हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
यदि कोई पूछे कि यह ब्रह्म-दर्शन क्या है, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हिन्दुओं तक के लिए यह एक नई बात है। हिंदुओं को वेदांत का ज्ञान है। वे ब्राह्मणवाद से परिचित हैं, किन्तु ब्रह्मवाद को नहीं जानते। आगे बढ़ने से पूर्व कुछ विवरण आवश्यक है।
हिंदुओं के दर्शन और धर्म के तीन अंग हैं: वे इस प्रकार हैं - 1. ब्रह्मवाद, 2. वेदांत, और 3. ब्राह्मणवाद । यद्यपि उनका परस्पर सम्बन्ध है परन्तु इनकी तीन भिन्न विचारधाराएं और मत हैं। वे हैं-
| 1. | सर्वम खलविदम् ब्रह्म | - सभी कुछ ब्रह्म है। |
| 2. | अहं ब्रह्मास्मि | - आत्मा ही ब्रह्म है इसलिए मैं ही ब्रह्म हूं। |
| 3. | तत्वामसि | - आत्मा और परमात्मा एक हैं। इसलिए तू भी ब्रह्म है। |
ये महावाक्य कहलाते हैं और इन्हीं में ब्रह्मवाद का सार है। निम्नलिखित मतों में वेदांत की शिक्षा का सार है-
1. ब्रह्म ही सत्य है।
2. जगत माया अथवा मिथ्या है।
3. जीव और ब्रह्म का संबंध-
(i) एक है, (ii) एक नहीं है परन्तु आत्मा परमात्मा का अंश है। उससे भिन्न नहीं है, (iii) वे भिन्न और भाज्य हैं।
ब्राह्मणवाद का सार इस प्रकार प्रकट किया जा सकता :
1. चातुर्वर्ण्य में विश्वास ।
2. वेदों की पवित्रता और असंदिग्धता ।
3. मुक्ति का मार्ग मात्र यज्ञ ।
अधिकांश लोग वेदांत और ब्राह्मणवाद के बीच भेद से परिचित हैं और यह जानते हैं कि उनके बीच मतभेद हैं? किन्तु ब्राह्मणवाद और वेदांत के बीच के भेद को बहुत कम लोग जानते हैं। यहाँ तक कि हिंदू भी ब्राह्मणवाद के सिद्धांत से अवगत नहीं हैं और न ही इसमें और वेदांत के बीच भेद से परिचित हैं । किन्तु इनके बीच स्पष्ट अंतर है। ब्रह्मवाद और वेदांत के बीच इस बात में सहमति है कि आत्मा और ब्रह्म एक ही हैं। परन्तु ब्राह्मणवाद जगत को मिथ्या नहीं मानता, वेदांत का विश्वास मिथ्यावाद है। दोनों के बीच यही मौलिक भेद है।
ब्राह्मणवाद का सार है विश्व सत्य है और विश्व के सत्य के पीछे ब्रह्म है। इसलिए प्रत्येक तत्व का सार ब्रह्म है।
ब्रह्मवाद के विरुद्ध दो प्रकार की आलोचनाएं की जाती हैं। यह कहा जाता है कि ब्रह्मवाद ढिठाई है। क्योंकि यह कहना " अहं ब्रह्मस्मि " एक प्रकार का अभिमान है। इसकी दूसरी आलोचना यह कहकर की जाती है कि कोई व्यक्ति ब्रह्म को नहीं जान सकता। “अहं ब्रह्मस्मि" इसलिए कहना एक गर्वोक्ति है। परन्तु किसी का अपना विश्वास हो सकता है। जिस संसार में मानवता इतने हीन भाव से ग्रस्त है, वहां एक व्यक्ति द्वारा ऐसी घोषणा करना स्वागत योग्य है। प्रजातंत्र का तकाजा है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता का अहसास होना चाहिए। यह भी आवश्यकता है कि प्रत्येक व्यक्ति यह समझे कि वह भी अन्य के समान है। जो “अहं ब्रह्मस्मि" का उपहास करते हैं, वे महावाक्य का दूसरा अंश भूल जाते हैं। वह है “ तत्वामसि" यदि तत्वामसि को छोड़कर केवल अहं ब्रह्मास्मि कहा जाएगा तो यह हास्यापद होगा । किन्तु तत्वामसि कहने से ब्रह्मवाद पर गर्वोक्ति का आरोप नहीं लग सकता ।
