हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
ऋग्वेद में ‘युग' शब्द का उपयोग 38 बार हुआ है। यह काल के रूप में प्रयुक्त हुआ है। साथ ही इसका अर्थ पीढ़ी, जुआ और आदिमजाति भी है। कुछ स्थानों पर यह बहुत संक्षिप्त समय के लिए हुआ है। बहुत से स्थानों पर ऐसा प्रतीत होता है कि यह बहुत ही कम अवधि के अर्थ में लिया गया है। कभी-कभी तो युगे युगे का अर्थ है प्रतिदिन ।
दूसरी बात यह है कि चार युगों को सामाजिक नैतिकता के निरंतर पतन से जोड़ा गया है। महाभारत के निम्नांकित अंश से यह अवधारणा स्पष्ट प्रकट होती है : ¹
कृत ऐसा काल है जिसका सदाचार शाश्वत है। इस सर्वश्रेष्ठ युग में प्रत्येक कर्म सम्पन्न (कृत) हो जाता है और कुछ करने को शेष नहीं रह जाता। तब कर्त्तव्य निस्तेज नहीं होते थे। ना ही लोग उत्साहहीन होते थे। यद्यपि कालांतर में ( समय के प्रभाव से) यह युग क्षुद्रता की ओर अग्रसर हुआ। उस समय न वहां देवता थे, दानव, न गंधर्व, यक्ष, राक्षस, ना ही पन्नगगण और ना ही क्रय-विक्रय होता था । वेद, साम, ऋज और यजुस में विभक्त नहीं थे, व्यक्ति प्रयास नहीं करते थे। फल सोचने से ही मिल जाते थे। धर्मपरायणता और सांसारिक त्याग विद्यमान था। आयु के प्रभाव ने न कोई रोग व्यापता था, न ही अंगों में क्षीणता आती थी। उस समय न दुर्भाव था, न विलाप, न दर्प, न प्रपंच, ना ही कोई विवाद था। वहां कोई अवसाद क्योंकर हो सकता था। तब न घृणा थी, न अत्याचार, भय, संताप, ईर्ष्या अथवा वैर भाव था। इस प्रकार परम ब्रह्म उन योगियों को ज्ञानातीत थे। तब सभी नारायण - सबकी आत्मा धवल थी। ब्राह्मण हो या क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र, सभी में कृत युग के गुण थे। उस समय ऐसे जीव जन्मे थे जो अपने कर्म के प्रति निष्ठावान थे। उनके उद्देश्य, विश्वास, कर्म और ज्ञान एक समान थे। उस काल में जातियां अपने कर्म के अनुसार कर्त्तव्य पालन करती थीं। सबको एक देवता पर अटल विश्वास था और मंत्र एक नियम और एक अनुष्ठान से आबद्ध थे यद्यपि उनके कार्य भिन्न-भिन्न थे। वेद एक ही था । एक ही कर्म करते थे। अपने-अपने लिए निर्धारित चारों कार्य में रत रहते थे, समय के पालक थे परन्तु निष्काम होकर परमात्मा का ध्यान लगाते थे। कृत युग में चारों वर्णों की यह अटल धर्मपरायणता उस युग का लक्षण था और वे परमात में विलीन होते थे। कृत युग तीन गुणों से मुक्त था। अब त्रेता को जानें। इसमें यज्ञ होते थे। धर्मपरायण ता का चतुर्थांश क्षीण हो गया। विष्णु का रंग लाल हो गया और जन साधारण सत्य का पालन करता था और अनुष्ठानों पर निर्भर धर्माचरण करता था । तब बलि होती थी। पवित्र कर्म और विभिन्न अनुष्ठानों से। त्रेता में सामान्यजन कोई उद्देश्य जानकर कार्य करते थे। वे अनुष्ठानों