अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
ब्राह्मण ! मूर्तिपूजकों की एक और जाति भी है, जिसे लोग ब्राह्मण कहते हैं। वे पुजारी होते हैं। मंदिरों पर इन्हीं का कब्जा होता है। पूजा घर इन्हीं के नियंत्रण में होते हैं। वे मंदिर बड़े- बड़े होते हैं। इनमें भरपूर आमदनी होती है । उनमें से अनेक मंदिर दान-दक्षिणा पर चलते हैं। इन मंदिरों में लकड़ी, पत्थर और तांबे की अनेक मूर्तियां होती हैं। इन मंदिरों में वे अपने आराध्य देवों के सम्मान में बड़े-बड़े समारोह करते हैं और हमारी ही तरह उनकी पूर्जा - अर्चना में ढेर सारी मोमबत्तियां, दिए जलाते हैं और घंटे घड़ियाल बजाते हैं। इन ब्राह्मणों और मूर्तिपूजको का जो धर्म है, वह होली ट्रिनिटी (यानी पिता, पुत्र और पवित्रात्मा के त्रय की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति) से बहुत कुछ मिलता-जुलता है। वे होली ट्रिनिटी (तीन देवों का ) परम सम्मान करते हैं। वे सदैव तीन देवों में परम देव की पूजा करते हैं, जो उनकी दृष्टि में सच्चा ईश्वर है, समूची सृष्टि का सिरजनहार है। उनके अनुसार अन्य अनेक देवता है, जो होली ट्रिनिटी के अधीन हैं। जहां कहीं भी इन ब्राह्मणों तथा मूर्तिपूजकों को हमारे चर्च मिलते हैं, वहां वे जाते हैं और हमारी मूर्तियों की पूजा-अर्चना करते हैं। से सदा ही सांता मारिया की चर्चा करते हैं। वैसे उन्हें इस बारे में कुछ पूरी जानकारी है। हमारी ही रीति से वे चर्च का सम्मान करते हैं और कहते हैं कि हमारे और आपके बीच तो नाममात्र का अंतर है। वे किसी भी मारी गई वस्तु को नहीं खाते, न ही वे किसी की हत्या करते हैं। स्नान का उनके लिए बड़ा महात्म्य है। उनका कहना है कि स्नान से तो वे तर जाते हैं।
कालीकट के इसी राज्य में ब्राह्मण नामक एक जाति भी है। उनमें हमारे पादरियों की भांति पुजारी होते हैं। उनकी चर्चा मैं अन्यत्र कर चुका हूं।
वे सब एक ही भाषा बोलते हैं और केवल ब्राह्मण का बेटा ही ब्राह्मण हो सकता है। जब वे सात वर्ष के होते हैं तो अपने कंधे पर बिना कमाई खाल की दो अंगुल चौड़ी पट्टी धारण करते हैं। यह पट्टी एक जंगली पशु की खाल की होती है, जिसको क्राइवामृगम कहते हैं और वह जंगली पशु गधे जैसा होता है। तब वह सात वर्ष तक पान नहीं खा सकता। इस पूरी अवधि के बीच वह इस पट्टी को पहने रहता है। जब वह 14 वर्ष का हो जाता है तो वे उसे ब्राह्मण की दीक्षा देते हैं। वे उसकी चमड़े की पट्टी उतार देते हैं और उसे तीन सूत्रों वाला धागा (यज्ञोपवीत) पहना देते हैं। उसे वह आजन्म धारण करता है और वह उसके ब्राह्मण होने का प्रमाण पत्र होता है। इस रस्त को वे बड़ी धूमधाम और उल्लास से करते हैं, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार हम उस पादरी के लिए करते हैं, जो पहले-पहल अपना मास (ईसाई पर्व विशेष ) गाता है। उसके बाद वह पान खा सकता है, लेकिन मांस व मछली नहीं खा सकता। भारतीयों में उनका बड़ा आदर व सम्मान होता है, जैसा कि मैं बता चुका हूं कि वे चाहे कोई भी अपराध करें, सर्वथा अबध्य होते हैं। उनका अपना प्रधान ही उन्हें