Asprishy ka vidroh - Gandhi aur Unka anshan - Poona pact - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar - अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट -  लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर - Page 3 मुख्य मजकूराकडे जा

अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट -  लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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18 ऑक्टोबर 2023
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सभ्यता या घोर असभ्यता

     I. भारत की जनता के विषय में एक और दृष्टिकोण,

     II. उसके द्वारा दलित वर्ग का निरूपण : (क) आदिम जनजातियां, (ख) जरायम- पेशा जातियां, और (ग) अस्पृश्य वर्ग,

     III. इन वर्गों की स्थिति पर हिंदू सभ्यता का प्रभाव, और

     IV. इन वर्गों की विभिन्न समस्याएं ।

     आमतौर पर भारत की आबादी का वर्गीकरण भाषाई या धार्मिक आधार पर किया जाता है। भारत के लोगों के वर्गीकरण के ये ही दो आधार हैं, जो काफी अर्से से व्यवहारित होते आ रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप विदेशियों के मन में यह बात बैठ गई है कि भारतवासियों के बारे में जानने योग्य और महत्वपूर्ण बात यह है कि वे किस धर्म का पालन करते हैं और वे कौन-सी भाषा बोलते हैं। इस सीमित दृष्टिकोण के कारण वे भारत में प्रचलित धर्मों और भाषाओं की जानकारी से ही संतुष्ट हो जाते हैं। जिस किसी विदेशी धर्म में रुचि होती है, वह केवल यह बात याद रखता है कि भारत में जो लोग हैं, वे या तो हिन्दू हैं या मुसलमान हैं या वह यह याद रखता है कि भारत में जो लोग बसते हैं, उनमें से कुछ मराठी बोलते हैं, कुछ गुजराती, कुछ बांगला और कुछ तमिल आदि भाषाएं बोलते हैं। sabhyata ya Ghor asabhyataa - Asprishy ka vidroh - Gandhi aur Unka anshan - Poona pact - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

     भारत के लोगों के वर्गीकरण के जो आधार हैं, उनमें से धार्मिक वर्गीकरण किसी विदेशी को अधिक प्रभावशाली और आर्कषक लगता है। इसलिए वह भाषाओं के मुकाबले धर्मों में अधिक रुचि लेता है। लेकिन फिर भी वह भारत के सभी धार्मिक संप्रदायों से परिचित नहीं होता है। वह केवल हिंदुओं और मुसलमानों को जानता है। वह कभी-कभी सिखों के बारे में सुनता है, भूले-भटके वह ईसाइयों के बारे में सुनता है, भले ही उनकी संख्या बढ़ती जा रही है, और बौद्धों के बारे में तो उसे कभी कोई जानकारी नहीं हो पाती, जिनका जहां तक आज के भारत का संबंध है, निश्चय ही कोई अस्तित्व नहीं है । ¹

     विदेशियों के मन में यह धारणा बैठ गई है कि भारत मे केवल हिंदू और मुसलमान हैं और अन्य के बारे में सिर खपाने की कोई जरूरत नहीं है। इस प्रकार की धारणा का होना अत्यंत स्वाभाविक है। सारे देश में हिंदू-मुस्लिम दंगों की चर्चा है। यह स्थिति कितनी गंभीर है, उसका अनुमान तो इस बात से लगाया जा सकता है कि हाल के वर्षों में कितने अधिक हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए और उनमें कितने अधिक लोग हताहत हुए।

     लेकिन यह संघर्ष अपनी-अपनी हुकूमत के लिए संघर्ष है। ऐसे भी हिंदू हैं, जो भारत में हिंदू राज स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिसमें मुसलमानों की हैसियत केवल अधीनस्थों की होगी। ऐसे मुसलमान भी हैं, जो सब जगह इस्लाम धर्म के होने का सपना देख रहे हैं। वे भारत को एक मुस्लिम साम्राज्य का अंग बनाना चाहते हैं, जिसमें हिंदुओं के लिए एक ही विकल्प होगा कि व या तो 'कुरान' को स्वीकार कर लें या फिर मौत को । इन को कट्टर विचारधारा वाले लोगों के बीच में ऐसे नरम लोग हैं, जो ऐसा राज्य चाहते हैं, जिसमें हिंदू और मुसलमान दोनों बराबर के साझीदार की भांति रह सकते हैं। यह तो केवल सयम ही बता सकता है कि कौन सफल होगा, कट्टरपंथी या उदारपंथी । फिलहाल अखबारों की सुर्खियां दोनों तरफ से किए जाने वाले खून-खराबों से भरी रहती हैं। लेकिन इस सबके बावजूद मैं यह सोचता हूं कि ऐसे अनेक लोग हैं, जिन्हें हिंदुओं और मुसलमानों के इस संघर्ष में अधिक दिलचस्पी नहीं है। बहरहाल, यह हुकूमत हासिल करने का संघर्ष है। यह मुक्ति प्राप्त करने का संघर्ष है। यह एक-दूसरे पर हुकूमत हासिल करने का संघर्ष है। उनकी अधिक रुचि उन दलितों के संघर्षों में होगी, जो स्थान प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इंग्लैंड में विगों और टोरियों के बीच पुराने विवाद का वर्णन करते हुए फ्रांसिस प्लेस ने विगों की राजनीतिक नीति के बारे में कहा था कि वे एक ओर राजा को और दूसरी ओर जनता को कुचलना चाहते थे। वे अभिजात वर्ग का शासन चाहते थे। इस समय जो हिंदू तथा मुसलमान संघर्ष कर रहे हैं, वे भारतीय राजनीति में वही नीति अपना रहे हैं। वे अपने-अपने वर्ग को शासक - वर्ग के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। जनता चाहे मुसलमान हो या हिंदू, उसका इस्तेमाल तो वर्ग विशेष की स्थापना के लिए केवल हथियार के रूप में किया जाता है। वर्तमान संघर्ष तो वर्गों का संघर्ष है, न कि जनता का ।


