अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
मद्रास प्रेसिडेंसी के तिन्नेवल्ली जिले में दृष्टिवर्जित लोगों का ऐसा वर्ग है, जिसे पुराडा वन्ना कहते हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि 'दिन में उन्हें बाहर आने की अनुमति नहीं है, क्योंकि उन पर दृष्टि पड़ने से ही आदमी भ्रष्ट हो जाता है। ये अभागे लोग निशाचरों जैसा जीवन जीने के लिए विवश हैं। वे अंधेरे में अपनी मांद से बाहर निकलते हैं और पौ फटने के पूर्व ही लकड़बग्घे, बिज्जू की भांति अपने-अपने घरों की ओर लौट पड़ते हैं। '

सामीप्यवर्जितों तथा दृष्टिवर्जितों की क्या कठिनाइयां होंगी? वे अपना जीवन कैसे काटते होंगे? यदि उनका दर्शन या उनका सामीप्य भी सहन नहीं किया जाता तो वे क्या रोजगार कभी पा सकते हैं? भीख मांगने और कुत्ते का मांस खाने के अलावा वे कर भी क्या सकते हैं? निश्चय ही कोई भी सभ्यता इससे अधिक क्रूर नहीं हो सकती। वास्तव में यह महान दया है कि सामीप्यवर्जितों तथा दृष्टिवर्जितों की संख्या बहुत कम है। पर क्या ये पांच करोड़ अस्पृश्य किसी भी सभ्यता के अधिकारी नहीं हैं?
अस्पृश्य लोग अपनी दुर्दशा से बच नहीं सकते, क्योंकि वे स्पृश्य की भांति घूम-फिर नहीं सकते। निश्चय ही जिस गांव में वे रहते हैं, वहां के लोग उन्हें जानते - पहचानते हैं और जब तक वे वहां रहते हैं, वे जाली रूप धारण नहीं कर सकते हैं। यदि वे गांव छोड़कर शहर में आ जाते हैं तो हो सकता है कि वे स्पृश्य की भांति वहां घूम-फिर सकें। लेकिन वे जानते हैं कि यदि उनके बारे में पता चल गया तो उनकी कैसी दुगर्ति होगी ।
समाचारपत्रों में छपी निम्न घटना से कुछ अनुमान लग जाएगा कि जाली रूप धारण करने में कितना जोखिम होता है :
रूढ़िवादिता का पागलपन¹
'अस्पृश्यों' के प्रति कथित बर्बर व्यवहारः महार होने का अपराध
अहमदाबाद से श्री केशवजी रनछोड़जी वघेल ने बहिष्कृत हितकारिणी सभा के अध्यक्ष डा. भीमराव अम्बेडकर को सूचना दी है
बापूराव लक्ष्माण और उनके भाई कौराओ पिछले छह सालों से अहमदाबाद में रह रहे हैं। वे मराठा जाति के दक्कन से आए कुछ लोगों के साथ उठते-बैठते थे। दामू और लक्ष्मण नामक कौराओं के दो बेटे मराठों की भजन मंडलियों में हिस्सा लिया करते थे। लेकिन हाल में मराठों को पता चला कि दामू लक्ष्मण नामक दोनों भाई महार जाति के हैं और इस बारे में निश्चय करने के लिए सूरत और अहमदाबाद के बीच चलने वाली पार्सल ट्रेन में काम करने वाले दो महारों को दामू और लक्ष्मण को पहचानने के लिए खासतौर पर बुलाया गया। यह निश्चय कर लेने के बाद कि दामू और लक्ष्मण महार हैं, उन्हें इसी मास की 11 तारीख की आधी रात को कालूपुर, भंडारी पोल, में भजन मंडली के लिए बुलाया गया। जब पूछा गया कि वे किस जाति के हैं, दामू और लक्ष्मण ने उत्तर दिया कि वे सोमवंशी हैं। इस उत्तर से मराठे क्रुद्ध हो गए। मराठों ने उन्हें जी भर के गालियां दीं और कहा कि उन्होंने उनके व्यक्तियों और स्थानों को भ्रष्ट किया है। मराठों ने महार बंधुओं की ठुकाई व पिटाई की। एक भाई के पास सोने की अंगूठी थी। वह उससे जबरन छीन ली गई और उसे 11 रुपये में बेच दिया गया। इस रकम में से छह रुपये उस महार को अदा कर दिए गए, जिसे इन बंधुओं की पहचान के लिए सूरत से बुलाया गया था। दामू और लक्ष्मण ने मराठों से चिरौरी और विनती की