Asprishy ka vidroh - Gandhi aur Unka anshan - Poona pact - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar - अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट -  लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर - Page 6 मुख्य मजकूराकडे जा

अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट -  लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 6 of 52
18 ऑक्टोबर 2023
Book
5,,7,1,13,,

III

     इस कहानी का दुखद या यों कहें कि चित्त तो क्षुब्ध कर देने वाला पक्ष यह है कि इन अभागे मानवों की दशा क्या वैसी होनी चाहिए, जैसी कि वह है, जबकि वे उच्च सभ्यता के बीच रहते और पलते आए हैं। निश्चय ही हर निष्पक्ष की यह प्रतिक्रिया होती है कि ऐसी सभ्यता में जरूर कोई बड़ी बुनियादी विकृति है, जिसके कारण यह इन सात करोड़ 95 लाख प्राणियों को मानवता के स्तर तक उठाने में असफल रही है।

     सभ्यता एक वरदान है। वह मानव व प्रकृति, कला व कौशल के ज्ञान का संचित भंडार है। वह एक नैतिक संहिता है, जो अपने साथियों के प्रति मानव के आचरण को विनियमित करती है। वह एक सामाजिक संहिता है, जो प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा पालन किए जाने वाले नियमों-विनियमों की व्यवस्था करती है। वह एक नागरिक संहिता है, जो शासक तथा शासित के अधिकारों का कर्तव्यों का प्रावधान करती है। वह एक आध्यत्मिक दर्शन है, जो लौकिक को अलौकिक से जोड़ता है। सभी प्रजातियों को यह सौभाग्य नहीं मिला है कि वे उसका पूर्णतम विकास कर सकें। अनके उसी अवस्था में हैं, जहां से उनका विकास होना शुरू हुआ था। अनेक प्रजातियां एक-दो कदम चल कर रुक गईं। अन्य केवल घेरे के भीतर चक्कर काट रही हैं। आस्ट्रेलिया और उसके आसपास छोटे-बड़े द्वीपों की आदिम जातियों के बारे में जब कुछ वर्षों पूर्व पहले-पहल पता चला तो पता चला था कि उन्हें थोड़ा-बहुत बोलना और आग जलाना आ गया था। वे मध्य युग की जंगली अवस्था से आगे नहीं बढ़ सकी थीं। हडसन खाड़ी क्षेत्र की आदिम जाति एल्लियापास्कस तथा कोलम्बिया घाटी के मूल निवासी तीर व कमान की अवस्था से आगे नहीं बढ़ सके। बर्तन बनाने, पशु पालने और लोहे को गलाने के बारे में वे कुछ नहीं जानते थे। मिस्र, बेबीलोनिया, असीरिया और यहां तक कि रोम तथा यूनान की सभ्यता भी केवल गतानुगतिका की सभ्यता है। इन देशों में तत्कालीन मानव ने उन्हीं साधनों के प्रयोग में प्रगति और सफलता प्राप्त की, जो उसे आदि मानव ने विरासत के रूप में दिए थे, जब वह जंगली अवस्था में था और इनकी सभ्यता के इतिहास में इन्हीं का ब्यौरा मिलता है। उन्होंने अपने पूर्वजों से प्राप्त सभ्यता में कुछ भी ऐसी प्रगति नहीं की, जिसे क्रांतिकारी कहा जा सके। उन्होंने केवल इतनी प्रगति की कि उनके पूर्वज जिस बात को फूहड़पने से करते थे, उसे वे बेहतर ढंग से करने लगे। यह प्रगति एक के बाद दूसरी अवस्था में तेजी से नहीं हुई। इसमें कोई शक नहीं कि जब पर्याप्त प्रगति करके मान 'बर्बर' कहलाया, उससे पूर्व वह अनेक युगों तक जंगली रहा। इसमें कोई भी संदेह नहीं कि जब मानव सभ्यता की निम्नतम अवस्था के अंतिम शिखर पर पहुंचा, उससे पूर्व बर्बरता के अन्य अनेक युग गुजरे। इन क्रमिक युगों की ठीक-ठीक कालावधि के बारे में तो केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है, लेकिन यह अनुमान निरापद हो सकता है कि यह अवधि एक लाख वर्ष की रही होगी।

asprishy ka vidroh - Gandhi aur Unka anshan - Poona pact - sabhyata yaa Ghor aasabhyata - Hindi Book Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

