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हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 74 of 92
25 ऑगस्ट 2023
Book
5,7,2,1,,

भाग III

राजनैतिक

इक्कीसवीं पहेली

मन्वंतर का सिद्धान्त

     ब्राह्मणों का एक सिद्धान्त था कि उनके देश का शासन स्वर्ग से चलता है। मन्वंतर का यही अर्थ प्रतीत होता है।

manvantara Ka Siddhant - rajnitik - Hindu Dharm Ki Paheliyan - Riddle of Hinduism - dr Bhimrao Ramji Ambedkar     मन्वंतर का आशय देश की राजनीतिक सत्ता से है। इसके पीछे यह विश्वास है कि निश्चित अवधि के लिए सत्ता एक निगम को सौंप दी जाती है। इस समूह में एक मनु होता है, सप्तऋषि ओर एक इन्द्र होता है जो स्वर्ग में अपने आसनों से प्रजा से पूछे बिना अथवा इच्छा जाने बिना शासन-सूत्र चलाता है। एक समूह के शासन-काल को, जिसमें मनु की सत्ता सर्वोपरि है, मन्वंतर कहते हैं। एक मनु का शासनकाल समाप्त हो जाता है तो दूसरा आ जाता है। यह क्रम चलता रहता है। युगों की भांति मन्वंतर का भी समय-चक्र है। चौदह मन्वंतरों का एक चक्र होता है। विष्णु पुराण से मन्वंतरों का आभास मिलता है जो इस प्रकार है:

     “तब ब्रह्मा ने सृष्टि- पालन हेतु स्वयं को मनु स्वायंभुव बना लिया। जो स्वयंमेव मौलिक रूप में एक रूप जन्मे, और अपने नारीभाग से उन्होंने शतरूपा को रचा जिसे सृजित प्राणियों की रक्षा हेतु तपस्या द्वारा वर्जित वैवाहिकता के पाप से शुद्ध किया जिसे मनु स्वयंभुव ने अपनी पत्नी बनाया। "

     एक क्षण को हम यहां ठहरकर विचार करते हैं, इसके क्या अर्थ हैं? क्या इसका अर्थ यह है कि ब्रह्मा उभयलिंगी थे? क्या इसका अर्थ यह है स्वायंभुव मनु ने अपनी बहन शतरूपा को पत्नी बना लिया? विषणु पुराण के अनुसार यदि यह सही है तो कितना विचित्र है? विष्णु पुराण का आगे कथन है :

     “इस युगल से दो पुत्र जन्मे, प्रियव्रत और उत्तानपाद, और दो पुत्रियां जन्मीं, प्रसूति और आकूति जो अत्यन्त लावण्यमयी और गुणवान थीं। प्रसूति का विवाह दक्ष से और आकूति का रुचि प्रजापति से आकूति से जुड़वा बच्चे उत्पन्न हुए यज्ञ और दक्षिणा जिन्होंने परस्पर विवाह कर लिया ( भाई-बहन के विवाह का एक और उदाहरण) । उनके बारह पुत्र उत्पन्न हुए। वे देवता स्वायंभुव मन्वंतर में यम कहलाए । ”


यह 11 पृष्ठों की पाण्डुलिपि है: अंतिम चार पृष्ठ लेखक के हस्तलिखित हैं। संपादक


     "प्रथम मनु स्वायंभुव था फिर स्वारोचिष। उसके उपरांत क्रमशः औतमी, तामस, रैवत, चाक्षुष, जो तिरोहित हो गए। सातवें वर्तमान मन्वंतर के मनु, सूर्य - पुत्र वैवस्वत हैं। "

     विष्णु पुराण कहता है अब मैं स्वारोचिष मनु के पुत्रों, देवताओं और ऋषियों के विषय में बताता हूं। इस काल (द्वितीय मन्वंतर) के देवता थे पारावत और तुषित । उनका इन्द्र था “ विपश्चित" उनके सप्तर्षि थे। ऊर्ज, स्तंभ, प्राण, दत्तोली, ऋषभ, निश्चर, और अर्वरीवट । चैत्र और किंपुरुष तथा अन्य मनु के पुत्र थे।

     “तीसरे मन्वंतर के मनु थे औतमी । उसके समय के इन्द्र थे सुशांति । देवताओं के नाम हैं : स्वधामा, सत्य, शिव, प्रतर्दन और वसुवृति और प्रत्येक पांच वर्ग के बारह देवता थे। उस समय के सप्तर्षि वशिष्ठ के सात पुत्र, सात ऋषिगण थे और अज, परसु, दिव्य तथा अन्य मनु के पुत्र थे।