कि उन्हें उनके घर लौटने दिया जाए। लेकिन मराठों ने कहा कि वे तभी जा सकते हैं, जब वे 500 रुपये का जुर्माना अदा कर दें। जब महार बंधुओं ने कहा कि वे इतनी बड़ी रकम तो नहीं दे सकते, तो एक मराठे ने सुझाव दिया कि महार बंधुओं पर केवल 125 रुपये का जुर्माना किया जाए । लेकिन एक मराठे ने जुर्माने के सुझाव का विरोध करते हुए कहा कि उन्हें केवल जुर्माने से संतुष्ट नहीं होना चाहिए, बल्कि अपनी जाति छिपाने के अपराध के लिए महार बंधुओं को कठोर दंड देना चाहिए। ऐसा निर्णय कर लेने के बाद महार बंधुओं को रोक लिया गया और सबेरे 9 बजे के लगभग उनका बर्बरतापूर्ण तिरस्कार किया गया। बाईं ओर से उनकी मूंछें और दाई ओर से उनकी भौंहें उस्तरे से साफ कर दी गई। उनके शरीरों पर तेल और मिट्टी में सनी कालिख पोत दी गई। उनके गलों में पुराने जूतों की मालाएं डाल दी गईं। उनमें से एक के हाथ में झाडू पकड़ा दी गई। दूसरे के हाथ में तख्ती पकड़ा दी गई। उस पर लिखा था कि अपराधियों को दंड इसलिए दिया गया कि उन्होंने उच्च जाति के लोगों को स्पर्श करने का दुस्साहस किया। महार बंधुओं का जुलूस निकाला गया। कोई 75 लोग उसमें साथ थे। आगे-आगे ढोल पीटा जा रहा था।
1. बॉबे क्रानिकल, 25 फरवरी, 1938
उक्त दोनों महार बंधुओं ने पुलिस से शिकायत की है। अभियुक्त ने अपने बयान में स्वीकार किया है कि दामू और लक्ष्मण के साथ कथित रीति से बर्ताव किया गया, लेकिन कहा कि शिकायत करने वालों ने स्वेच्छा से दंड भुगतना स्वीकार किया है। जाहिर है कि दामू और लक्ष्मण उस समय असहाय थे, जब उन्हें गालियां दी गईं, मारा व पीटा गया, कठोर दंड की धमकी दी गई और वस्तुतः बर्बरतापूर्वक उनका तिरस्कार किया गया। इस मामले में तथाकथित अस्पृश्य जातियों के लोगों में भारी सनसनी पैदा कर दी है। शिकायत करने वालों को समुचित कानूनी मदद देने के प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन अस्पृश्यता के बारे में इस हिंदू सभ्यता के नियम इतने सूक्ष्म हैं कि वे इस बात की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ते कि अस्पृश्य लोग अस्पृश्य होने का दिखावा कर सकें। अतः कतिपय इलाकों में ऐसे नियम हैं, जिनके अनुसार अस्पृश्यों से अपेक्षा की जाती है कि वे काला धागा पहनें, ताकि उन्हें सरलता से पहचाना जा सके और बोलकर घोषणा करें कि वे अस्पृश्य हैं, ताकि स्पृश्य अनजाने में उन्हें स्पर्श करके भ्रष्ट न होने पाएं। बंबई प्रेसिडेंसी में द्वारिका नगर में महान हिंदू देवता कृष्ण का विख्यात मंदिर है। वहां का नियम है कि सड़कों पर चलते समय हर अस्पृश्य को अपने हाथों से ताली बजानी होगी और कहना होगा, 'बचो, बचो' ताकि इस बात की घोषणा हो सके कि वह अस्पृश्य है और स्पृश्य सावधार हो जाएं। मद्रास प्रेसिडेंसी के चेरुमानों के बारे में निम्न विवरण उपलब्ध है :
इन दयनीय प्राणियों की सामाजिक स्थिति बहुत घटिया है। जब कोई चेरुमान उच्च जाति के किसी व्यक्ति से मिले तो उसे 30 फुट की दूरी पर ही खड़ा रहना होगा। यदि वह इस निषिद्ध दूरी के भीतर आ जाता है तो उसके सामीप्य से भ्रष्टता होगी और वह जल से स्नान करने पर ही दूर होगी। चेरुमान, ब्राह्मणों के किसी गांव, मंदिर या पोखरे पर नहीं जा सकता। यदि वह जाता है तो शुद्धि जरूरी हो जाती है। आम सड़क पर चलते समय भी यदि वह अपने स्वामी को देख लेता