हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
प्राचीन व्यवस्था के अनुसार वानप्रस्थ अथवा संन्यासी अपनी पत्नी अथवा संतान के साथ कोई कठोरता नहीं बरतते थे। मनु की नई व्यवस्था से यह आरम्भ हो गया क्योंकि पहले तो किसी को विवाह के लिए विवश किया जाए और फिर उसे अपनी पत्नी को त्यागने की अनुमति दे दी जाए। यदि यह अपराध नहीं है तो अत्याचार तो है ही। परन्तु मनु ने इसकी कोई परवाह नहीं की। वह तो सभी के लिए वैवाहिक अवस्था निर्धारण पर तुले थे।
मनु ने ऐसा क्यों किया ? उन्होंने वानप्रस्थ और संन्यासियों के लिए गृहस्थाश्रम की अनिवार्यता क्यों रखी ? मनु ने सभी आश्रमों में गृहस्थ को श्रेष्ठ बताया है। वे कहते हैं:
6.87. “विद्यार्थी, गृहस्थ, वैखानस और तापस - इनकी चार स्थितियां हैं इन सबका उद्गम गृहस्थ है। "
6.88. “किन्तु सभी (अथवा ) इनमें से कोई (एक), अवस्था भी जिसका उत्तरोत्तर एवं पवित्र विधानानुकूल पालन किया गया है ब्राह्मण को उच्च स्थिति प्रदान करती है । "
1. एजूकेशन इन एशिएंट इंडिया, पृ.6
6.89. “और वैदिक नियमानुसार और स्मृति के अनुरूप गृहस्थ को श्रेष्ठतम बताया गया है क्योंकि वह अन्य तीनों का सहायक है। "
6.90. “जैसे सभी नदियां वशाल और लघु समुद्र में समा जाती हैं, इसी प्रकार सभी श्रेणियों के व्यक्ति गृहस्थ से संरक्षण पाते हैं। "
इस कथन को सत्य भी मान लेते हैं तो प्रश्न फिर भी बचता है कि मनु ने वानप्रस्थ और संन्यास के पूर्व विवाह की शर्त क्यों रखी ? इसका एक ही उत्तर है कि वे लोगों को संन्यासी बनने से रोकना चाहते थे। मनु को संन्यास और वानप्रस्थ क्यों पसंद थे? इसका उत्तर यह है कि बौद्धधर्म का समर्थन और प्रचार सामान्यतः भिक्षु कहलाने वाले संन्यासियों ने किया था। अविवाहित लोगों के लिए भिक्षु बनना सरल था। मनु इसे रोकना चाहते थे। इसी कारण विवाह अनिवार्य बनाया ।
प्रकरण
वानप्रस्थ और संन्यास की तुलनात्मक संहिता
I. आश्रम में प्रवेश करते समय परिवार से संबंध
| वानप्रस्थ | संन्यासी |
| 6. 3. " सभी कृषि जन्य भोजन और वस्तुओं का परित्याग कर, पत्नी को पुत्रों के दायित्व में छोड़कर अथवा साथ ले जाकर वन में प्रयाण करे। " | 6.38. “ जगत स्रष्टा प्रजापति को पावन इष्टि संपन्न करने के पश्चात् जहां सारी सम्पत्ति यज्ञ शुल्क में देगा, पवित्र अग्नि को आत्मसात कर गृह से प्रयाण करेगा। ( तापस रूप में)।" |
II. आवास संबंधी नियम
| वानप्रस्थ | संन्यासी |
| 6.4. “ पवित्र अग्नि और घरेलू (यज्ञ कार्यों के लिए आवश्यक सामग्री लेकर ग्राम से वन को प्रयाण करे और वहां इंद्रिय नियंत्रण से रहे । " | 6.41. "पवित्र कमण्डल, दण्ड आदि से युक्त मौन धारण किया हुआ घर से निकला हुआ और उपस्थित इच्छा प्रवर्तक वस्तु में नि:स्पृह होकर संन्यास ग्रहण करे। " |
| 6.42. "वह बिना साथी के मोक्ष प्राप्ति हेतु अकेले ही विचरण करे, पूर्णत: समझते हुए कि एकाकी अपने अंतिम लक्ष्य का न परित्याग करता है और न परित्यक्त होता है। " | 6.43. " लौकिक अग्नि से रहित, गृह से रहित, शरीर में रोगादि होने पर भी चिकित्सा आदि का प्रबंध न करने वाला, स्थिर बुद्धि वाला, ब्रह्म का मनन करने वाला, ब्रह्म में ही भाव रखने वाला संन्यासी भिक्षा के लिए ग्राम में प्रवेश करे। " |
III. जीवन-चर्या के नियम
| वानप्रस्थ | संन्यासी |