1. कलकत्ता महाबोधि सोसाइटी उनके पुररुद्धार का अति क्षीण प्रयास कर रही है (यह तथा अन्य सूचना भारत की जनगणना 1931 खंड 1 भाग 3, से ली गई है)।


     जिन लोगों की जन-आंदोलनों में रुचि है, उन्हें भारत के लोगों के प्रति एक दूसरा दृष्टिकोण अपनाना होगा। उन्हें केवल धार्मिक दृष्टिकोण अपनाना छोड़ देना चाहिए। उन्हें भारत के लोगों के प्रति सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टिकोण भी अपनाना होगा। इसका अर्थ नहीं कि हमें यह जानने का प्रयास नहीं करना चाहिए कि धर्म ने भारत के लोगों के आर्थिक और सामाजिक जीवन को किस प्रकार प्रभावित किया है। यदि धर्म को ध्यान में न रखा जाए तो वास्तव में भारत के लोगों का कोई भी अध्ययन, चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान, उनके जीवन का पर्याप्त चित्रण नहीं कर सकता। इसका कारण है। भारत में धर्म उसी प्रकार सर्वोपरि है, जिस प्रकार यूरोप में मध्य युग में रोमन कैथोलिक चर्च था। ब्राइस¹ ने लोगों के जीवन पर चर्च के प्रभुत्व का जिन शब्दों में वर्णन किया है, वह यहा उल्लेखनीय है, 'चर्च का जीवन, चर्च के लिए जीवन, चर्च के माध्यम से जीवन, वह जीवन जिसे चर्च प्रातः कालीन सामूहिक प्रार्थना सभा में आशीर्वाद और सांध्यकालीन प्रार्थना सभा में शांति प्रदान करता है, जीवन जिसे चर्च निरंतर होने वाले धार्मिक संस्कारों से पुष्ट करता रहता है, पाप की स्वीकारोक्ति से राहत प्रदान करता है, तप से उसे शुद्ध करता है, चिंतन और उपासना के लिए मूर्त प्रतीक प्रस्तुत कर उसे चेतावनी देता रहता है, यह था वह जीवन जिसे मध्य-युग के अनगिनत लोगों ने मानव का धर्मपरायण जीवन समझा था, अनेक लोगों का यही वास्तविक जीवन था, उनका सर्वमान्य आदर्श था ।

     आज भारत के लोगों के जीवन पर धर्म जिस प्रकार हावी है, वह स्थिति चर्च की उस स्थिति से लेशमात्र भी भिन्न नहीं है, जो मध्य युग में उसकी लोगों के जीवन में थी। अतः धर्म को ध्यान में न रखना भूल होगी। लेकिन यह सोचना भी उतना ही ठीक है कि धार्मिक दृष्टिकोण कोरा सतही चित्र प्रस्तुत करेगा। अतः यह जानना अधिक महत्वपूर्ण है कि सामान्य जनता और उसके विभिन्न वर्ग के लोग भारत में किस प्रकार का जीवन यापन करते हैं? उनके सामूहिक जीवन की सामाजिक अनिवार्यताएं और आर्थिक जरूरतें क्या हैं? कहां तक वे धर्म से प्रभावित हैं। हिंदू समाज के दायरे में आने वाले विभिन्न वर्ग के लोग जिस प्रकार का सामाजिक जीवन जीते हैं, उसमें इस प्रश्न का उत्तर हमें मिल जाता है।


1. होली रोमन एम्पायर, पृ. 367

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