     निश्चय ही सभ्यता कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो आसानी से मिल सकती है। सभ्यता तो एक अत्यंत महत्वपूर्ण वस्तु है, न केवल एक पीढ़ी के लिए, बल्कि अगली पीढ़ी के लिए भी । विरासत में मिलने पर एक पीढ़ी की सभ्यता अगली पीढ़ी के लिए साधन बन जाती है। सामाजिक विरासत हर पीढ़ी के लिए अति आवश्यक है। यदि यह सामाजिक विरासत नष्ट हो जाए तो सारी की सारी प्रगति ठप्प हो जाएगी। किसी ने ठीक कहा, यदि धरती से श्री वेल्स का कोई पुच्छलतारा टकरा जाए और यदि उसके फलस्वरूप इस समय का हर जीवित प्राणी वह सब ज्ञान और आदतें गंवा बैठे जो उसने पिछली पीढ़ियों से प्राप्त की थीं, तो (भले ही खोज, स्मृति और अभ्यास की उसकी सभी शक्तियां ज्यों-की-त्यों बनी रहें) पृथ्वी की 9/10 जनसंख्या एक मास के भीतर और शेष 1/10 जनसंख्या की 99 प्रतिशत जनसंख्या छह मास के भीतर मर जाएगी। विचारों की अभिव्यक्ति के लिए उनके पास कोई भाषा नहीं होगी, केवल अस्पष्ट ध्वनियां रह जाएंगी। वे न नोटिस पढ़ सकेंगे और न ही मोटरकार और घोड़े दौड़ा सकेंगे। जब उन्हें प्यास लगेगी तो सैंकड़ों की संख्या में वे कुछ स्वभावतः तगड़े व्यक्तियों की अस्पष्ट चीखों के पीछे-पीछे भागकर नदी के घाट पर पहुंच जाएंगे और डूब मरेंगे। मनुष्य समय रहते अपने जीवन को सुरक्षित रखने के बारे में कुछ नहीं कर सकेंगे, वे अन्न उठाने, पशुओं को पालने, आग जलाने और अपने लिए कपड़े बनाने के उपाय नहीं सोच सकेंगे। जीवन को पुनः शुरू से प्रारंभ करना होगा। जो पीढ़ी अपनी सामाजिक विरासत को गंवा देगी, उसे आदिम जाति की भांति अपना जीवन पुनः जंगली फलों तथा कीड़ों पर निर्भर करना होगा। यह सिलसिला तब तक चलता रहेगा, जब तक कि वह नई सामाजिक विरासत संचित न कर ले। कुछेक हजार पीढ़ियों के बाद शायद वे कोई ऐसी चीज प्राप्त कर सकें, जिसे भाषा कहा जा सके, जिसे पशु-पालन और काश्तकारी की कोई कला कहा जा सके। हो सकता है कि वे धर्म या हमारे कुछ सरल यांत्रिक आविष्कारों या राजनीतिक युक्तियों जैसी कोई चीज पैदा कर लें या न भी कर लें। हो सकता है कि उनके पास कानून, आजादी, न्याय जैसे कोई सामान्य विचार हों या न हों। यह अंतर सामाजिक विरासत पैदा करती है और यह कोई मामूली अंतर नहीं ।

