हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
प्राचीन आर्य समुदाय में बहुपतित्व और बहुपत्नीत्व दोनों प्रथाएँ प्रचलित थीं। उदाहरण इतने अधिक हैं कि उनको प्रस्तुत करना आवश्यक नहीं है । परन्तु शायद जिसका लोगों को पूरी तरह पता नहीं है, वह तथ्य था- स्वच्छंद संभोग । स्वच्छंद संभोग उस स्थिति में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है जब हम नियोग-प्रथा पर विचार करते हैं। नियोग - प्रणाली जिसे आर्यों ने प्रथा का रूप दे दिया, जिसमें कोई स्त्री विवाहित पति के अतिरिक्त, किसी अन्य व्यक्ति से नियोग (सहवास) से संतान प्राप्त ( उत्पन्न ) कर सकती थी । इस प्रणाली के कारण समाज में संभोग की पूरी स्वच्छंदता थी, क्योंकि उस पर कोई नियंत्रण नहीं था। पहले तो इस पर कोई सीमा नहीं थी कि किसी स्त्री से कितने नियोग कराए जाएं। माधुरी को नियोग की अनुमति थी। अम्बिका ने एक वास्तविक नियोग कराया और दूसरे की इच्छा प्रकट की। सरदनंदिनी के साथ तीन बार नियोग हुआ। पाण्डु ने अपनी पत्नी कुंती को चार नियोगों की आज्ञा दी । व्युसिसताश्व को सात की आज्ञा थी और बलि के विषय में लिखा है कि उसने 17 बार नियोग की आज्ञा प्रदान की। इनमें से 11 एक पत्नी के साथ और 6 दूसरी के साथ। जैसे नियोगों की संख्या पर कोई सीमा नहीं थी, वैसे ही इसकी भी कोई परिभाषा नहीं थी कि किस स्थिति में नियोग कराया जा सकता है। नियोग किसी व्यक्ति के जीवन-काल में होता था और उन स्थितियों में भी जहां पति संतानोत्पत्ति की अक्षमता से नहीं उभर पाता हो। सम्भवतः पहल पत्नी की ओर से की जाती थी। हां, पुरुष का चुनाव भी उसी का होता था । उसे यह स्वतंत्रता थी कि यह निर्णय कर सके क उसे किस पुरुष से नियोग कराना है और कितने बार । नियोग अवैध संभोग का दूसरा नाम है, जो एक रात के लिए भी हो सकता था, बारह वर्ष तक भी या तब तक, जब तक कि इस व्यभिचार के प्रश्रयदाता पति की सहमति होती थी ।
आर्यों के प्राचीन समाज में जन सामान्य का यह आचरण और नैतिकता थी । ब्राह्मणों का चरित्र कैसा था? सच यह है कि वे जन-सामान्य से बेहतर नहीं थे । ब्राह्मणों की दुश्चरित्रता के अनेक उदाहरण हैं। परन्तु कुछ का उदाहरण पर्याप्त होगा । यह तो पहले ही बताया जा चुका था कि ब्राह्मण अपनी पत्नियां बेच दिया करते थे । हम उनकी दुश्चरित्रता की और मिसालें देंगे। उत्तक वेद का शिष्य था जो जनमेजय तृतीय का पुरोहित था। वेद की पत्नी उत्तंक से अनुनय करती है कि वह उसे पत्नी के रूप में भोगे और संभोग सुख के लिए उसके पास आए। दूसरा प्रसंग उद्दालक की पत्नी का है। वह स्वेच्छा से अथवा बुलाने पर किसी भी ब्राह्मण के पास जा सकती थी। श्वेतकेतु उसका पुत्र है, जो उसके पति के एक शिष्य से उत्पन्न हुआ था। व्यभिचार की यह मात्र मिसालें नहीं हैं। ये तो वे बातें हैं जिन्हें सब जानते हैं कि ब्राह्मण स्त्रियों को कितनी छूट थी । जटिल गौतमी एक ब्राह्मण स्त्री थी, जिसके सात पति थे, जो ऋषि थे। महाभारत में कहा गया है कि जब द्रौपदी को नगरवासियों ने अपने पांच पतियों के साथ देखा तो उसकी प्रशंसा की और उसकी उपमा जटिल गौतमी से दी जिसके सात पति थे। ममता उतथ्य की पत्नी है परन्तु उतथ्य के भाई है बृहस्पति के उसके पास उतथ्य के जीवन काल में ही खुला आना-जाना है। उसे केवल एक बार ममता की आपत्ति का सामना करना पड़ा, जब उसने कहा कि वह गर्भवती है, इसलिए अभी प्रतीक्षा करें परन्तु उसने यह नहीं कहा कि उनके ये संबंध अनुचित या अवैध हैं।
