हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
"अग्नि, देवताओं और मनु की संतान सहित मंत्रोच्चार से विविध यज्ञ कर रहे हैं। "
"तुम देव, बज और ऋभुगणों जैसे देवों को प्रसन्न करते हो, मानुष की संतति के बीच शुभ दिन देवताओं के मार्ग से हमारे यज्ञ में आओ। "
“मानव गण ने यज्ञ में अग्नि उद्बोधक की स्तुति की । "
"लोक स्वामी अग्नि ने जब भी कृतज्ञ मानव के आवास की प्रदीप्त कया, उसने राक्षस गण को मार भगाया। "
अब हम ब्राह्मण साहित्य पर आएं और देखें कि इस प्रश्न पर वे क्या कहते हैं ?
शतपथ ब्राह्मण की व्याख्या इस प्रकार है¹:
“प्रजापति ने “भू” जपते हुए यह पृथ्वी बनाई, “भुवः" के साथ वायु बनाई, " स्वाहा” के साथ आकाश बनाया। ब्रह्मांड का इस संसार से सह-अस्तित्व है। अग्नि सर्वत्र व्याप्त है। “भू” कहकर प्रजापति ने ब्राह्मण उत्पन्न कया “भुवः " से क्षत्रिय, “स्वाहा” से विष बनाया अग्नि सर्वत्र व्याप्त है। “भू" कहकर प्रजापति ने स्वयं को उत्पन्न किया, भुवः कहकर संतति रची “स्वाहा " से पशु उत्पन्न किए। यह शिव स्व संतति और पशु है। अग्नि सर्वत्र व्याप्त है।"
इसी शतपथ ब्राह्मण की ही एक अन्य व्याख्या है। यह निम्नांकित है।
"ब्रह्मा (यहां व्याख्याकार के अनुसार वह अग्नि स्वरूप है और ब्राह्मण वर्ग का रूप है) पहले यह एक मात्र (ब्रह्मांड ) थे। एक रहते उनकी वृद्धि नहीं हुई । उन्होंने शक्ति से एक श्रेष्ठ क्षेत्र उत्पन्न किया अर्थात् देवताओं में वे जिनमें शक्ति है (क्षत्राणी) इन्द्र, वरुण, सोम, रुद्र, पारजन्य, यम, मृत्यु, ईशान। इस प्रकार क्षात्र से श्रेष्ठ कोई नहीं। इसलिए ब्राह्मण राजसूय यज्ञ में क्षत्रिय से नीचे बैठते हैं। वह क्षत्रिय की गरिमा स्वीकार करता है। ब्रह्मा, क्षत्रिय का उद्गम है। इस प्रकार यद्यपि राजा की श्रेष्ठता है, अंत में वह उद्गम हेतु ब्राह्मण के आश्रय में जाता है। वह अति दयनीय बन जाता है। उसी के समान जिसकी श्रेष्ठता आहत होती है। 24. उसकी वृद्धि नहीं हुई। उसने विष उत्पन्न किया। देवताओं की इस श्रेणी में वसु, रुद्र, आदित्य, विश्वदेव, मरुत आते हैं। 25. उसकी वृद्धि नहीं हुई उसने शूद्र वर्ण उत्पन्न किया। यह पृथ्वी पूशान है। सो वह सभी का पोषण करती है। 26. उसकी वृद्धि नहीं हुई उसने शक्ति से एक वलक्षण रूप उत्पन्न किया न्याय (धर्म) यह शासक है (क्षात्र) अर्थात् न्याय । इस प्रकार न्याय से श्रेष्ठ कुछ नहीं। इसलिए निर्बल बलवान से त्राण को न्याय मांगता है जैसे एक राजा से यह न्याय सत्य है । परिणामस्वरूप ऐसे व्यक्ति के विषय में वे कहते हैं: "यह सत्य बोलता है, क्योंकि उसमें दोनों गुण हैं। " 27. यह ब्रह्म क्षात्र, विज और शूद्र हैं।
1. म्यूर, द्वारा उद्धृत, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1, पृ. 17
2. संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1. पू. 20
'अग्नि के माध्यम से देवताओं में वह ब्रह्मा बन जाता है, मनुष्यों में ब्राह्मण, (दैवी) क्षत्रिय के माध्यम से (मनुष्य) एक क्षत्रिय, दैवी वैश्य के माध्यम से एक (मनुष्य) वैश्य । दैवी शूद्र के माध्यम से एक (मनुष्य) शूद्र बनता है। अब वह देवों में अग्नि और मनुष्यों में ब्राह्मण है । "
