अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
इसमें कोई संदेह नहीं की वर्ण व्यवस्था को हिंदू कानून की मान्यता प्राप्त है। हिंदू कानून का हर ग्रंथ जाति को कानूनी संस्था स्वीकार करता है, जिसका उल्लंघन करना अपराध है और जिसके दंड का विधान है। मनु के कानून का ग्रंथ 'मनुस्मृति' अथवा मानव धर्म-शास्त्र कहते हैं, हिंदुओं के कानून का सबसे पुराना और सबसे प्रामाणिक ग्रंथ है। उसके उद्धरणों से यह भली-भांति स्पष्ट हो जाएगा कि जाति पर कानूनी मान्यता की मोहर लगी हुई है।
हिंदू कानून का निर्माता मुन चार वर्णों की व्यवस्था को कानूनी मान्यता प्रदान करता है कि मनु की संहिता का प्रमुख उद्देश्य चार वर्णों के कानून की व्यवस्था करना के था। संहिता के प्रारंभिक श्लोकों से ही यह बात स्पष्ट है। उसमें कहा गया है:
1.1 एक समय बहुत से महर्षि मनु के पास आए जो एकाग्रचित्त बैठे थे और और उनकी विधिपूर्वक अर्चना करके उनसे यह वचन बोले :
1.2 हे भगवान, आप हमें अनुक्रम के अनुसार सभी वर्गों (प्रमुख चार) और उनके बीच के वर्णों में से प्रत्येक के धर्म, सटीक रूप से बताएं।
इस प्रकार वह वर्ण-व्यवस्था को अपनी ओर से न केवल कानूनी मान्यता देता है, अपितु राजा के लिए अनिवार्य व्यवस्था भी देता है कि वह इस संस्था की रक्षा करे:
7.35 राजा की सृष्टि वर्णों (जातियों) और आश्रमों की रक्षा के लिए की गई है जो अपने पद के अनुसार अपने नाना कर्तव्यों को पूरा करते हैं।
7.24 दंड के विभ्रम- अभाव या अनुचित प्रयोग से सब वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि) दूषित ( पत्नी - संभोग से वर्णसंकर) हो जाएंगे, सब मर्यादा (चतर्वर्ग - फल प्राप्ति का कारणभूत नियम ) छिन्न-भिन्न हो जाएंगे और सब लोगों में (एक-दूसरे के प्रति) क्षोप उत्पन्न हो जाएगा।
जाति के उल्लंघन को मनु पाप कहता है और जो जाति से च्युत होकर पतित हो जाता है, उसके लिए वह भिन्न-भिन्न तीन प्रकार के दंडों की व्यवस्था करता है। पहला दंड मृत्यु के बाद का दंड है। मनु कहता है :
12.59 जो पतितों के साथ संबंध रखता है, जो अन्य पुरुषों की स्त्रियों के साथ संभोग करता है, जो ब्राह्मण की संपत्ति का अपहरण करता है, वह ब्रह्मराक्षस हो जाता है।
इस जीवन में पतित के लिए दंड का विधान दोहरा था। एक तो बहिष्कार था । मनु ने बहिष्कार का जो रूप-स्वरूप निश्चित किया है, वह इस प्रकार है :
11.180. जो पतित के साथ संबंध रखता है, उसके साथ सवारी करता है, एक ही आसन पर बैठता है, भोजन करता है, वह एक वर्ष में, और जो पतित के साथ यज्ञ करता है, उसे विद्याध्ययन कराता है या जो पतित के साथ विवाह संबंध रखता है, वह तत्काल पतित हो जाता है।
11.181. जो इन पतितों में से किसी भी पतित के साथ संबंध रखता है, उसे (ऐसे) संबंध जन्य पाप के शमन के लिए वही प्रायश्चित करना चाहिए, जो इस प्रकार के पतितों के लिए निर्धारित है।
11.182. पतित (व्यक्ति के) सपिंडों और समानोदकों को चाहिए कि वे किसी अशुभ दिन गांव से बाहर सायंकाल के समय बांधवों, पुरोहितों और गुरुओं की उपस्थिति में उसे (जैसे वह मर गया है) जलदान करें।
11.183. कोई नौकरानी पानी से भरे घड़े को, जैसे वह मृत व्यक्ति के लिए हो, अपनी लात से ठोकर मारकार लुढ़का दे और पतित व्यक्ति के सपिंड जन व समानोदक जन एक दिन और एक रात का अशौच मानें।
11.184. इसके बाद उसके महापालकों के जाति वाले उसके साथ बात न करें, न एक आसन पर साथ बैठें, न दायभाग दें और न कोई लौकिक व्यवहार ही, जैसा कि प्रायः होता है, उसके साथ रखें।
दूसरा था दायभाग से वंचित करना ।
9.201. नपुंसक, पतित, जन्मान्ध, जन्मवधिर पागल, मूर्ख और गूंगा तथा किसी भी (कर्म या स्पर्श) इंद्रिय से शून्य व्यक्ति दाय के भागी नहीं होते।