यह ठीक है कि ब्रह्म अजेय है । परन्तु इसके बावजूद ब्रह्म के सिद्धांत के कुछ सामाजिक प्रभाव हैं। आश्चर्यजनक रूप से प्रजातंत्र का बीज मंत्र यदि सभी व्यक्ति ब्रह्म का अंश हैं तो सभी समान भी हुए इसलिए उनमें लोकतंत्र के बीज विद्यमान हैं। इस दृष्टिकोण से ब्रह्म अज्ञेय हो सकता है । परन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रजातंत्र का जितना बीज रूप ब्रह्म के सिद्धांत में है, उतना अन्यत्र नहीं।
केवल इस बात पर प्रजातंत्र का समर्थन करना एक बहुत कमजोर आधार है कि हम सभी ईश्वर की संतान हैं। इसलिए जब प्रजातंत्र इस आधार को अपनाता है तो उसमें दृढ़ता नहीं आती । परन्तु यह पहचानने और समझने के लिए कि हम सब एक ही तत्व से बने हैं तो इससे प्रजातंत्र में विश्वास के सिवाय अन्य कोई सिद्धांत नहीं बचता। यह मात्र लोकतंत्र का मार्ग नहीं दिखाता वह सबके लिए प्रजातंत्र को अनिवार्य बना देता है।
प्रजातंत्र के संबंध में पश्चिमी विद्वानों ने यह प्रचारित किया है कि प्रजातंत्र का उद्गम या तो ईसाई मत से हुआ है अथवा अफलातून (अरिस्टोटल ) से और इसे छोड़कर कोई अन्य स्रोत नहीं है। यदि उन्हें यह पता होता कि भारत में ब्रह्मवाद का सिद्धांत प्रतिपादित हुआ है, जो प्रजातंत्र का बेहतर आधार प्रदान करता है तो वे इतने हठधर्मी न होते। भारत के योगदान को भी प्रजातंत्र का सैद्धांतिक आधार तैयार करने में स्वीकार किया जाना चाहिए।
प्रश्न यह है कि ब्रह्मवाद का यह सिद्धांत क्या है? यह स्पष्ट है कि ब्रह्मवाद का कोई सामाजिक प्रभाव नहीं है। इसे धर्म का आधार नहीं बनाया गया। जब यह पूछा गया कि ऐसा क्यों हुआ? तो उत्तर यही मिला । ब्रह्मवाद तो केवल दर्शन हैं, जैसे कि दर्शन सामाजिक जीवन का प्रतिबिम्ब न होता हो। शून्य में ही रम गया हो। दर्शन केवल सैद्धांतिक ही नहीं होता। यह एक व्यावहारिक सम्भावना है। दर्शनशास्त्र का मूल जीवन की समस्याओं में है और दर्शनशास्त्र से जो सिद्धांत निकलते हैं, वहीं समाज के पुनर्निर्माण के कारक बनकर समाज में आ जाते हैं। केवल जानना ही आवश्यक नहीं है। जो जानते हैं वे इसे पूरा करें।
ब्रह्मवाद नया समाज क्यों नहीं दे पाया? यह एक बड़ी पहेली है। बात यह नहीं है कि ब्राह्मणों ने ब्रह्मवाद को मान्यता नहीं दी। वह तो दी। परन्तु उन्होंने कभी यह भी पूछा कि ब्राह्मण और शूद्र, पुरुष और नारी, छूत-अछूत के बीच विषमता का समर्थन कैसे कर सकते हैं? परन्तु उन्होंने नहीं पूछा। इसका परिणाम यह निकला कि एक ओर तो हमारे सामने शुद्धतम प्रजातांत्रिक ब्रह्मवाद का सिद्धांत है दूसरी और जातियों, उपजातियों, अछूतों, आदिम जातियों, जरायम पेशा जातियों के खानों में बंटा समाज है। क्या इससे बड़ा भी कोई अजूबा हो सकता है? और भी हास्यास्पद बात है महान शंकराचार्य के उपदेश । क्योंकि यह शंकराचार्य ही थे जिन्होंने कहा- एक ब्रह्म हैं, यही सत्य है, वही निरंतर है और उसी शंकराचार्य ने ब्राह्मणवादी समाज की सभी असमानताओं को शिरोधार्य किया। कोई पागल ही ऐसे दो परस्पर विरोधी सिद्धान्तों का प्रतिपादक हो सकता है। सचमुच ब्राह्मण एक गाय के समान है, वह कुछ भी और सब कुछ खा सकता है। जैसा कि एक गाय करती है, और फिर भी ब्राह्मण बनी रहती है ।