ब्राह्मणों के बीच ऐसी अनैतिकता व्याप्त थी कि जब बहुपतित्व के कारण दुर्योधन ने द्रौपदी पर कटाक्ष किया और उसकी गाय से उपमा दी तो उसने कहा कि तेरे पतियों को तो ब्राह्मण के घर पैदा होना चाहिए था ।
अब जरा ऋषियों की नैतिकता का विवेचन करें। हम वहां क्या देखते हैं? पहली चीज जो हम ऋषियों में पाते हैं, वह भी पशुगमन । विभाण्डक ऋषि का उदाहरण लें। महाभारत के वन पर्व के 100वें अध्याय में कहा गया है कि वह एक हिरनी के साथ व्यभिचार करता था । उससे एक पुत्र भी उत्पन्न हुआ जिसेश्रृंग ऋषि कहा जाता है। महाभारत के आदि पर्व के अध्याय एक और 118 में एक कथानक है कि किस प्रकार पाण्डवों के पिता पाण्डु को दम ( महाभारत में किंदम नाम है) ऋषि ने शाप दिया। व्यास कहते हैं कि किंदम ऋषि एक हिरणी के साथ जंगल में मैथुन में संलग्न था। जब वह इसमें लिप्त था तो पाण्डु ने उस पर एक तीर छोड़ा और किंदम ऋषि ने प्राण त्याग दिए । परन्तु मरने से पूर्व उसने पाण्डु को यह शाप दिया कि जब भी वह अपनी पत्नी से सहवास के लिए उद्यत होगा, उसका तभी प्राणांत हो जाएगा। ऋषि के पशु-मैथुन पर पर्दा डालने के लिए व्यास कहते हैं कि ऋषि और उसकी पत्नी ने संभोग के लिए हिरण और हिरणी का रूप धारण कर रखा था। भारत के प्राचीन धार्मिक साहित्य में मैथुन के अन्य उदाहरण ढूंढने में कोई कठिनाई नहीं होगी, बशर्तें कोई थोड़ी मेहतन करे ।
ऋषियों की एक अन्य घृणास्पद प्रवृति थी - स्त्रियों के साथ खुले में और आम जनता के सम्मुख संभोग करना। महाभारत के आदि पर्व के अध्याय 63 में भी ऐसी ही एक अन्य घटना का प्रसंग है कि ऋषि पराशर ने सत्यवती अर्थात् मत्स्यगंधा के साथ कैसे सहवास किया जो एक मछुआरे की पुत्री थी । व्यास कहते हैं कि उन्होंने खुले में सबके सामने मैथुन किया । आदि पर्व के अध्याय 104 में भी ऐसी ही एक अन्य घटना का प्रसंग है। जहां कहा गया है कि ऋषि दीर्घतमस ने लोगों के समक्ष संभाग किया। महाभारत में ऐसी अनेक घटनाएं हैं। उन्हें खोदने की आवश्यकता नहीं। ‘अयोनिजा' शब्द यह प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है। आम बात क्या थी? अधिकांश हिन्दू जानते हैं कि सीता, द्रौपदी और अन्य प्रमुख नारियों को अयोनिजा कहा जाता है। अयोनिजा का अर्थ है, ऐसा शिशु जिसका गर्भधारण निष्कलंक हो। ‘अयोनि' का अर्थ व्युत्पत्ति के माध्यम से बताने की कोई आवश्यतकता नहीं। 'योनि' का मूल अर्थ गृह है । योनिज का अर्थ है ऐसा शिशु जिसका घर में जन्म हुआ हो । अयोनिजा का अर्थ है ऐसा शिशु जो घर में उत्पन्न न हुआ हो । यद अयोनिजा, यह सही व्युत्पत्ति है तो इससे प्रमाणित होता है कि ऐसा चलन मौजूद था कि सरेआम लोगों के समक्ष संभोग किया जाता था।
