हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
परिशिष्ट - I
वर्णाश्रम धर्म की पहेली
वर्ण धर्म और आश्रम धर्म के दो मताग्रहों की ओर पहले ही ध्यान दिलाया जा चुका है, जिन दोनों से मिलकर वर्णाश्रम धर्म बनता है और जो हिंदुत्व का मूल आधार है। इन अजीब सिद्धांतों पर प्राचीन लेखकों के क्या विचार हैं? मैं उन पर प्रकाश डालने से नहीं रह सकता ।
I
पहले वर्ण धर्म से प्रारंभ करते हैं। यह उचित होगा कि वेदों में प्रकट किए विचारों को सर्वप्रथम एक स्थान पर एकत्रित किया जाए।
इस विषय पर ऋग्वेद के दसवें मंडल में 90 वें मंत्र को देखना है । वह इस प्रकार है :
1. “पुरुष के एक सहस्र शीश हैं, एक सहस्र चक्षु, एक सहस्र चरण । वह सर्वत्र परिपूर्ण व्यापक है। उसने दस अंगुलियों से हर ओर से समस्त भूमंडल को आच्छादित कर रखा है।” 2. “पुरुष स्वयं सम्पूर्ण (ब्रह्मांड ) है, जो वर्तमान है, जो भावी है। वह अविनाशी स्वामी है। भोजन से उसका विस्तार होता है। 3. उसकी समानता ऐसी है और पुरुष सर्वश्रेष्ठ है। सारी सृष्टि उसका क्षेत्र है और उसका तीन चौथाई अविनाशी अंश अंतरिक्ष में है। 4. पुरुष का तीन चौथाई अंश उर्ध्व है, उसका एक चौथाई अंश यहां पुनः विद्यमान है। फिर उसका सर्वत्र विलय हो गया। उन सभी पदार्थों में जो भक्षण करती हैं और भक्षण नहीं करती। 5. उससे विराज उत्पन्न हुआ और विराज से पुरुष। जन्म लेते ही वह धरती से आगे बढ़ गया आगे भी और पीछे भी। 6. जब देवों ने पुरुष की आहुति से यज्ञ किया तो वसंत उसका घी था ग्रीष्म लकड़ी और शरद समिधा। 7. यह बलि पुरुष जो सर्वप्रथम जन्मा उन्होंने बलि घास पर जला दिया । उसके साथी देवताओं साध्यों और ऋषियों ने आहुति दी। 8. इस ब्रह्मांड यज्ञ से दही और मक्खन उपलब्ध हुए। इससे वे नभचर और थलचर बने जो वन्य और पालतू हैं। 9.ब्रह्मांड यज्ञ से ऋग्वेद और सामवेद की ऋचाएं निकलीं, छंद और यजुस निकले। 10. उससे अश्व जन्में और दोनों जबड़ों वाले सभी पशु जन्मे, मवेशी जन्मे और उसी से अजा मेष जन्मे। जब (देवों ने) पुरुष को कितने भागों में काटकर विभाजित कर दिया। उसका मुख्य क्या था। उसकी कितनी भुजाएं थीं। ( कौन से दो तत्त्व) उसकी जंघाएं और चरण बताई गई हैं। 12. ब्राह्मण उसका मुख था, राजन्य उसकी भुजाएं बनी, जो वैश्य (बना) वह उसकी जंघाएं थीं, शूद्र उसके पैरों से उत्पन्न हुए । 13. उसकी आत्मा (मानस) से चन्द्रमा, उसके चक्षु से सूर्य, उसके मुख से इन्द्र और अग्नि, उसके श्वास से वायु बनी। 14. उसकी नाभि से मारुत बनी, उसके शीर्ष से आकाश बना, उसके चरणों से धरती, उसके कर्ण से दिशाएं और इस प्रकार विश्व बना। 15. जब देवता यज्ञ कर रहे थे, उन्होंने पुरुष को एक बलि- जीव के रूप में बांधा। इसके लिए सात डंडिया अग्नि के चारों ओर थी और तीन बार लकड़ियों की सात टुकड़ों की समिधा चढ़ाई गई। 16. इस यज्ञ में देवताओं ने आहुति दी। यह प्रथम अनुष्ठान था। इन शक्तियों ने आकाश से कहा पूर्व साध्यगण, कहां है ?"
