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अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट -  लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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18 ऑक्टोबर 2023
Book
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II

     कहा जाता है कि किसी प्राचीन नास्तिक ने अपने दर्शन की व्याख्या करने के बाद अंत में कहा था :

     मैं केवल यह जानता हूं कि मैं कुछ भी नहीं जानता, और मैं पूरे विश्वास से यह भी नहीं कह सकता कि मैं यह जानता भी हूं।

vah Samaj Jise hinduon Ne Banaya - Asprishy ka vidroh - Gandhi aur Unka anshan - Poona pact - Written by Dr Babasaheb Ambedkar     सर डेंजिल इबट्सन ने पंजाब की जाति-व्यवस्था के बारे में लिखते हुए कहा कि इस नास्तिक ने अपने बारे में ऊपर जो कुछ कहा है, यही शब्द जाति के बारे में मेरी अपनी धारणा को भी व्यक्त करते हैं। सच तो यह है कि स्थानीय परिस्थितियों के कारण जाति की अवधारणा में अत्यधिक अंतर मिलता है। किसी एक स्थान पर उपलब्ध किसी जाति के बारे मे पूर्ण दृढ़ता से कोई बात कहतना अति कठिन है, क्योंकि किसी अन्य स्थान पर उपलब्ध उसी जाति के बारे में उक्त तथ्य का उतनी ही दृढ़ता से खंडन किया जा सकता है।

     भले ही यह बात सच हो, फिर भी जाति के आवश्यक और मूल लक्षणों और उसके अनावश्यक और सतही लक्षणों की अलग-अलग करना कठिन नहीं है। किसी व्यक्ति का किन कारणों से बहिष्कार किया जा सकता है, इसे निश्चित करने का आसान तरीका श्री भट्टाचार्य ने इस प्रकार बताया है, इसे निश्चित जाति से बहिष्कार के निम्न कारण गिनाए हैं: (1) ईसाई या इस्लाम धर्म ग्रहण कर लेना, ( 2 ) यूरोप अथवा अमरीका की यात्रा करना, ( 3 ) विधवा से विवाह करना, (4) यज्ञोपवीत को खुल्लम-खुल्ला उतार फेंक देना, (5) खुल्लम-खुल्ला गोमांस या सुअर का मांस खाना, (6) खुल्लम-खुल्ला मुसलमान, ईसाई और छोटी जाति के हिंदू के हाथ का बना कच्चा भोजन करना, (7) अति निम्न जाति के शूद्र के घर पर काम करना, (8) अनैतिक प्रयोजन से किसी महिला का घर से बाहर जाना, और (9) विधवा का गर्भवती हो जाना। यह सूची पूर्ण नहीं है और उसमें जाति से बहिष्कार के सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण छोड़ दिए गए हैं। वे हैं: ( 10 ) अंतर्जातीय विवाह करना, (11) दूसरी जाति के व्यक्ति के साथ खान-पान करना, और ( 12 ) व्यवसाय बदलना। श्री भट्टाचार्य के कथन का दूसरा दोष यह है कि उसमें आवश्यक और अनावश्यक कारणों में कोई भेद नहीं किय गया है। इसमें शक नहीं है कि जब किसी व्यक्ति का जाति से बहिष्कार किया जाता है तो दंड एक समान होता है। उसके दोस्त, रिश्तेदार और जाति - भाई उसका आतिथ्य नहीं ग्रहण करते। उसे उनके घरों में उत्सवों में नहीं बुलाया जाता। वह अपने बच्चों के विवाह नहीं कर सकता। उसकी विवाहित पुत्रियां भी जाति से बहिष्कृत होने के भय से उससे मिलने नहीं आ सकतीं। पुरोहित, नाई और धोबी उसके घर नहीं जाते। उसके जाति भाई उससे इस हद तक संबंध तोड़ लेते हैं कि उसके घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर वे अंत्येष्टि में नहीं जाते। कभी-कभी तो जाति से बहिष्कृत व्यक्ति को सार्वजनिक मंदिरों और श्मशान में भी प्रवेश नहीं करने दिया जाता।