तैत्तिरीय ब्राह्मण में निम्नांकित व्याख्याएं हैं। प्रथम इस प्रकार है¹:
“यह समस्त (ब्रह्मांड) ब्रह्मा द्वारा रचित है। मनुष्य कहते हैं कि वैश्य ऋक् ऋचाओं से बना है। वे कहते हैं, यजुर्वेद के गर्भ से क्षत्रिय उत्पन्न हुआ है। सामवेद से ब्राह्मण प्रकट हुआ। यह शब्द प्राचीन है घोषित प्राचीन। "
द्वितीय संदर्भ में मात्र दो वर्ण हैं- केवल ब्राह्मण और शूद्र उसके अनुसार²:
“ब्राह्मण वर्ण देवों से प्रकट हुआ, शूद्र असुरों से। "
शूद्रों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में तीसरी व्याख्या निम्न प्रकार है³ :
"वह शुष्क भोजन से स्वेच्छा से दुग्ध की आहुति दे । शूद्र दुग्ध की आहुत न दे, क्योंकि शूद्र शून्य से जन्मा है। वे कहते हैं, जब शूद्र दूध चढ़ाता है, वह आहुति नहीं है। शूद्र अग्निहोत्र में दूध से आहुति न दे क्योंकि वे इसे शुद्ध नहीं करते। जब उसे छान लिया जाय, तब यह आहुति है । "
अगली बात यह देखनी है कि वर्ण-व्यवस्था के सम्बन्ध में स्मृतयों की क्या व्याख्या है, उसका ज्ञान आवश्यक है । मनु ने अपनी स्मृति⁴ में इस संबंध में क्या कहा है:
“उसने (स्वयंभू) इच्छा करके और अपनी देह से विभिन्न जीवों की रचना के मनोरथ से पहले सागर की सृष्टि की और उसमें एक बीज छोड़ दिया।
9. बीज सहस्रों सूर्यों के समान प्रकाश वाला, सुवर्ण के समान शुद्ध अंडज हो गया। उसमें सम्पूर्ण लोकों की सृष्टि करने वाले बह्मा उत्पन्न हुए । 10. जल को "नारा: " कहते हैं क्योंकि वह नर की संतान हैं। वह "नार" परमात्मा का प्रथम निवासस्थान है, इस कारण परमात्मा " नारायण" कहे जाते हैं। 11. वह जो अत्यंत प्रसिद्ध सबका कारण है, नित्य है, सत् तथा असत् स्वरूप है, उससे उत्पन्न पुरुष लोक में ब्रह्मा कहा जाता है। 12. ब्रह्मा ने उस अण्डे में एक वर्ष निवास कर अपने ध्यान के द्वारा उस अंडे के दो टुकड़े कर दिए। 13. “ कि विश्व में प्राण प्रतिष्ठा हो, उन्होंने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों की रचना की जो उनके मुख, भुजाओं, जंघाओं और चरणों से उत्पन्न हुए। 32. वे ब्रह्मा अपने शरीर के दो भाग करके आधे भाग से पुरुष तथा आधे भाग से स्त्री हो गये और उसी स्त्री में "विराट" पुरुष की सृष्टि की। 33. हे श्रेष्ठ द्विजगणो! उस “विराज" पुरुष ने तपस्या करके स्वयं की सृष्टि की, इस लोक की सृष्टि की। " 34. प्रजापतियों की सृष्टि करने को इच्छुक मैंने अत्यंत कठिन तपस्या कर पहले इस प्रजापतियों की सृष्टि की। 35. मरीचि, अत्रि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेता, वसिष्ठ, भृगु और नारद । 36. महातेजस्वी इन दस प्रजापतियों ने सात अन्य मनुओं, ब्रह्मा से पहले नहीं उत्पन्न किये गये देवों, उनके वास्रस्थानों तथा अपरिमित तेजस्वी महर्षियों की सृष्टि की। 37. यज्ञ, राक्षस, पिशाच, गंधर्व, असुर, नाग, सर्प, गरुड़, पितृगण । 