Asprishy ka vidroh - Gandhi aur Unka anshan - Poona pact - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar - अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट -  लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर - Page 4 मुख्य मजकूराकडे जा

अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट -  लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 4 of 52
18 ऑक्टोबर 2023
Book
5,,7,1,13,,

II

     यह खेद की बात है कि प्रो. मैक्स मूलर कभी भारत नहीं आए। सिद्धांत और यथार्थ में कितना अंतर होता है, इसे देखने के बाद वह संभवतः अंतर को स्पष्ट कर सकते थे। फिलहाल यह अंतर एक पहेली बना हुआ है।

     यह अंतर उस ब्रह्म सिद्धांत के बावजूद है, जिसकी दुहाई देते हुए ब्राह्मण यह कहते हैं कि ब्रह्म सभी प्राणियों में व्याप्त है और सभी प्राणियों में उसका वास है। यदि ब्राह्मण में ब्रह्म का वास है तो वह आदिवासी, जरायम- पेशा और अस्पृश्य में भी तो हैं? इन दो तथ्यों में, अर्थात् ब्रह्म सिद्धांत और उसके विपरीत आदिम जातियों, जरायम- पेशा जातियों और अस्पृश्य जातियों के अस्तित्व में किस प्रकार हो सकता है ?

Asprishy ka vidroh - Gandhi aur Unka anshan - Poona pact - sabhyata yaa Ghor aasabhyata - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar     इस दलित वर्ग की तीन अलग-अलग कोटियां हैं। एक कोटि उन लोगों की है, जिन्हें आदिम जातियां कहते हैं। दूसरी कोटि जरायम पेशा वर्गों की सूची में शामिल जातियों की है। एक अलग तथा तीसरी श्रेणी उन लोगों की है, जिसे अस्पृश्य वर्ग कहते हैं।

     इन तीनों कोटियों के लोगों की संख्या कुद कम नहीं है। 1931 की जनगणना के अनुसार भारत में आदिम जातियों के लोगों की कुल संख्या दो करोड़ 50 लाख है। अब जरायम- पेशा के रूप में सूचीबद्ध जरायम- पेशा वर्गों की कुला संख्या कोई 45 लाख है। 1931 की जनगणना के अनुसार अस्पृश्यों की कुल संख्या समग्र भारत में पांच करोड़ है। कुल मिलाकर इन लोगों की संख्या सात करोड़ 95 लाख है। अब प्रश्न यह है कि इन सात करोड़ 95 लाख लोगों की स्थिति क्या है?

     पहले आदिम जातियों को लें। उनकी सभ्यता किस अवस्था में है?