     जाति से बहिष्कार के ये कारण जाति के नियमों को परोक्ष रूप से दर्शाते हैं। लेकिन सभी विनियम बुनियादी नहीं होते। अनेक विनियम अनावश्यक होते हैं। आवश्यक और अनावश्यक में भेद एक अन्य प्रश्न द्वारा किया जा सकता है। वह है कि जाति से बहिष्कृत हिदू पुनः जाति में कब शामिल हो सकता है? हिंदुओं में प्रायश्चित करने की पद्धति है। जात से बहिष्कृत व्यक्ति को पहले प्रायश्चित करना होगा, उसके बाद ही वह पुनः जाति-बिरादरी में शामिल हो सकता है। इन प्रायश्चितों के बारे में कुछ बातें याद रखनी होंगी। सर्वप्रथम तो यह कि जाति संबंधी कुछ अपराध ऐसे हैं, जिनके लिए कोई प्रायश्चित नहीं है। दूसरी यह है कि अपराध के अनुसार प्रायश्चित बदल जाते हैं। कुछ अपराधों में तो प्रायश्चित के रूप में बहुत हल्का-सा जुर्माना होता है । अन्य अपराधों में जुर्माना अति कठोर हो सकता है।

     प्रायश्चित का होना या न होना महत्व रखता है और उसे साफ तौर पर समझना होगा। प्रायश्चित न होने का अर्थ यह नहीं होता कि अपराध करने पर दंड नहीं मिलेगा। इसके विपरीत उसका अर्थ होता है कि अपराध अक्षम्य है और जिस अपराधी को एक बार जाति से निकाल दिया जाएगा, उसका कभी भी पुनः उद्धार नहीं होगा। उसे पुन: कभी जाति में शामिल नहीं किया जाएगा। प्रायश्चित होने का अर्थ है कि अपराध क्षम्य है। अपराधी प्रायश्चित कर सकता है और बहिष्कृत व्यक्ति जाति में पुनः शामिल हो सकता है।

     दो अपराधों के लिए कोई प्रायश्चित नहीं है। वे हैं: (1) हिंदू धर्म को छोड़कर दूसरा धर्म अपना लेना, और (2) दूसरी जाति अथवा धर्म के व्यक्ति से शादी कर लेना। जाहिर है कि यदि इन अपराधों के लिए कोई व्यक्ति जाति से बाहर कर दिया जाता है तो वह सदा के लिए जाति से बाहर हो जाता है।

     जिन दो अपराधों के लिए कठोरतम प्रायश्चित का विधान है, वे हैं: (1) किसी दूसरी जाति के व्यक्ति और किसी अहिंदू के साथ खान-पान करना, और (2) जातीय व्यवसाय को छोड़कर कोई दूसरा व्यवसाय अपनाना। अन्य अपराधों के लिए दंड हल्का है या यूं कहें कि प्रायः नाममात्र का है।

     जाति के बुनियादी नियम क्या हैं और जाति का रूप स्वरूप क्या है, इस पहेली को बूझने का सर्वाधिक निश्चित अता-पता प्रायश्चित संबंधी नियम देते हैं। जिन नियमों के उल्लंघन के लिए कोई प्रायश्चित नहीं है, उन्हें जाति की 'आत्मा' कहा जा सकता है । जिन नियमों के उल्लंघन के लिए कठोरतम प्रायश्चित का विधान है, उन्हें जाति का 'तन' कहा जा सकता है। अतः बिना किसी संकोच के कहा जा सकता है कि जाति के चार बुनियादी नियम हैं। जाति की परिभाषा इस प्रकार की जा सकती है। कि वह एक ऐसा समाज समूह है, जिसकी (क) हिंदू धर्म में आस्था हो, और जो (ख) विवाह, (ग) खान-पान, और (घ) व्यवसाय संबंधी कतिपय नियमों से आबद्ध हो। इसमें एक और विशेष लक्षण जोड़ा जा सकता है, यानी वह ऐसा समाज समूह हो, जसका एक समान नाम हो ।

     विवाह के संबंध में यह नियम है कि विवाह केवल अंतर्जातीय होना चाहिए । विभिन्न जातियों के बीच विवाह नहीं हो सकते। यह वह सबसे बड़ा तथा सर्वाधिक बुनियादी आधार है, जिस पर जाति का समूचा ताना-बाना और ढांचा टिका हुआ है।

