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हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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25 ऑगस्ट 2023
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परिशिष्ट - II

अनिवार्य वैवाहिक व्यवस्था

     मनु की व्यवस्था है कि संसार में लोगों का जीवन चार भागों में विभाजित हो। ये चार अवस्थाएं हैं: 1. ब्रह्मचर्य, 2. गृहस्थ, 3. वानप्रस्थ और संन्यास। ब्रह्मचर्य विद्यार्थी जीवन है। एक ऐसी अवस्था, जब मनुष्य का जीवन वेदों के अध्ययन को समर्पित होता है। गृहस्थाश्रम का अर्थ है, वैवाहिक जीवन । जैसा कि मनु ने कहा है, गृहस्थ रहकर सुख भोगना और परिवार - वृद्धि करना । वानप्रस्थ की स्थिति में गृहस्थी से दूर रहना होता है; वह गृह-त्याग कर देता है फिर भी वह अपनी पत्नी का त्याग नहीं करता । वह जंगलों में रहता है किन्तु अपनी सम्पत्ति का अधिकार नहीं त्यागता। जहां तक गृहस्थ जीवन और धार्मिक कृत्यों का संबंध हैं, वह मरे के समान है किन्तु सामाजिक रूप से वह मरता नहीं है। संन्यास वह अवस्था है, जब मनुष्य अपने वैवाहिक बंधन तोड़ देता है। वह गृहस्थी त्याग देता है और गृहस्थों के लिए आवश्यक धर्म-कर्म से नाता तोड़ लेता है और ब्रह्म की उपासना हेतु जंगलों में चला जाता है। ऐसा समझा जाता है कि उसका सामाजिक अंत हो गया है।

Compulsory Marriage System - char ashram - Hindu Dharm Ki Paheliyan - Riddle of Hinduism - dr Bhimrao Ramji Ambedkar     मनुष्य-जीवन की विभाजन - प्रथा उससे भी पुरानी है जितनी मनु की। महत्वूपर्ण बात यह है कि मनु ने इसमें संशोधन कर दिया ।
ने बनाया, जो

     प्रथम परिवर्तन यह है कि मनु ने विवाह को अनिवार्य बना दिया। किसी ब्रह्मचारी को अध्ययन समाप्त करने पर विवाह करना चाहिए। यह नियम मनु निम्न व्यवस्थाओं से प्रकट है:

     3.2. (एक विद्यार्थी) जसने विद्यार्थिपन बिना ( नियमोल्लंघन ), उचित क्रम में तीन वेदों का अध्ययन किया है अथवा केवल एक का, वह गृहस्थ में प्रवेश करे ।

     3.4. “गुरु की आज्ञा से स्नान करने के पश्चात् और नियमानुसार समावर्तन कर लिया है, उस द्विज को समान वर्ग की पत्नी से विवाह करना चाहिए जो शुभ चिह्नों से उसे दी जाए।"


इस अध्याय को 'चार आश्रम' पहेली के साथ पढ़ा जाए। संपादक


     मनु ने जो दूसरा संशोधन किया वह है एक ब्रह्मचारी के संन्यास आश्रम में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाना । मनु ने संन्यास से पूर्व विवाह की शर्त लगा दी है। उन्होंने घोषित किया है कि गृहस्थ में प्रवेश किए बिना संन्यास ग्रहण करना एक पाप है।

     6.35. “जब वह तीनों ऋणों से उऋण हो जाता है तो मोक्ष के लिए सुरति लगाए जो उऋण हुए बिना मुक्ति चाहता है उसका पतन होता । "

     6.36. “नियमानुसार वेदाध्ययन, पवित्र विधानानुसार पुत्रवान होकर, योग्यतानुसार यज्ञ करके, वह अपना ध्यान मोक्ष पर लगाए। "

     6.37. कोई द्विज जो वेदाध्ययन बिना, पुत्रवान हुए बिना यज्ञ के बिना मोक्ष चाहता है वह नरक को जाता है। "

     6.38. “जिसमें समस्त सम्पत्ति को दक्षिणा रूप में देते हैं ऐसे प्राजापत्य यज्ञ को अनुष्ठान कर और उसमें कथित विधि से अपने में अग्नि का आरोप कर ब्राह्मण घर से संन्यास आश्रम को ग्रहण करे। "

     मनु ने तीसरा संशोधन जो किया, वह यह है कि एक गृहस्थ बिना वानप्रस्थ में प्रवेश किये बिना संन्यासी नहीं हो सकता ।

     6.1. "ब्रह्मचर्याश्रम के बाद समावर्तन संस्कार को प्राप्त स्नातक द्विज इस प्रकार विधिपूर्वक गृहस्थाश्रम में रहकर आगे कथित नियम से जितेन्द्रिय होकर वन में निवास करे।"

     6.2. “जब गृहस्थाश्रमी झुर्रियोंदार त्वचा, पके हुए बाल तथा अपने पुत्रों के पुत्र को देख ले तब वन का आश्रय करे। "

     6.3. “ग्राम्य आहार तथा परिच्छद को छोड़कर, अपनी पत्नी को पुत्रों के उत्तरदायित्व में सौंप कर अथवा साथ जाने की इच्छा करने वाली अपनी पत्नी को साथ लेकर वन को जावे। "

