Hindu Dharm Ki Paheliyan - dr Bhimrao Ramji Ambedkar - हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर - Page 85 मुख्य मजकूराकडे जा

हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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25 ऑगस्ट 2023
Book
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     मन्वंतर की अवधारणा यदि ऐतिहासिक भी नहीं तो पौराणिक तो है ही। इसका सूत्र है कि ब्रह्मा ने चराचर सृष्टि रची। परन्तु चर की वंश - वृद्धि नहीं हुई तब ब्रह्मा ने नौ मानस पुत्र उत्पन्न किए। परन्तु उनमें कोई आवेग नहीं था। मात्र पवित्र ज्ञान से अभिभूत थे, ब्रह्मांड से विरक्त और प्रजनन के अनिच्छुक । ब्रह्मा को यह देखकर क्षोभ हुआ। तब ब्रह्मा ने स्वयं को प्रथम पुरुष मनु स्वायंभुव और प्रथम नारी शतरूपा में परिवर्तित किया । मनु स्वायंभुव ने शतरूपा का वरण किया। इस प्रकार प्रथम मन्वंतर आरम्भ हुआ जो स्वायंभुव मन्वंतर कहलाया । चौदह मन्वंतरों का विवरण इस प्रकार है :

Kaliyuga Ki Paheliyan - Hindu Dharm Ki Paheliyan - Riddle of Hinduism - Book by dr Bhimrao Ramji Ambedkar     “तब ब्रह्मा ने सृष्टि पालन हेतु स्वयं को मनु स्वायंभुव बना लिया, अपने वास्तवि रूप के समान अपने नारी भाग से शतरूपा रची, जिसे तपस्या द्वारा पाप से शुद्ध किया जिसे मनु ने अपनी पत्नी बनाया। इन दोनों से दो पुत्र जन्मे, प्रियव्रत और उत्तानपाद । दो पुत्रियां थी प्रसूति और आकूति जो अति सुंदर थीं। प्रसूति का विवाह दक्ष से और आकूति का रुचि प्रजापति से हुआ। आकूति से जुड़वां बच्चे उत्पन्न हुए यज्ञ और दक्षिणा जिन्होंने परस्पर विवाह कर लिया। ( भाई-बहन के विवाह का एक और उदाहरण ) उनसे बारह पुत्र उत्पन्न हुए। ये दवेता स्वायंभुव मन्वंतर में यम कहलाए ।

     प्रथम मनु¹ स्वायंभुव था फिर स्वारोचिष । इसके उपरांत क्रमशः औतमी, तामस, रैवत, चाक्षुष। यह छै मनु काल कवलित हुए। सातवें, वर्तमान मन्वंतर का मनु सूर्यपुत्र वैवस्वत है। "

     “कल्प के आरंभ में स्वायंभुव मनु के समय का मैं वर्णन कर चुका हूं। उनके देवों, ऋषिगण, अन्य महापुरुषों जो उस समय विद्यमान थे उनके साथ। “अब मैं स्वारोचिष मनु के पुत्रों, देवताओं और ऋषियों के विषय में बताता हूं। इस काल (द्वितीय मन्वंतर) के देवता थे, पारावत और तुषित उनका इन्द्र था " विपश्चित। उनके सप्तर्षि थे ऊर्ज, स्तंभ, प्राण, दत्तोली ऋषभ, निश्चर और अर्वरीवट मनु के पुत्र थे चैत्र और किंपुरुष ।


1. विल्सन, विष्णु पुराण, पृ. 259-641


     तीसरे मन्वंतर के मनु थे औतमी उसके समय के इन्द्र थे, सुशांति, देवताओं के नाम है स्वधामा, सत्य, शिव प्रतर्दन और वसुवृति । प्रत्येक पांच वर्ग के बारह देवता थे। उस समय सप्तर्षि वशिष्ठ के सात पुत्र थे और अज, परसु, दिव्य तथा अन्य मनु के पुत्र थे।

     चौथे मनु तामस के काल में पूजनीय देवता थे, सुरूप, हरि, सत्य और सुधि । प्रत्येक के सत्ताईस देवता थे। शिवी उस काल का इन्द्र था जिसे शत क्रतु भी कहा जाता है। इसने सौ यज्ञ किए थे। सप्तऋषि थे ज्योतिधाम, पृथु, काव्य, चैत्र, अग्नि, वानक, पिवर तामस मनु के पुत्र थे, नर, ख्याति, सांतहय, जनुजंघा आदि ।

     पांचवें मन्वंतर के मनु रैवत थे । उनका इन्द्र विभु था। देवता इस प्रकार थे अमिताभ, अभूतराजास, वैकुंठगण, सुमेधा । सप्तऋषि थे : हिरण्यरोम, वेदशिरा, ऊर्ध्वबाहु, वेदबाहु, सुधमन, पर्जन्य और महामुनि । रैवत के पुत्र इस प्रकार थे: बालबंधु सुसम्भाव्य, सत्यक तथा अन्य साहसी राजा ।