है तो उसे आम रास्ता छोड़ना होगा और भले ही कीचड़ हो, उस पर चलना होगा, ताकि वह अकस्मात अपवित्र करने के लिए स्वामी के कोप से बच सके। राहगीर अपवित्र न हो जाए, इसके लिए वह इस अप्रिय ध्वनि को दोहराता है - 'ओ, ओह, ओ'। कुछ स्थानों में, जैसे पालघाट में, हम देख सकते हैं कि चेरुमान सड़क के किनारे गंदा कपड़ा फैलाकर तीखी आवाज में चिल्लाता है, 'मुझे कुछ पैसे दो और उन्हें कपड़े पर फेंक दो।' कोचीन और ट्रावनकोर के देशी राज्यों में उनकी स्थिति असहनीय है। वहां ब्राह्मण का प्रभाव प्रबल है। और पालघाट तालुक में तो आज भी चेरुमान बाजार में कदम नहीं रख सकता । मलाबार में कहा जाता है,¹ 'उच्च जाति का व्यक्ति चलते-चलते कभी-कभी जोर से चिल्लाता है, ताकि निम्न जाति का व्यक्ति सड़क से हट जाए और उसे अपवित्र न कर पाए। जब निम्नतम जातियों के लोग चलते हैं तो वे चिल्लाते हैं, ताकि अपवित्रता की छाप वाली अपनी उपस्थिति का भान करा सकें और उच्च जाति के व्यक्ति के आदेश को सुनकर सड़क से हट जाएं। आम तौर पर देखा जा सकता है कि छोटी जाति के लोग सड़क के समानांतर चलते हैं और उस पर चलने का साहस नहीं करते । '
1. थर्स्टन, ट्राइब्स एंड कास्ट्स आफ सदर्न इंडिया, खंड 5, पृ. 196
इन अभागी आत्माओं की यह कैसी अधोगति एवं दुर्गति है कि उन्हें इस हिंदू सभ्यता ने सामाजिक कुष्ठी बना दिया है। उन्हें अस्पृश्य कहा जाता है। क्या यह स्वयं में कम दुर्भाग्यपूर्ण है? लेकिन यह अपेक्षा करना कि अस्पृश्य स्वयं अपने ही मुख से अपनी लज्जा का ढोल पीटे कि वह अस्पृश्य है, ऐसी क्रूरता है, जो मेरी राय में तो बेमिसाल है। इस हिंदू सभ्यता के बारे में अस्पृश्य क्या कहेगा। क्या यह गलत होगा, यदि वह कहे कि यह सभ्यता नहीं, यह तो घोर असभ्यता है?
इस बारे में तो किसी भी प्रकार का संदेह नहीं किया जा सकता है कि आदिम जातियों, जरायम- पेशा जातियों और अस्पृश्य वर्गों की जो दशा है, वह हिंदू सभ्यता के मूल सिद्धांतों का ही कुफल है।
इन आदिम जातियों को हिंदुओं की परिधि में लाने के लिए कोई आंदोलन क्यों नहीं चलाए गए हैं?
कतिपय जनजातियों ने जुर्म को अपना पेशा क्यों बना लिया है ? अस्पृश्यों जैसे कतिपय वर्गों को मानव संसर्ग के अयोग्य क्यों ठहराया गया है?
इन प्रश्नों में से हरेक का उत्तर हिंदू सभ्यता के किसी-न-किसी मूल सिद्धांत से जुड़ा है।
प्रथम प्रश्न का उत्तर है कि वर्ण-व्यवस्था हिंदू धर्म को सेवाव्रती (मिशनरी) धर्म बनने से रोकती है और वर्ण (जाति) हिंदू सभ्यता का मूल अंग है। दूसरे प्रश्न का उत्तर है कि चातुर्वर्ण्य उन अवसरों पर अंकुश लगाता है, जो व्यक्ति सम्मानजनक जीवन जीने के लिए प्राप्त कर सकता है। समूचे ज्ञान और ज्ञानार्जन पर ब्राह्मणों का एवं सभी सामरिक सेवाओं पर क्षत्रियों का एकाधिकार है। व्यापार केवल वैश्य ही कर सकते हैं। शूद्रों के भाग्य में है, केवल दास-कर्म । जो इस वर्ण-व्यवस्था से बाहर है, उनके लिए कुछ भी सम्मानजनक कर्म शेष नहीं रहा है। अतः उन्हें विवश होकर अपना पेट भरने के लिए जुर्म का धंधा और अपमानजनक तरीके अपनाने पड़े हैं। यह है चातुर्वर्ण्य का दुष्परिणाम और चातुर्वर्ण्य हिंदू सभ्यता का मूलाधार है।
तीसरे प्रश्न का उत्तर है कि अस्पृश्यता 'स्मृतियों' में वर्णित हिंदू कानून का अंग है और 'स्मृतियां' हिंदू सभ्यता की मूलाधार हैं।