हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
बाईसवीं पहेली
ब्रह्म धर्म नहीं है, ब्रह्मा किस काम का ?
इतिहास में कई प्रकार की सरकारों का वर्णन है, वे हैं- राजतंत्र, कुलीनतंत्र और प्रजातंत्र । इसमें अधिनायकवाद भी जोड़ा जा सकता है।
इस समय सर्वाधिक सरकारें प्रजातांत्रिक हैं। बहरहाल इस बात पर कोई सहमति नहीं है कि प्रजातंत्र क्या है? इस विषय का निरूपण करने पर हमें इस संबंध में दो विचार मिलते हैं। एक विचार है कि प्रजातंत्र एक प्रकार की सरकार है। इस विचार के अनुसार जब सरकार प्रजा द्वारा चुनी जाती है और जहां प्रतिनिधि सरकार है, वही प्रजातंत्र है। इसके अधीन प्रजातंत्र और प्रतिनिधि सरकार पर्यायवाची है जिसका अर्थ है वयस्क मताधिकार और समय-समय पर चुनाव ।
दूसरे मत के अनुसार प्रजातंत्र सरकार की प्रणाली से भी बढ़कर है। यह समाज के संगठन का स्वरूप है। इसके लिए दो आवश्यक स्थितियां हैं जो इस बात का लक्षण है कि समाज प्रजातांत्रिक ढंग से गठित है। पहला यह कि समाज को वर्गों में विभक्त न किया जाए। दूसरा, लोगों और वर्गों की सामाजिक प्रवृति, जो निरन्तर समायोजन और हित सहयोजन को तत्पर हो। जहां तक प्रथम का संबंध है, इसमें कोई संदेह नहीं कि यह प्रजातंत्र का अति आवश्यक अंग है। जैसा कि प्रो. डेवी का मत है : ¹
(लेखक द्वारा निर्दिष्ट उद्धरण मूल पाण्डुलिपि 'डेमोक्रेसी एंड एजूकेशन', पृष्ठ 98 में उपलब्ध नहीं है।)
प्रजातांत्रिक ढंग से गठित समाज के लिए दूसरी शर्त भी उतनी ही आवश्यक है। वर्गों और व्यक्तियों के हितों में परस्पर सहयोजन न होने के प्रजातंत्र विरोधी परिणाम होते हैं जिनका प्रो. डेवी ने² भलीभांति वर्णन किया है :
1. डेमोक्रेसी एंड एजूकेशन, पृ. 98
2. वही, पृ. 99
इस अध्याय के मूल 20 पृष्ठ हैं। प्रथम दो और अंतिम छह लेखक के हस्तलिखित हैं। शेष टकित पृष्ठों पर लेखक के संशोधन हैं। संपादक
प्रजातंत्र के इन दो विचारों में निःसंदेह प्रथम यदि गलत भी नहीं तो अनावश्यक है । उस समय तक प्रजातांत्रिक सरकार नहीं कहला सकती जब तक कि उस समाज जिनके लिए वह कार्यरत है, उसकी रचना पद्धति प्रजातांत्रिक न हो। जो यह सोचते हैं कि प्रजातंत्र का अर्थ मात्र चुनाव कराना है, वे तीन गलतियां करते हैं।
पहली गलती तो यह विचार है कि सरकार और समाज बिलकुल अलग-अलग हैं। दरअसल सरकार समाज से अलग नहीं है। सरकार अनेक ऐसी संस्थाओं में से है जो समाज में जन्म लेती है और सामूहिक सामाजिक जीवन के लिए उसे कुछ आवश्यक काम सौंपे जाते हैं।
दूसरी गलती वे यह करते हैं कि वह यह नहीं समझते कि सरकार किसी समाज के अंतिम लक्ष्य, उद्देश्यों और आकांक्षाओं की प्रतिबिम्ब है और यह तभी संभव है। जब समाज, जिसमें कि वह सरकार है, उसकी बुनियाद प्रजातांत्रिक है। अगर समाज की संरचना प्रजातांत्रिक नहीं तो सरकार भी वैसी नहीं हो सकती। जहां समाज शासक और शक्ति वर्ग में बंटा होगा, वहां सरकार, निश्चित रूप से शासक वर्ग की होगी।
उनकी तीसरी गलती यह है कि वे यह भूल जाते हैं कि किसी सरकार का अच्छा या बुरा होना, प्रजातांत्रिक या अप्रजातांत्रिक होना, आमतौर से उसके प्रशासनतंत्र पर निर्भर करता है, विशेष रूप से उसकी प्रशासनिक सेवाओं पर, जिसके ऊपर सर्वत्र सरकार को कानून-व्यवस्था के पालन हेतु निर्भर रहना पड़ता है। यह सब उस सामाजिक वातावरण पर निर्भर है जिसमें प्रशासक पलता है। यदि सामाजिक परिवेश ही अप्रजातांत्रिक है तो सरकार भी अप्रजातांत्रिक ही होगी।
लोग एक और गलती करते हैं जब वे यह समझ बैठते हैं कि प्रजातांत्रिक सरकार चलाने के लिए प्रजातांत्रिक प्रणाली अपना लेना ही काफी है। इस गलती को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि अच्छी सरकार कौन - सी होती है।
