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हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 67 of 92
25 ऑगस्ट 2023
Book
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     महाभारत की व्याख्या निम्न प्रकार से है¹ :

Varnashrama Dharma ki Pahli - Hindu Dharm Ki Paheliyan - Riddle of Hinduism - Hindi Book Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar     “महान ऋषियों की भांति भव्यता से जन्मे प्रचेता के दस पुत्र गुणवान और पवित्र प्रतिष्ठित हुए और उनसे पूर्ण गौरवशाली प्राणी उनके मुख से प्रज्ज्वलित होने वाली अग्नि से स्वाहा हो गए। उनसे दक्ष प्रचेतस जन्मे और विश्व के जनक दक्ष से ये जगत। विरनी के सहवास से मुनि दक्ष को अपने समान एक सहस्र पुत्र प्राप्त हुए, जिन्हें नारद ने मोक्ष का मार्ग बताया और सांख्य का अनुपम ज्ञान दिया। संतति वृद्धि के मनोरथ से दक्ष प्रजापति ने पचास पुत्रियां उत्पनन कीं, उनमें से दस धर्म को दे दी, तेरह कश्यप को, सत्ताइस काल नियंता इन्दु (सोम) को.... अपनी तेरह में से सर्वश्रेष्ट पत्नी दक्षयानी से मारिचि पुत्र कश्यप को इन्द्र के पश्चात् अपनी शक्ति में अद्वितीय आदित्य तथा विवस्वत प्राप्त हुए। विवस्वत से शक्तिमान पुत्र यम वैवस्वत उत्पन्न हुआ। मार्तण्ड (विवस्वत, सूर्य) को बुद्धिमान और वीरपुत्र मनु उत्पन्न हुए और प्रसिद्ध यम उसका (मनु) अनुज प्राप्त हुआ। बुद्धिमान मनु धार्मिक था जिसने एक प्रजाति चलाई। इस प्रकार उसके ( परिवार) मनुष्य, मानव जाति कहलाई । हे राजन् ! उससे ब्राह्मण क्षत्रियों के साथ उत्पन्न हुए। "

     महाभारत की दूसरी व्याख्या ऋग्वेद के पुरुष सूक्त के समान है। वह इस प्रकार है:

     राजा किसी ऐसे व्यक्ति को राज पुरोहित नियुक्त करे। जो उत्तमता का संरक्षक और दुष्टता का प्रतिरोधी हो । इस विषय में वे इस प्राचीन कथा को सुनाते हैं। जिसमें इला पुत्र मातृस्वन (वायु) और पुरुरवा का संवाद सन्निहित है। पुरुरवा ने कहाः “ तुम मुझे बताओ कि कब ब्राह्मण, कब अन्य तीन जातियां उत्पन्न हुई और कब श्रेष्ठता (प्रथम की) स्थापित हुई। मातृस्वन ने उत्तर दिया- " ब्राह्मण का जन्म ब्रह्मा के मुख से हुआ, उसकी भुजाओं से क्षत्रिय, उसकी जंघाओं से वैश्य जबकि इन तीन वर्णों की सेवा हेतु उसके चरणों से चतुर्थ वर्ण शूद्र उत्पन्न हुआ। जन्मते ही ब्राह्मण धर्म तत्व की रक्षार्थ धरती पर भूतजात का स्वामी बन गया। फिर सृष्टा ने पृथ्वी का शासक क्षत्रिय उत्पन्न किया प्रजा की संतुष्टि को दण्डधारण हेतु द्वितीय यम उत्पन्न किया और ब्रह्मा का आदेश था इन तीन वर्णों को वैश्य धन-धान्य उपलब्ध कराएं और शूद्र सेवा करें। " तब इला पुत्र ने पूछा: “वायु मुझे बताओं अपनी धन-सम्पदा सहित यह पृथ्वी किस के अधिकार में है। ब्राह्मण के अथवा क्षत्रिय के । " वायु ने उत्तर दिया, “ अपनी श्रेष्ठता के आधार पर पृथ्वी पर विद्यमान समस्त सम्पदा का स्वामी ब्राह्मण है, जो कर्तव्य-विधान में पारंगत है। उन्हें यह ज्ञात है, ब्राह्मण जो खाता है, पहनता है, लुटाता है, वह उसी का है। वह सभी जातियों में श्रेष्ठ है, प्रथम जन्मा और सर्वश्रेष्ठ। जिस प्रकार कोई स्त्री अपना पति (पहला ) छिन जाने पर अपने देवर जेठ को दूसरा पति बना लेती है, उसी प्रकार विपत्ति में ब्राह्मण पहला आश्रय है और इसके बाद कोई और।"


1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1, पृ. 125


     महाभारत¹ के शांति पर्व में तीसरी व्याख्या दी गई है:

     भृगु ने उत्तर दिया “ इस प्रकार ब्रह्मा ने पहले अपनी शक्ति से प्रजापतियों के समान भव्य सूर्य और अग्नि को रचा। तब स्वामी ने सत्य, धर्मनिष्ठा, कठोर भक्ति, शाश्वत वेद, गुणकर्म, और स्वर्ग ( प्राप्ति हेतु ) शुद्धता की पुष्टि की। उसने देवता, दानव, गंधर्व, दैत्य, असुर, महाराग, वक्ष, राक्षस, नाग, पिशाच और मानव ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, साथ ही वर्ण के प्राणी रचे । ब्राह्मण का वर्ण गौर, क्षत्रिय का लाल, वैश्य का पीत और शूद्र का काला बनाया। तब भारद्वाज ने प्रतिवाद किया: “यदि हर जाति के चार वर्ण (रंग) उसका परिचायक हैं तो इससे पहचान में भ्रांति होती है। मनोकामना, क्रोध, भय, लोभ, संताप, कुंठा, भूख, क्लांति हम सब में समान है, तब जाति किससे निर्धारित होती हैं। स्वेद, मूत्र, मल, श्लेष, श्लेष्मा, पित्त और रक्त (सबमें समान हैं) सभी शारीरिक विकार हैं, तब जाति किस से निर्धारित होती हैं। अनगिणत चल और अचल पदार्थ हैं, इनका वर्ण कैसे निर्धारित होता है?