1. यह पहेली 16-17 का मिला-जुला परिशिष्ट है जिसका शीर्षक है "वर्णाश्रम धर्म"। इसको मूल अनुक्रमणि का में सम्मिलित नहीं किया गया है, इसलिए इसे परिशिष्ट में रखा गया है। यह कहना कठिन है, कौन-सा पाठ बाद का है। दोनों पाठों में उद्धरण पहले नहीं गये हैं जबकि कई भाष्य बदले गए हैं। यह 55 पृष्ठों का आलेख है। इनमें लेखक के संशोधन नहीं हैं। - संपादक
इस मंत्र वृंद का सर्वविदित नाम पुरुष सूक्त है और यह जाति और वर्ण व्यवस्था का शास्त्रीय सिद्धांत माना जाता है।
सर्वप्रथम यह जांच करनी है कि अन्य किस वेद में वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति ऋग्वेद के पुरुष सूक्त की भांति मानी गयी है? अलग-अलग वेदों के मत का अनुशीलन करने पर आश्चर्यजनक परिणाम सामने आते हैं:
सामवेद की ऋचाओं में पुरुष सूक्त सम्मिलित नहीं किया गया है और न उसमें वर्ण-व्यवस्था की कोई व्याख्या दी गयी है।
यजुर्वेद में इस संबंध में अत्यधिक मतातर है। अब हम श्वेत यजुर्वेद का प्रश्न लेते हैं और कृष्ण यजुर्वेद की अपेक्षा अलग से अध्ययन करते हैं तो दोनों की तुलना हम तीन संहिताओं के आधार पर करते हैं। इसकी तीन संहिताओं, कठ संहिता और मैत्रायणी संहिता में ऋग्वेद के पुरुष सूक्त का कोई उल्लेख नहीं है और न उसने वर्ण-व्यवस्था की कोई अन्य व्याख्या दी है। मात्र वाजसनेयी संहिता ही यजुर्वेद की ऐसी संहिता है, जिसके मंत्रों में बिना किसी अन्तर के पुरुष सूक्त यथावत् सम्मिलित किया गया है परन्तु वाजसनेयी संहिता में एक नई और मौलिक व्याख्या दी गई है, जो पुरुष सूक्त से नितांत भिन्न है। पुरुष सूक्त में निम्नांकित¹ है:
1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1, पृ. 18
"उसने एक के साथ स्तुति की। प्राणी बने । प्रजापति राजा थे। उन्होंने तीन के साथ स्तुति की। ब्राह्मण की रचना हुई । ब्राह्मणस्पति राजा थे। उन्होंने पांच के साथ स्तुति की, विद्यमान पदार्थ उत्पन्न हुए। भूतानामपति राजा थे। उन्होंने सात के साथ स्तुति की, सप्तऋषि उत्पन्न हुए। धात्री राजा थे। उन्होंने नौ के साथ स्तुति की, पितृगण उत्पन्न हुए । अदिति राजा थे। उन्होंने ग्यारह के साथ स्तुति की, ऋतुएं उत्पन्न हुईं। आर्तव राजा थे। उन्होंने तेरह के साथ स्तुति की, मास उत्पन्न हुए। वर्ष राजा था। उन्होंने पंद्रह के साथ स्तुति की, क्षत्रिय उत्पन्न हुआ। इन्द्र राजा थे। उन्होंने सत्रह के साथ स्तुति की, पशु उत्पन्न हुए। बृहस्पति राजा थे। उन्होंने उन्नीस के साथ स्तुति की, शूद्र और आर्य (वैश्य) उत्पन्न हुए। दिवस और रात्रि शासक थे। उन्होंने इक्कीस के साथ स्तुति की, अविभाजित सूंड धारी पशु उत्पन्न हुए। वरुण राजा थे। उन्होंने तेईस के साथ स्तुति की, लघु पशु उत्पन्न हुए। पूशान राजा थे। उन्होंने पच्चीस के साथ स्तुति की, वन्य जीव उत्पन्न हुए। वायु राजा थे (ऋ.वे. 10.90.8); उन्होंने सत्ताईस के साथ स्तुति की धरती और स्वर्ग विलग हुए। वसु, रुद्र और आदित्य उनसे विलग हो गए वे राजा थे। उन्होंने उन्तीस के साथ स्तुति की, वृक्ष उत्पन्न हुए। सोम राजा थे। उन्होंने इक्तीस के साथ स्तुति की, प्राणी उत्पन्न हुए। मास के पक्ष राजा थे। उन्होंने इक्तीस के साथ स्तुति की, विद्यमान पदार्थ शांत हो गए, प्रजापति परमेष्ठी राजा थे । "
