Hindu Dharm Ki Paheliyan - dr Bhimrao Ramji Ambedkar - हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर - Page 84 मुख्य मजकूराकडे जा

हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 84 of 92
25 ऑगस्ट 2023
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चौबीसवीं पहेली

कलियुग की पहेली

     कालगणना की जो इकाईयां हिंदुओं में प्रयुक्त हैं, उनकी ओर लोगों का सम्यक ध्यान नहीं जाता कि उनकी विशिष्टता क्या है? यह ऐसा विषय है जो पुराणों से संबद्ध है। उनके अनुसार काल गणना के पांच माप हैं: 1. वर्ष, 2. युग, 3. महायुग, 4. मन्वंतर और 5. कल्प। हम इन इकाईयों के संबंध में विष्णु पुराण पर आते हैं। वर्ष से आरम्भ करें। विष्णु पुराण ने इसे किस प्रकार गिना हैं : '

Kaliyuga Ki Paheliyan - Hindu Dharm Ki Paheliyan - Riddle of Hinduism - dr Bhimrao Ramji Ambedkar     “हे ऋषि श्रेष्ठ ! पन्द्रह बार पलक झपकने पर एक काष्ठ पूर्ण होता है। तीस कलाओं से एक महूर्त, तीस मुहूर्तों से एक मानवीय दिन और रात। ऐसे तीस दिनों से एक महीना बनता है। उसके दो पक्ष होते हैं, 6 मास से एक आयण (उत्तरायण, दक्षिणायण) बनता है और दो आयणों से एक वर्ष बनता है । "

     विष्णु पुराण में ही एक अन्य स्थान पर यही व्याख्या विस्तार से दी गई है :-

     पन्द्रह बार पलक झपकने (निमेधों) से एक काष्ठ, तीस काष्ठ से एक कला, तीस कलाओं से एक मुहूर्त (अड़तालीस मिनट), तीस मुहूर्तों से एक दिन और रात, उनका समय चाहे घटता-बढ़ता रहे। यह कहा गया है कि संध्या घटने-बढ़ने की दशा में भी वही रहती है। उसका एक ही मुहूर्त होता है। परन्तु जिस समय सूर्य की परिधि को तीन मुहूर्त के लिए रेखांकित किया जाए, वह मध्यांतर प्रातः कहलाता है। जो दिवस का पंचमांश होता है। अगला भाग अर्थात् प्रातः के पश्चात् के तीन मुहूर्त संगव (पूर्वाह्न) होता है। अगले तीन मुहूर्त मध्याह्न होते हैं, उसके पश्चात् के तीन मुहूर्त अपराह्न अथवा संध्या होते हैं और दिन के पन्द्रह मुहूर्तों को पांच समान भागों में विभक्त किया है ।


1. विष्णु पुराण, विल्सन, पृ. 22-3
2. वही।


रिडल आफ कलियुग का यह दूसरा पाठ है। हमें इसकी कार्बन प्रति मिली है। इसमें लेखक के संशोधन नहीं हैं। यह अध्याय 40 पृष्ठों का है  - संपादक


     तीस-तीस मुहूर्तों के पन्द्रह दिनों से एक पक्ष बनता है चन्द्र पक्ष दो पक्षों से एक मास, दो मास से षट ऋतु की एक ऋतु, तीन ऋतुओं से एक आयण अर्थात् उत्तरायण अथवा दक्षिणायण, और दो आयणों से एक वर्ष बनता है।

     विष्णु पुराण में युग की परिकल्पना इस प्रकार की गई है : ¹

     "बारह हजार दैवी वर्षों ( एक में तीन सौ साठ ) से चार युग बनते हैं, उनका विवरण इस प्रकार है: कृत युग में चार हजार दैवी वर्ष, त्रेता में तीन हजार, द्वापर में दो हजार और कलियुग में एक हजार । यह प्रचीन गणना के समान है। "

     “प्रत्येक युग से पूर्व एक संध्या होती है। यह कई सौ वर्षों की होती है क्योंकि एक युग में हजार वर्ष होते हैं। युग के पश्चात् संध्यांश आता है। उसकी अवधि भी इतनी ही होती है। संध्या और संध्यांश के बीच युग होता है। जैसे कृत, त्रेता आदि । ”

     विष्णु पुराण में समय नापने के लिए महायुग का जिक्र आया है। वह कहता है:²

     “वर्ष में चार प्रकार के महीने होते हैं। जिनकी पांच पहचान हैं और इन सबको मिलाकर एक युग का चक्र बनता है। वर्ष को संवत्सर, इत्सर, अनुवत्सर, परिवत्सर और वत्सर, कई नामों से पुकारा जाता है। यह समय युग कहलाता है । "

     महायुग का अर्थ है युग का विस्तार जैसा कि विष्णु पुराण में कहा गया है:³

     “कृत, त्रेता, द्वापर और कलि मिलकर महायुग बनते हैं अथवा चतुर्युग, इस प्रकार के हजार का योग ब्रह्मा का एक दिन होता है। "