अच्छी सरकार का अर्थ है अच्छे कानून और अच्छा प्रशासन । यही अच्छी सरकार का मूलमंत्र है, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं । यदि जिनके पास सत्ता है, वे उसका उपयोग समस्त समाज अथवा दलित वर्ग के स्थान पर अपने स्वयं के समाज के हित में करते हैं तो वह अच्छी सरकार नहीं हो सकती।
कोई प्रजातांत्रिक सरकार भली प्रकार चल सकती है या नहीं, यह समाज में सदस्यों पर निर्भर करता है। यदि समाज के लोगों की मानसिकता प्रजातांत्रिक है। तो प्रजातांत्रिक सरकार से अच्छे परिणामों की अपेक्षा की जा सकती है। अगर ऐसा नहीं है तो प्रजातांत्रिक सरकार आसानी से एक खतरनाक तरीके की सरकार हो सकती है। यदि किसी समाज के सदस्य जातियों अथवा वर्गों में बंटे होंगे और एक-दूसरे से कोई मतलब नहीं रखेंगे और जहां प्रत्येक व्यक्ति की आस्था पहले उसके अपने वर्ग के प्रति है तो यह जातिवाद अथवा वर्गवादी बन जाता है और अपने वर्ग के हितों को सबसे ऊपर रखकर चलेगा और अपने अधिकारों का प्रयोग कानून और न्याय को विकृत करके अपने वर्ग के हित - संवर्धन में लगायेगा और इस उद्देश्य से उन लोगों के प्रति जीवन के हर क्षेत्र में नियोजित रूप से भेदभाव बरतेगा जो उसके वर्ग से सम्बद्ध नहीं हैं तो प्रजातांत्रिक सरकार क्या कर लेगी? उस समाज में जहां विभिन्न वर्गों के बीच संघर्ष होता है और समाज विरोधी गतिविधियां और आक्रामक भावना पनपती हैं वहां की सरकार न्याय और निष्पक्षता से अपना कार्य नहीं कर सकती। ऐसे समाज में यदि सरकार लोगों की है और लोगों द्वारा बनाई भी गयी है किन्तु वह लोगों के लिए नहीं हो सकती। यह एक वर्ग की और एक वर्ग के लिए है। लोगों के लिए सरकार वही हो सकती है जहां प्रत्येक नागरिक का व्यवहार प्रजातांत्रिक है। इसका अर्थ है जहां प्रत्येक नागरिक अन्य सभी नागरिकों को समान समझने के लिए तैयार है; उतनी ही स्वतंत्रता देने के लिए तैयार है जितनी स्वयं चाहता है। प्रजातांत्रिक मानसिकता से एक प्रजातांत्रिक समाज में व्यक्ति का समाजीकरण हो जाता है। प्रजातांत्रिक सरकारों का पतन आमतौर से इस कारण हुआ है कि जिस समाज के लिए वे बनीं, वह समाज ही प्रजातांत्रिक नहीं था ।
दुर्भाग्य से इस बात का अहसास ही नहीं किया जाता कि अच्छी सरकार अपने समाज की मानसिक और नैतिक प्रवृत्ति पर निर्भर करती है। प्रजातंत्र एक राजनीतिक तंत्र से आगे भी कुछ है। यह एक सामाजिक प्रणाली से भी आगे है। यह मस्तिष्क की प्रवृत्ति और जीवन-दर्शन है।
कुछ लोग प्रजातंत्र की बराबरी समानता और स्वतंत्रता से करते हैं। इसमें तो कोई सन्देह नहीं कि गहनता से प्रजातंत्र की अन्तरात्मा ही समानता और स्वतंत्रता है । परन्तु इससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि समानता और स्वतंत्रता कैसे सुरक्षित रह सकती है। कुछ व्यक्ति कह सकते हैं कि सरकार कानून, समानता और स्वतंत्रता की रक्ष होती है। यह सही जवाब नहीं है। समानता और स्वतंत्रता सहभावना से आती है जैसा कि फ्रांस की राज्यक्रांति के कर्णधारों ने उसे भ्रातृत्व कहा। भ्रातृत्व अपने में सम्यक अभिव्यक्ति नहीं है। बुद्ध ने सम्यक के लिए सही शब्द 'मैत्री' कहा है। इससे पता चलेगा कि हिन्दू धर्म में और दर्शन में भ्रातृत्व का सिद्धांत ही अज्ञात है। पर निष्कर्ष ऐतिहासिक तथ्यों से मेल नहीं खाता। हिन्दुओं के धार्मिक और दार्शनिक विचारों की एक विचारधारा में भ्रातृत्व - भाव से भी बढ़कर सामाजिक प्रजातंत्र था, यह विचारधारा थी ब्रह्म-दर्शन¹ ।
1. मैंने यह शब्द प्रोफेसर हॉपकिंस की पुस्तक एपिक्स ऑफ इंडिया से लिया है।