     उन्हें जो यह आदिम जाति नाम दिया गया है, उससे ही उनकी वर्तमान दशा का पता चल जाता है। वे वनों में यत्र-तत्र छोटी-छोटी झोंपड़ियों में रहते हैं। वे जंगली फल, कंद व मूल खाते हैं। भोजन के लिए वे मछली और वन्य जंतुओं का शिकार भी करते हैं। उनकी सामाजिक अर्थव्यवस्था में खेती का नगण्य स्थान है। खाद्य सामग्री का वहां नितांत अभाव है। अतः उन्हें भरपेट भोजन नसीब नहीं होता। यह उनकी नियति है । वे लगभग पूर्ण नग्न अवस्था में रहते हैं। बोंडा पोराज नामक एक आदिम जाती है। बोंडा पोराज का अर्थ ही है 'नग्न पोराज'। इन लोगों के बारे में कहा जाता है कि इनकी महिलाएं एक टुकड़ा लपेटे रहती हैं, जो पेटीकोट का काम करता है। वह वैसा ही होता है, जैसा कि असम के मोमजाक नागा लोग पहनते हैं। उसके सिरे बाईं जंघा के ऊपर बड़ी मुश्किल से बंधा पाते हैं। ये पेटीकोट जंगली पेड़ की छाल के रेशे से घर पर ही बुने जाते हैं। लड़कियां अपने बगलों में ताड़ के पंख और मनके लगाकर चोटियां गूंधती हैं। वे अपने गले में ढेर सारे मनके की मालाएं और अन्य आभूषण ठीक उसी प्रकार धारण करती हैं, जिस प्रकार कि अनेक मोमजाक महिलाएं धारण करती हैं। इसके अलावा महिलाएं कुछ भी नहीं पहनती। महिलाएं अपने सिर को पूरी तरह मुंडवाती हैं। ... निजाम के राज्य में फरहाबाद के पास रहने वाली चेंचु नामक एक जाति के बारे में कहा जाता है कि उनके घर शंकु के आकार के छोटे-छोटे होते हैं। शंकु के शीर्ष से ढाल देकर चारों ओर नीचे तक बांस की लंबी पट्टियां लगी होती हैं और इन्हें घासफूस से ढक दिया जाता है, जो छप्पर का काम करता है । ...माल-मते के रूप में उनके पास कुछ नहीं होता। वे नाममात्र के कपड़े पहनते हैं। पुरुष लंगोटी और कच्छा पहनते हैं और महिलाएं एक छोटी-सी अंगिया और पेटीकोट पहनती हैं। यही उनके वस्त्र होते हैं। इसके अलावा खाना पकोन के कुछ बर्तन और एक-दो टोकरियों होती हैं। कभी-कभी उनमें अनाज रखा होता है। वे पशु और बकरियां पालते हैं। केवल इसी गांव में थोड़ी-बहुत खेती होती है। अन्यत्र वे अपने निर्वाह के लिए शहद और जंगलों में पैदा होने वाली सामग्री पर निर्भर रहते हैं, जिन्हें वे बेचा करते हैं। मोरिया नामक एक अन्य आदि जाति के बारे में कहा जाता है कि पुरुष सामान्यतः कमर के नीचे घुटने के ऊपर तक धोतीनुमा अंगोछा बांधे रहते हैं, जिसका पल्ला सामने लटका रहता है। वे मनकों की माला भी पहनते हैं, और नृत्य करते समय वे अपने साफों में मुर्गे और मोर के पंख खोंस लेते हैं। अनेक लड़कियां अपने शरीर को, विशेषतः अपने चेहरे को गुदवा लेती हैं। कुछ तो अपनी टांगों पर भी गुदने गुदवा लेती हैं। किये गुदने निज़ी रुचि के अनुसार विभिन्न आकृतियों के होते हैं। गोदने का यह काम सुई और कांटे से किया जाता है। उनमें से अनेक अपने बालों में जंगली मुर्गों के पंख लगा लेती हैं। वे अपने सिर लकड़ी के कंघों, टीन और पीतल से भी सजा लेती हैं।

     इन आदिम जातियों को खाने के मामले में कोई परहेज नहीं होता। ये कीड़े-मकोड़े तक खाती हैं। वास्तव में किसी तरह का शायद ही कोई मांस हो, जो ये नहीं खातीं। ये मरे हुए जानवर का भी मांस खा लेती हैं, चाहे वह अपनी मौत से मरा हो या चाहे वह चीते के द्वारा चार-पांच दिन पहले मरा हुआ क्यों न हो।

     सभी प्रकार के भूत-प्रेतों और अपने मरे बाप-दादाओं की पूजा करना ही उनका धर्म है। जादू-टोना, झाड़-फूंक, पशुओं और मानवों की बलि चढ़ाना इनके धार्मिक विधान हैं।

     ये आदिम जातियां शिक्षा का पूर्ण अभाव होने, विज्ञान की कुछ भी भनक न होने, प्रकृति के कार्यकलाप की कुछ भी जानकारी न होने, अज्ञान और अंधविश्वास से ग्रस्त होने के कारण सभ्यता की सीमा रेखा से बाहर और उसकी स्थापित व्यवस्था के अनुसार सदियों से जंगली जीवन बिताती आ रही हैं।

     कभी पिंडारियों और ठगों को भी जरायमपेशा जाति कहा जाता था, जिनके बड़े-बड़े दल होते थे।

