अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
IV
यह सच है कि जहां तक अतीत का संबंध है, भारत के सात करोड़ 95 लाख लोगों की इन तीनों श्रेणियों के लिए अधोगति की दशा एक सी रही है। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि उनकी भावी नियति भी उनके लिए एक समान होगी । उसका कारण है। भले ही उनकी दशा प्रत्यक्षतः समान दीख पड़े, पर उनकी स्थिति अनिवार्यतः भिन्न है।

ध्यान देने योग्य पहली बात तो यह है कि आदिम जातियां और जरायम - पेशा जातियों अस्पृश्यता की इस प्रणाली से पीड़ित नहीं हैं। हिंदू को वे अपवित्र नहीं करते। वास्तविकता तो यह है कि ये आदिम और जरायम- पेशा जातियों अस्पृश्यों के प्रति अस्पृश्यता का व्यवहार करती हैं। कैसी हास्यापद स्थिति है। हम देखते हैं कि ये आदिम तथा जरायम- पेशा जातियों के लोग सोचते हैं कि वे अपवित्र हो जाएंगे, यदि कोई अस्पृश्य उन्हें छू लेगा। वे अस्पृश्यों से कहीं ज्यादा गरीब, गंदे, अंधविश्वासी और अनपढ़ हैं। फिर भी वे इस बात पर गर्व करते हैं कि वे सामाजिक दृष्टि से अस्पृश्यों से ऊंचे हैं। निश्चय ही यह छूत के उस रोग का प्रभाव है, जो उन्हें हिंदुओं से संसर्ग से लगा है। लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि हिंदू उन्हें अस्पृश्य नहीं मानता। अस्पृश्यों के मुकाबिले उन्हें यह एक लाभ प्राप्त है और यह लाभ उनके भविष्य के लिए आश्वासन है । यदि आदिम जातियों के पास उन्नति के अवसर नहीं हैं तो इसका कारण यह है कि वे अलग-थलग रहना पसंद करते हैं। लेकिन यदि एक बार वे वनों की अपनी गुफाओं से बाहर निकल आएं और सभ्यता में भागीदार हा जाएं तो कोई भी बाधा उन्हें रोक नहीं सकेगी। इसी प्रकार जरायम - पेशा जातियां भी अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त हैं। सरकार ने उनके लिए बस्तियां स्थापित कर दी हैं। वहां इन जरायम- पेशा जातियों को रखा जाता है और उन्हें व्यवसाय के लाभदायक हुनर सिखाए जाते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि जल्दी ही वे अपनी गंदी आदतों के दुष्चक्र से छुटकारा पा जाएंगे।
अस्पृश्यों का मामला बिल्कुल अलग तरह का है। उनकी उनकी असुविधाएं उन पर थोपी गई हैं। उनका अकेलापन दरअसल अलगाव है। वह उन पर जबरदस्ती थोपा गया है। अस्पृश्यों की समस्या आदिम जातियों की समस्या से अलग है, क्योंकि उनकी अवस्था में अलगाव की बुराइयां अस्पृश्यता के विष के कारण बढ़कर दुगनी - चौगुनी हो जाती हैं। नतीजा यह होता है कि जहां आदिम जातियों की दशा में समस्या का कारण भौगोलिक अलगाव है और वे बेहतरी के अवसरों का लाभ नहीं उठाना चाहते, वहां अस्पृश्यों की दशा में समस्या का कारण है कि उन्हें वास्तव में अवसरों से वंचित किया जा रहा है।
अस्पृश्यों के उद्धार की कोई अधिक आशा नहीं दीख पड़ती। बहरहल, आदिम जातियों के उद्धार के मुकाबिले उनका उद्धार अधिक कंटकपूर्ण और दुष्कर है। गुलामों की समस्या है कि उन्हें राजनीतिक या आर्थिक अधिकार नहीं दिए जाते। यदि अस्पृश्यों की समस्या उन्हें राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों से वंचित किए जाने की है तो उसे कानूनी तथा संवैधानिक उपायों से हल किया जा सकता है। उन्हें राजनीतिक तथा आर्थिक अधिकारों से वंचित किया गया है, उसका कारण है, उसका कारण हिंदुओं की सामाजिक मनोवृत्ति है। अस्पृश्यों की समस्या का सीधा संबंध हिंदुओं के सामाजिक व्यवहार से है। अस्पृश्यता तभी मिटेगी, जब हिंदू अपनी मनोवृत्ति बदलेंगे। समस्या यह है कि वह कौन-सा तरीका है, जिससे हिंदू अपनी जीवन शैली को भुला दें। यह कोई छोटी-मोटी समस्या नहीं है कि कोई समूचा राष्ट्र अपनी बंधी- बंधाई जीवन-शैली को त्याग दे। जीवन शैली के अलावा जिस शैली के आदी हिंदू हैं, वह ऐसी है जिसे उनका धर्म प्रमाणित करता है। जो भी हो, वे तो ऐसा ही सोचते हैं। उनकी जीवन-शैली को बदलना उनके धर्म को बदलने जैसा ही है।
यह कैसे हो सकता है ? केवल तभी, जब यह अनुभव किया जाए कि अस्पृश्यों का त्रास ही हिंदुओं का अपराध है। हिंदुओं की धार्मिक मनोवृत्ति में इस क्रांति के लिए अस्पृश्यों को कितना इंजजार करना पड़ेगा? इसका उत्तर तो वही दें, जो भविष्यवाणी करने की योग्यता रखते हैं। इस बीच यह वांछनीय होगा कि उनकी दशा और उनके एवं उनके मित्रों के सामने आने वाली समस्याओं का वर्णन किया जाए।