Hindu Dharm Ki Paheliyan - dr Bhimrao Ramji Ambedkar - हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर - Page 63 मुख्य मजकूराकडे जा

हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 63 of 92
25 ऑगस्ट 2023
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     सगोत्रता विधान का एक और अंग है जिसमें बहुत परिवर्तन किए गए हैं किन्तु जिसकी ओर किसी का ध्यान नहीं गया। वह है बालक का वर्ण निर्धारण । बालक का वर्ण क्या हो? उसे पिता का वर्ण मिलता है या माता का । मनु से पूर्व पिता का माना जाता था, माता के वर्ण का कोई महत्व नहीं था। इस संबंध में कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो इस शोध की पुष्टि करते हैं।

  पिता माता बालक
  नाम वर्ण नाम वर्ण नाम वर्ण
1. शांतनु क्षत्रिय गंगा अज्ञात भीष्म क्षत्रिय
2. पराशर ब्राह्मण मत्स्यगंधा मछेरा कृष्णद्वैपायन ब्राह्मण
3. वशिष्ठ ब्राह्मण अक्षमाला - पायन -
4. शांतनु क्षत्रिय मत्स्यगंधा मछेरा विचित्रवीर्य क्षत्रिय
5. विश्वामित्र क्षत्रिय मेनका अप्सरा शकुंतला क्षत्रिय
6. ययाति क्षत्रिय देवयानी ब्राह्मण यदु क्षत्रिय
7. ययाति क्षत्रिय शर्मिष्ठा आसुरी द्रुहय क्षत्रिय
8. जरत्कारु ब्राह्मण जरत्कारी नाग आस्तीक ब्राह्मण


pitritva Se bhraatritva Ki Aur brahmans ko isse kya Mila - Hindu Dharm Ki Paheliyan - Riddle of Hinduism - dr Bhimrao Ramji Ambedkar     मनु क्या करते हैं ? संतान के वर्ण निर्णय संबंधी विधान में मनु¹ के परिवर्तन क्रांतिकारी हैं। मनु' ने निम्नांकित नियम निर्धारित किए:

     5. “सभी वर्गों में वे संतान, जिनका जन्म सहज विवाहित पत्नियों से होता है जो उसी वर्ण की कन्या रही हों, वे उसी वर्ण (जो पिता का है) के माने जाएंगे। "

     6. “द्विज द्वारा उस पत्नी से उत्पन्न संतान, जो एक वर्ण नीचे की हो, वे भी (अपने पिता के समान) वर्ण में गिने जाएंगे भले ही माता के दोष उनमें रहे हों। "

     14. द्विजों के वे पुत्र, जो एक वर्ण नीचे की पत्नियों से उत्पन्न होंगे, जिनको उसी क्रम में गिना गया है, मातृ दोष के कारण अनन्तर (एक वर्ण नीचे) समझे जायेंगे।"

     41. “(आर्यों से) उत्पन्न छह पुत्र, जो समान अथवा एक वर्ण नीचे की पत्नियों से जन्मेंगे, उनके कर्त्तव्य द्विजों के समान होंगे परन्तु जिनका जन्म नियमोल्लंघन से होता होगा, कर्त्तव्य के संबंध में वे शूद्रवत होंगे। "

     मनु ने निम्नांकित भिन्नताएं नियत की हैं:

     1. जहां पिता और माता समान वर्ण के हों।

     2. जहां माता का वर्ण पिता से एक वर्ण निम्न हो जैसे ब्राह्मण पिता, क्षत्रिय माता क्षत्रिय पिता, वैश्य माता और वैश्य पिता और शूद्र माता ।

     3. जहां माता का वर्ण पिता से एकाधिक वर्ण नीचे हो जैसे ब्राह्मण पिता और वैश्य अथवा शूद्र माता, और क्षत्रिय पिता तथा शूद्र माता ।

     पहली श्रेणी में संतान का वर्ण पिता का वर्ण होगा। दूसरी श्रेणी में भी पिता का वर्ण ही मिलेगा। परन्तु तीसरी श्रेणी में उन्हें पितृ नहीं मिलेगा। मनु ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि पिता का वर्ण नहीं मिलेगा तो फिर कौन सा वर्ण मिलेगा ? परन्तु मनु के सभी भाष्यकार मेधातिथि, कुल्लुक भट्ट, नारद और नंदपण्डित कहते हैं यह स्पष्ट है कि ऐसी संतानों को माता का वर्ण दिया जाएगा। संक्षेप में कहा जा सकता है कि मनु ने पितृवर्ण को मातृवर्ण में परिवर्तित कर दिया ।

     यह एक महान क्रांतिकारी परिवर्तन है। यह एक दुखद स्थिति है कि जिसे बहुत कम लोग समझ पाए हैं कि प्रचलित विवाह पद्धतियां पुत्रों की श्रेणियां, अनुलोम विवाह और पितृ वर्ण के सिद्धांत का औचित्य, वर्ण व्यवस्था जबकि ब्राह्मणों की इच्छा थी कि वह बंद पद्धति रहे एक मुक्त व्यवस्था बनी रही। कहा जाए तो वर्ण-व्यवस्था में अनेक छिद्र थे। वर्ण-व्यवस्था से विवाह पद्धतियों का कोई संबंध नहीं था। राक्षस और पिशाच विवाहों में, विवाह की हर संभावनाओं के परिपेक्ष्य में पुरुष निम्न वर्ण के थे और स्त्रियां उच्च वर्ण से संबंधित थीं।

