हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
'विष्णु पुराण के अनुसार अत्रि ब्रह्मा का पुत्र और सोम (चन्द्रमा) का पिता था, जिसे ब्रह्मा ने पौधों की सम्प्रभुता दी और तारों का स्वामी बनाया। राजसूर्य यज्ञ के पश्चात् सोम मदांध हो गया और देवताओं के गुरु बृहस्पति की पत्नी तारा को ले आया जिसके लिए यद्यपि उसकी भर्त्सना की गई और ब्रह्मा ने देवताओं और ऋषियों ने बृहस्पत् की पत्नी लौटाने की अनुनय-विनय भी की किन्तु उसने उसे नहीं लौटाया । सोम का पक्ष ऊष्ण गण ने लिया जबकि आंगिरस के शिष्य रुद्र ने बृहस्पति की सहायता की। दोनों ओर से घमासान युद्ध हुआ, जिसमें देवता और दैत्यों ने क्रमशः दोनों पक्षों में युद्ध किया । ब्रह्मा बीच में पड़े और सोम को विवश किया कि वह बृहस्पति को उसकी पत्नी लौटा दें। इस बीच वह गर्भवती हो गई और एक पुत्र बुध को जन्म दिया। बहुत अनुरोध करने पर उसने स्वीकार कर लिया कि सोम ही बुध का पिता है। जैसा कि पहले बताया जा चुका है, पुरुरवा मनु की पुत्री इला और बुध का पुत्र था। पुरुरवा और अप्सरा उर्वशी का प्रेम शतपथ ब्राह्मण 11.15 1 1, विष्णु पुराण 4, 6, 19 भागवत पुराण 9, 14, और हरिवंश पुराण अंश 26, महाभारत आदि पर्व भाग 75 में वर्णित है। इसमें पुरुरवा का ब्राह्मणों से संघर्ष दिखाया गया है। उन प्रसंगों का आगे उल्लेख किया जाएगा। विष्णु पुराण 6, 7, 1, के अनुसार पुरुरवा के छह पुत्र थे। उनमें सबसे बड़ा अयुस था। अयुस के पांच पुत्र थे: नहुष, क्षेत्र -वृद्ध, रम्भा, राजी और अनेनस ।
“क्षेत्रवृद्ध का पुत्र था सुनहोत्र जिसके तीन पुत्र कास, लेस और गृत्समद थे। अंतिम पुत्र से शौनक उत्पन्न हुआ जिसने चार वर्ण बनाए । कास एक पुत्र कासिराज था, उसका भी पुत्र था दीर्घतमस क्योंकि धन्वंतरि दीर्घतमस था । "
द्वितीय कथन के अनुसार वर्ण व्यवस्था के जनक ब्रह्मा थे। जैसे कि निम्नांकित उद्धरण विष्णु पुराण में मिलते हैं :
“मैत्रेय कहते हैं : तुमने मुझे अर्वस्रोत अथवा मानवसृष्टि के संबंध में बताया। अब हे ब्राह्मण! मुझे विस्तार से बताओ । ब्रह्मा ने इसकी सृष्टि किस प्रकार की ? मुझे बताओ, उसने कैसे और किस गुण से वर्ण बनाए और ब्राह्मण तथा अन्य कार्य कौन-कौन से हैं। पराशर ने उत्तर दिया 3. अपने विचार के अनुसार ब्रह्मा की कामना जगत सृष्टि की हुई। जिनमें सत्व होता है, वे उनके मुख से उत्पन्न हुए। 4. जिनमें रजोगुण होता है, वे उसके वक्ष से जन्मे; जिनमें रजोगुण और तमोगुण होता है, वे उनकी जंघाओं से जन्मे । 5. अन्य उनके चरणों से उत्पन्न हुए जिनके मुख्य लक्ष्ण हैं कलुष। इससे वर्ण व्यवस्था की चार जातियाँ बनीं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, जो क्रमशः मुख, वक्ष, जंथा और चरणों से बने हैं। 6. ब्रह्मा ने यह चातुर्वर्ण्य व्यवस्था यज्ञ के लिए की थी । देवताओं ने वर्षा कर मानवता पर उपकार किया। यज्ञ से सम्पन्नता आती है। 8. इसे गुणी सदाचारी और दुष्कर्मों से दूर रहने वाले लोग सम्पन्न करते हैं। 9. मानव अपनी नम्रता से स्वर्ग और मोक्ष प्राप्त करता है और वे वांछित लोक को प्रस्थान करते हैं।
"गृत्समद का पुत्र शुनक था, उससे शौनक ब्राह्मण, क्षत्रिय और शूद्र उत्पन्न हुए। "
“विताठ पांच पुत्रों के पिता थे। वे थे सुहोत्र, सुहोत्री, गया, गर्ग और कपिल । सुहोत्र के दो पुत्र थे, कासक और राजा गृत्समति । उसके पुत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य थे। "
दूसरे आख्यान के अनुसार उनकी उत्पत्ति विष्णु से हुई जो ब्रह्मा से प्रकट हुए थे और प्रजापति दक्ष बन गए। यह इस प्रकार है¹.