    यह सच है कि सभी का ऐसा सौभाग्य कहां कि वे सभ्य हो जाएं और जो ऐसे सौभाग्यशाली होते हैं भी, उन्हें भी सभ्यता धीरे-धीरे प्राप्त होती है और बीच-बीच में लंबे और उबाऊ विराम आते हैं। लेकिन यह भी सच है कि जो सभ्य हैं, उनकी सभ्यता मदद करने के स्थान पर रुकावट बन सकती है। हो सकता है कि वह गलत रास्ते पर चली जाए, हो सकता है कि वह नकली बुनियादों और नकली मूल्यों पर खड़ी हो। ऐसी सभ्यता समाज को जड़ और व्यक्ति को ठूंठ बना सकती है। ऐसी सभ्यता की बेड़ियां डालने और ऐसी सभ्यता के बोझ तले पिसने से तो बेहतर होगा कि ऐसी सभ्यता के बिना ही रहा जाए।

    हर देशभक्त हिंदू, डींग हांकता है कि हिंदू अथवा वैदिक सभ्यता दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यता है। हिंदू बार- बार बड़े जोरशोर और द्वेषपूर्ण घमंड से कहता है कि जब संसार की अन्य जातियां आदिम जामियों की भांति जीवन जी रही थीं और नंगी घूम रही थीं तो भारत सभ्यता की एक बड़ी ऊंची चोटी पर पहुंच चुका था। हिंदू यह भी कहता है कि उसकी सभ्यता में जन्मजात शक्ति है और इसी कारण वह आज तक जिंदा बची है, जब कि मिस्र, बेबीलोन, यहूदी, रोम और यूनान की सभ्यताएं मिट चुकी हैं। ऐसा नजरिया, भले ही कितना भी जायज हो, खास मुद्दे की अनदेखी करता है। खास मुद्दा यह नहीं है कि सभ्यता प्राचीन है और वह जिंदा रह सकी है।¹ खास मुद्दा यह है कि सभ्यता के क्या- क्या गुण हैं? क्या उसकी कोई उपयोगिता है? यदि वह बची रह सकी है तो किस स्तर पर जिंदा है? या यूं कहें कि असली सवाल यह है कि क्या हिंदू सभ्यता यानी उसकी सामाजिक परंपरा बोझ है या उससे कोई लाभ है और यह सभ्यता अपनी प्रगति और अपने विस्तार से समाज के विभिन्न वर्गों और व्यक्तियों को क्या कुछ देती है?

    मानव और प्रकृति विषयक ज्ञान में हिंदू सभ्यता की क्या देन रही है? अनेक देशभक्त हिंदुओं का यह विश्वास है कि मानव और प्रकृति के विषय में ज्ञान का आरंभ हिंदुओं से हुआ। यदि मान भी लिया जाए कि ऐसी ही है तो निश्चय ही यह अति अल्प विकसित अवस्था से आगे नहीं बढ़ सका। क्या कोई हिंदू, ठीक हो या गलत, यह कहेगा कि हिंदू भाषा - विज्ञान वहीं पर है, जहां पाणिनि और कात्यायन ने उसे छोड़ा था? यह वह गलत हो या सही, इस बात का खंडन कर सकता है कि दर्शन - शास्त्र वहीं पर है, जहां कपिल और गौतम ने उसे छोड़ा था? क्या वह कहेगा कि साहित्य वहीं पर है, जहां व्यास और बाल्मीकि ने उसे छोड़ा था? कहा जाता है कि अध्यात्म-विधा में तो हिंदू- चिंतन चरम उत्कर्ष प्राप्त कर चुका है। लेकिन देखिए हिंदू अध्यात्म के बारे में प्रो. हरदयाल क्या कहते हैं² :