     पिंडारी लोग हथियारबंद डकैत होते थे, इनका काम लूटपाट करना था। उनका संगठन लुटेरों का खुला सैन्य संगठन था। उनके पास 20,000 या उससे भी अधिक बढ़िया घोड़े होते थे। उनका एक मुखिया होता था। इनमें चित्तू एक सर्वाधिक शक्तिशाली मुखिया था। अकेले उसी के पास 10,000 घोड़े थे, जिसमें 5,000 बढ़िया घुड़सवार थे। इसके अलावा उसके पास पैदल और तोपें भी थीं। इस विशाल सैन्य बल को काम देने के लिए पिंडारियों के पास कोई फौजी योजना तो थी नहीं। अतः इनका विकास पेशेवर लुटेरों के गिरोहों में होता गया। उनका ध्येय किसी को जीतना नहीं था। इनका ध्येय तो लूटपाट कर अपने लिए माल और नकदी प्राप्त करना था। लूटमार और लूटपाट ही उनका धंधा था। वे किसी को अपना शासक नहीं मानते थे। वे किसी के अधीन नहीं थे। किसी के प्रति वे वफादार नहीं थे। वे किसी का भी आदर नहीं करते थे। उच्च हो या नीच, गरीब हो या अमीर, वे सभी को बिना किसी डर और दया के लूटते थे।

     ठग¹ पेशेवर हत्यारों की सुसंगठित जाति थी। वे भारत भर में अलग-अलग वेष में 10 से लेकर 200 तक की टोलियों में घूमते थे। वे धनी वर्ग के राहगीरों का विश्वास प्राप्त कर लेते थे। जैसे ही उन्हें कोई अनुकूल अवसर मिलता था, वैसे ही वे इन राहगीरों के गले में कपड़े या रस्सी का फंदा डालकर उनका गला घोंटकर उन्हें मार डालते थे और उनका सारा माल छीनकर उनके शव को जमीन में गाड़ देते थे। वे यह सब काम कतिपय प्राचीन तथा कड़ाई के साथ निश्चित रीति के अनुसार और विशेष धार्मिक अनुष्ठान के बाद करते थे, जिसमें कुल्हाड़ी की पूजा और गुड़ के द्वारा हवन किया जाता था। वे काली के कट्टर भक्त होते थे, जो हिंदुओं में बलि की देवी मानी जाती है। किसी भी लाभ के लिए हत्या करना उनकी दृष्टि में पुण्य कार्य था। उसे वे पवित्र और सम्मानजनक पेशा समझते थे। वास्तव में उन्हें बुरे - भले का कोई ज्ञान नहीं था और उनके मन में नैतिकता जागृत ही नहीं होती थी। वे इसी देवी के आदेश से और इसी देवी के निमित्त अपना सारा कारोबार करते थे। इस देवी की इच्छा उन्हें अनेक गूढ़ संकेतों से ज्ञात हो जाती थी। इन संकेतों के अनुपालनार्थ वे अपने शिकार के साथ-साथ या उसके पीछे-पीछे सैंकड़ों मील की यात्रा करते थे और जब भी मौका मिलता था, तब वे अपना काम पूरा करते थे। काम के हो जाने पर वे अपनी अधिष्ठाती देवी के सम्मान में अनुष्ठान करते थे और लूट का अधिकांश भाग उसके लिए अलग से रख देते थे। ठगों की अपनी एक गुप्त भाषा और कुछ चिह्न होते थे। इन्हीं के द्वारा वे भारत के दूरदराज के क्षेत्रों में भी एक-दूसरे को पहचान लेते थे। जो ठग बुढ़ापे के कारण ठगी के कार्यों में सक्रिय रूप से हिस्सा नहीं ले सकते थे, वे भी इस धंधे में मदद करते थे। वे पहरेदारी या जासूसी करते थे या रसोइए का काम करते थे। उनका एक भरा-पूरा संगठन होता था। वे इसी कारण गुप्त रूप से और सुरक्षापूर्वक काम करते थे। ये मुख्यतः धार्मिक वेश में रहते थे, जिसके कारण ये हत्याएं करने पर भी अपने को बचा लेते थे। इसी कारण वे सदियों लूटपाट का अपना यह धंधा चलाते रहे। विशेष बात यह थी कि भारत के शासक, चाहे वे हिंदू थे या मुसलमान 'ठगी' को नियमित धंधा मानते थे। ठग राज्य को हमेशा कर देते थे और राज्य की ओर से उनके साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होती थी ।


1. एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका 11 वां संस्करण, खंड 26, पृ. 896

Book Pages

Page 4 of 52