हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
अब हम स्त्री-पुरुष के वैवाहिक संबंधों पर आते हैं। इतिहास क्या कहता है ? आरंभ में आर्यों में विवाह के कोई नियम ही नहीं थे। समाज के उच्च और निम्न, दोनों वर्गों में स्वच्छंद संभोग प्रथा थी। इस संबंध में कोई प्रतिबंध नहीं थे। निम्नांकित उदाहरणों से यह स्पष्ट है।
ब्रह्मा ने अपनी स्वयं की पुत्री शतरूपा से विवाह किया। उनका पुत्र पृथुवंश का संस्थापक मनु था। उसी से इक्ष्वाकु और इला का उदय हुआ।
हिरण्यकश्यपु ने अपनी पुत्री रोहिणी से विवाह किया। पिता-पुत्री के विवाह के आम उदाहरण हैं जैसे वशिष्ठ और शतरूपा, जहनु और जाह्नवी, सूर्य और उषा । पिता-पुत्री के बीच विवाह एक सामान्य बात थी । वह कानीन पुत्रों की मान्यता से प्रकट हैं। कानीन पुत्र का अर्थ है कुंवारी कन्या से पुत्रोत्पत्ति | विधानानुसार वे पुत्री के पिता से उत्पन्न पुत्र होते थे। स्पष्ट है कि वे उनके पिताओं द्वारा उत्पन्न पुत्र ही होने चाहिए ।
ऐसे भी उदाहरण हैं कि पिता और पुत्र एक ही स्त्री के साथ सहवास करते थे। ब्रह्मा मनु के पिता थे और शतरूपा मनु की मां। यही शतरूपा मनु की पत्नी भी थी। दूसरा उदाहरण श्रद्धा का है। वह वैवस्वत की पत्नी है। मनु उनका पुत्र है परन्तु श्रद्धा मनु की पत्नी भी है। इससे संकेत मिलता है कि पिता और पुत्र एक ही स्त्री से सहवास करते थे। अपने भाई की पुत्री से विवाह करने की स्वतंत्रता थी । धर्म ने दक्ष की दस कन्याओं से विवाह किया जबकि दक्ष और धर्म भाई-भाई थे। चचेरी बहन से विवाह का भी प्रचलन था। कश्यप की तेरह पत्नियां थीं और वे सभी दक्ष की पुत्रियां थीं। दक्ष कश्यप के पिता मारीचि का भाई था ।
ऋग्वेद में यम और यमी का प्रसंग आया है। यह प्रसंग भी बहुत कुख्यात है जिसमें भाई-बहन के विवाह संबंधों पर प्रकाश पड़ता है क्योंकि यम ने यमी के साथ संभोग करने से इंकार कर दिया। इससे यह नहीं कहा जा सकता कि उस युग में ऐसा होता नहीं था।
महाभारत के आदिपर्व में एक वंशावली दी गई है, जो ब्रह्मदेव से आरम्भ होती है। इस वंशावली के अनुसार ब्रह्मा के तीन पुत्र थे, मारीचि, दक्ष और ब्रह्मा तथा एक पुत्री, जिसका नाम दुर्भाग्य से वंशावली में नहीं है। इसी वंशावली में कहा गया है कि दक्ष की बहन ही हुई। उन दोनों से 50-60 पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं। भाई-बहन के विवाह के अन्य उदाहरण भी उपलब्ध हैं। वे हैं- पूशान और उसकी बहन अच्छोद और अनावसु, पुरुकुत्स और नर्मदा, विप्राचिती और सिंहिका, नहुष और विराज, शुक्र- उशनस और गो, अंशुमान और यशोदा दशरथ और कौशल्या, राम और सीता, शुक और पीवरी, द्रौपदी और प्रश्नी । ये भाई-बहन के विवाह थे।
निम्नांकित उदाहरण प्रकट करते हैं कि माता और पुत्र के बीच भी सहवास होता था। पूशान और उसकी मां, मनु और शतरूपा और मनु और श्रद्धा का उदाहरण है। दो अन्य बातों की ओर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। अर्जुन और उर्वशी और अर्जुन और उत्तरा। उत्तरा का अभिमन्यु से विवाह हुआ था, जो अर्जुन का पुत्र था। उस समय उसकी आयु केवल 16 वर्ष की थी। उत्तरा का अर्जुन के साथ सम्पर्क था। वह उसे नृत्य-संगीत सिखाता था। यह बताया गया है कि उत्तरा के मन में अर्जुन के प्रति प्रेमांकुर थे और महाभारत कहता है इन प्रेम-संबंधों के कारण ही उनका प्राकृतिक विवाह हुआ। महाभारत यह नहीं कहता कि उनका विधिवत विवाह हुआ । यदि प्राकृतिक विवाह हुआ तो कहा जा सकता है कि अभिमन्यु ने अपनी माता से विवाह किया। इस संबंध में अर्जुन- उर्वशी प्रकरण और भी ठोस उदाहरण है।
