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हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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25 ऑगस्ट 2023
Book
5,7,2,1,,

II

     आश्रम - धर्म में जीवन को चार चरणों में विभाजित किया है- 1. ब्रह्मचर्य, 2. गृहस्थाश्रम, 3. वानप्रस्थ, और 4. संन्यास। ब्रह्मचर्य की औपचारिक दोनों अवस्थाओं का समान अर्थ है, अविवाहित जीवन । इसका औपचारिक अर्थ है गुरु से शिक्षा ग्रहण करना। गृहस्थाश्रम वह अवस्था है जब कोई व्यक्ति वैवाहिक जीवन बिताता है। संन्यास वह है जब कोई व्यक्ति वैराग्य ले लेता है। वानप्रस्थ, गृहस्थाश्रम और संन्यास के मध्य की स्थिति है। यह वह स्थिति है जब कोई व्यक्ति समाज का अंग होते हुए भी उससे पृथक रहता है। जैसा कि नाम से प्रकट है, इसका अर्थ है जंगलों में रहना ।

Varnashrama Dharma ki Pahli - Hindu Dharm Ki Paheliyan - Riddle of Hinduism - author B R Ambedkar     हिंदुओं का विश्वास है कि आश्रम - धर्म ऐसी संस्था है जो वर्ण-धर्म के समान प्राचीन है। वे इन दोनों को एक साथ मिलाकर वर्णाश्रम धर्म कहते हैं क्योंकि ये दोनों ही संश्लिष्ट हैं, और दोनों ही मिलकर हिन्दूधर्म का लौहस्वरूप निर्माण करती हैं।

     यह उचित रहेगा कि हम आश्रम - धर्म का प्रादुर्भाव, प्रयोजन और विशिष्टता पर विचार करने से पूर्व हम इसका पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लें। आश्रम - प्रथा के दिग्दर्शन का सर्वोत्तम स्रोत मनुस्मृति है, जिसमें से निम्नांकित अंशों को उद्धृत किया जा रहा है :

     अध्याय 2.36. “ब्राह्मण के पुत्र का गर्भधारण के आठ वर्ष पश्चात् उपनयन संस्कार कराया जाए। क्षत्रिय गर्भधारण के ग्यारह वर्ष पश्चात्, किन्तु वैश्य का बारह वर्ष उपरांत। "

     अध्याय 2.168. “कोई द्विज यदि वेदाभ्यास नहीं करता है और अन्य का ( सांसारिक ज्ञान) अध्ययन करता है, वह शीघ्र ही, अपितु अपने जीवनकाल में ही शूद्र और उसकी संतत की स्थिति प्राप्त करता है।"

     अध्याय 3.1. " गुरु के अधीन तीन वेदों का व्रत छत्तीस वर्ष तक धारण किया जाए अथवा इसके अर्द्धांश अथवा चतुर्थांश अथवा जब तक उनका पूरा ज्ञान न हो जाए, यह व्रत रखा जाए। "

     अध्याय 3.2. “जो उचित क्रम से तीन वेदों अथवा दो अन्यथा एक का भी अध्ययन बिना नियमोल्लंघन कर लेता है, वह गृहस्थाश्रम में प्रवेश करे। "

     अध्याय 6.8. “विद्यार्थी, गृहस्थ, बैरवानस और तापस इनकी चार स्थितियां हैं, जिन सबका उद्गम गृहस्थ है। "

     अध्याय 6.88. “किन्तु सभी ( अथवा ) कोई एक अवस्था भी विधानानुकूल एकोपरांत हो ब्राह्मण को उच्च स्थिति प्रदान करती है जो इनका नियमानुसार पालन करता हो। "

     अध्याय 6.89. “ और वैदिक नियमानुसार और स्मृति के अनुरूप गृहस्थ को श्रेष्ठतम बताया गया है क्योंकि वह अन्य तीनों का सहायक है। "

     अध्याय 6.1. "कोई द्विज स्नातक, जो नियमानुसार गृहस्थ-धर्म निभा चुका हो, वह दृढ़ संकल्प करे कि वह अपनी इन्द्रियों का दमन करेगा, वनों में रहेगा ( निम्नांकित नियमानुसार)।”

     अध्याय 6.2. “जब कोई गृहस्थ यह देखे कि उसकी त्वचा में झुर्रियां पड़ने लगी हैं और उसके बाल पकने लगे हैं और उसके पुत्रों को पुत्र हो गए हैं तब वह वन को प्रस्थान करे। "

