हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
तेइसवीं पहेली
कलियुग - ब्राह्मणों ने इसे अनन्त क्यों बनाया ?
यदि हिन्दुओं में कोई धारणा सर्वाधिक व्याप्त है और जिसके विषय में सभी स्त्री-पुरुष, बूढ़े और जवान, समझदार और गैर- समझदार परिचित हैं, वह है- कलियुग । यह सभी जानते हैं कि आज का युग कलियुग है और वे कलियुग में रह रहे हैं। कलियुग का मनोवैज्ञानिक प्रभाव लोगों के दिमाग में घुसा हुआ है। इसका अर्थर है कि यह अमांगलिक युग है। यह अनैतिक युग है। इसलिए यह जानना आवश्यक है कि ऐसी भावना क्यों पनपी ? हमें चार बातों का पता होना चाहिए, वे हैं- 1. कलियुग क्या है ? 2. कलियुग का आरंभ कब हुआ?, 3. कलियुग कब समाप्त होगा ?, 4 लोगों में ऐसी धारणा क्यो पनपी ?

I
प्रथम प्रश्न से आरंभ करते हैं। इसकी विवेचना के उद्देश्य से यह उचित होगा कि सर्वप्रथम हम इसका समास विग्रह करें और अलग से विचार करें। युग का अर्थ क्या है? ऋग्वेद में "युग" का प्रयोग काल, पीढ़ी और जनजाति के अर्थ में किया गया है जैसे कि युगे युगे ( हर युग में), उत्तरयुगानि (भविष्य काल में), उत्तर युगे (बाद के काल में) और पूर्वानि युगानि ( पूर्व काल में) आदि अभिव्यक्तियां हैं। यह मानुषी, मानुष, मनुष्य के संबंधय में प्रयुक्त हुआ है जिसका शाब्दिक अर्थ मानव की पीढ़ियों से है। इसका एक ही अर्थ है - काल। यह स्थापित करने के अनेक प्रयत्न किए गए हैं कि वैदिक जन " युग" को कितने समय का मानते हैं। युग की व्युत्पत्ति संस्कृत की युज् धातु से है, जिसका अर्थ है, योजित करना और वह अर्थ ज्योतिष में योग के अर्थ में लिया जाता है। प्रो. वेबर का मत है कि युग का समय चन्द्रमा की चार गतियों के बराबर है।
इस अध्याय में 45 टाइप किए हुए पृष्ठ हैं। केवल पहले 9 पृष्ठों पर लेखक की हस्तलिपि में संख्याएं पड़ी हैं। बहरहाल इस अध्याय की सामग्री संपूर्ण है। - संपादक
इस बात पर प्रो. रंगाचार्य¹ ने एक सिद्धांत प्रतिपादित किया है कि “सम्भवतः युग का अर्थ नव चन्द्रमा से एक माह की अवधि है जब सूर्य और चन्द्रमा आमने-सामने होते हैं अर्थात् जब उनका योग होता है।" अन्य विद्वान इससे सहमत नहीं। उदाहरणार्थ श्याम शास्त्री' के अनुसार युग एक साधारण वर्ष है जैसा कि स्कन्द पुराण का भाग कहे जाने वाले सेतुमहात्म्य में कहा गया है। इसी सिद्धांत के मत में इसे शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष के लिए भी प्रयुक्त किया गया है ।
इन सब प्रयत्नों से यह जानने में सहायता नहीं मिलती कि वैदिक जन युग का समय कितना समझते थे ?