     खान-पान के संबंध में नियम है कि कोई व्यक्ति जाति से बाहर के किसी व्यक्ति से न तो भोजन ले सकता है और न ही उसके साथ बैठकर भोजन कर सकता है। इसका अर्थ है कि जो लोग आपस में शादी कर सकते हैं, केवल वे ही साथ बैठकर भोजन भी कर सकते हैं। जो आपस में शादी नहीं कर सकते, वे एक-दूसरे के साथ बैठकर भोजन नहीं कर सकते। दूसरे शब्दों में, जाति एक अंतर्जातीय इकाई भी है और एक सांप्रदायिक इकाई भी ।

     व्यवसाय के संबंध में नियम है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी जाति का परंपरागत व्यवसाय ही करेगा, और यदि किसी जाति का कोई व्यवसाय नहीं है तो उसे अपने पिता का व्यवसाय करना होगा।

     जहां तक किसी व्यक्ति की सामाजिक स्थिति का संबंध है, वह निश्चित और वंशानुगत होती है। वह स्थाई होती है, क्योंकि व्यक्ति की सामाजिक स्थिति का निर्धारण उसकी जाति की सामाजिक स्थिति के अनुसार होता है। वह वंशानुगत है, क्योंकि हिंदू पर उसके माता-पिता की जाति का ठप्पा लगा होता है। हिंदू अपनी सामाजिक स्थिति नहीं बदल सकता, क्योंकि वह अपनी जाति नहीं बदल सकता । हिंदू जन्म से हिंदू होता है, और मरने पर भी वह उसी जाति का रहता है, जिसमें उसका जन्म हुआ था। अगर कोई हिन्दू अपनी जाति से च्युत हो जाता है, तो वह अपनी सामाजिक स्थिति से भी च्युत हो जाता है। वह नई या कोई बेहतर अथवा भिन्न सामाजिक स्थिति प्राप्त नहीं कर सकता।

     जाति के संबंध में एक समान नाम का क्या महत्व है? इसका महत्व स्पष्ट हो जाएगा, यदि हम दो प्रश्न करें। वे अति संगत भी हैं और जाति नामक इस संस्था का संपूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिए उनका सही उत्तर जरूरी है। समाज में वर्ग या तो संगठित होते हैं या फिर असंगठित होते हैं। जब वर्ग की सदस्यता और वर्ग में शामिल होने या उनसे अलग होने की प्रक्रिया निश्चित सामाजिक नियम बन जाती है। और वर्ग के अन्य सदस्यों के संदर्भ में उनमें कतिपय कर्तव्यों तथा विशेषाधिकारों का समावेश हो जाता है, तो वर्ग एक संगठित वर्ग बन जाता है। प्रत्येक वर्ग एक स्वैच्छिक वर्ग होता है और उसमें जब सदस्य शामिल होते हैं तो उन्हें इस बार का पूरा-पूरा ज्ञान होता है कि वे क्या कर रहे हैं और संगठन के लक्ष्य क्या हैं। दूसरी ओर ऐसे वर्ग होते हैं, जिसमें कोई व्यक्ति शामिल तो हो जाता है, पर अपनी इच्छा-शक्ति का प्रयोग नहीं करता और ऐसे सामाजिक विनियमों तथा परंपराओं का दास हो जाता है, जिन पर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता ।

     इस प्रकार जाति एक अति संगठित सामाजिक वर्गीकरण है। यह कोई असंगठित अथवा हल्का-फुल्का निकाय नहीं है। इसी प्रकार जाति कोई ऐसा वर्गीकरण नहीं है, जो स्वैच्छाश्रित हो। हिंदुओं में व्यक्ति जाति में जन्म लेता है और मरने पर भी उसी जाति का बना रहता है। ऐसा कोई हिंदू नहीं, जिसकी कोई जाति न हो। जाति से उसका कोई छुटकारा नहीं । जन्म से मृत्यु तक जाति से बंधे रहने के कारण वह अपनी जाति के ऐसे नियमों तथा रूढ़ियों के अधीन रहता है, जिन पर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता।