हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
पहला अधिकार यज्ञ था जो आर्यों द्वारा देवों को समय-समय पर दिये जाने वाले भोज का आयोजन होता था जिसके बदले में देवजाति के लोग राक्षसों से आर्यों की रक्षा करते थे। यज्ञ कुछ नहीं था बल्कि देवों की सामंती बलपूर्वक वसूली होती थी । इसको समझने में यदि भूल हुई है तो इसका कारण यही है कि देवों को एक जाति के स्थान पर भ्रांति से ईश्वर (देवता) समझ लिया गया। आर्यों ने आरम्भ से ही समझने में यह गलती की थी।
देवों की, जो दूसरा अधिकार आर्यों से प्राप्त था, वह यह था कि उन्हें आर्यों की स्त्रियों को भोगने का पूर्व अधिकार था। यह बहुत पहले से आरम्भ हो गया था। ऋग्वेद में एक उल्लेख है 10.85.40 जिसके अनुसार आर्यों की स्त्रियों पर पहले सोम, फिर गंधर्व, फिर अग्नि और सबके बाद आर्यों से सहवास करना होता था। प्रत्येक आर्य स्त्री किसी देव की होती थी। किसी आर्य कन्या के किशोरावसा में आने पर उसे किसी देव से सहवास करना होता था। इससे पूर्व कि किसी आर्य कन्या का विवाह हो, उसे देव को भेंट चढ़ाकर शांत करना होता था। आश्वलायन गृह्य सूत्र के खंड सात के प्रथम अध्याय में विवाह-संस्कार का जो वर्णन है, वह इस बात का ज्वलंत प्रमाण है। इस सूत्र का सावधानी और विश्लेषणात्मक दृष्टि से अनुशीलन किया जाए तो पता चलेगा कि विवाह के समय तीन देव होते थे। आर्यमान, वरुण और पूशान स्पष्ट है कि उनका कन्या पर पहले से ही अधिकार था। पर प्रथम वह यह कार्य करता है कि वह कन्या को एक पत्थर के टुकड़े के पास ले जाता है और उससे कहता है कि "उस पर” पैर रख और पत्थर के समान कठोर बन । शत्रु से मुक्ति पा, शत्रु को पैर के नीचे दबा। इसका अर्थ है वर कन्या को उन तीन देवों के नियंत्रण से मुक्ति के लिए कहता है, जिन्हें वह अपना शत्रु मानता है। देवों को क्रोध आता है और वे वर की ओर बढ़ते हैं। कन्या का भाई बीच में आता है और विवाद सुलझाने का प्रयास करता है। वह क्रुद्ध देवों को भुना अन्न भेंट करता है जिससे कन्या पर से उनके अधिकार का मूल्य चुकाया जा सके। तब भाई-बहन से अंजलि बनाने के लिए कहता है, फिर वह उसकी अंजलि में भुना अन्न भर देता है और उसमें घी डालता है और कन्या से वह तीनों देवों को तीन बार अर्पित करने के लिए कहता है। यह अवदान कहलाता है। जब बहन देवों को अवदान अर्पित करती है तो एक विशेष वचन दोहराता है जिसे जानना महत्वपूर्ण है। वह कहता है, “यह कन्या अग्नि के माध्यम से आर्यमान का अवदान अर्पित करती है। आर्यमान इस पर से अपना अधिकार छोड़ दें और वर के अधिकार को बाधित न करें। " कन्या दो अन्य देवों को भी अलग से अवदान देती है और प्रत्येक बार उसका भाई यह दोहराता है। अवदान के पश्चात् अग्नि की प्रदक्षिणा होती है जो सप्तपदी कहलाती है। इसी के पश्चात् विवाह संबंध वैध और उत्तम माना जाता है। यह सब इतना ज्वलंत है। कि आर्यों पर देवों की दासता पर प्रकाश डालता है। साथ ही देवों और आर्यों के चरित्र पतन का भी परिचायक है।
विधि विशेषज्ञ जानते हैं कि हिन्दू विवाह में सप्तपदी नितांत अनिवार्य है और इसके बिना हिन्दू विवाह वैध नहीं होता । परन्तु बहुत कम लोग जानते हैं कि हिन्दू विवाह में सप्तपदी का इतना महत्व क्यों है, कारण स्पष्ट है। यह इस बात का प्रतीक है कि देवों ने कन्या पर से अपना पूर्वाधिकार त्याग दिया है, वे अवदान से संतुष्ट हैं और कन्या को मुक्त करने पर सहमत हैं। यदि देव वर को और कन्या को सात पग चलने देते हैं तो यह समझा जाता था कि देवों को मुआवजा स्वीकार है और उनका अधिकार समाप्त हो गया है और कन्या दूसरे की पत्नी बन सकती है। सप्तपदी के कोई अन्य अर्थ नहीं हो सकते। सप्तपदी प्रत्येक विवाह में आवश्यक थी, इस बात का द्योतक है कि ऐसी अनैतिकता देवों और आर्यों में किस हद तक मौजूद थी ?
