हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
वेदों में यह बताने की चेष्टा की गई है कि वर्ण पुरुष से, मनु से प्रजापति से, वृत्य से और सोम से उत्पन्न हुए हैं।
ब्राह्मण ग्रंथों में वेदों के साथ पर्याप्त मतभेद हैं। वे पुरुष, मनु, वृत्य अथवा सोम से इसकी उत्पत्ति नहीं मानते। वे प्रजापति और ब्रह्मा के बीच अटक जाते हैं। यह नई बात है। तैत्तिरीय ब्राह्मण का अनूठा ही सिद्धांत है। उसका कहना है कि ब्राह्मण देवताओं से उत्पन्न हुए और शूद्र असुरों से।
मनुस्मृति की दो व्याख्याएं हैं, पौराणिक और बौद्धिक । पौराणिक व्याख्या के अनुसार इसका उद्गम ब्रह्मा से है और बौद्धिक व्याख्या का निष्कर्ष है कि यह व्यक्तियों का संगठनात्मक परिणाम है। रामायण, महाभारत और पुराणों का मत यह लगता है कि वर्णों का उद्भव मनु से हुआ है। मनु संबंधी सिद्धांत के प्रसंग में उन्होंने इसे पूर्णत: भ्रामक बना डाला है। रामायण में 'मनु' एक स्त्री है जो दक्ष की पुत्री कश्यप की पत्नी हैं। महाभारत में 'मनु' पुरुष है, स्त्री नहीं। वह वैवस्वत का पुत्र है, जो कश्यप के पुत्र हैं। महाभारत के कश्यप की पत्नी मनु नहीं है, दक्षयानी है जो दक्ष की पुत्री बताई गई है। पुराण वर्ण-व्यवस्था के उदय पर मनु सम्बंधी सिद्धांत को तो स्वीकार करते हैं, किन्तु भिन्न-भिन्न मत प्रकट करते हैं। विष्णु पुराण इसका जन्मदाता उसके पुत्रों को मानता है। किन्तु उसमें इतनी जल्दबाजी है कि वह मात्र दो वर्णों की व्याख्या ही भूल जाता है। यही विष्णु पुराण एक अन्य स्थान पर भिन्न सिद्धांत प्रतिपादित करता है कि चारों वर्ण मनु की पुत्री इला की प्रणाली है। दूसरे सिद्धांत के अनुसार इला का विवाह पुरुरवा से हुआ जिसके छह पुत्र थे। ज्येष्ठतम था अयुष । अयुष के क्षेत्रवृद्ध उससे सुहोत्र, उससे गृत्समद । गृत्समद से चार वर्ण बने। वायु पुराण को यह स्वीकार नहीं। उसका कहना है कि वर्ण गृत्समद पौत्र शौनक से उत्पन्न हुए । 'हरिवंश' एक स्थान पर विष्णु पुराण का मत स्वीकार कर लेता है कि वर्णों का जनक गृत्समद था किन्तु उसमें अन्तरन यह है कि शूद्र उससे उत्पन्न नहीं हुए। यह पुराण नहीं बताता फिर शूद्र कहां से आ गए? एक अन्य स्थान पर वह कहता है कि वर्ण गृत्समद के पुत्र शुनक से निकले। इस प्रकार अपनी ही बात काटता है और विष्णु पुराण और वायु पुराण से भी भिन्न मत प्रकट करता है।
यह व्याख्या अल्पबुद्धि की सनक लगती है। इससे पता चलता है कि वर्ण-व्यवस्था का औचित्य ठहराने के लिए ब्राह्मणों ने किस प्रकार एड़ी-चोटी का जोर लगाया। प्रश्न यह है कि ब्राह्मण इस व्यवस्था के इतने दृढ़ प्रचारक थे तो वर्ण-व्यवस्था के उद्गम पर एक ही बात पर जम क्यों नहीं सके। एक समान और निर्विवाद ग्राह्य और बौद्धिक व्याख्या क्यों नहीं दे पाए ?