     स्वारोचिष, औतमी, तामस और रैवत प्रियव्रत की संतान थे जिसने अपनी उपासना से विष्णु को प्रसन्न करके अपनी संतति के लिए मन्वंतरों का मनु बनाए जाने का वर प्राप्त कर लिया था।

     “छठे मन्वंतर का मनु चाक्षुष था, उसका इन्द्र मनोज्व था उस काल के देवता थे आदय, प्रस्तुत, भव्य, पृथुग और लेखगण जिनके आठ और देव थे; उस काल के सप्तर्षि थे सुधामा, विरजा हविष्मान, उत्तम, मधुर, अतिमान, सहिष्णु । चाक्षुष के पुत्र थे उरु, पुरु, शतद्युम्न आदि। "

     वर्तमान सातवें मन्वंतर के मनु अन्त्येष्टि देव सूर्य की अनुपम संतान वैवस्वत हैं; उनके देवता हैं, आदित्य, वसु और रुद्र; उनका इन्द्र है पुरन्दर; सप्तर्षि हैं- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज । वैवस्त मनु के नौ पुत्र ओजस्वी हैं। इक्ष्वाकु नाभाग, भ्रष्ट, सन्मति, नरिश्यंत, नाभानिदिष्ट, करुष, प्रिषध्र और यशस्वी वसुमत ।

     अभी सात मन्वंतरों का विवरण दिया गया है जो विष्णु पुराण में उल्लिखित हैं। विष्णु पुराण लिखे जाने तक की स्थिति थी। क्या मन्वंतर शासन बाह्य था ? इस विषय में ब्राह्मण मौन हैं। परन्तु विष्णु पुराण के लेखक को पता है कि सात मन्वंतर अभी और आने हैं। इनका विवरण इस प्रकार है: ¹


1. विल्सन, विष्णु पुराण, पृ. 266-69.


     विश्वकर्मा की पुत्री संजना सूर्य की पत्नी थी। उसकी तीन संतानें मनु (वैवस्वत) यम और यमी (अथवा यमुना नदी) थीं। अपने पति का तेज झेलने में असमर्थ संजना ने उसे सेविका के रूप में छाया दे दी और स्वयं उपासना के लिए वनों में चली गई। सूर्य ने छाया को अपनी पत्नी संजना जानकर उससे तीन संतान और उत्पन्न कीं, शनिश्चर, द्वितीय मनु (सावर्णी) और पुत्री ताप्ती । छाया को एक बार यम पर क्रोध आ गया, उसने उसे शाप दे दिया। साथ ही यम को और सूर्य को यह भी बता दिया कि वह वास्तविक संजना नहीं हैं। छाया के बताने पर कि उसकी पत्नी जंगलों में चली गई है, सूर्य ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा कि वह घोड़ी रूप में तपस्या रत है। (उत्तर कुरु प्रदेश में) सूर्य ने घोड़े के रूप में पुनर्जन्म लिया और अपनी पत्नी के पास पहुंच गया और उससे तीन अन्य संताने उत्पन्न कीं, दो अश्विन और रेवंत और फिर संजना को घर ले आया। विश्वकर्मा ने नक्षत्र की गहनता कम करने के लिए उसकी दीप्ति घटाने के उद्देश्य से अपनी चक्री पर चढ़ाया और उसे घिसकर आठवां भाग कर दिया क्योंकि इससे अधिक अविभाज्य था। जो दैवी वैष्णव भव्यता सूर्य में थी, वह विश्वकर्मा के घिसने से धरती पर गिरी, शिल्पीश्रेष्ठ ने उससे विष्णु का चक्र, शिव का त्रिशूल, कुबेर का शस्त्र और कार्तिकेय का वेलु बनाया और अन्य देवों के शास्त्र भी बनाए। विश्वकर्मा ने इन सबका निर्माण सूर्य की फालतू किरणों से किया।

     छाया का पुत्र भी मनु कहलाया उसी वर्ण का होने के कारण उसका दूसरा नाम सावर्णी पड़ा जैसा कि उसके बड़े भाई मनु वैवस्वत का था। वह आठवें मन्वंतर का मनु है। अब मैं उसका विवरण निम्न बातों के साथ देता हूं। जिस काल में सावर्णी मनु बनेंगे, उनके देववर्ग इस प्रकार होंगे सुतप, अग्निताभ और मुख्य प्रत्येक के इक्कीस सप्तर्षि इस प्रकार होंगे दीप्तिमान, गालव, राम; कृप, द्रोणि मेरा पुत्र व्यास छठा और ऋष्यऋग सातवां ऋषि होगा। इस युग का इन्द्र बलि होगा । विरोचन का निष्पाप पुत्र विष्णु की कृपा से पाताल राज बनेगा। सावर्णी की संतानें होंगी । विराज, अर्वरीव, निर्मोह आदि ।

