हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
“छाया का पुत्र, जो मनु कहलाता था, उसी वर्ण का होने के कारण उसका दूसरा नाम सावर्णी पड़ा। जैसा कि उसके बड़े भाई मनु वैवस्वत का था। वह आठवें मन्वंतर का मनु है। अब मैं उसका विवरण निम्न बातों के साथ देता हूं। जिस काल में सावर्णी मनु बनेंगे, उनके देवगण होंगे सुतप, अभिताभास और मुख्य तथा प्रत्येक के 21 देवगण होंगे तथा सप्तऋषि इस प्रकार होंगे: दीप्तिमत, गालव, राम, कृप और द्रोणि। मेरा पुत्र व्यास छठा और ऋष्यऋग सातवां ऋषि होगा। इस युग का इन्द्र बलि होगा । विरोचन का निष्पाप पुत्र विष्णु की कृपा से पाताल का राजा बनेगा। सावर्णी की संतानें होंगी - विराज, अरवरिवास, निर्मोह आदि ।
“नौवें मनु दक्ष सावर्णी होंगे। उस समय के तीन प्रकार के देव होंगे - घारस, मारीचिगर्भ और सुधर्मा प्रत्येक वर्ग में बारह देव होंगे और उनका प्रमुख इन्द्र होगा । अद्भुत सवन, द्युतिमत्, भव्य, वसु, मेधातिथी, ज्योतिषान और सत्य, ये सप्तऋषि होंगे, धृतिकेतु, दृप्तिकेतु, पंचहस्त, निर्मय, पृथुसर्व आदि मनु के पुत्र होंगे।
“दसवें मन्वंतर में मनु ब्रह्म सावर्णी होंगे; उनके देवगण होंगे सुधामा, विरुद, शंतसांख्य उनका इन्द्र बलशाली शांति होगा; सप्तऋषि होंगे- हविष्मान, सुकृति, सत्य; अप्पममूर्ति, नाभाग, अप्रतिमौज और सत्यकेतु। मनु के दस पुत्र होंगे- सुक्षेत्र, उत्तौज, हरिषेण आदि । "
“ग्यारहवें मन्वतर का मनु धर्मसावर्णी होंगे। उसके समय देव होंगे विहंगम, कामागम और निर्माणरति और प्रत्येक की संख्या तीस होगी। इस मन्वंतर का इन्द्र वृष होगा। सप्तर्षि होंगे निश्चर, अग्नितेज, वपुस्मान, विष्णु, आरुणी, हविष्मान और अनघ । पृथ्वीपालक मनु के पुत्र होंगे सावर्ग, सर्वधर्म, देवानिक और अन्य। "
“बारहवें मन्वंतर में रुद्र - सावर्णी का पुत्र मनु होगा; उस काल का इन्द्र होगा ऋतुधामा, देवों के नाम होंगे हरित, लोहित, सुमानस और सुकर्मा । प्रत्येक की संख्या पन्द्रह होगी। सप्तर्षि इस प्रकार होंगे: तपस्वी सुतप, तपोमूर्ति, तपोर्ति, तपोधृति, तपोद्युति और तपोधन; और मनु के मेधावी और बलशाली पुत्र होंगे - देव, उपदेव तथा देवश्रेष्ठ आदि । "
तेरहवें मन्वंतर का मनु रौच्य होगा । देववर्ग होगा- सुधामन, सुधर्मन, और सुकर्मण, उनका इन्द्र दिवसपति होगा । सप्तर्षि होंगे निर्मोह, तत्वदर्शन, निष्प्रकंप, निरुत्सुक धृतिमत, अव्यय और सुतापस तथा त्रिसेन, विचित्र तथा अन्य नृप होंगे।
“चौदहवें मन्वतर का मनु भौत्य होगा। शुचि उसका इन्द्र होगा। देवताओं के पांच वर्ग होंगे चाक्षुष, पवित्र, कनिष्ठ, भ्रजीराज, और वैवृद्ध । सप्तर्षि इस प्रकार होंगे। अग्निबाहु, शुचि, शिक्रमागध, ग्रिधृ युक्त और अजित। मनु के पुत्रों के नाम होंगे उरु, गभीर, गभीरा, बृधन, आदि राजा होंगे और इस धरा के शासक होंगे।"
इस प्रकार की है मन्वंतरों की कहानी। आजकल हम सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवाद की बातें सुनते हैं। ब्राह्मणों का सिद्धान्त इसके ठीक विपरीत है। उनका सिद्धान्त है सर्वहारा पर स्वर्ग में बैठे पिताओं का अधिनायकवाद ।
इस प्रकार एक प्रमुख प्रश्न उठता है। एक के पश्चात् एक मनुओं ने किस प्रकार प्रजा पर शासन किया? “प्रजा के लिए उन्होंने कौन से विधान बनाए ?" इसका उत्तर केवल मनुस्मृति से ही प्राप्त होता है।
मनुस्मृति के प्रथम अध्याय से यह उत्तर मिलता है :
1. ऋषिगण मनु के पास गए जो एकाग्रचित्त बैठे थे; उनकी समुचित उपासना करके उन्होंने ऐसा कहा:
2. देव हमें साररूप में उचित क्रम में चारों (मुख्य) वर्णों और मध्यवर्तियों के लिए पवित्र विधान बताएं।
3. क्योंकि, हे देव! केवल आपको ज्ञात है कि स्वायंभुव (मनु) ने क्या अनुष्ठान और आत्मा के ज्ञान का उपदेश किया है जो ज्ञान और अनुभव के परे हैं।
मनु उन्हें उत्तर देते हैं:
5. यह ब्रह्मांड अंधकारमय अदृश्य था । इसका कोई आकार नहीं था । पहचान नहीं थी । न इसे समझा जा सकता था, न इसे जाना जा सकता था क्योंकि यह गहरी निद्रा में सुप्त था।
8. स्वायंभुव मनु ने सोचा मैं एक से अनेक होऊं। उन्होंने सर्वप्रथम जल की रचना की और उसमें बीज डाल दिया।
9. वह (बीज) एक स्वर्णिम अण्डज बन गया। दीप्ति में सूर्य के समान इसी अण्डे से वह स्वयं ब्रह्मा जन्मे, समस्त सृष्टि के रचयिता ।
34. तब मैंने सृष्टि रचना के लिए कठोर तप किया। इसके पश्चात् दस महान ऋषियों को बनाया जो सृष्टि के स्वामी थे।
35. मारीचि, अत्रि, आंगिरस, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेतस वशिष्ठ भृगु और नारद को रचा।
58. परन्तु उसने पवित्र विधान का सम्पादन कर उन्हें दीक्षित किया। स्वयं उन्हें सिखाया, शास्त्रानुसार आरंभ में मात्र मुझे ही, फिर मैंने वे (विधान) मारीचि और अन्य ऋषियों को बताए ।
59. भृगु ये विधान तुम्हें बताएंगे क्योंकि उस ऋषि ने सम्पूर्ण रूप में पूर्णता से मुझसे सीखा है। "
इससे यह प्रकट होता है कि केवल मनु ने विधान बनाया। जो स्वायंभुव मनु था । विष्णु पुराण के अनुसार प्रत्येक मन्वंतर का एक मनु है। उन्होंने अपने मन्वंतरों के लिए विधान क्यों नहीं चाहिए? अथवा स्वायंभुव मनु का बनाया विधान शाश्वत है। यदि ऐसा है तो ब्राह्मणों ने अलग मन्वंतर क्यों बनाए ?