छोटा-मोटा दंउ दे देता है। हमारी भांति वे केवल एक बार शादी करते हैं, और केवल सबसे बड़ा पुत्र ही शादी कर सकता है, वह घर का प्रधान समझा जाता है, जैसे वह किसी छोटी-मोटी रियासत का मालिक हो। अन्य भाई आजन्म अविवाहित रहते हैं। ये ब्राह्मण अपनी पत्नियों को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करते हैं। उन्हें पूर्ण सम्मान देते हैं। कोई अन्य व्यक्ति उनके साथ संभोग नहीं कर सकता। यदि उनमें से किसी की पत्नी मर जाती है तो वह पुनर्विवाह नहीं करता। लेकिन कोई स्त्री अपने पति के साथ विश्वासघात करती है तो उसे विष देकर मार दिया जाता है। जो भाई अविवाहित होते हैं, वे नायर स्त्रियों के साथ संभोग करते हैं। वे इसे अति सम्मानजनक समझती हैं, और चूंकि वे ब्राह्मण होते हैं, अतः कोई भी स्त्री अस्वीकार नहीं करती। फिर भी वे उम्र में अपने से बड़ी स्त्री के साथ संभोग नहीं करते। वे अपने-अपने घरों और नगरों में रहते हैं, और मंदिरों में पुजारी का काम करते हैं। वहां वे दिन की निश्चित अवधि मे प्रार्थना- - पूजा और मूर्तियों का अभिषेक करते हैं।
इनमें से कुछ ब्राह्मण राजाओं की हर प्रकार से सेवा करते हैं, लेकिन वे युद्ध नहीं करते। राजा के लिए भोजन केवल ब्राह्मण या उसका संगा-संबंधी ही तैयार कर सकता है। वे दूत का भी काम करते हैं। वे अन्य देशों को पत्र, धन और माल लाने ले जाने का काम करते हैं। वे जहां भी चाहें बेखटके और बेखौफ आ-जा सकते हैं। कोई भी उनको क्षति नहीं पहुंचाता है, तब भी नहीं जब राजा युद्ध के लिए चला जाता है। वे ब्राह्मण मूर्तिपूजा में पारंगत होते हैं और इस संबंध में उनके पास अनेक ग्रंथ होते हैं। राजा इन ब्राह्मणों का बड़ा सम्मान करते हैं।
मैं अनेक बार नायरों की चर्चा कर चुका हूं, फिर भी मैंने अभी तक नहीं बताया है कि उनके तौर-तरीके क्या हैं। मलाबार के इस प्रदेश में नायर लोगों की एक और जाति है। उनमें उदात्त लोग होते हैं। युद्ध में भाग लेना ही उनका एकमात्र धर्म व कर्म है। जहां कहीं वे जाते हैं, वे सदा ही हथियारों से लैस रहते हैं। कुछ के पास तलवार और ढाल होती हैं। कुछ के पास तीर-कमान होते हैं, और कुछ के पास भाले होते हैं। वे सभी राजा और अन्य बड़े-बड़े सामंतों के साथ रहते हैं, लेकिन सभी को वेतन राजा से या उन बड़े-बड़े सामंतों से मिलता है, जिनके साथ वे रहते हैं। केवल नायर वंश का व्यक्ति ही नायर हो सकता है। अपनी उदात्त मर्यादा में वे निष्कलंक होते हैं। वे निम्न जाति के किसी व्यक्ति को स्पर्श नहीं करते। वे खाएंगे भी तो नायर के साथ, और पिएंगे भी तो नायर के साथ।
वे लोग विवाह नहीं करते। उनके भानजे ( बहन के पुत्र) उनके उत्तराधिकारी होते हैं। उच्च कुल की स्त्रियां बड़ी स्वच्छंद प्रकृति की होती हैं और अपनी इच्छा से ब्राह्मण या नायर के साथ संभाग करती हैं। लेकिन मृत्यु के भय से वे अपने से किसी नीची जाति के व्यक्ति के साथ संभोग नहीं करतीं। जब लड़की बारह वर्ष की हो जाती है तो उसकी माता बड़ा उत्सव मनाती है। जब कोई माता देखती है कि उसकी पुत्री ने उक्त आयु प्राप्त कर ली है तो वह अपने