलोचना ही की जा सके।
वेदों के दोनों गुण हैं। उन्हें वह श्रेष्ठ स्थिति प्राप्त है, जो अलिखित धर्म की तुलना में लिखित धर्म को मिलती है। उन्हें वह श्रेष्ठ स्थिति भी प्राप्त है, जो प्रकृत धर्म की तुलना में उद्घाटित धर्म को मिलती है।
इस चर्चा का उद्देश्य इस बात पर बल देना है कि चूंकि वेदों में जाति का उल्लेख है, अतः स्वतः ही उसे, अर्थात् जाति को लिखित पुस्तक की प्रामाणिकता और ईश्वरीय वचन होने की मान्यता प्राप्त हो जाती है। वेदोक्त योजना होने के फलस्वरूप उसे दोहरी सुरक्षा प्राप्त है। बिना किसी अपवाद के हर व्यक्ति को जाति को स्वीकार करना होगा, क्योंकि वह ईश्वरीय सत्य है और जो कोई उसकी आलोचना करने की भूल करेगा, वह पवित्र को अपवित्र करने का अपराधी होगा, क्योंकि वह पवित्र है । सेनार्त ने अपने व्यवसायगत सिद्धांतों में की है, और जो नेस्फील्ड ने अपने वृत्तिमूलक सिद्धांत द्वारा की है। वह जानता है और मानता है कि जाति की रचना तो ईश्वर ने ही की होगी, क्योंकि वेदों में इसका उल्लेख है और वेद श्रुति हैं, अथवा ईश्वर का वचन है। अतः जाति सनातन और सत्य है।
यह है, जाति के संबंध में हिंदू का दृष्टिकोण और एक हिंदू उस आधुनिक व्याख्या से सहमत नहीं है, जो रिजले ने प्रजातीय सिद्धांत के आधार पर की है, जो सेनार्त ने अपने व्यवसायगत सिद्धांतों में की है, और जो नेस्फील्ड ने अपने वृत्तिमूलक सिद्धांत द्वारा की है। वह जानता है और मानता है कि जाति की रचना तो ईश्वर ने ही की होगी, क्योंकि वेदों में इसका उल्लेख है और वेद श्रुति हैं, अथवा ईश्वर का वचन है। अतः जाति सनातन और सत्य है।