और युद्धों से फल प्राप्ति चाहते थे। तप साधना से और कर्त्तव्य-बोध से उनका मन फिर गया था। इस युग में उनके अपने कार्यों धर्म-कर्म में निष्ठा थी। द्वापर में धर्म परायणता अर्धांश रह गयी थी । विष्णु पीतवर्ण हो गए और वेदों के चार अंग हो गए। कुछ चारों वेद पढ़ते थे, कुछ तीन ही, कुछ दो, कुछ एक ही और कुछ तो एक भी नहीं। शास्त्र ऐसे बंट गए, अनुष्ठानों में विविधता आ गई। लोग तप-साधना करते। उपहार पाते और राजसी हो गए थे। किसी एक ही वेद में आस्था बन जाने से उनकी संख्या बढ़ी और सतोगुण की क्षीणता के कारण सत्य पर गिने-चुने लोग ही अटल थे। नर-नारियों से सद्गुण नष्ट हो गए, अनेक रोग, राग और विपत्तियां, उन्हें समय के साथ सताने लगीं, जिनसे वे अत्यधिक त्रस्त हुए और साध ना-मार्ग पर बढ़े। अन्य स्वर्गीय आनन्द की कामना करने लगे और यज्ञों का आयोजन किया। इस प्रकार जब द्वापर आया तो लोगों का धर्माचरण और गिरा । कलियुग में तो वह चतुर्थांश ही रह गया। इस अंधकार युग में विष्णु का रंग काला हा गया । वेद, व्यवहार, धर्मपरायणता, अनुष्ठान, आयोजन लुप्त होने लगे । विपदाएं, रोग, क्लांति, दोष जैसे क्रोधादि निराशा, चिंता, भूख, भय, विद्यमान थे। जैसे-जैसे युग बढ़ा धर्मपरायणता का क्षय होता गया। जब ऐसा हुआ तो मानव का भी ह्रास हुआ। जब वे ही रोगी थे, जो प्रेरणाएं उन्हें परिचालित करती थीं, वे भी विकृत हो गई। युग के ह्रास के कारण जो प्रवृत्तियां विकसित हुईं, उनसे मानव के उद्देश्य विफल हो गए। ऐसा कलियुग है जो थोड़े समय रहा। जो चिरायु हैं, वे युग के अनुरूप ही चलते हैं"।
1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खण्ड 1, पृ. 144-46
नि:संदेह, यह आश्चर्यजनक है। इन बातों का प्राचीन वैदिक साहित्य में भी उल्लेख है। कृत, त्रेता, द्वापर और अक्षंद शब्द ऐतरेय ब्राह्मण की तैत्तरीय संहिता तथा शतपथ ब्राह्मण में भी प्रयुक्त हुए हैं। शतपथ ब्राह्मण का कथन है- “ कृत वह है जब खेल की गलतियों से लाभ मिलता है, त्रेता वह है जब कोई नियमित योजनानुसार खेलता है, द्वापर वह है जब कोई सामने वाले खिलाड़ी को पछाड़ने की चाल चलता है। अक्षंद का अर्थ है क्रीड़ास्थल का कीड़ा । " ऐतरेय ब्राह्मण और तैत्तरीय ब्राह्मण में अक्षंद के स्थान पर 'कलि' शब्द प्रयुक्त हुआ है। तैत्तरीय ब्राह्मण में कृत का अर्थ है जुआघर का स्वामी, त्रेता का अर्थ है- गलतियों से लाभ उठाना, द्वापर अर्थात् बाहर बैठने वाला, कलि का अर्थ है, जो जुआघर को कभी नहीं त्यागता । ऐतरेय ब्राह्मण में कहा गया है:
“यहां प्रत्येक सफलता की आशा करता है, आभागी मृत्यु के लिए। कलि लेटा पड़ा है, अन्य दो शनैः शनैः चल रहे हैं। आधे गिर चुके हैं परन्तु सबसे सौभाग्यशाली कृत में पूरी गति है।" यह स्पष्ट है कि ये सभी शब्द जुए के पासों के लिए हैं।