जनमेजय² कहता है : हे ब्राह्मण! मैंने ब्रह्मयुग (वर्णन) सुना है जो आदि युग था। मेरी भी कामना है, क्षत्रिय युग के विषय में सारगर्भित और विस्तार से अनेक प्रेक्षणों के आधार यज्ञ के सौदाहरण उल्लेख का सम्पूर्ण विवरण दें। वैशम्पायन ने उत्तर दिया : “मैं उस युग के विषय में बताता हूं, जिसका यज्ञों के कारण आदर है और जो मुक्ति में अनेक कर्मों की विशिष्टता से सम्पन्न है, जिसका आदर तब के मनुष्यों के कारण किया जाता है। मुक्ति के लिए अबाध कर्म किए जाते थे। ब्रह्मा के प्रति चित्त की एकाग्रता थी और संयम था। ब्राह्मणों के उद्देश्य महानतम थे। ब्राह्मण अपने व्यवहार से गौरवान्वित और मर्यादित थे, संयम का जीवन व्यतीत करते थे। ब्राह्मणों में अनुशासन था, वे अपने कर्त्तव्यपालन में त्रुटिहीन थे। उनका ज्ञान अथाह था। वे मननशील थे। तब सहस्रों युग व्यतीत होने पर ब्राह्मणों की सत्ता शिखर पर थी। तब ये मुनि इस विश्व के विलयन में सम्मिलित हुए। ब्रह्मा से विष्णु प्रकट हुए। वे इन्द्रियज्ञान से परे हो गए। और ध्यानावशिष्ट हो गए, प्रजापति दक्ष बन गए और अनेक प्राणियों की सृष्टि की। ब्राह्मण को रूपराशि (चन्द्रमा को प्रिय) और अक्षय बनाया गया। क्षत्रियों को नश्वर तत्वों से रचा, एकांतरण से वैश्य बने और धूम्र परिष्करण से शूद्रों को बनाया गया। जब विष्णु वर्णों पर विचार कर रहे थे तो ब्राह्मण कौ गौर, लाल, पीत तथा नीले रंग का बनाया गया। इस प्रकार विश्व में मानव वर्णों में विभाजित हो गये। उनकी चार पहचान हुई, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र । एक स्वरूप अनेक कार्य, दो पैरों पर चलने वाला अत्यंत आश्चर्यजनक, शक्तिमान और अपने व्यवसाय में पारंगत तीन उच्च वर्णों के संस्कारों का वेदों में निर्धारण हुआ। प्राणियों की योगावस्था से ब्रह्मा प्रकट हुए। विष्णु जैसी उसे ध्यानावस्था से भगवान प्रचेतस (दक्ष ) अर्थात् महान योगी विष्णु अपनी मेधा एवं ऊर्जा से ध्यानावस्था से कर्मक्षेत्र में उतरे। अपशिष्ट से शूद्र उपजे वे संस्कार रहित हैं। इस कारण वे शुद्धि संस्कारों में सम्मिलित नहीं हो सकते। न ही पवित्र विज्ञान से उनका संबंध है। वैसे ही जैसे ईंधन के घर्षण से अग्नि उत्पन्न होती है और लुप्त हो जाती है। उसकी यज्ञ में कोई आश्वयकता नहीं। इसी प्रकार धरती पर घूमने वाले शूद्र हैं। कुल मिलाकर (बलि देने के अतिरिक्त किसी उपयोग के नहीं) अपने जन्म के कारण, उनका जीवन शुद्धता से वंचित रखा गया है और उनकी अनावश्यकता वेदों में नियत है। "
1. म्यूर, खंड 1, पृ. 152 153
2. हरिवंश में जनमेजय और वैशंपायन के मध्य वार्तालाप |
अन्त में भागवत पुराण¹ :
“कई सहस्र वर्षों के उपरांत अपने कर्मों और प्राकृतिक गुणों से तत्कालीन प्राणियों ने जल पर उतराते अण्डज को जीव रूप प्रदान किया। फिर पुरुष ने उसका विखण् डन कर उससे एक सहस्र जंघाएं, चरण, भुजाएं, चक्षु, मुख और शीर्ष प्रकट किए। विश्व - व्यवस्थापक ने अपने सहयोगी ऋषियों के साथ विश्व की रचना की। उन्होंने अपने कटि से सात अधोभुवन रचे और ऊर्ध्व मूल से और सात ऊर्ध्व भुवनों की रचना की। ब्राह्मण पुरुष का मुख था, क्षत्रिय उसकी भुजाएं, वैश्य उसकी जंघाओं से उपजे और शूद्र उस देव पुरुष के चरणों से जन्मे । पृथ्वी उनके पैरों से बनी। वायु उनकी नाभि से, उनके हृदय से स्वर्ग और उनके वक्ष से महालोक बने।"
अब अंत में वायु पुराण देखें। यह क्या कहता है? इसके अनुसार मनु ने वर्ण-व - व्यवस्था रची :
“गृत्समद का पुत्र शुनक था। उससे शौनक जन्मा । उसी के परिवार में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र उत्पन्न हुए। द्विज मानव विभिन्न कर्मों के साथ जन्मे।'
यह सर्वेक्षण हमें क्या प्रदर्शित करता है? यदि परिणाम निकलता है तो वह है कि ब्राह्मणों ने वर्ण-व्यवस्था की व्याख्या करने के लिए कैसी अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न कर दी है। इन व्याख्याओं में एकरूपता नहीं है और ना ही कोई बात निश्चित रूप से कही गई है। एक ही स्रोत ने जो व्याख्याएं दी हैं, उनमें से कुछ पौराणिक हैं, कुछ रहस्यात्मक और बौद्धिक हैं। सभी का तात्पर्य इस व्यवस्था की व्याख्या करना है।
1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1, पृ. 156