वैदिकों के अथवा धर्म मीमांसकों के साहित्य में युग के संबंध में कोई यथार्थता नहीं है। ज्योतिषशास्त्रियों (वेदांग ज्योतिष के रचनाकारों) ने इसका अर्थ वैदिकजन से भिन्न एक निश्चित काल के लिए किया है। उनके अनुसार युग का अर्थ है पांच वर्ष का समय चक्र, जिसके अंग इस प्रकार हैं- 1. संवत्सर, 2. परिवत्सर, 3. इद्वत्सर, 4. अनुवत्सर और 5. वत्सर ।
अब हम कलि पर आते हैं जो कृत, त्रेता, द्वापर और कलि, चार युगों के चक्र का एक भाग है। ‘कलि' शब्द का आरम्भ कहां से हुआ। कृत, त्रेता, द्वापर और कलि का उपयोग विभिनन तीन प्रसंगों में किया गया है। कलि शब्द तथा अन्य शब्दों का सर्वप्रथम प्रयोग जुए के पासों में हुआ करता था ।
ऋग्वेद से पता चलता है कि पासों की गोटियां विभीतक वृक्ष के फलों की हुआ करती थीं। यह वृक्ष जायफल के आकार का होता है उसके पांच सपाट रुख होते हैं। बाद में पासे चौकोर बनाए जाने लगे। चारों कोनों पर चार अंक होते थे 4, 3, 2, 11 जिस ओर ‘4’ लिखा होता, वह 'कृत' था, 3 वाला त्रेता 2 वाला द्वापर और 1 की गिनती वाला भाग कलि कहलाता था । श्याम शास्त्री बताते हैं कि किस प्रकार जुआ यज्ञ का अंग बन गया, किस प्रकार यह खेला जाता था? उसका वर्णन इस प्रकार है:
“यजमान की गाय ले जाते समय अनेक खिलाड़ी मार्ग में उसके साथ चला करते थे और गाय पर दाव लगाते थे। वे कई दलों में बंटकर जुआ खेला करते थे। दाव के रूप में अनाज जमा कराया करते थे। प्रत्येक खिलाड़ी एक सौ अथवा उससे अधिक कौड़ियां जमीन पर फेंका करता था और इस प्रकार फेंकी गई कौड़ियों में से जब अधिक चित हुआ करती थीं या पट्ट हुआ करती थीं तो दाव के अनुसार उनकी संख्या चार से विभाजित हो जाती थी तो यजमान जीत जाता था। यदि नहीं तो वह हार जाता था । इस प्रकार जीते गये अनाज से बलि के दिन चार ब्राह्मण जिमाए जाते थे । "
1. युगाज ए क्वश्चन आफ हिंदू क्रोनोलाजी एण्ड हिस्ट्री, पृ. 19
2. द्रप्स : दि वैदिक साइकिल आफ एंक्लीप्स्ज, (1938) पृ. 88
वैदिक साहित्य के विषय में प्रो. इगलिंग के कथन से इस संबंध में कोई संदेह नहीं रह जाता है कि आदिकाल से ही जुए का प्रचलन था। यह भी स्पष्ट है कि यह खेल पांच पासों से खेला जाता था¹। जिनमें से चार कृत और पांचवां कलि कहलाता था। वह ये भी बताते हैं कि खेल कई प्रकार का होता था और सबसे पहला खेल इस प्रकार का होता था कि यदि सारे पासे एक जैसे पड़ते थे तो खिलाड़ी जीत जाता था। जुआ राजसूय के समय और पवित्र अग्नि की स्थापना पर किए जाने वाले यज्ञ के समय भी खेला जाता था।
कृत, त्रेता, द्वापर और कलि शब्दों का गणित में भी प्रयोग किया जाता था। यह भगवती सूत्र पर अभयदेव सूरी की निम्न टीका से स्पष्ट है जो कि जैनधर्म का विशाल ग्रंथ है।
“गणित की शब्दावली में सम संख्या युग्म कहलाती थी और विषम संख्या को ओझ कहते हैं। दो संख्याओं को ही युग्म कहा जाना चाहिए और दो को ही ओझ । फिर भी, युग्म शब्द से अर्थ है - चार युग्म अर्थात् चार संख्याएं । उनमें कृत युग्म बनता है। कृत का आशय है सम्पूर्ण । क्योंकि चार के आगे कोई संख्या नहीं है, जिसे अलग नाम दिया जाता हो। (अर्थात् वह नाम कृत आदि) चार नामों से भिन्न है। जो संख्या अपूर्ण है, जैसे त्रियोज और दूसरी संख्याएं और जो विशेष सम संख्या है वह है कृत युग्म। जहां तक त्रियोज का प्रश्न है, ऐसी विषम संख्या है, जो कृतयुग के ऊपर विषम है वह त्रियोज है। जहां तक द्वापरयुग्म का प्रश्न है, वह भी कृतयुग्म की भांति