     नौवें मनु दक्ष सावर्णी होंगे। इस समय के देव होंगे पारस, मारीचि गर्भ और सुधर्मी । प्रत्येक वर्ग में बारह देव होंगे उनका मुख्य इन्द्र होगा अभूत सवन द्युतिमान, भव्य, वसु, मेधातिथि ज्योतिषमान और सत्य ये सप्तर्षि होंगे। धृतकेतु, द्रप्तिकेतु, पंचहस्त, निर्भय, पृथुसर्व आदि मनु पुत्र होंगे।

     दसवें मन्वंतर में मनु ब्रह्मा सावर्णी होंगे; उनके देवगण होंगे सुधामा विरूद्ध शतसांख्य, उनका इन्द्र महातेजस्वी शांति होगा । सप्तऋषि होंगे हविष्मान, सुकृति, सत्य, अप्पममूर्ति, नाभाग, अप्रतिमजा और सत्यकेत। मनु के दस पुत्र होंगे। सुक्षेत्र, उत्तमजा, हरिषेण आदि ।

     ग्यारहवें मन्वंतर का मनु धर्म सावर्णी होगा उसके समय प्रमुख देव होंगे विहंगम, कामागम और निर्माणरति; प्रत्येक की संख्या तीस होगी; इस न्वंतर का इन्द्र वृष होगा । सप्तर्षि होंगे निश्चर, अग्नितेज व पुशमन, विष्णु, आरुणी, हविष्मान और अनघ पृथ्वी के स्वामी और मनु के पुत्र होंगे, सवर्ण, सर्वधर्म और देवानिक आदि ।

     बारहवें मन्वंतर में रुद्र का पुत्र सावर्णी मनु होगा; उस काल का इन्द्र होगा ऋतुधामा । देवों के नाम हैं हरितास, लोहितास, सुमन और सुकर्मा; प्रत्येक की संख्या पन्द्रह होगी । सप्तर्षि इस प्रकार होंगे-तपस्वी, सुतप, तपोमूर्ति, तपोघ्रिति तपोद्युति और तपोधन। मनु के मेधावी पुत्र होंगे। देव, उपदेव तथा देवश्रेष्ठ आदि ।

     तेरहवें मन्वंतर का रौच्य मनु होगा । देव वर्ग होग, सुधमन, सुधर्मन और सुकर्मण; उनका इन्द्र दिवसपति होगा। सप्तर्षि होंगे निर्मोह, तत्वदर्शन निष्प्रकम्प, निरुत्सुक, धृतिमान, अव्यय और सुतप तथा त्रिसेन, विचित्र तथा अन्य नृप होंगे।
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     भौत्य चौदहवें मन्वंतर का मनु होगा। शुचि उसका इन्द्र होगा। देवताओं के पांच वर्ग होंगे। चाक्षुष, पवित्र, कनिष्ठ भ्राजीरास और वैवृद्ध। सप्तर्षि इस प्रकार होंगे। अग्निबाहु, शुचि, शुक्र, मागध, ग्रिधर, युक्त और अजित। मनु के पुत्रों के नाम होंगे उरु, गभीर, गभीरा, बृधन आदि जो इस धरा के शासक होंगे। "

     मन्वंतर की योजना शायद इस इरादे से बनाई गई कि उस काल के लिए कोई सत्ता स्थापित की जा सके। प्रत्येक मन्वंतर में एक स्वामी मनु होता है। पूजा के लिए देव होते हैं, सात ऋषि और एक इन्द्र होता है। विष्णु पुराण में कहा गया है:¹

     “विभिन्न वर्गों के देवता और मनु के पुत्र अपने संबंधित मन्वंतरों में आहुतियां प्राप्त करते हैं और उनके वंशज उस काल में पृथ्वी के शासक होते हैं। प्रत्येक मन्वंतर के नियंता होते हैं मनु, सप्तऋषि देवता मनु के पुत्र और इन्द्र होते हैं। "

     परन्तु इसकी क्रम - योजना महायुग कहलाती है जो अत्यधिक जटिल मामला है।

     कल्प को महायुग में क्यों विभक्त किया जाए और एक महायुग को चार युगों में क्यों विभाजित किया जाए, जिन्हें कृत, त्रेता, द्वापर और कलियुग कहते हैं? यह एक पहेली है। यह पुराणों पर आधारित है और हिंदू इतिहास के वास्तविक प्रसंग से विलग है। ऐसा काल के साथ नहीं होता।

     पहले तो यह पता नहीं चलता कि युग के समय को इतना असीम विस्तार क्यों दिया गया, जिससे पूरा क्रम मनगढ़ंत और बनावटी लगता है?


1. विल्सन, विष्णु पुराण, पृ. 269-70