     अध्याय 6.33. "परन्तु इस भांति अपने जीवन का तीसरा भाग वनों में व्यतीत करने के उपरांत चौथेपन में वह सभी सांसारिकताओं का परित्याग कर तापस का जीवन बिताए । "

     अध्याय 6.34. “जो चरण तापस के रूप में प्रति चरण यज्ञ करके और इन्द्रियों का दमन करके क्लांत हो जाता है। ( भिक्षादान और भोजन कराकर ), वह मृत्यु उपरांत सुख भोगता है । "

     अध्याय 6.35. “जब वह तीनों ऋणों से उऋण हो जाता है तो मोक्ष के लिए सुरति लगाए, जो उऋण हुए बिना मुक्ति चाहता है, उसका पतन होता है। "

     अध्याय 6.36. “नियमानुसार वेदाध्ययन, पवित्र विधानानुसार पुत्रवान होकर, योग्यतानुसार यज्ञ करके वह अपना ध्यान मोक्ष पर लगाए। "

     अध्याय 6.37. “कोई द्विज, जो वेदाध्ययन बिना, पुत्रवान हुए बिना, यज्ञ के बिना मोक्ष चाहता है, वह नरक में जाता है। "

     इन नियमों से यह स्पष्ट है कि मनु के अनुसार आश्रम- धर्म के तीन रूप हैं। प्रथम यह कि यह शूद्रों और महिलाओं के लिए नहीं है। द्वितीय यह कि ब्रह्मचर्य अनिवार्य है। ऐसे ही गृहस्थ भी। वानप्रस्थ और संन्यास अनिवार्य नहीं है। तृतीय यह कि इनका निर्धारित क्रम से पालन किया जाए। प्रथम ब्रह्मचर्य, द्वितीय गृहस्थ, तृतीय वानप्रस्थ और चतुर्थ संन्यास। कोई एक को लांघकर दूसरे आश्रम में नहीं जा सकता।

     व्यक्तिगत जीवन में मनु द्वारा नियोजित अर्थ-व्यवस्था के लिए बताई जाने वाली इस आश्रम - प्रणाली पर विहंगम दृष्टि डालने पर कुछ प्रश्न उत्पन्न होते हैं। वेदों के संदर्भ में आश्रमों का यह सिद्धांत अज्ञात है। वेदों में ब्रह्मचारी का उल्लेख है परन्तु ब्रह्मचर्य को जीवन का प्रथम और अनिवार्य सोपान बनाए जाने का कोई प्रसंग नहीं है । ब्राह्मणों ने व्यक्तिगत जीवन में ब्रह्मचर्य को अनिवार्य क्यों बनाया। आश्रम धर्म के संबंध में यह प्रथम गोरखधंधा है।

     दूसरा प्रश्न यह है कि मनु ने व्यक्ति के लिए एक ही क्रम में आश्रम - प्रणाली क्यों रखी? इसमें कोई संदेह नहीं रहा है कि एक समय ऐसा था, जब कोई ब्रह्मचारी तीनों में से कोई सा भी आश्रम अपना सकता था। वह गृहस्थ बन सकता था अथवा गृहस्थ बने बिना संन्यासी भी बन सकता था । यह तुलना करें कि धर्म-सूत्र इस विषय में क्या कहते हैं? वशिष्ठ धर्म सूत्र का मत है¹:

     “चार सोपान हैं: विद्यार्थी, गृहस्थ, वैखानस और तापस। "

     "जिस व्यक्ति ने एक दो अथवा तीन वेदों का अध्ययन विद्यार्थी धर्म का उल्लंघन किए बिना किया है, वह जिस आश्रम में जीवन बिताना चाहे, बिता सकता है । "

     गौतम धर्म सूत्र² का मत है:

     “कोई (बताए कि) वह (जिसने वेदाध्ययन किया है) किसी भी आश्रम का चयन कर सकता है" इसमें चार आश्रम हैं : विद्यार्थी, गृहस्थ, भक्षु, वैखानस।

     मनु ने विकल्प को तिरोहित करके गृहस्थ को अनिवार्य क्यों बनाया? उसे गृहस्थ को बैखानस से पूर्व की शर्त क्यों बनाया और बैखानस को संन्यास से पूर्व की शर्त क्यों रखा?