     अध्यात्म-विधा भारत का कलंक रही है। उसने उसके इतिहास को चौपट किया है, उसे विनाश के गढ्ढे में धकेल दिया है। उसने उसके महापुरुषों को दयनीय स्थिति में डाल कोरा वितंडतावादी बना दिया है और उन्हें निरर्थक जिज्ञासा और चेष्टा के गलियारों में भटका दिया है। अनेक सदियों तक वह भारतीय विद्वानों के लिए मृगमरीचिका रही है। उसने कुतर्क को, कला और कपोल कल्पनाओं को ज्ञान में ऊंचे सिंहासन पर बैठा दिया है। उसने भारतीयों को इतना निकम्मा बना दिया है कि जिससे वे सैंकड़ों साल तक कोल्हू के बैल की भांति उसी पुराने ढर्रे पर चलते रहे। उसने उसके ऋषियों की दृष्टि की क्षीण कर दिया है, जिसके कारण ये झूठे बिम्बों को असलियत मान बैठे।.... वह अंहकार, आडंबर, वाक्जाल और क्षीण दृष्टि है। वह अपने स्फुट विचारों को भगवद् संदेश कहती है और अपने विलक्षण शब्दों के द्वारा सिद्धांतों का महान व अभेद्य भवन खड़ा करती है।...... उपनिषद उसकी यह व्याख्या करने का दावा करते हैं, जिसे जान लेने से सब-कुछ जान लिया जाता है। 'परब्रह्म' संबंधी यह मध्ययुगीन जिज्ञासा ही भारत की समूची उच्च अध्यात्म विद्या का आधार है। कल्पना की बेतुकी, उड़ानों, विचित्र भ्रांतियों और अंटशंट अटकलबाजियों से ग्रंथ-के-ग्रंथ भरे पड़े हैं। और हम हैं कि अभी तक नहीं समझ पाए हैं कि वे व्यर्थ हैं। 'समाधि' अथवा मूर्च्छा को आध्यात्मिक प्रगति का चरम बिंदु माना जाता है। यह कितने आश्चर्य की बात है कि मूर्च्छा की क्षमता को बुद्धिमत्ता का लक्षण माना जाए। यदि भावना प्रधान हो और विवेक गौण हो तो चेतना खो बैठना कौन बड़ी बात है। यही कारण है कि मामूली से मामूली उद्धिग्नता से भी महिलाएं बेहोश हो जाती हैं। लेकिन भारत में समाधि' योग का आठवां अंग या सीढ़ी है और उसे केल 'परमहंस' ही प्राप्त करता सकता है । है इजरील, क्या यही तुम्हारे देवता हैं, नकली रीति से उत्पन्न की गई असामान्य मनोदशा को ज्ञान प्राप्ति का संकेत मानना ऐसी गलती है, जो केवल भारतीय दार्शनिक ही कर सकते हैं।


1. देखिए, मेरी कृति 'एनीहिलेशन आफ कास्ट'
2. माडर्न रिव्यू, जुलाई 1912



     विज्ञान, कला और कौशल के क्षेत्र में हिंदू सभ्यता का योगदान अति आदिम स्वरूप का है। बुनाई, कताई आदि के कुछ क्षेत्रों को छोड़कर शेष में हिंदू सभ्यता ने ऐसी कोई तकनीक ईजाद नहीं की है, जो प्रकृति के विरुद्ध मानव के संघर्ष में उसकी मदद कर सके और वह ऐसा जीवन स्तर प्राप्त कर सके, जिसे बर्बर युग के स्तर से ऊंचा कहा जा सके। इसका कारण है। वैज्ञानिक और तकनीकी साधन हैं ही नहीं। पल्ले न पड़ने वाली समूची आध्यात्मिक बकवास हम पर थोपी जा रही है। अतः सभी युगों में इस देश को अकाल रौंदते रहे हैं। अज्ञान, अंधविश्वास आदि मन के विकार और मलेरिया, प्लेग आदि तन के विकास युग-युग से इस देश के लिए मानो कफन रहे हैं।