| 6.6. “वह चर्म अथवा गूदड़ पहने। वह प्रातः अथवा संध्या को स्नान करे। वह सदा शिखा रखे। उसकी दाढ़ी, उसके देह के बाल और नख न काटे जाएं। " | 6.44. “एक खपरा, पेड़ों की जड़ या वृक्ष का वक्कल, फटा - पुराना कपड़ा, अकेलापन, ममता और सब में समान भाव ये मुक्ति के लक्षण हैं। " |
| 6.52. “उसके बाल, नाखून और दाढ़ी- मूंछ कटे हों, भिक्षापात्र, दण्ड- कमण्डल को लिए हुए सभी प्राणियों को पीड़ित न करता हुआ वह आत्मसंयमी सर्वदा विचरण करे। " | |
| 6.53. " उसके भिक्षापात्र धातु के न हों, वे छिद्र रहित हों, उनकी शुद्धि यज्ञ में यमस के समान केवल पानी से होती है।' | |
| 6.54. “ तुम्बा, काष्ठ पात्र, मिट्टी के सकोरे या बांस की खप्पचियों से निर्मित पात्र संन्यासी के योग्य होते हैं। ऐसा स्वायंभुव पुत्र मनु ने कहा है । " |
IV. जीवन-यापन संबंधी नियम
| वानप्रस्थ | संन्यासी |
| 6.11. “वह यज्ञ के लिए पुरोदस और उबले आहार (कारु) नियमानुसार तैयार करे, तापसों के अनुकूल शुद्ध अन्न एकत्र करे जो वसंत और शरद ऋतु में उगता है। " | 6.49. " आत्मा संबंधी प्रसंगों से आनन्दित हो योगमुद्रा में बैठे, बाह्य सहायता से मुक्त इन्द्रिय सुख से अनिच्छुक स्वयं संगी जीवन मोक्ष के परमानंद का इच्छुक रहे। " |
| 6.12. “प्रस्तुत किए जाने पर अत्यंत शुद्ध यज्ञ खाद्य प्राप्त करे जो वन्य पदार्थों से बना हो, बचे हुए पदार्थ वह नमक मिलाकर स्वयं खाए । " | 6.50. “ चमत्कार प्रदर्शन, शकुन ज्ञान, ज्योतिष अथवा हस्त रेखा ज्ञान से परामर्श देकर और शास्त्रों की व्याख्या करके कभी भिक्षा न ले।" |
| 6.26. “पदार्थों की प्राप्ति हेतु प्रयास न करे जो सुखद है। धरती पर बिन बिछौने सोए, कोई छाया न भोगे, वृक्ष की जड़ में रहें। " | 6.51. " ( भिक्षा के अभिप्रास से ) वह उस घर के निकट न जाए जहां साधू, ब्राह्मण, पक्षी, श्वान अथवा अन्य भिक्षुक हो । " |
| 6.27. “तापस रूप में रह रहे ब्राह्मणों से इतनी ही भिक्षा ले जो जीवन-यापन हेतु पर्याप्त है अथवा वनवासी द्व गृहस्थों से भिक्षा ले।" | |
| 6.28. " अथवा (वनवासी वैखानस ) गांव से भोजन लाए, उसे या तो दोने में अथवा अंजलि में या मिट्टी के बर्तन में मात्र आठ ग्रास खाए । " |
V. भोजन संबंधी नियम
| वानप्रस्थ | संन्यासी |
| 6.13. “उसका आहार हो शुष्क भूमि अथवा जल में उगे पदार्थ फल फूल, कंद मूल, शुद्ध वृक्षों के उत्पाद और अन्य फलों से निकला तेल । " | 6.55. “ वह दिन में एक बार ही भिक्षाटन करे, भिक्षा में अधिक मात्रा में पदार्थ की कामना न करे क्योंकि यदि तापस भिक्षा के लिए आतुर है तो वह इंद्रिय सुख का इच्छुक माना जाता है। " |
| 6.14. "वह शहद, मांस और कुकुरमुत्ता न खाए चाहे वह भूमि पर उपजा हो ( या अन्यत्र ) भूस्तृण सिगरुक और श्लेशमंतक नामक फल न खाए। " | 6.56. “ जब रसोई से धुआं उठना बंद हो जाए, जब चूल्हा बुझ जाए, जब लोग भोजन से निवृत्त हो जाएं, जब जूठन फेंक दी जाए, तो तापस भिक्षा को जाए। " |
| 6.15. “ आश्विन मास में वह तापसों का भोजन फेंक दे जो वह संग्रह करता है, उसी प्रकार अपने पुराने वस्त्र, शाक- मूल और फल फेंक दे।" | 6.57. " खाली हाथ लौट आने पर वह दुखी न हो, न ही प्राप्ति पर प्रसन्न । वह इतना ही प्राप्त करे जो जीने के लिए आवश्यक है। वह अपने बर्तनों (की गुणवत्ता) का ध्यान न रखे।" |