     विष्णु पुराण में मन्वंतर की व्याख्या इस प्रकार की गई है : ⁴

     “मध्यांतर मन्वंतर कहलाता है। वह चार युगों का इकहत्तर गुना बड़ा होता है। उसमें कुछ और वर्ष भी होते हैं। "

     कल्प के विषय में विष्णु पुराण में कहा गया है:

     "ब्रह्मा का दिन कल्प"

     कुछ अवधि हैं, जिनमें समय का विभाजन किया जाता है। इन अवधियों में कितना समय होता है, यह उल्लेखनीय है।

     वर्ष की अवधि सरल है। 365 दिन का ही होता है। युग, महायुग, मन्वंतर और कल्प गिनना टेढ़ी खीर हैं, फिर भी कल्प के विभाजन में युग और महायुग को समझना कुछ सरल है अपेक्षाकृत इसके कि कल्प को युगों से गुणा किया जाए । कल्प और महायुग के संबंधों को समझने के लिए हमें 71 महायुगों को जोड़ना होगा जबकि एक महायुग में चार युग होते हैं और एक मन्वंतर 71 महायुगों तथा कुछ वर्षों का होता है।


1. विष्णु पुराण, विल्सन, पृ. 23
2. वही पृ. 23
3. वही पृ. 23
4. वही पृ. 24


     इन इकाईयों के आधार पर कालगणना करते समय हम युग को आधार मानकर नहीं चल सकते। क्योंकि युगों का समय तो निश्चित है किन्तु उनमें समानता नहीं है। गणना का आधार महायुग है जिसका समय निर्धारित है।

     महायुग में चार युग होते हैं। यथा 1 कृत, 2. त्रेता 3. द्वापर, और 4. कलि । प्रत्येक युग का समय निश्चित है। प्रत्येक युग के आगे-पीछे संध्या और संध्यांश होते हैं। उनका समय भी निर्धारित है। विभिन्न युगों का अपना समय और उनके साथ सम्बद्ध संध्या और संध्यांश का समय भिन्न-भिन्न है।

युग समय संध्या संध्यांश योग
कृतयुग ...4000 400 400 4800
त्रेता ...3000 300 300 3600
द्वापर ...2000 200 200 2400
कलि ...1000 100 100 1200
महायुग ... ... ... 12000

     महायुगों की यह गणना दैवी वर्षों के आधार पर है अर्थात् ब्रह्मा के 12000 दैवी वर्षों से एक महायुग बनेगा। हिसाब यह है कि मानव का एक वर्ष महायुग के एक दैवी दिन के बराबर है। इस प्रकार मानव वर्षों के आधार महायुग का हिसाब इस प्रकार बैठता है ( 360x12000 ) = 43,20,000 वर्ष ।

     71 महायुगों से एक कल्प बनता है। इसका अर्थ है, कल्प का समय हुआ (43,20,000 × 71 = 3,06,72,000)

     मन्वंतर 71 महायुगों तथा कुछ वर्षों का योग है। मन्वंतर का काल कल्प के बराबर बैठता है अर्थात् 3,06,72,000 तथा कुछ और वर्ष । मन्वंतर का समय कल्प से कुछ ज्यादा होता है

     वर्ष की परिकल्पना खगोलशास्त्र के अनुरूप है। इसलिए काल-गणना के लिए आवश्यक हैं।

     कल्प की परिकल्पना पौराणिक और ब्रह्माण्डोत्पत्ति से सम्बद्ध है और इस विश्वास पर आधारित है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति और अवसान ब्रह्मा द्वारा होते हैं। इन दोनों कालों के बीच का अंतर कल्प कहलाता है। इस पर सर्वप्रथम प्रकाश विष्णु पुराण में डाला गया है। वह इसकी सृष्टि से आरम्भ होता है। इसकी रचना के दो रूप हैं: 1. सर्ग अर्थात् प्रकृति से ब्रह्मांड की उत्पत्ति और 2. प्रति सर्ग अर्थात् मूल तत्वों से हुआ आरम्भिक विकास अथवा अस्थाई विकृतियों के पश्चात् पुर्नोदय। यह दोनों रचनाएं सावधिक हैं परन्तु ब्रह्मा के जीवन अवसान पर पहले का समापन हो जाता है जब न केवल देवतागण अपितु अन्य तत्व भी लुप्त हो जाते हैं। परन्तु ये तत्व पुनः मूल रूप में परिवर्तित होकर उभर आते हैं। उनके साथ तब केवल सूक्ष्म तत्व बचता है, वह प्रति कल्प अथवा ब्रह्मा के दिन घटित होता है। इससे केवल क्षुद्र जीव और निम्न जगत प्रभावित होते हैं। ब्रह्मांड सार ऋषि और देवता गण अप्रभावित रहते हैं। यह कल्प की अवधारणा है।