कृष्ण के चरित्र पर अलग से प्रकाश डाले बिना अवलोकन सम्पन्न नहीं हो सकता क्योंकि कलियुग का आरम्भ और कृष्ण का देहांत एक-दूसरे से जुड़े हैं। इसलिए उनके चरित्र पर विचार करने का महत्व है। कृष्ण का चरित्र अन्यों की तुलना में कैसा है ? विस्तृत विवरण अन्य स्थान पर दिए गए हैं। हम यहां कुछेक के बारे में ही चर्चा करेंगे। यादव बहुपत्नीवादी थे। कृष्ण, वृष्णि ( यादव परिवार) से संबंधित थे। यादव राजाओं के विषय में बताया गया है कि उनकी बहुपत्नयां और बहुपुत्र थे। यह कलंक कृष्ण पर भी लगा हुआ है। परन्तु यह यादव परिवार और स्वयं कृष्ण के घर में मातृ मैथुन का धब्बा लगा है। यहां यादव परिवार में पिता द्वारा पुत्री से विवाह का वर्णन मत्स्य पुराण में आता है। मत्स्य पुराण के अनुसार कृष्ण के एक पूर्वज राजा तैत्री ने अपनी पुत्री को ही घर में रख लिया था और उससे नल नाम का पुत्र उत्पन्न किया था। कृष्ण का पुत्र साम्ब अपनी मां से सहवास करता था। मत्स्य पुराण बताता है कि किस प्रकार साम्ब अवैध रूप से कृष्ण की पत्नी के साथ रहता था । कृष्ण ने अपने पुत्र साम्ब और पत्नी को क्रोधित होकर शाप दिया था। महाभारत में भी यह प्रकरण है। सत्यभामा ने द्रौपदी से यह भेद जानना चाहा कि पांच पतियों को किस प्रकार नियंत्रण में रखती है। महाभारत के अनुसार द्रौपदी ने सत्यभामा को चेताया कि वह अपने सौतेले पुत्रों के साथ अकेले में न तो बात करे और न उन्हें अकेले में ठहरने दे। यही मत्स्य पुराण में भी साम्ब के प्रसंग में कहा गया है। साम्ब का ही अकेला उदाहरण नहीं है। उसके भाई प्रद्युम्न ने भी अपनी पालक माता और सम्बर की पत्नी मायावती से विवाह कर लिया था।
कृष्ण की मृत्यु के पूर्व आर्यों के समाज की नैतिकता इस प्रकार की थी । इतिहा को निश्चित युगों में विभक्त नहीं किया जा सकता और यह नहीं कहा जा सकता कि कृत युग में जैसी नैतिकता थी, वैसी त्रेता और द्वापर में थी। वह कृष्ण की मृत्यु पर सहसा समाप्त हो गई । यदि हम आर्यों के सुधारों की प्रगति का ध्यान रखें तो पाएंगे कि प्रथम युग कृत में वह निम्नतम थी, उससे कुछ बेहतर त्रेता में और सबसे कम अनैतिकता द्वापर में थी । कलियुग में स्थिति सर्वोत्तम है।
कोई विचारधारा मानव समाज के मात्र सामान्य विकास से नहीं बनती जैसे कि संसार भर में हम देखते हैं। प्राचीन काल में आर्यों का जो नैतिक पतन था, उन्होंने दृढ़ता से सुधार कर उन सामाजिक दुष्कर्मों को त्याग दिया जिसकी जानकारी इतिहास में मिलती है।