सगे-संबंधियों तथा मित्रों से अपनी पुत्री के विवाह की तैयारी करने के लिए कहती है। वह अपने कुल या किसी विशिष्ट के यहां अपनी पुत्री से विवाह करने के लिए प्रस्ताव भेजती है। इस पर वह सहर्ष स्वीकृति देता है। वह एक छोटा-सा आभूषण बनवाता है, जिसमें आधी अशरफी- भर सोना होता है। वह माला की तरह होता है। इस आभूषण के बीचों-बीच एक छेद होता है। उसमें सफेद रेशम के धागे की डोरी पड़ी होती है । तब माता किसी नियत तिथि को अपनी पुत्री को अनेक मूल्यवान आभूषणों से खूब सुसज्जित करती है। उसके यहां खूब नाच-गाना होता है। लोग भारी संख्या में एकत्र होते हैं। तब उक्त कुल का कोई सगा-संबंधी या मित्र उस आभूषण के साथ आता है और कुछ रस्में पूरी करके उस लड़की के गले में पहना देता है, जिसे वह प्रतीक के रूप में जीवन-भर पहनती है, और उसका विवाह हुआ समझा जाता है। यदि वह मां का सगा-संबंधी होता है, तब वह उस लड़की के साथ संभोग किए बिना वापस जाता है। यदि वह सगा संबंधी नहीं होता, तब वह उस लड़की के साथ संभोग कर सकता है, लेकिन वह वैसा करने के लिए बाध्य नहीं होता। उसके बाद माता खोज करती है और किसी युवक से अपनी पुत्री के कौमार्य को भंग करने का अनुरोध करती है। उसे नायर ही होना चाहिए। वे स्वंय किसी अन्य महिला के कौमार्य को भंग करना अपमानजनक और गंदा समझते हैं। जब कोई व्यक्ति एक बार उसके साथ संभोग कर लेता है तो फिर वह पुरुषों के साथ सहवास करने योग्य हो जाती है। तब माता अन्य युवा नायरों से पूछताछ करती है कि क्या वे उसकी पुत्री का भरण-पोषण करना चाहते हैं? क्या वे उसे अपनी गृहणी के रूप में स्वीकार करना चाहते हैं, ताकि तीन-चार नायर उसके साथ जीवन-यापन के लिए तैयार हो जाएं और हर व्यक्ति से प्रतिदिन भरण-पोषण के लिए राशि मिलती रहे। जितने अधिक प्रेमी होते हैं, वह उतना ही अधिक उसके लिए सम्मानजनक होता है। प्रत्येक का समय नियत कर दिया जाता है। प्रत्येक के साथ एक दिन दोपहर से अगले दिन दोपहर तक समय बिताता है। इस प्रकार वे शांति से रहने लगते हैं। किसी प्रकार की अशांति या लड़ाई-झगड़ा नहीं होता। यदि उनमें से कोई उसे छोड़ना चाहता है तो वह उसे छोड़ देता है और दूसरी के साथ रहने लगता है। वह भी यदि किसी पुरुष से ऊब जाए तो वह उससे चले जाने के लिए कह देती है और वह चला जाता है या उससे समझौता कर लेता है। यदि उनसे कोई बच्चे पैदा हो जाएं तो वे माता के साथ रहते हैं और माता को उनका लालन-पालन करना पड़ता है, क्योंकि वे उन्हें किसी की भी संतान नहीं मानते। यदि उनमें से उनकी शक्ल मिलती-जुलती है, जो भी वे उन्हें अपनी संतान नहीं मानते। न ही वे उनकी जायदाद के उत्तराधिकारी होते हैं। जैसा कि मैं बता चुका हूं, उनके उत्तराधिकारी उनके भानजे, यानी उनकी बहन के पुत्र होते हैं। (जो भी अपने मन के भीतर झांक कर देखेगा तो उसे पता चलेगा कि इस नियम की स्थापना के पीछे आम आदमी की समझ से कहीं बड़ा और गहरा अर्थ था)। उनका कहना है कि नायरों के राजाओं ने वह नियम इसलिए बनाया कि कहीं बच्चों के लालन-पालन के फेर में पड़कर वे उनकी सेवा सेवा से विमुख न हो जाएं।