11.185. और (यदि वह ज्येष्ठ हो) तो उसका ज्येष्ठता का अधिकार और उसे प्राप्य अतिरिक्त अंश नहीं दिया जाएगा और उसके स्थान पर कोई छोटा भाई जो गुणवान हो, अपने ज्येष्ठ भाई के अंश को प्राप्त करेगा।
बहिष्कार और दायभाग से वंचित होने के दोनों दंडों से मुक्ति का एक ही उपाय था कि वह विहित रीति से प्रायश्चित कर ले। प्रायश्चित ही एकमात्र उपाय था। मनु कहता है :
11.187. और यदि वह प्रायश्चित कर ले तो उसके सजातीय उसके साथ पवित्र जलाशय में स्नान करेंगे और वहां एक नया घड़ा रखेंगे, जो जल से भरा होगा ।
11.188. और वह उस घड़े को जल से छोड़ देगा। वह घर लौटेगा और पहले की तरह अपने संबंधियों के प्रति अपने सभी कर्तव्य करने लगेगा |
पतित पुरुष और पतित स्त्री में एक भेद था। किसी को छूट नहीं थी। नियम दोनों पर लागू होता है। मनु कहता है :
11.189. जहां तक पतित स्त्रियों का संबंध है, वे भी उसी नियम का पालन करें, परंतु उन्हें भोजन, वस्त्र, पानी दिया जाए और वे अपने ( परिवार के घर ) के निकट निवास करें।
कानूनी मान्यता सशक्त मान्यता थी । जाति के उल्लंघन के लिए कानून में दोहरे दंड की व्यवस्था थी। उसमें बहिष्कार भी था और साथ ही दायभाग के अधिकार से वंचित किए जाने का भी विधान था । ये दंड कितने कड़े थे, उसका सम्यक वर्णन सर टामस स्ट्रेंज ने हिंदू कानून संबंधी अपने निबंध में किया है। वह इस विषय में लिखते हैं:
अब एक मामले पर विचार करना बाकी है। यह व्यक्तिगत है कि वह त्रुटि से संबंधित है, जो पर्याप्त चर्चा का विषय रही है। इस कारण व्यक्ति निष्काषित कर दिया जाता था, उस मर्यादा दी जानी बंद कर दी जाती थी, उसे जातिच्युत कर दिया जाता था । इसका प्रभाव यह होता है कि व्यक्ति समाज में संपर्क रखने से वंचित कर दिया जाता था, वह किसी भी समारोह में भाग नहीं ले सकता था, वह किसी भी कार्य के योग्य नहीं रह जाता था। उससे जीवन की सारी सुविधाएं छीन ली जाती थीं। उसके साथ सभी प्रकार के सामाजिक संबंध तोड़ दिए जाते थे। ज्यों ही किसी व्यक्ति को दंड दे दिया जाता था, उसी क्षण से ही उससे न तो कोई बात करेगा, न उसके पास बैठेगा, वह दाय में किसी भी अंश का या किसी प्रकार की संपत्ति का अधिकारी नहीं रह जाता, उसे किसी भी समारोह के लिए, जो चाहे साधारण हो या विशेष, जैसे नव वर्ष पर आयोजित उत्सव, कोई न्योता नहीं भेजा जाता था। इन परिस्थितियों में वह जीवित होते हुए भी मृत समझ लिया जाता है। हिंदू विधि में ऐसे लोगों के लिए तर्पण करने की व्यवस्था है, मानों ये प्रेत हों। दंड देने की यह व्यवस्था जो अत्यंत अपमानजनक और दमनकारी थी, प्रचीन विधि के अधीन लागू की जाती थी। जो भी उससे बच निकलने की कोशिश करता था, उसे वैसा ही दंड भोगना पड़ता था। लेकिन वर्तमान में प्रारंभ से ही यह दंड नरम कर दिया गया। यह कहा गया है कि 'केवल पापी ही अपने पाप का दंड भोगेगा।' अब कानून बहिष्कार की इस प्रणाली को इतना गलत समझता है कि यदि कोई व्यक्ति, जिसे दूसरे व्यक्ति के साथ बैठकर भोजन करना चाहिए, भोजन करने से इंकार कर दें और उसका कोई पर्याप्त कारण न हो तो वह दंडनीय होगा । बंबई की रिपोर्टों में जाति से दुर्भावना से बहिष्कार के लिए हर्जाने के दावे की एक घटना का उल्लेख है। हिंदू कानून जिसे जातिच्युत कहता है और जाति से निष्कासन, जैसा कि पहले हम लोगों में प्रचलित था, ये दोनों दंड प्रकृति और प्रभाव की दृष्टि से एक-दूसरे के समान तो हैं, लेकिन विशिष्ट परिस्थिति में इनमें अंतर है। हमारे यहां की तरह हिंदुओं में अपराध को ध्यान में रखते हुए कहीं दंड कम है और कहीं अधिक है, जैसा कि दायभाग के मामले में है। हमारे सामने 1814 में बंगाल की सदर दीवानी अदालत का एक केस है। जब इस केस के बारे में सरकारी पंडितों से राय ली गई, तब उन्होंने ऐसे मामलों में जिसमें किसी व्यक्ति को आंशिक और अस्थाई रूप में जाति से पदावनत कर दिया जाता है और उन मामलों में जिनमें बाद में जाति ही छिन जाती है, भेद निर्धारित किया। उनका विचार था कि पहली यानी आंशिक पदावनति की स्थिति में जब अपराध का प्रायश्चित कर लिया जाता है तो उत्तराधिकार की बाधा दूर हो जाती है, लेकिन दूसरी स्थिति में जहां पदावनति सदा के लिए होती है, तब भले ही अपराध का पाप प्रायश्चित से दूर हो जाए, पर उत्तराधिकार की बाधा बनी रहती है, क्योंकि जिस व्यक्ति को अंतिम रूप से जाति से बहिष्कृत कर दिया जाए, वह सदा सर्वदा के लिए बहिष्कृत ( पतित) ही रहेगा। उल्लिखित केस में विचाराधीन पक्ष पर आरोप था कि उसने अनेक बार लंपटता और निर्लज्जता का आचरण किया, उसने बेशर्मी से मादक पेयों की लत पाल ली, उसने सर्वाधिक नीच और सर्वाधिक कुख्यात चरित्र के लोगों के साथ कुसंगति और खान-पान किया, उसने अलग-अलग समय पर कई व्यक्तियों के साथ मनमाने ढंग से मार-पीट कर उन्हे आहत किया, उसने खुले आम मुस्लिम महिला के साथ सहवास किया और उसने अपनी माता के, जिसने उसे गोद लिया था, निवास स्थान को न केवल आग लगा दी, बल्कि उससे पूर्व अन्य उपायों से उसे एक से अधिक बार बर्बाद करने का भी प्रयास किया। पंडितों ने कहा, शियन्नाध के विरुध जो अपराध सिद्ध हो चुके हैं, उन सब में से केवल एक यानी उसने मुस्लिम महिला के साथ जो सहवास किया, ऐसा अपराध है जो उसे दंड का पात्र बनाता है कि उसे सदा-सर्वदा के लिए अपनी जाति से बहिष्कृत कर दिया जाए। और यह थी अदालत की राय । सबसे पहली बात तो यह है कि पदावनत करने की शक्ति संबंधित जाति की पंचायत के पास होती है। यदि उनकी सजा को चुपचाप स्वीकार न किया जाए तो सम्राट के न्यायालय में अपील की जा सकती है। यहां इस केस में दायभाग के दावे का सवाल उठा और यह पता चला कि पंचायत अनेक मामलों में अपनी शक्ति का प्रयोग कर दोषी व्यक्ति को सेंसर कर सकती है, जिनमें कानून कुछ भी नहीं कर सकता। अपराधी को दंड केवल उन अपराधों के लिए दिया जा सकता है, जो उसने अपनी वर्तमान अवस्था में किए हों और जहां अपराध घटिया हो तो उसके दंड का औचित्य तभी होगा, जब वह बार-बार किया जाए। पदावनित बहिष्कार के अन्य कारणों से इस दृष्टि से भिन्न है कि उसका प्रभाव उसके पुत्र पर पड़ता है, जो अपने पिता द्वारा अपराध करने के बाद पैदा होता है। यदि उसका जन्म पहले हुआ हो तो वह दायभाग का अधिकारी बना रहेगा और वह दायभाग अपने पिता के निधन के बाद प्राप्त करता है । बहिष्कार के हर अन्य मामले में पुत्र यदि वस्तुतः अपने पिता की तरह संकट में नहीं है तो उत्तराधिकार प्राप्त करता है और उसका पालन-पोषण करता है, वह अधिकार पड़पोते तक बना रहता है। पिता अथवा स्वयं अपराधी के संबंध में अगर दायभाग का अधिकार प्राकृतिक दोष के कारण नहीं छिनता है, तब संपत्ति के बंटवारे का प्रश्न संपत्ति के विभाजन से पूर्व उठता है। अगर वह उसके बाद उठता है तो उसके कारण उत्तराधिकार नहीं छिनेगा। पति के द्वारा धर्म-परिवर्तन करने पर अगर पत्नी जारकर्म करती है, तब दायभाग का उसका अधिकार नहीं रहेगा। यदि उसे मिल भी गया हो तो भी छिन जाएगा। इस संबंध में हिंदू विधवा की स्थिति हमारी विधवाओं जैसी होती है। अधिकांश मामलों में उनकी स्थिति पट्टेदार जैसी होती है। वे उसे तभी धारण करती हैं, जब तक वे सदाचारिणी रहें। एक अति श्रद्धायोग्य व्यक्ति के मत के अनुसार, यदि जाति से बहिष्कार ऐसा हो कि उसका प्रायश्चित और उसकी क्षतिपूर्ति न हो सके तो वह अधिकार जब्त कर लिया जाता है। सामान्यतः अयोग्यता का कानून स्त्री और पुरुष दोनों पर समान रूप से लागू होता है।