अब कृष्ण यजुर्वेद पर आते हैं। इसमें केवल एक संहिता उपलब्ध है। यह तैत्तिरीय संहिता कहलाती है। इसमें दो व्याख्याएं हैं। प्रथम व्याख्या² यह है जो वाजसनेयी संहिता में मूल रूप में दी गई है। दूसरी व्याख्या इसकी अपनी है और यह वाजसनेयी संहिता में उल्लिखित नहीं है। यह इस प्रकार है:
“वह वृात्य भावावेश से भर उठा तब राजन्य प्रकट हुआ। "
“जिसके घर यह जाने वाला वृात्य अतिथि रूप में आता है, उसे वह (राजा) स्वयं से श्रेष्ठ जानकर उसका सम्मान करे। ऐसा करके वह राजपद अथवा अपनी सत्ता पर आघात नहीं करता । उससे ब्राह्मण प्रकट हुआ और क्षत्रिय भी। उन्होंने कहा हम किसमें प्रवेश करें आदि। "
महत्वपूर्ण बात यह है कि वाजसनेयी संहिता में ऋग्वेद का पुरुष सूक्त सन्निहित है जबकि तैत्तिरीय संहिता में इसका उल्लेख हटा दिया गया है।
1. खंड 4 देखें, प्रपाठक 3, श्लोक 10
2. वही 1, पृ. 22
अथर्ववेद में पुरुष सूक्त है किन्तु मंत्रों का क्रम ऋग्वेद से भिन्न है। बल्कि यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता और तैत्तिरीय संहिता की भांति अथर्ववेद पुरुष सूक्त से समतुल्य नहीं है। इसकी दूसरी व्याख्या है। उतनी पूर्ण और सर्वमान्य नहीं, जैसा पुरुष सूक्त है, किन्तु इसकी अपनी विशेषता है¹:
“सर्वप्रथम ब्राह्मण उत्पन्न हुआ। उसके दस सिर और दस मुख थे। उसने सर्वप्रथम सोम पान किया, उसने शिव को प्रभावहीन किया।
देवता राजन्य से भयभीत थे, जो गर्भ में था। जब वह गर्भ में था, उन्होंने उसे बंधन युक्त कर दिया। परिणामस्वरूप यह राजन्य बंधनयुक्त उत्पन्न हुआ। यदि वह अजन्मा निर्बंध होता तो वह अपने शत्रुओं का वध करता । राजन्य, कोई अन्य, जो चाहे कि वह बंधन मुक्त उत्पन्न हो और अपने शत्रुओं का हनन करता रहे तो वह ऐन्द्र- - ब्राहस्पत्य आहुतियां दे । राजन्य के लक्षण इन्द्र जैसे हैं और ब्राह्मण बृहस्पति है। ब्राह्मण के माध्यम से ही कोई राजन्य को बंधनमुक्त कर सकता है। स्वर्णबंध, एक उपहार, स्पष्ट रूप से उसे बेड़ियों से मुक्त करता है । "
मात्र पुरुष सूक्त ही चार वर्णों की उत्पत्ति की व्याख्या ही नहीं करता बल्कि वर्ण-व्यवस्था की उत्पत्ति की ओर इंगित करता है जो वेदों में पायी जाती है। एक अन्य व्याख्या उन व्यक्तियों का उल्लेख करती है जो मनु की संतति हैं²: उनका निम्नांकित उद्धरण में उल्लेख है:
“प्रार्थनाएं और मंत्र पहले इन्द्र की उपासना में उस उत्सव में संकलित हुए जिसे अर्थवन, पिता मनु और दधीचि ने सुशोभित किया।"
“हे रुद्र ! यज्ञ से संकटमोचन पिता मनु ने जो सम्पदा ग्रहण की, तेरे निर्देश में हमें वही सब प्राप्त हो। "
“जो प्राचीन मित्र दैवी शक्ति से सम्पन्न था। पिता मनु ने उसके प्रत देवों की सफलता के प्रवेश द्वार की भांति मंत्र रचे थे। "
"यज्ञ मुन हैं हमारे पालक पिता । "
"हे देवताओ, तुमने हमें उत्पन्न किया, पोषित किया और हमारे प्रति अनुनय किया, हमें पिता मनु के मार्ग से विचलित न करें। "
"वह (अग्नि) जो मनु की संतति के बीच देवताओं के उद्बोधक स्वरूप निवास करता है, वह इनका भी स्वामी है। "
1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1, पृ. 21-2
2. वही, पृ. 162-165