हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
वेदों में यह बताने की चेष्टा की गई है कि वर्ण पुरुष से, मनु से प्रजापति से, वृत्य से और सोम से उत्पन्न हुए हैं।
ब्राह्मण ग्रंथों में वेदों के साथ पर्याप्त मतभेद हैं। वे पुरुष, मनु, वृत्य अथवा सोम से इसकी उत्पत्ति नहीं मानते। वे प्रजापति और ब्रह्मा के बीच अटक जाते हैं। यह नई बात है। तैत्तिरीय ब्राह्मण का अनूठा ही सिद्धांत है। उसका कहना है कि ब्राह्मण देवताओं से उत्पन्न हुए और शूद्र असुरों से।
यह व्याख्या अल्पबुद्धि की सनक लगती है। इससे पता चलता है कि वर्ण-व्यवस्था का औचित्य ठहराने के लिए ब्राह्मणों ने किस प्रकार एड़ी-चोटी का जोर लगाया। प्रश्न यह है कि ब्राह्मण इस व्यवस्था के इतने दृढ़ प्रचारक थे तो वर्ण-व्यवस्था के उद्गम पर एक ही बात पर जम क्यों नहीं सके। एक समान और निर्विवाद ग्राह्य और बौद्धिक व्याख्या क्यों नहीं दे पाए ?
इन अनेक व्याख्याओं में से वर्ण-व्यवस्था के औचित्य में ब्राह्मण केवल दो पर ही ठहरते हैं।
प्रथम यह है कि इसकी उत्पत्ति पुरुष से हुई है। सिद्धांत यह है कि इसका उल्लेख ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में हैं। यदि यह पौराणिक है तो भी पौराणिकता इतिहास ही है। चाहे उसमें अतिश्योक्ति ही क्यों न हो? परन्तु ऐसा नहीं है । व्याख्या पूर्णत: रहस्यात्मक है। यह किसी खब्ती दिमाग की उड़ान है। इसी कारण इसे कभी व्याख्या स्वीकार नहीं किया गया और यही कारण है कि कई अन्य भी परस्पर विरोधी व्याख्याएं दी जाती हैं। इसमें तनिक भी शिष्टाचार नहीं बरता गया है। यहां तक कि वैदिक लेखकों में यही प्रवृति विद्यमान है। यह दो परिस्थितियों से स्पष्ट है। इसका एक संदर्भ ऋग्वेद के विविध अंशों में है। दूसरे, श्वेत यजुर्वेद की कठ और मैत्रायणी संहिता तथा कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता में इसका उल्लेख नहीं है। सामवेद में ऋग्वेद के पुरुष सूक्त के मात्र पांच मंत्र हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि इन पांच मंत्रों को समाहित करते समय उन मंत्रों को छोड़ दिया गया है, जिनमें यह कहा गया है कि वर्ण पुरुष के चार अंगों से उपजे । वास्तव में घालमेल हुआ। परन्तु इसी के साथ यह स्पष्ट संकेत है कि इसके रचयिता उस व्याख्या के संबंध में आश्वस्त नहीं थे जो आस्थाओं से लदी थी। सम्भवतः यह आरोपित और प्रतीकात्मक वर्णन था जिसके अनुसार ब्राह्मणों ने साहित्यिक कथन को तथ्यों में परिवर्तित करने की चेष्टा की । इससे पहेली का उत्तर नहीं मिलता। उल्टे एक उलझन उत्पन्न हो गई है। वह है कि ब्राह्मण क्यों चातुर्वर्ण्य को इतना प्रोत्साहन दे रहे थे ?
इसके पीछे बौद्धिक व्याख्या भगवद्गीता की है। हिन्दुओं का देवता कृष्ण यह समझता है कि वह चातुर्वर्ण्य का रचयिता है और यह सिद्धांत प्रतिपादित करता है कि यह गुणों में अंतर पर आधारित है । गुणों में भिन्नता का सिद्धांत कपिल के सांख्य-दर्शन से लिया गया है। कृष्ण चातुर्वर्ण्य की व्याख्या प्रशंसात्मक शैली से करते हैं, जैसे यह अपरिवर्तनशील हो । सांख्य दर्शन में निःसंदेह यह कहा गया है कि इसका मूल आधार सतो, रजो, तमो गुण हैं। विषय जड़ता का नहीं है। यह परिवर्तनशील सम्यता है, जहां तीनों गुणों की शक्ति समान है। इसमें उस समय गतिशीलता आ जाती है जब साम्यता विभाजित होती है, जब एक गुण का दूसरे पर प्रभुत्व हो जाता है। कृष्ण ने वर्ण-व्यवस्था को वैज्ञानिक स्वरूप देने के लिए सांख्य की गुण-धर्म का मान्यता स्वीकार करके अत्यंत चतुराई दिखाई है । परन्तु ऐसा करके कृष्ण अपने जाल में स्वयं फंस जाते हैं। ये यह नहीं समझ पाते कि गुण तीन हैं और वर्ण चार हैं और इसका कोई कारण नहीं बता सके कि चार वर्णों के लिए तीन से अधिक गुणों की आवश्यकता वे क्यों अनुभव करते हैं। इस प्रकार जिस व्याख्या को बौद्धिक बताने की चेष्टा की गई, वह अनर्गल व्याख्या है। इससे गुत्थी सुलझती नहीं है बल्कि एक और गांठ पड़ जाती है। ब्राह्मण चातुर्वर्ण्य को सही बताने के लिए क्यों झख मार रहे हैं ?