| 6.16. वह हल चलाई गई धरती से अपने पदार्थ न खाए चाहे वे किसी ने फेंक दिए हों। ना ही गांव में उगने वाले मूल और फल चाहे (भूख से व्याकुल भी हो। " | 6.58. " वह सभी भोजन को तिरस्कार कर दे जो विनम्र अभिवादन के साथ प्राप्त हो (क्योंकि) जो तापस पूर्ण बंधनमुक्त है, वह बाध्य है कि विनम्र अभिवादन से भोजन न ले।" |
| 6.17. " वह अग्नि से पका भोजन अथवा समय पर पके फल ही खाए या वह पत्थर पर रगड़कर या दांत से काटकर ही खाए। " | |
| 6.18. “वह अपने दैनिक भोजन के उपरांत अपना भिक्षापात्र स्वच्छ करे अथवा एक मास के लिए पर्याप्त अथवा छह मास अथवा एक वर्ष के लिए संग्रह करे।" | |
| 6.19. “अपनी क्षमतानुसार भोजन एकत्र करके या तो रात्रि में (केवल ) अथवा (दिन में ) ( केवल) अथवा चौथे समय अथवा आठवें समय भोजन करे। " | |
| 6.20. “अथवा वह चंद्रायण के अनुसार शुक्ल पक्ष अथवा कृष्ण पक्ष में अपने भोजन की मात्रा प्रतिदिन घटाए अथवा प्रत्येक पक्ष के अंतिम दिन एक बार ही जौ का दलिया खाए । " | |
| 6.21. “ अथवा वह वैखानस के लिए निर्धारित नियमानुसार सतत फूलों, कंद मूलों और उन फलों का आहार करे जो समय पर पके हों और स्वयं वृक्षों से टपके हों। " | |
| 6.22. " वह या तो भूमि पर लेटे अथवा दिन में पंजों पर खड़ा रहे अथवा वह एक बार खड़ा रहे एक बार बैठे। संन्यास प्रमाण (सूर्योदय, दोपहर, गोधूलि ) पर (नहाने को ) वन से जल लाए। " |
VI. पालनार्थ कर्त्तव्य
| वानप्रस्थ | संन्यासी |
| 6.5. “ तापसों के अनुकूल विभिन्न प्रकार के पवित्र भोजन अथवा जड़ी- बूटियां, कंदमूल और फल देकर वह नियमानुसार पंच आहुतियां दे । " | 6.65. “गहन ध्यानावस्था से वह परमात्मा की सूक्ष्मता को और प्राणी मात्र में उसकी उपस्थिति को जाने, उच्चतम भी निम्नतम भी । " |
| 6. 7. " वह ऐसे आहार की आहुति दे जो वह लेता हो और क्षमतानुसार भिक्षा दे, जो उसके आश्रम में आएं, उसे जल, कंदमूल और फल देकर समादर प्रदान करे। " | 6.83. "वह निरंतर वेदपाठ करे जो यज्ञ-प्रसंग में हैं, देवों से सम्बद्ध हैं, जो आत्मा से सम्बद्ध हैं और वेदों के उपसंहार (वेदांत ) में सन्निहित हैं। " |
| 6.8. " वह अकेला वेद पाठ करे, वह अभावों के प्रति धैर्यवान रहे, (सबसे) मैत्री बरते, सदैव उदार रहे, कदापि उपहार ग्रहण न करे, सभी जीवों के प्रति कृपालु रहे। " | |
| 6.9. वह पवित्र त्रि अग्नियों से नियमानुसार अग्निहोत्र करे, पूर्णिमा और अमावस्या को उचित समय यज्ञ करना न भूले। " | |
| 6.10. "वह नक्षत्रेष्टि, आग्रहायण, चातुर्मास्य यज्ञ और साथ ही उत्तरायण और दक्षिणायन यज्ञ नियम से करे । " | |
| 6.23. " ग्रीष्म में वह पंचाग्नि ताप सहे, पावस में मुक्ताकाश में रहे, शीतकाल में भीगे वस्त्र पहने, ऐसे वह अपने तप की शक्ति बढ़ाए। " | |
| 6.24. “ जब वह दिन में तीन बार (प्रातः, दोपहर, संध्या) को स्नान करता है तो वह देवताओं को अर्घ्य चढ़ाए और कठोर से कठोर संयम बरते, वह अपनी देह सुखा डाले । " | |
| 6.25. “निर्धारित नियमानुसार पवित्र त्रियाग्नि को आत्मसात करे, वह बिना अग्नि के रहे, बिना घर रहे, मौन रहे, कंदमूल और फलों के आहार पर रहे। " |
"सबसे पहली बात तो यह स्वीकार कर लेनी चाहिए कि एक समान भारतीय संस्कृति जैसी कोई चीज कभी नहीं रही और यह कि भारत तीन प्रकार का रहा - ब्राह्मण भारत, बौद्ध भारत और हिंदू भारत । इनकी अपनी-अपनी संस्कृतियां रहीं। ... भारत का इतिहास ब्राह्मणवाद और बौद्ध धर्म के अनुयायियों के बीच परस्पर संघर्ष का इतिहास रहा है। "
- भीमराव अम्बेडकर