सामान्य आर्यों की दृष्टि में देवों और ऋषियों का बहुत सम्मान है और यह नियम है कि हीन कुलीन का अनुसरण करता है। आर्य समुदाय में जो भी अनैतिकता थी, वह इसी का परिणाम थी कि सामान्य आर्यजन ने देवों और ऋषियों के अनैतिक कार्यों की नकल की। अपने समाज को नैतिक अध: पतन से मुक्ति दिलाने के लिए आय के कुछ प्रमुख व्यक्तियों ने अत्यधिक महत्वपूर्ण सुधार लागू किए। उन्होंने घोषित किया कि देवों और ऋषियों के कार्यों का उल्लेख न किया जाए।¹ ना ही उन्हें उदाहरण स्वरूप किया जाए। इस प्रकार साहस और दृढ़ता से अनैतिकता के एक कारण तथा उसके स्रोत को समाप्त किया गया।
अन्य सुधार भी निर्णायक थे। महाभारत में दीर्घतमस और श्वेतकेतु नामक दो सुधारकों का उल्लेख है। श्वेतकेतु ने व्यवस्था दी कि विवाह अटूट बंधन है और उसे तोड़ा नहीं जा सकता। दीर्घतमस के दो सुधार हैं। उसने बहुपतित्व पर प्रतिबंध लगाया और घोषित किया कि किसी स्त्री का एक समय केवल एक पति होगा । उसका दूसरा सुधार यह बताया जाता है कि उसने नियोग को विनियोजित किया। उसकी अति महत्वपूर्ण पूर्ति निम्न प्रकार रखी गई:
(1) विधवा का पिता अथवा भाई (अथवा विधवा के पति के) उस गुरु के पास जाएं, जिसने मृतक पति और उसके संबंधियों को शिक्षा दी हो अथवा उनके लिए यज्ञ किया हो और मृत पति के लिए संतान उत्पन्न करने वाला नियत कराए²।
(2) (ए) पति, मृतक अथवा जीवित हो किन्तु उसके पुत्र न हो;
2. परिवार के सदस्यों के परामर्श से पति के लिए गुरु संतानोत्पत्ति करने वाला नियुक्त करें, 3. वह पति का भाई अथवा सपिण्ड अथवा सगोत्र ( गौतम के अनुसार) या सपरिवार अथवा सजातीय हो 4. नियत पुरुष और विधवा काम वासना वश नहीं वरन् कर्त्तव्य मानकर सहवास करें, 5. नियत पुरुष अपने शरीर से घी अथवा तेल मले। (नारद स्त्री पुमसा, 82) उससे बात न करे, न चुम्बन करे, न कामकेलि करे, 6. यह संबंध एक पुत्र के जन्म तक ( कुछ के अनुसार दो ) तक सीमित रहेगा, 7. विधवा की आयु अपेक्षाकृत कम होनी चाहिए। यह अधिक वय की न हो, बंध्या न हो, ऋतुमती होने का समय समाप्त न हुआ हो अथवा रोगी अथवा गर्भवती न हो। (बौधा ध.सू. II 2.70, नारद, स्त्रीपुमसा 83.84 (8) पुत्र जन्म के उपरांत वे एक दूसरे को ससुर और पुत्रवधू माने (मनु. 9.62 ) । यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि देवर, ज्येष्ठ ने भाभी के साथ बड़ों की अनुमति के बिना सहवास किया है या यदि अन्य परिस्थितियां अनुकूल नहीं हैं ( यदि पति से पुत्र पहले ही हैं ) और उसने बड़ों की सहमति से ही सहवास किया हो तो वह परिजन मैथुन का पापी होगा ।"