     भृगु ने उत्तर दिया, “जातियों में कोई अंतर नहीं है। "

     शांति पर्व में ही चौथी व्याख्या² दी गई है। वह कहती है- भारद्वाज ने फिर पूछा, “परमश्रेष्ठ ब्रह्मर्षि, मुझे बताएं वे क्या गुण हैं कि जिनसे कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र बन जाता है।" भृगु कहते हैं- “जो शुद्ध है। प्रसव तथा अन्य संस्कारों से पवित्र है, जिसको वेदों का सम्पूर्ण अध्ययन है, छह संस्कारों को सम्पन्न करता है, शुद्धता के अनुष्ठान पूर्णता से सम्पन्न करता है, जो चढ़ावे से बचे पदार्थ ग्रहण करता है, अपने धर्म-गुरु से सम्बद्ध है, सदैव धर्मपरायण है और सत्य को समर्पित है, ब्राह्मण कहलाता है। उसमें सत्य के दर्शन होते हैं। स्वाधीनता, अनाक्रमकता, उपकारिता, सादगी, धैर्य और कठोर भक्ति परिलक्षित हो ब्राह्मण हैं। जो राजपद के कर्त्तव्य का पालन करता है, जिसे वेदाध्ययन का व्यसन है और जो लेने और देने से प्रसन्नता अनुभव करता है, वह क्षत्रिय कहलाता है । वह, जो तत्परता से पशुपालन करता है, जिसकी कृषि कार्यों की लगन है, जो शुद्ध है और वेदों के अध्ययन में पारंगत है, वह वैश्य है । वह, जो हर प्रकार के भोजन का व्यसनी है, सभी कार्य करता हैं, जो अस्वच्छ है, जिसने वेदों का परित्याग कर दिया है, जो पवित्र कर्म नहीं करता, परम्परा से शूद्र कहलाता है और यह (जो मैंने बताया) शूद्र के लक्षण हैं और यह एक ब्राह्मण में नहीं मिलते। ( ऐसा ) शूद्र शूद्र ही रहेगा। जो ब्राह्मण (जो ऐसा करता है ) ब्राह्मण नहीं होगा । "


1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1, पृ. 139-40
2. वही, पृ. 141 142


     आइये, अब यह देखें कि वर्ण-व्यवस्था के संबंध में पुराण क्या कहते हैं?

     हम विष्णु पुराण से आरम्भ करते हैं। चातुर्वर्ण्य उत्पत्ति पर विष्णु पुराण में तीन सिद्धांत हैं। एक में यह आरोप के सिर जाता मनु है।¹ विष्णु पुराण का मत :

     “ऐहिक अण्डज से पूर्व देव ब्रह्मा हिरण्यगर्भ, विश्व के शाश्वत नियंता, जो ब्रह्मा के तत्व रूप थे, जिसमें दिव्य विष्णु सन्निहित थे, जो ऋक्, यजुस, साम और अथर्ववेद के रूप में जाने जाते हैं (ही) विद्यमान थे। ब्रह्मा के दाएं अंगुष्ठ से प्रजापति दक्ष उत्पन्न हुए, दक्ष की पुत्री अदिति थी, उससे विवस्वत उत्पन्न हुआ, उससे मनु प्रकट हुआ। मनु के पुत्र थे इक्ष्वाकु, नृग, धृष्ट, सावर्ती, नरिष्यंत, प्रमसु, नाभागनिदिष्ट, करुष और पृषध्र, करुष से करुषगण, महाशक्तिवान क्षत्रिय उत्पन्न हुए। निदिष्टा का पुत्र नाभाग वैश्य बना। "

     विष्णु पुराण में एक और भिन्न कथन है। उसके अनुसार :

     पुत्र कामना में मनु ने मित्र और वरुण की आहुति दी किन्तु होता के द्वारा मंत्र के गलत उच्चारण कर दिए जाने पर एक पुत्री उत्पन्न हुई। उसका नाम इला था। तब मित्र और वरुण की कृपा से मनु नाम के सुद्युम्न का जन्म हुआ, परन्तु महादेव के कोप के कारण वह भी नारी रूप में परिवर्तित हो गया। वह नारी सोम पुत्र बुध के आश्रम के निकट विचरती रही । बुध उस पर आसक्त हो गया और उन दोनों से एक पुत्र उत्पन्न हुआ, पुरुरवा । जन्म के उपरांत उस देवता की, जो ऋक, यजुस, साम और अर्थववेद मानस की आहुति से उत्पन्न हुआ जो यज्ञ पुरुष का रूप है, उसकी ऋषियों ने पूजा की जिन का मनोरथ था कि सुद्युम्न अपना पुरुषत्व पुनः प्राप्त कर ले।


1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट पृ. 220-21