     चौथे मनु तापस के काल में पूजनीय देवता थे सुरूप, हरि, सत्य और सुधि। प्रत्येक वर्ग में सत्ताईस देवता थे। शिवी उस काल का इन्द्र था। सौ यज्ञ संपन्न करने के कारण उसे शतक्रतु भी कहा जाता है। सप्तऋषि थे ज्योजिर्धाम, पृथु, कव्य, चैत्र, अग्नि, वानक, और पिवर । तामस के बलशाली पुत्र थे। राजा नर, ख्याति, सांध्य, जनुजंघा आदि ।

     पांचवें मन्वंतर के मनु रैवत थे। उनका इन्द्र विभु था। देवतागण, जिनमें प्रत्येक के चौदह देवता होते थे, इस प्रकार थे- अमितभास, अभूतरास, वैकुंठगण, सुमेधगण। तत्कालीन सप्तऋषि थे : हिरण्यरोम, वेदश्री, उर्ध्वबाहु, वेदबाहु, सुद्युम्न, पर्जन्य और महामुनि। रैवत के पुत्र इस प्रकार थे - बाल बंधु, सुसंभाव्य, सत्यक तथा अन्य वीर राजा ।

     ये चार मनु - स्वारोचिष, औतमी, तामस और रैवत प्रियव्रत की संतान थे जिसने विष्णु को अपनी उपासना से प्रसन्न करके अपनी संतति के लिए मन्वंतरों का मनुबनाए जाने का वर प्राप्त कर लिया था।

     छठे मन्वंतर का मनु चाक्षुष था। उसका इन्द्र मनोज्व था। उस काल के पांच वर्ग के देवता थे आद्य, प्रस्तुत, भव्य, पृथुग और उदारता की प्रतिमूर्ति लेखगण । उस काल के सप्तर्षि थे- सुमेध, विराज, हाविष्मत, उत्तम, मधु, अभिनमान और सहिष्णु । पृथ्वी के स्वामी चाक्षुष के शक्तिशाली पुत्र थे उरू, पुरु, शतद्युम्न आदि ।

     वर्तमान सातवें मन्वंतर के मनु अन्त्येष्टि देव, सूर्य की अनुपम संतान वैवस्वत हैं और उनके देवता हैं आदित्य, वसु और रुद्र । उनका इन्द्र पुरन्दर सप्तर्षि है।

     वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, और भारद्वाज | वैवस्वत मनु के नौ धर्मनिष्ठ पुत्र हैं राजा इक्ष्वाकु, नाभानिदिष्ट, करुष, पृषध्र और वसुमत।"

     अभी सात मन्वंतरों का विवरण दिया गया है जो विष्णु पुराण में उल्लिखित हैं। ये विष्णु पुराण लिखे जाने तक की स्थिति थी। क्या मन्वंतर शासन बाह्य था ? इस विषय में ब्राह्मण मौन हैं। परन्तु विष्णु पुराण के लेखक को पता है कि सात मन्वंतर अभी और आने हैं। इनका विवरण इस प्रकार है :

     "विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा सूर्य की पत्नी थी, उसकी तीन संतानें हुई- मनु (वैवस्वत) यम और यमी (अथवा यमुना ); अपने पति का तेज झेलने में असमर्थ संज्ञा ने उसे छाया दे दी और स्वयं उपासना के लिए वनों में चली गई। सूर्य ने छाया को अपनी पत्नी संज्ञा जान कर उससे तीन संतान और उत्पन्न कीं । शनिश्चर (शनि), मनु (सावर्णी) और पुत्री ताप्ती ( ताप्ती नदी) । छाया को एक बार यम पर क्रोध आ गया। उसने उसे शाप दिया साथ ही उसने यम को और सूर्य को यह भी बता दिया कि वह वास्तविक संज्ञा नहीं है। छाया के यह बताने पर कि उसकी पत्नी जंगलों में चली गई है सूर्य ने अपनी दिव्यदृष्टि से देखा कि वह घोड़ी रूप में तपस्यारत है (अश्वी), सूर्य ने घोड़े के रूप में पुनर्जन्म ले लिया था और अश्वरूपिणी अपनी पत्नी के पास पहुंच गया। और उससे तीन अन्य संतानें उत्पन्न कीं। दो आश्विन और रैवत थीं। फिर संज्ञा को घर ले गया। विश्वकर्मा ने सूर्य (नक्षत्र) की गहनता कम करने और उसकी दीप्ति घटाने के उद्देश्य से अपनी चक्री पर चढ़ाया और उसे घिस कर आठवां भाग कर दिया क्योंकि इससे अधिक अविभाज्य था। जो दैवी वैष्णव भव्यता सूर्य में थी, वह विश्वकर्मा के घिसने से धरती पर गिरी। शिल्पकार (विश्वकर्मा) ने विष्णु का चक्र, शिव का त्रिशूल, कुबेर का शस्त्र और कार्त्तिकेय का वेलु बनाया और अन्य देवों अन्य देवों के शस्त्रों का निर्माण किया। विश्वकर्मा ने इन सबका निर्माण सूर्य की तेजोपम किरणों से किया । "