छांदोग्य उपनिषद् में ऋषियों की अनैतिकता का एक और साक्ष्य मिलता है। इस उपनिषद के अनुसार लगता है, ऋषियों ने यह नियम बनाया कि यदि कोई यज्ञ कर रहा है और उस समय कोई स्त्री ऋषि से संभोग करना चाहे तो ऋषि यज्ञ अधूरा छोड़कर और किसी एकांत स्थान पर जाने के बजाए यज्ञ मण्डप में ही सार्वजनिक रूप से उस स्त्री के साथ मैथुन करे। इस अनैतिकता को भी धार्मिक रूप दे दिया गया था जिसे वामदेव व्रत कहते थे। कालांतार में यही वाममार्ग कहलाया ।
आर्यों का परमपवित्र साहित्य ऋषियों की नैतिकता दर्शाने में और बढ़कर है, अभी उसका एक पक्ष और बताना है।
लगता है, प्राचीन आर्यों की लालसा होती थी कि उनकी संतति अच्छी उत्पन्न हो और इस इच्छा की पूर्ति के लिए वे अपनी पत्नियों को दूसरों के पास भेजा करते थे, विशेष रूप से ऋषियों के पास, जो आर्यों की दृष्टि में कुलीन सांड थे। ऐसे ऋषियों की संख्या बहुत अधिक थी। असल में कुछ ऋषियों ने तो इसे बाकायदा धंधा बना लिया था और वे इतने भाग्यशाली थे कि राजा तक अपनी रानियों को गर्भवती कराने के लिए उनकी शरण में जाया करते थे। अब जरा देवों¹ पर भी एक दृष्टिपात डालें।
देवगण शक्तिशाली और अत्यन्त कामुक प्राणी हुआ करते थे। यह एक सुविदित आख्यान है कि इन्द्र ने गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या के साथ बलात्कार किया। किन्तु आर्य स्त्रियों के साथ उन्होंने कितनी बदकारी की, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। आरम्भस से ही देव जाति ने आर्य सम्प्रदाय में अपनी बादशाहत जमा ली थी। इसी कारण इन देवों की हवस मिटाने के लिए आर्य स्त्रियों को वेश्या के स्तर तक गिरा दिया गया था। आर्य इस बात पर गर्व करते थे कि उनकी पत्नी के किसी देव से शारीरिक संबंध हैं और किसी देव ने उसकी पत्नी को गर्भवती बना दिया है। इसका उल्लेख महाभारत और हरिवंश पुराण में है, जब आर्य स्त्रियों को इन्द्र, यम, अग्नि, वायु और अन्य देवों से पुत्र पैदा हुए। इसका उल्लेख इतनी बार है कि इस बात पर अचरज होता है कि कितने बड़े पैमाने पर देवों के आर्यों की स्त्रियों के साथ अवैध संबंध थे।
समय बीतने पर देवों और आर्यों के बीच संबंध स्थायी रूप लेने लगे और लगता है, यह प्रवृत्ति सामंतवाद के रूप में पनपी । देवताओं ने आर्यों से दो अधिकार (लाभ)² प्राप्त किए।
1. पता नहीं, जिन्होंने प्रथम बार संस्कृत से अंग्रेजी में अनुवाद किया, उन्होंने देवों को देवता क्यों समझ लिया? यह एक भयानक गलती थी, जिससे यह भ्रांति पैदा हुई कि वैदिक साहित्य के परिप्रेक्ष्य में आय के सामाजिक जीवन को ठीक से नहीं समझा जा सका। देव एक जाति का नाम था, यह निर्विवाद है। राक्षस, दैत्य, देव विभिन्न समुदायों के नाम हैं, जैसे कि आर्य और दस्यु, यह भी असंदिग्ध हैं।
2. क्या देवों और आय के बीच ऐसे संबंध थे जैसे किसी स्वामी के अपनी प्रजा के साथ सामंती स्वभाव के होते हैं, इस बात की अभी छानबीन नहीं की गई है। क्योंकि देवों को मानव समुदाय का नहीं समझा गया। देवगण आर्यों से जो उपहार प्राप्त करते थे, वे वैसे ही थे जैसे स्वामी प्रजा से लेता है।