मनु ने इनका किस प्रकार प्रयोग किया¹ है ? उसे भी देखा जाए। वे कहते हैं:
1. मनु, 9, 301-2
“कृत, त्रेता, द्वापर और कलियुग वे राजा के कार्यों के रूप हैं क्योंकि राजा युग कहलाता है। जब वह सोता है तो कलि है, गतिमान है तो द्वापर है, कार्योंद्यत है तो त्रेता है, बढ़ता हुआ है तो कृत है। "
जब मनु की हम उनके पूर्ववर्तियों से तुलना करते हैं तो हमें स्वीकार करना पड़ता है कि इन शब्दों के भावार्थ में स्पष्ट अंतर आ गया। जो शब्द जुए की शब्दावली थी वह राजनीतिक बन गई, जिसमें राजा की कर्त्तव्य परायणता और ऐसे राजाओं की तुलना की गई, जो क्रियाशील हैं, जो कार्योच्छुक हैं, जो सचेत हैं और जो सोते रहते हैं। उनके लिए राज्य जाए भाड़ में।
प्रश्न यह है कि किन परिस्थितियों में ब्राह्मण कलियुग का सिद्धांत प्रतिपादित करने को विवश हुए? ब्राह्मणों ने कलियुग को पतित समाज का पर्याय क्यों बना डाला? मनु ने एक सोते हुए राजा को कलिराज क्यों कहा? मनु के समय कौन राजा था ? उसे सोता हुआ राजा क्यों कहा गया? ऐसी कुछ पहेलियां हैं जो कलियुग सिद्धांत से उत्पन्न होती हैं।
कलियुग संबंधी अन्य पहेली भी है। एक है कलियुग वास्तव में कब आरंभ हुआ?
कलियुग कब आरंभ हुआ, उसके समय के संबंध में कई सिद्धांत हैं? पुराणों ने दो तिथियां दी हैं। कुछ के अनुसार यह ईसा पूर्व चौदहवीं शताब्दी में आरम्भ हुआ। कुछ का कथन है कि यह ई.पू. 18 फरवरी, 3102 से आरम्भ होता है, जब कौरव - पाण्डवों के बीच युद्ध की शुरुआत बताई जाती है। प्रो. अयंगर ने कहा है कि ऐसे कोई प्रमाण नहीं है कि जिनसे यह प्रकट होता हो कि ईसवी की सातवीं शताब्दी के पूर्व कलियुग का कोई उल्लेख हुआ हो। सर्वप्रथम इसका प्रयोग पुलकेशिन द्वितीय के काल के एक लेख में हुआ है, जिसमें 610 से 642 ईसवी तक बादामी पर शासन किया। इसमें दो तिथियां हैं, शक संवत् 556 और कलि संवत् 37351 इन तिथियों से कलियुग का आरम्भ 3102 ईसवी पूर्व बैठता है। यह गलत है कि ई.पू. 3102 न तो महाभारत युद्ध की तिथि है और ना ही कलि के आरम्भ की। श्री काणे ने यह अंतिम रूप से प्रमाणित कर दिया है। विभिन्न वंशों के उन राजाओं के विषय में, जिन्होंने पाण्डव-पुत्र परीक्षित के काल में शासन किया, सबसे पक्का कथन यह है कि महाभारत की तिथि ई.पू. 1263 थी। यह ई.पू. 3102 नहीं हो सकती। श्री काणे ने यह भी कहा है कि ई.पू. 3102 कल्प के आरम्भ की तिथि है, कलि आरम्भ की नहीं। इस आलेख में कालपदि को कल्यादि पढ़ लिया गया। इस प्रकार कोई निश्चत तिथि नहीं है, जिसे ब्राह्मण कलि का आरम्भ कह सकें। एक निश्चित तिथि होनी चाहिए थी जिससे इतनी बड़ी घटना की शुरूआत बताई जाती। यह पहेली है।
परन्तु और भी पहेलियां हैं, जो इस प्रकार हैं :