     मनु ने जो संशोधन किए, वे वास्तव में अत्यंत क्रांतिकारी थे, उन नियमों में जो उनसे पूर्व प्रचलित थे। इस संबंध में हम केवल दो प्रासंगिक नियमों का उल्लेख करेंगे, जो दो धर्म सूत्रों वशिष्ठ धर्मसूत्र और गौतम धर्मसूत्र में हैं।

     वशिष्ठ धर्मसूत्र का¹ कथन है:


1. अध्याय 7 श्लोक 1, 2, 3


     "चार सोपान हैं: विद्यार्थी, गृहस्थ, वैखानस और तापस। "

     "जिस व्यक्ति ने एक दो अथवा तीन वेदों का अध्ययन विद्यार्थी धर्म का उल्लंघन किए बिना किया है, वह जिस आश्रम में जीवन बिताना चाहे, बिता सकता है। "

     गौतम धर्मसूत्र¹ के अनुसारः

     “कुछ (कहते हैं कि) वह (जिसने वेदों का अध्ययन किया है) अपनी इच्छानुसार (किस) अवस्था में रहना चाहता है (इसका वरण कर सकता है) । (चार अवस्थाएं है।) विद्याध्ययन, गृहस्थ, भिक्षु या वैखानस । "

     जैसा कि दो धर्म सूत्रों से स्पष्ट है, यह चयन करना किसी व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर है कि वह ब्रह्मचर्य धर्म निभाने के पश्चात् किस आश्रम में जाना चाहता है। यदि वह चाहे तो विवाह कर सकता है और गृहस्थ बन सकता है अथवा बिना विवाह किए वह सीधे संन्यास आश्रम में प्रवेश कर सकता है। मनु ने वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम से पूर्व अनिवार्य गृहस्थ का निर्देश देकर सचमुच क्रांतिकारी परिवर्तन किया है, यह स्पष्ट है।

     ऐसा प्रतीत होता है कि मनु ने एक अन्य परिवर्तन भी किया है। यह समझ नहीं आता कि गृहस्थ के पश्चात् संन्यास ग्रहण करने से पूर्व वानप्रस्थ की क्या आवश्यकता है? कोई व्यक्ति सीधे ही संन्यासी क्यों नहीं बन सकता? क्या वानप्रस्थ और संन्यास के बीच कोई ऐसा अंतर है जिसे मूलभूत कहा जा सके? इस अध्ययन के प्रकरण में हमने मनु के द्वारा वानप्रस्थ और संन्यासी के लिए बनाई गई संहिता का संग्रह किया है। इन नियमों पर दृष्टिगत करने से पता चलता है कि उनमें कठिनता से ही कोई भिन्नता है। इसको छोड़कर कि वानप्रस्थ को कुछ धर्म-कर्म करने पड़ते हैं। जिनकी व्यवस्था गृहस्थी के लिए है, दोनों आश्रमों के बीच कोई ठोस अंतर नहीं है। साथ ही यह भी सत्य है कि वानप्रस्थ और संन्यासी के समान प्रयोजन हैं। मनु के निम्नांकित उल्लेख से पता चल जाएगा, उनमें कैसा साम्य है।


1. अध्याय 3 श्लोक 1 और 2


परम प्राप्ति लक्ष्य

वानप्रस्थ संन्यासी
6.29. जो ब्राह्मण वन में रहता है इन तथा अन्य धार्मिक कार्यों का परमात्मा से पूर्ण एकाकार हेतु पालन करे, विभिन्न धार्मिक विषयों का अध्ययन करे जो उपनिषदों में समाहित हैं। 6.85. " उपरोक्त नियमों का पालन कर कोई द्विज पाप से मुक्त हो जाता है और परमब्रह्म को प्राप्त होता है।

     फिर मनु ने गृहस्थ और संन्यास के मध्य वानप्रस्थ की रचना क्यों कर डाली ? वानप्रस्थ के विषय में यह कहा जा सकता है कि यह स्थिति मनु से पूर्व विद्यमान थी। वे अरण कहलाते थे। प्रोफेसर राधा कुमुद मुकर्जी¹ के अनुसारः

     उन ब्रह्मचारियों को अरण अथवा अरण्यन कहा जाता था, जो ज्ञान प्राप्ति की अभिलाषा में अविवाहित रहना चाहते थे। ये अरण गांव के बाहर आबादी से दूर वैखानस के रूप में वनों में रहते थे। वह जंगल जहां अरण तापस रहते थे, अरण्य कहलाते थे। इन तापसों की दार्शनिक जिज्ञासा परम समस्याओं पर थी जैसे ब्रह्म, सृष्टि, आत्मा अथवा अमरता।

     प्राचीन अरण को मनु ने वानप्रस्थ का नाम दे दिया जिसका अर्थ अरण ही है। मनु ने न केवल नाम ही बदला, उन्होंने एक महत्वपूर्ण परिवर्तन और कर दिया। उन्होंने ब्रह्मचर्य और वानप्रस्थ के मध्य में वैवाहिक अवस्था डाल दी जबकि मूल वानप्रस्थ अथवा अरण भी अविवाहितों के लिए थी, मनु का वानप्रस्थ अनिवार्यतः विवाहित के लिए है। प्राचीन अवस्था में ब्रह्मचारी स्वेच्छा से वानप्रस्थ अथवा गृहस्थ बन सकता था। मनु ने क्रम बदल दिया, जिससे कि कोई बिना विवाह किए वानप्रस्थ न बन जाए ।