     धर्म और आचार-शास्त्र के क्षेत्र में हिंदुओं ने सर्वाधिक प्रयास किए हैं। उनका जो योगदान है, उसमें वे सबसे अधिक विकसित हैं। इसमें संदेह नहीं कि वे मनुष्य के लिए अति आवश्यक हैं। उसका सीधा सा कारण यह है कि वे मनुष्य के मन में विचार और कर्म के बीज बोते हैं। वे ही जीवन के प्रति मनुष्य के दृष्टिकोण को तराशते हैं। वे ही अपने साथी के प्रति मनुष्य के दृष्टिकोण को संवारते हैं। वे उसके आचरण एवं चरित्र को ढालने वाले सिद्धांत तय करते हैं। वे ही मनुष्य के मन में विवेक जैसे रहस्यमय बीज का आरोपण करते हैं। विवेक ही पहरेदार है और उसे गलत रास्ते पर नहीं जाने देता।

    जब हम इस हिंदू सभ्यता को उसके अपने धार्मिक दृष्टिकोण और उसके अपने जीवन-दर्शन की कसौटी पर कसते हैं तो हमें शंका होने लगती है कि क्या इस हिंदू सभ्यता का कोई लाभ उन पीढ़ियों को है, जिन्हें वह विरासत में मिलेगी ही? आदिम जातियों के जो ढाई करोड़ लोग इसकी परिधि में हैं, उन्हें यह सभ्यता क्या देती है ? इस सभ्यता की परिधि के बीच जरायम- पेशा जातियों के जो 50 लाख लोग रह रहे हैं, उन्हें यह सभ्यता क्या देती है? इस सभ्यता के अंतर्गत जो पांच करोड़ अस्पृश्य न केवल रह रहे हैं, बल्कि जिन्हें इस सहन करना पड़ रहा है, उन्हें वह क्या देती है ? ऐसी सभ्यता के बारे में आदिम जातियां क्या कहेंगी, जिन्हें उसने अपने में शामिल करने का कोई प्रयास नहीं किया है? ऐसी सभ्यता के बारे में जरायम- पेशा जातियां क्या कहेंगी, जिन्हें खदेड़कर उसने विवश कर दिया है कि वे अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए जुर्म को अपना धंधा बना लें? यदि वे कहें कि यह सभ्यता नहीं, अपितु सभ्यता के नाम पर कलंक है, तो क्या यह अनुचित होगा?

    जहां तक अस्पृश्यों का संबंध है, उनका तो सदैव दुर्भाग्य रहा है। हिंदू सभ्यता के अधीन पहले भी वे घोर अपमान और घोर अभाव की चक्की में पिसते रहे हैं, और भविष्य में भी उनके लिए आशा की कोई किरण नहीं है कि अस्पृश्यता की इस व्यवस्था में कितना घोर अपमान और कितना घोर अभाव मौजूद है। 1928 में दलित वर्गों तथा आदिम जातियों की शिकायतों की जांच करने के लिए बंबई सरकार ने जो कमेटी नियुक्त की थी, उसके विचार इस संबंध में अति संगत हैं। उसमें कहा गया है :