     महत्वपूर्ण लक्ष्य के लिए जीवन के चार चरणों की आवश्यकता कर दी गई है। यह समझना कठिन है कि शूद्रों और नारियों को क्यों बाहर रखा गया है? मनु के कार्यक्रम के अनुसार शूद्र और स्त्रियां केवल गृहस्थ ही रह सकते हैं। वे ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासी क्यों नहीं हो सकते? यदि आश्रम धर्म उन पर भी लागू कर दिया जाए तो उससे उन्हें अथवा समाज को क्या हानि हो सकती है?

     आश्रम धर्म के संबंध में और भी पहेलियां हैं। पहली यह कि उन्होंने ब्रह्मचारियों³ के संबंध में भेदभाव क्यों रखा?

     अध्याय 2.41. कटि से ऊपर अपनी वर्ण व्यवस्थानुसार छात्र काले और चितकबरे मृग की छाल और बकरे की खाल वस्त्र के रूप में धारण करें और कटि के नीचे सन और भेड़ की ऊन के वस्त्र पहनें।

     अध्याय 2.42. ब्राह्मण की मेखला में तीन गांठें हों जो मूंगा घास की मुलायम और चिकनी, क्षत्रिय की धनुष की तरह अर्धवृत्त में मुखाघास और वैश्य सन की बनी हो उसे धारण करें।


1. सै. बु. ई. खंड 14, पृ. 40 अध्याय 7 श्लोक 1, 2, 3
2. वही, खंड 2, पृ. 192, अध्याय 3 श्लोक 1, 2
3. वही, खंड 2 मनु पृ. 37-9


     अध्याय 2.43. मूंज आदि के नहीं मिलने पर कुश, अश्मन्तक और बल्वज की बनी हुई मेखला पारिवारिक रीति के अनुसार गांठें बांधकर धारण करें।

     अध्याय 2.44. ब्राह्मण का यज्ञोपवीत कपास का क्षत्रिय का यज्ञोपवीत सन के बने सूत का और वैश्य का यज्ञोपवीत भेड़ के बाल के बने सूत का ऊपर की ओर से बंटा हुआ तीन लड़ी का होना चाहिए।

     अध्याय 2.45. धर्मानुसार ब्राह्मण ब्रह्मचारी को बेल या पलाश का, क्षत्रिय ब्रह्मचारी को बट या खैर का और वैश्य ब्रह्मचारी को पीलू या गूलर का दण्ड धारण करना चाहिए।

     अध्याय 2.46. प्रमाणानुसार ब्राह्मण ब्रह्मचारी का दण्ड केश तक, क्षत्रिय ब्रह्मचारी का दण्ड ललाट तक और वैश्य ब्रह्मचारी का दण्ड नाक तक लम्बा होना चाहिए । अध्याय 2.47. दण्ड सीधे, बिना कटे हुए, देखने में सुन्दर, लोगों में सीधे भय नहीं करने वाले छिलकों के सहित और बिना जले हुए होने चाहिए।

     अध्याय 2.48. ईप्सित दण्ड धारण कर, सूर्य उपासना तथा अग्नि की प्रदक्षिणा कर विधिपूर्वक भिक्षा मांगनी चाहिए।

     अध्याय 2.49. उपवीत ब्राह्मण ब्रह्मचारी को " भक्त" शब्द का वाक्य के पहले उच्चारण कर, क्षत्रिय ब्रह्मचारी को " भक्त " शब्द का वाक्य के मध्य में उच्चारण कर और वैश्य ब्रह्मचारी को "भक्त" शब्द का वाक्य के अंत में उच्चारण कर भिक्षायाचना करनी चाहिए ।

     ब्रह्मचारी सभी द्विज होते हैं। उन्हें अपने ऊर्ध्व परिधान में अंतर रखना चाहिए । जनेऊ में अंतर क्यों रखा गया है? वे दंड में अंतर क्यों रखे ? भिक्षा मांगने के तरीके में अंतर क्यों रखा गया है? ब्राह्मण ब्रह्मचारी ही यह क्यों कहे- " भगवती भिक्षाम देहि" क्षत्रिय ब्रह्मचारी इतना ही क्यों कहें- “भिक्षाम भवती देहि "? वैश्य क्यों कहे- “भिक्षाम् देहि भवती।”