38. तथा बिजली, वज्र, बादल, रोहित, इन्द्रधनुष, उल्का, निर्घात, धूमकेतु और अनेक प्रकार के ऊंची-नीची छोटी-बड़ी ताराओं, ध्रुव तथा अगस्त्य आदि। 39. किन्नर, वानर अनेक प्रकार की मछलियां, पक्षी, पशु, मृग, सिंह, व्याघ्र आदि और दोनों ओर दांत वाले पशुओं। 40. कृमि, बहुत छोटे कीड़े, कीट-पतंग, जूं, मक्खी, खटमल, सब प्रकार के दंश तथा मच्छर और अनेक प्रकार के जड़ पदार्थों की सृष्टि की। 41. इस प्रकार इन महात्माओं ने मेरे आदेश से तपोबल द्वारा इन स्थावर तथा जंगम प्राणियों की सृष्टि उनके कर्म के अनुसार की। "
1. म्यूर, खंड 1, पृ. 17
2. और 3. म्यूर, संस्कृत टैक्टस, खंड 1, पृ. 21
4. वही, पृ. 36-37
मनु ने अपनी 'स्मृति' में उन आधारभूत कारणों के विषय में एक अन्य मत प्रकट किया है जिनके परिणामस्वरूप मनुष्यों को चार श्रेणियों में विभाजित किया गया¹ :
“अब मैं संक्षेप में बताता हूं कि किस क्रम से अपने गुणानुसार आत्माएं अपनी स्थिति को पहुंचती हैं। 40. सत्व - सम्पन्न आत्माएं देवता बन जाती हैं, रजोगुण युक्त मनुष्य बनती हैं, जबकि तमोगुण वाली वन्य जंतु होती हैं - यह तीन गतियां हैं। 43. हाथी, अश्व, शूद्र और प्रताणनीय मलेच्छ, सिंह, बाघ और सूकर की मध्यम अधभार स्थिति... 46. राजा, क्षत्रिय, राज पुरोहित और वे व्यक्ति, 1 जिनका मुख्य व्यवसाय वाद-प्रतिवाद है, दुर्वासना की मध्य स्थिति... 48. भक्त, तापस, ब्राह्मण, देवतागण विमानारूढ़ होती हैं। तारामंडल दैत्यों में सद्गुण न्यूनतम होते हैं। 49. अग्निहोत्री, ऋषि, देवतागण, वेद, सृष्टा ब्रह्मा, सदाचारी, महंत, अव्यक्तों में सर्वाधिक सदगुण होते हैं। 50. सृष्टा, सदाचारी, महंत और अव्यक्त ब्रह्मा में सर्वोपरि श्रेष्ठता है। इन विचारों की रामायण और महाभारत में व्यक्त विचारों से तुलना की जाए। "
यह रुचिकर होगा कि हम रामायण और महाभारत से इस मत की तुलना करें। रामायण में कहा गया है कि चारों वर्ण मनु की संतान हैं। वे दक्ष की पुत्री और कश्यप की पत्नी से उत्पन्न हुए हैं:
1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1, पृ. 41
“सुनो, मैं तुम्हें बताता हूँ कि आरम्भ में सर्वप्रथम प्रजापति ने प्रारंभ किया। सर्वप्रथम कर्दम थे, फिर विकृत, शेष, समस्रेय, शक्तिमान, भूपुत्र, स्थनु, मारीचि, अत्रि, प्रबल, क्रतु, पुलस्त्य, अंगिरस, प्रचेता, पुलह, दक्ष, फिर वैवस्वत, आरिष्टनेमी और गौरवशाली कश्यप, जो अंतिम थे। दक्ष प्रजापति की साठ कन्याएं बताई जाती हैं। उनमें से अदिति, दिति, दनु, कालका, ताम्र, क्रोधनासा, मनु और अनाला, इन आठ सुन्दर कन्याओं का विवाह कश्यप से हुआ। प्रसन्न होकर कश्यप ने कहा- “तुम मेरे समान पुत्र उत्पन्न करो, तीनों लोक का पोषण करो। " अदिति, दिति, दनु और कालका तत्पर हो गईं किन्तु अन्य तैयार न हुईं। अदिति से तैंतीस देवता उत्पन्न हुए, आदित्य, वसु और दो अश्विनी पुत्र। कश्यप भार्या मनु से मनुष्य जन्मे, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र । ब्राह्मण का जन्म मुख से हुआ, क्षत्रिय का वक्ष से, वैश्य जंघाओं से और शूद्र चरणों से। ऐसा वेद कहते हैं । अनल से शुद्ध फलों वाले वृक्ष उत्पन्न हुए। "