1. गौतम धर्मसूत्र में नियम निर्धारित है कि ऋषियों के चरित्र को उदाहरण बना कर अनुगमन नहीं किया जा सकता - "ना देवा चरितम चरैयते"। इससे यह सीमा बांध दी गई है कि देवों के कार्य उदाहरण नहीं बन सकते। यह एक मुक्त श्लोक है जसका स्रोत अज्ञात है।
2. काणे ग्रंथ, भाग 1, पृ. 60
आर्यों के प्राचीन समाज में कुछ अन्य सुधार किये गये, जो नैतिक उत्थान के लिए था। विवाह के संबंध में कुछ निषेधात्मक नियम बनाए गए, जिससे पिता, पुत्री, भाई-बहन, मां-बेटे और दादा पोती के बीच विवाह वर्जित कर दिए गए, गुरु की पत्नी के साथ संभोग को भी जघन्य पाप घोषित किया गया। जुए पर रोक लगाने के प्रयत्नों के भी प्रमाण हैं। धर्मसूत्रों के प्रत्येक लेख में ऐसे विधान के प्रसंग हैं जिनमें राजा से कहा गया कि राजा का कर्त्तव्य है कि राजदण्ड से कठोर दण्ड देकर जुए पर नियंत्रण करें।
कलियुग के आरंभ होने से काफी पहले ये प्रसंग मिलते हैं। यह स्वाभाविक है कि नैतिक दृष्टि से कलियुग बेहतर है। यह कहना कि कलियुग में नैतिकता का ह्रास हो रहा है, न केवल निराधार है बल्कि स्पष्ट रूप से पथभ्रष्टता है।
V
कलियुग के संबंध में इस विवेचन से बहुत-सी पहेलियां उत्पन्न होती हैं। महायुगों का विचार कब जन्मा? यह सत्य है कि संसार भर में अतीत को स्वर्गीय समझा जाता है। महायुग की कल्पना यहां भी की जाए तो कोई अजीब बात नहीं। अन्यत्र यह मान्ता है कि स्वर्णयुग गया तो गया । परन्तु महायुग का मोह हमारे यहां जीवित है। वह एक चक्र पूरा होने पर फिर आएगा ।
दूसरी पहेली है कि कलियुग 165 ई.पू. समाप्त क्यों नहीं हुआ जबकि खगोलशास्त्रियों के अनुसार यह समाप्त हो जाना चाहिए था। तीसरी पहेली कलियुग की संध्या और संध्यांश का है। यह स्पष्ट है कि यह बाद की कल्पना है क्योंकि विष्णु पुराण में उनका उल्लेख अलग से किया गया है। यह जोड़ी क्यों गई ? फिर काल-गणना के संबंध में भी झमेला है। पहले कलियुग का समय सामान्य वर्ष में गिना गया था किन्तु बाद में कहा गया ये दैवी वर्ष है। इसका अर्थ हुआ जो कलियुग 1200 वर्ष में बीत जाना था, उसकी अवधि का विस्तार 4,32,000 वर्ष तक होगा। यह नई खोज क्यों की गई ? कलियुग का इतना लम्बा विस्तार वैदिक ब्राह्मणों ने क्यों किया? क्या यह कुछ शूद्र राजाओं पर अनुचित दबाव जमाने की चाल थी कि कलियुग की खोज कर ली गई और उसे अनंत बना दिया गया ताकि प्रजा को उनके राज पर विश्वास न रहे ?