सम संख्या है किंतु उससे भिन्न है जो आरंभ के दो से अथवा कृतयुग्म के ऊपर से आरम्भ होती है। वह द्वापरयुग्म है। द्वापर एक विशेष व्याकरणिक शब्द है। कालयोज वह विषम संख्या है, जो कलि से अविभाज्य है। अर्थात् एक कृतयुग्म के लिए एक कालयोज है। वे संख्याएं, जिन्हें चार से विभाजित किया जा सकता है। और संख्या पूरी तरह विभाजित हो जाती है, तो वह कृतयुग्म है। संख्याओं के क्रम में, यद्यपि चार को चार से विभक्त करने की आवश्यकता नहीं थी। वह स्वयं चार है, फिर भी वह कृतयुग्म कहलाती है। "
श्याम शास्त्री² इस शब्दावली को दूसरे आशय से प्रयोग करते हैं। उनके अनुसार, इनका उपयोग पर्व नाम से किया गया है जैसे, कृतपर्व, त्रेतापर्व, द्वापरपर्व और कलिपर्व । एक पर्व 15 तिथियों की अवधि का होता है या यह दिन पक्ष के नाम से पुकारे जाते हैं क्योंकि तिथियां धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ी होती हैं। इसलिए पर्व समापन का सही समय महत्वपूर्ण है। यह कहा जाता था कि पर्व अपने समाप्ति काल के कारण चार भागों में विभाजित हैं, 1. वे या तो सूर्योदय पर समाप्त होते है।, या 2. पहले प्रहर में, 3. अथवा दोपहर बाद 4. अथवा तीन पहर बाद । पहले को कृत पर्व कहते थे, दूसरे को त्रेता पर्व, तीसरे को द्वापर पर्व और चौथे को कलि
1. शतपथ ब्राह्मण में तत्संबंधी उनकी टिप्पणी देखें, खण्ड 4, पृ. 107
2. श्याम शास्त्री, द्रप्स, पृ. 92-3
उस समय ‘कलि' और 'युग' शब्दों के कुछ भी अर्थ क्यों न रहे हों, परन्तु कलियुग दीर्घकाल से प्रयुक्त शब्द होने के कारण हिन्दुओं की कालगणना मे इकाई का द्योतक रहा है। हिन्दुओं के अनुसार चार युगों का एक चक्र है, उन्हीं में से कलियुग भी एक है। अन्य युग हैं कृत, त्रेता और द्वापर
II
वर्तन कलियुग कब आरंभ हुआ? इस प्रश्न के दो विभिन्न उत्तर हैं।
ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार, इसका आरंभ वैवस्वत मनु के पुत्र नाभनिदिष्ट से होता है। पुराणों के अनुसार यह महाभारत युद्ध के पश्चात् कृष्ण के देहांत पर आरंभ हुआ ।
समय निर्धारण में पहले डा. श्याम शास्त्री का कथन¹ है, कलियुग ईसा से 3,101 वर्ष पूर्व आरम्भ हुआ। दूसरा अनुमान गोपाल अय्यर ने गणना करके बताया है। उनके अनुसार महाभारत युद्ध 14 अक्तूबर, 1194 ई.पू. को आरंभ होकर 31 अक्तूबर को समाप्त हुआ था। उनका कहना है कि कृष्ण का देहांत युद्ध - समाप्ति के 16 वर्ष पश्चात् हुआ। उनका अनुमान इस बात पर आधारित है कि जब परीक्षित का राजतिलक हुआ, तो उसकी आयु सोलह वर्ष की थी और पाण्डवों ने परीक्षित का राजतिलक करते ही महाप्रस्थान किया था। राजतिलक उसी दिन हुआ था जिस दिन कृष्ण का देहांत हुआ था। इससे वह समय 1177 ई.पू. बैठता है, जब से कलियुग आरंभ हुआ।
इस प्रकार कलिनयुग के आरंभ के विषय में हमारे समक्ष दो तिथियां हैं। 3. 101 ई.पू. और 1,117 ई.पू.। कलियुग के संबंध में यह प्रथम पहेली है। कलियुग के आरंभ के संबंध में दो भिन्न तिथियां दी गई हैं, जिनमें बहुत बड़ा कालांतर है। एक व्याख्या कहती है कि 3101 ई.पू. कल्प परिवर्तन की तिथि है न कि कलि के आरंभ की और यह नकल करने वाले की गलती है जिसने कल्प को कलि पढ़ लिया और भ्रांति पैदा कर दी। दूसरी व्याख्या डॉ. श्याम शास्त्री ने दी है। उनके अनुसार कलियुग दो हैं। एक, वह जो 3101 ई.पू. में आरंभ हुआ और दूसरा 1260 अथवा 1240 में आरम्भ हुआ। पहला कलियुग 1840 अथवा 1860 वर्ष रहा और समाप्त हो गया।
1. गवम् अयन।