इन अनेक व्याख्याओं में से वर्ण-व्यवस्था के औचित्य में ब्राह्मण केवल दो पर ही ठहरते हैं।
प्रथम यह है कि इसकी उत्पत्ति पुरुष से हुई है। सिद्धांत यह है कि इसका उल्लेख ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में हैं। यदि यह पौराणिक है तो भी पौराणिकता इतिहास ही है। चाहे उसमें अतिश्योक्ति ही क्यों न हो? परन्तु ऐसा नहीं है । व्याख्या पूर्णत: रहस्यात्मक है। यह किसी खब्ती दिमाग की उड़ान है। इसी कारण इसे कभी व्याख्या स्वीकार नहीं किया गया और यही कारण है कि कई अन्य भी परस्पर विरोधी व्याख्याएं दी जाती हैं। इसमें तनिक भी शिष्टाचार नहीं बरता गया है। यहां तक कि वैदिक लेखकों में यही प्रवृति विद्यमान है। यह दो परिस्थितियों से स्पष्ट है। इसका एक संदर्भ ऋग्वेद के विविध अंशों में है। दूसरे, श्वेत यजुर्वेद की कठ और मैत्रायणी संहिता तथा कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता में इसका उल्लेख नहीं है। सामवेद में ऋग्वेद के पुरुष सूक्त के मात्र पांच मंत्र हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि इन पांच मंत्रों को समाहित करते समय उन मंत्रों को छोड़ दिया गया है, जिनमें यह कहा गया है कि वर्ण पुरुष के चार अंगों से उपजे । वास्तव में घालमेल हुआ। परन्तु इसी के साथ यह स्पष्ट संकेत है कि इसके रचयिता उस व्याख्या के संबंध में आश्वस्त नहीं थे जो आस्थाओं से लदी थी। सम्भवतः यह आरोपित और प्रतीकात्मक वर्णन था जिसके अनुसार ब्राह्मणों ने साहित्यिक कथन को तथ्यों में परिवर्तित करने की चेष्टा की । इससे पहेली का उत्तर नहीं मिलता। उल्टे एक उलझन उत्पन्न हो गई है। वह है कि ब्राह्मण क्यों चातुर्वर्ण्य को इतना प्रोत्साहन दे रहे थे ?
इसके पीछे बौद्धिक व्याख्या भगवद्गीता की है। हिन्दुओं का देवता कृष्ण यह समझता है कि वह चातुर्वर्ण्य का रचयिता है और यह सिद्धांत प्रतिपादित करता है कि यह गुणों में अंतर पर आधारित है । गुणों में भिन्नता का सिद्धांत कपिल के सांख्य-दर्शन से लिया गया है। कृष्ण चातुर्वर्ण्य की व्याख्या प्रशंसात्मक शैली से करते हैं, जैसे यह अपरिवर्तनशील हो । सांख्य दर्शन में निःसंदेह यह कहा गया है कि इसका मूल आधार सतो, रजो, तमो गुण हैं। विषय जड़ता का नहीं है। यह परिवर्तनशील सम्यता है, जहां तीनों गुणों की शक्ति समान है। इसमें उस समय गतिशीलता आ जाती है जब साम्यता विभाजित होती है, जब एक गुण का दूसरे पर प्रभुत्व हो जाता है। कृष्ण ने वर्ण-व्यवस्था को वैज्ञानिक स्वरूप देने के लिए सांख्य की गुण-धर्म का मान्यता स्वीकार करके अत्यंत चतुराई दिखाई है । परन्तु ऐसा करके कृष्ण अपने जाल में स्वयं फंस जाते हैं। ये यह नहीं समझ पाते कि गुण तीन हैं और वर्ण चार हैं और इसका कोई कारण नहीं बता सके कि चार वर्णों के लिए तीन से अधिक गुणों की आवश्यकता वे क्यों अनुभव करते हैं। इस प्रकार जिस व्याख्या को बौद्धिक बताने की चेष्टा की गई, वह अनर्गल व्याख्या है। इससे गुत्थी सुलझती नहीं है बल्कि एक और गांठ पड़ जाती है। ब्राह्मण चातुर्वर्ण्य को सही बताने के लिए क्यों झख मार रहे हैं ?