     पुत्रत्व विधान में भी अत्यंत दोष थे क्योंकि शूद्रों के पुत्र ब्राह्मण बन सकते थे। उदाहरणार्थ, गुह्यज, सहोदज, कानीन। कौन कहता है कि ये शूद्र से अथवा ब्राह्मण से क्षत्रिय या वैश्य से उत्पन्न हुए हैं? ये सन्देह अनुलोम प्रथा से संभव थे, जिसमें यह कानूनी मान्यता थी जो पितृवर्ण प्रथा से संबद्ध थी, जिसके अनुसार यह गुंजायश थी कि निम्न वर्ण के व्यक्ति उच्च वर्ण में आ जाएं। कोई शूद्र कभी ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य नहीं बन सकता था किन्तु किसी शूद्र स्त्री की संतान वैश्य बन सकती थी यदि वैश्य का उससे विवाह हो जाता। इसी प्रकार वह संतान क्षत्रिय और ब्राह्मण भी बन सकती थी यदि उसकी शादी क्षत्रिय या ब्राह्मण से संपन्न हो जाती । निम्न श्रेणी का उच्च श्रेणी में मिश्रण या संमिलन एक सकारात्मक और विश्वसनीय प्रक्रिया थी चाहे वह अप्रत्यक्ष माध्यम से ही क्यों न हो? यह प्राचीन व्यवस्था का परिणाम था। इसके दूसरे परिणाम थे। यह थे कि किसी वर्ण के व्यक्ति मिश्रित और समुच्चय समुदाय बन जाते थे। ब्राह्मण वर्ग में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र समुदाय की स्त्रियों से उत्पन्न संतानें हो सकती थीं और उन्हें ब्राह्मणों को प्राप्य अधिकार प्राप्त थे। क्षत्रिय समुदाय में क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र स्त्रियों से उत्पन्न संतानें हो सकती थीं और उन्हें क्षत्रियों के अधिकार प्राप्त होते थे। इसी प्रकार वैश्य समुदाय में वैश्य तथा शूद्र स्त्रियों से उत्पन्न संतानें वैश्य समझी जाती थीं और उन्हें वही अधिकार प्राप्त थे।


1. मनु, अध्याय 10 श्लोक 5, 6, 14 और 41 पृ. 402, 403 404 और 412


     मनु ने जो परिवर्तन किए, वह हिन्दुओं के मौलिक आदर्शों के विरुद्ध थे। पहली बात तो यह है कि यह हिन्दुओं के क्षेत्र-क्षेत्रज विधान का ही विरोध करता है। इस विधान के अनुसार, जो संतान सम्पत्ति अधिकार से संबंधित है, कहा गया है संतान का अधिकारी मात्र औपचारिक पति है वास्तविक पिता नहीं। वह इस बात को ऐसे कहते हैं¹:

     इस प्रकार वे पुरुष, जिनका किसी स्त्री से वैवाहिक संबंध नहीं है, परन्तु किसी ऐसी स्त्री के गर्भ में उनका बीज है जो किसी अन्य की पत्नी है तो संतान पर पति का अधिकार होगा। परन्तु वह उससे कोई लाभ नहीं उठा सकता। जब तक क्षेत्र के स्वामी और बीज डालने वाले के बीच कोई सहमति न हो। स्पष्ट रूप से जमीन का स्वामी पिता है, क्योंकि भूमि का महत्व बीज से अधिक है।

     यही कारण है कि बारह प्रकार के पुत्रों का अधिकार नियत किया गया।

     यह परिवर्तन निर्धारित नियम के विरुद्ध था। हिंदू परिवार रोम की भांति पितृ सत्तात्मक हैं। दोनों समाजों में पिता को परिवार के सदस्यों पर अधिकार है । मनु इससे अवगत थे और उसकी अधिक दशाओं को स्वीकार कर लिया। हिंदू पिता के अधि कारों की परिभाषा करते हुए मनु कहते हैं :

     तीन व्यक्ति, पत्नी, पुत्र और दास सामान्यतः किसी सम्पत्ति के स्वामी नहीं हो सकते। जो सम्पत्ति उन्होंने अर्जित की हो, उसका भी स्वामी वही है जिससे वे सम्बद्ध हैं।

     वह परिवार के प्रमुख की है- अर्थात् पिता की । यह नियम भी था कि पिता पुत्र द्वारा अर्जित सम्पत्ति का स्वामी है। पितृत्व सत्तात्मक विधान में परिवर्तन का अर्थ है पिता की निश्चित हानि ।

     मनु ने पितृ-सावर्ण्य को मातृ-सावर्ण्य में क्यों परिवर्तित किया?


1. मयने हिन्दू ला, पृ. 83