इन्द्र, अर्जुन का वास्तविक पिता था। उर्वशी, इन्द्र की रखैल थी । इस प्रकार वह अर्जुन की मां के रिश्ते में थी। यह अर्जुन की शिक्षिका थी और उसे नृत्य और संगीत सिखाती थी । उर्वशी अर्जुन पर मोहित हो गई। उसके पिता इन्द्र की सहमति से उसने अर्जुन से सम्भोग करने के लिए निवेदन किया। अर्जुन ने सहवास से यह कहकर इंकार कर दिया कि वह उसकी माता के समान है। ऐतिहासिक रूप से अर्जुन की अस्वीकृति के स्थान पर उर्वशी का व्यवहार अधिक महत्वूर्ण है। उसके दो कारण हैं। उर्वशी द्वारा इन्द्र की सहमति से, अर्जुन से प्रणय निवेदन करना इस बात का परिचायक है कि उस समय ऐसा हुआ करता था। दूसरी बात यह है कि उर्वशी अर्जुन से कहती है कि यह तो एक पुराना रिवाज है और अर्जुन के पूर्वजों ने ऐसे आमंत्रण को निःसंकोच स्वीकार किया है।
सहवास के लिए सगोत्र का ध्यान न रखने की निम्नांकित कहानी से बड़ा उदाहरण मिल ही नहीं सकता, जो हरिवंश पुराण के दूसरे अध्याय में समाविष्ट है। इसके अनुसार सोम दस पिताओं का पुत्र था, जो बहुपतित्व-प्रथा का संकेत है। उनमें से एक का नाम था- प्रल्हेत। सोम की एक पुत्री थी- मरीशा । सोम के दस पिता और स्वयं सोम उसके साथ सहवास करते थे। यह एक ऐसा उदाहरण है, जब किसी स्त्री के पितामह और पिता उसके पति भी थे, जो अपने पितामहों और पिता की पत्नी थी। दक्ष प्रजापति सोम का पुत्र था और उसने अपनी 27 पुत्रियाँ अपने पिता को संतति वृद्धि के लिए ब्याह दीं। 'हरिवंश' के तीसरे अध्याय में लेखक कहता है कि दक्ष ने अपनी एक बेटी का विवाह अपने ही पिता ब्रह्मा से कर दिया। उससे एक पुत्र नारद उत्पन्न हुआ। यह सपिण्ड स्त्री-पुरुषों के सहवास के प्रसंग हैं।
प्राचीन आर्य स्त्रियां बेची जाती थीं। आर्य विवाह पद्धति के रूप में पुत्रियों के विक्रय के साक्ष्य उपलब्ध हैं। किसी पिता का पुत्र, किसी स्त्री का जो मूल्य चुकाता था, उसके लिए पारिभाषिक शब्द 'गो-मिथुन' प्रचलित था। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि गो-मिथुन के बदले लड़कियाँ बेच दी जाती थीं। 'गो-मिथुन' का अर्थ है एक गाय और एक वृषभ जो किसी कन्या का समुचित मूल्य समझा जाता था। न केवल पिता अपनी पुत्रियों को बेचा करते थे बल्कि पति अपनी पत्नियां भी बेच दिया करते थे। हरिवंश पुराण के 79वें अध्याय में इस बात का जिक्र है कि एक अनुष्ठान पुण्यक व्रत में यज्ञ करने वाले पुरोहित को शुल्क क्यों दिया जाए। इसमें कहा गया है कि ब्राह्मणों की पत्नियां उनके पतियों से खरीद ली जाएं और पुरोहित को उसके दक्षिणा के रूप में दे दिया जाए। इससे यह स्पष्ट है कि ब्राह्मण बेझिझक अपनी पत्नियां बेचते थे।
यह भी सत्य है कि प्राचीन आर्य अपनी स्त्रियों को दूसरों को सहवास के लिए किराये पर दे दिया करते थे। महाभारत के अध्याय 103 से 123 में माधवी के जीवन का उल्लेख है। इस आख्यान के अनुसार माधवी राजा ययाति की पुत्री थी । ययाति ने उसे गालव को उपहार में दे दिया था जो एक ऋषि था । गालव ने उसे एक के बाद एक तीन राजाओं को क्रमशः सहवास और पुत्र प्राप्ति हेतु दे दिया। जब तीसरे राजा की भोग की अवधि समाप्त हो गई तो गालव ने माधवी को अपने गुरु विश्वामित्र को सहवास के लिए दे दिया जिसको उन्होंने अपनी पत्नी बना लिया और तब तक उसे अपने पास रखा, जब तक उन्हें एक पुत्र प्राप्त नहीं हुआ। इसके उपरांत विश्वामित्र ने उसे गालव को लौटा दिया। अंत में गालव ने उसे उसके पिता ययाति को वापस दे दिया।