    यहां कोई विचित्र बात नहीं कि अस्वच्छ व्यक्ति या वस्तु घृणा पैदा करती है, क्योंकि यह प्रदूषण का आधार है। लेकिन जिस रीति से यह भावना (अस्पृश्यों) प लागू की जाती है, उसकी अतार्किकता खेदजनक है। वह किसी व्यक्ति पर केवल जन्म के आधार पर ही अस्पृश्य का ठप्पा लगा देती है। जो व्यक्ति अस्पृश्य के यहां पैदा हुआ है, वह अस्पृश्य ही रहता है, भले ही वह निजी सफाई के मामले में तथाकथित स्पृश्य से कितना भी स्वच्छ क्यों न हो। उसके सामने अपनी इस स्थिति से बच निकलने का कोई रास्ता नहीं होता। इस सबमें अचरज की बात तो यह है कि रूढ़िवादी हिंदू इस बात के बावजूद कि उसकी व मुसलमानों, पारसियों और ईसाइयों की धार्मिक धारणाओं, जीवन-शैली तथा जीवन-दृष्टि में अंतर होते हैं, उन्हें स्पृश्य मानता है। इस कारण ( अस्पृश्यों ) की स्थिति और खराब हो गई। रूढ़िवादी हिंदुओं के इस अनुचित भेदभाव के कारण कुछ मामलों में, खासकर गांवों में रूढ़िवादी हिंदुओं के प्रभाव में आकर मुसलमान, पारसी और ईसाई भी (अस्पृश्यों) के प्रति अस्पृश्यता का व्यवहार करते हैं, जब कि उनके धर्म तो इसके विपरीत शिक्षा देते हैं। हमें सबसे अधिक चिंता इस बात की है कि अस्पृश्यता में अलगाव और हीन भावना जैसी बुराइयां तो हैं ही, पर साथ ही उससे कुछ खास बुराइयां भी जुड़ी हुई हैं। तर्क की दृष्टि से देखा जाए तो रूढ़िवादी हिंदू समाज में अस्पृश्यता के कारण (अस्पृश्य) सरकारी स्कूल में दाखिला नहीं पा सकेगा, भले ही स्कूल का खर्च सरकार उठाती हो। उसके कारण वह सरकारी सेवाओं में नियुक्त नहीं हो सकेगा, भले ही वह उनके लिए योग्यता रखता हो। वह केवल उन्हीं सेवाओं को कर सकेगा, जो रूढ़ि के अनुसार उसके लिए नियत की गई हैं। उसके कारण वह उन सार्वजनिक स्थानों से भी पानी नहीं ले सकेगा, जिनका रखरखाव सरकारी खर्च से होता है । इस दृष्टि से देखा जाए तो अस्पृश्यता केवल सामाजिक समस्या नहीं है, यह एक सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक समस्या है और इसका सरोकार राज्य के नागरिक के अधिकारों के बुनियादी सवाल से है।

    यहां तो सिर्फ अस्पृश्यों की कठिनाइयां गिनाई गई हैं। लेकिन ये अस्पृश्य ही तो अपमान की जिंदगी नहीं बसर करते हैं। कुछ अन्य वर्ग भी हैं, और उनकी स्थिति और भी खराब है। अस्पृश्य उन्हें कहा जाता है, जो केवल शारीरिक स्पर्श से भ्रष्ट करते हैं। लेकिन ऐसे लोग भी हैं, जो तब भ्रष्ट करते हैं, जब वे निश्चित दूरी पर न रहकर पास आ जाते हैं। इन्हें सामीप्यवर्जित कहा जाता है। उनसे भी खराब स्थिति में वे लोग हैं, जिनको देखने मात्र से भ्रष्ट होने का पाप लग जाता है। ये दृष्टिवर्जित कहलाते हैं। नयाडी' लोग सामीप्यवर्जित लोगों की श्रेणी में आते हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि वे कुक्कुरभक्षी होते हैं और हिंदुओं में सबसे अधम जाति के हैं। भीख मांगने में वे सबसे ज्यादा हठी लोग हैं। वे किसी भी व्यक्ति का, चाहे वे पैदल चले, सवारी करे, नौका यात्रा करे, मीनों तक पीछा करेंगे और उससे दूर-दूर रहकर उसके पीछे-पीछे चलते जाएंगे। यदि उन्हें कोई चीज दी जाती है तो उसे भूमि पर ही रखना होगा और जब उसे देने वाला व्यक्ति पर्याप्त दूरी पर पहुंच जाएगा, तभी प्राप्त करने वाला व्यक्ति सहमता हुआ आगे बढ़ता है और उसे उठाता है। इन्हीं लोगों के बारे में श्री थर्स्टन कहते हैं: 'मैंने इन लोगों (नयाडियों) को शोरानूर में देखा है । ये लोग तीन मील दूर रहते थे। लेकिन ये लोग प्रदूषण के कारण जो ये सदियों से ओढ़े चले आ रहे थे, नदी पर बने विशाल पुल से न चलकर, मीलों के चक्करदार रास्ते से आते-जाते थे। '


1. मलाबर मैनुअल

Book Pages

Page 6 of 52