Hindu Dharm Ki Paheliyan - dr Bhimrao Ramji Ambedkar - हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर - Page 62 मुख्य मजकूराकडे जा

हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 62 of 92
25 ऑगस्ट 2023
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उन्नीसवीं पहेली

पितृत्व से भातृत्व की ओर: ब्राह्मणों को इससे क्या मिला ?

     हिंदू विधान पर अपने शोध प्रबंध में मयने ने संकेत दिया है कि सगोत्रता विधान में कुछ विसंगतियां हैं। उनका कथन है:

pitritva Se bhraatritva Ki Aur brahmans ko isse kya Mila - Hindu Dharm Ki Paheliyan - Riddle of Hinduism - dr Bhimrao Ramji Ambedkar     हिंदू विधान में इतनी विसंगतियां और कहीं नहीं हैं, जितनी पारिवारिक संबंधों के प्रसंग में हैं। इससे न केवल प्राचीन समाज और आधुनिक समाज के बीच में निरंतरता पूर्णतया छिन्न-भिन्न हो गई है बल्कि प्राचीन व्यवस्था की विभिन्न प्रणालियों के बीच प्रत्यक्ष टकराव भी दृष्टिगोचर होता है। उसमें एक उत्तराधिकार विधान है, जिसमें अविरल चौदह पीढ़ियों तक पुरुष पूर्वज की संभावना का अनुमान किया जाता है। साथ ही कुटुम्ब - विधान है जिसमें कतिपय स्वीकृत पद्धतियां शील भ्रष्टीकरण और बलात्कार के प्रति मात्र प्रियोक्तियां हैं। जहां बारह प्रकार के पुत्रों को मान्यता है और इनमें से अधिकांश का पिता से कोई रक्त संबंध नहीं होता ।

     इन विसंगतियों का अस्तित्व वास्तव में विद्यमान है जो हिन्दू विवाह तथा पितृत्व विधान का अध्ययन करने पर स्पष्ट हो जाएगा।

     हिन्दू विधान में आठ प्रकार के विवाहों को मान्यता है। उनके नाम इस प्रकार हैं: 1. ब्रह्म 2. देव, 3. आर्ष, 4. प्रजापात्य 5. आसुर 6. गंधर्व, 7. राक्षस और 8. पिशाच ।

     ब्रह्म विवाह के अनुसार किसी वेद ज्ञाता को वस्त्रालंकृत पुत्री उपहार में दे दी जाती थी जिसे उसका पिता स्वेच्छा से आमंत्रित करके उसकी सम्मानपूर्वक अगवानी करता था।

     देव-विवाह वह था जब कोई पिता अपने घर यज्ञ करने वाले पुरोहित को दक्षिणास्वरूप अपनी पुत्री दान कर देता था ।

     आर्ष विवाह के अनुसार वर वधू के पिता को उसका मूल्य चुका कर प्राप्त करता था ।


यह ग्यारह पृष्ठों की टकित सामग्री है। अध्याय के शीर्षक को छोड़कर लेखक की हस्तलिपि में और कुछ भी नहीं जोड़ा गया है। - संपादक


     प्रजापात्य विवाह का अर्थ है, वर द्वारा वधू के पिता से पुत्री प्रदान करने का आग्रह । प्रजापात्य और ब्रह्म विवाह में अंतर यह था कि एक में पिता द्वारा पुत्री को उपहारस्वरूप तो दे दिया जाता था किन्तु इसके लिए आग्रह की आवश्यकता थी । आसुर विवाह वह था, जब वर-वधू के पिता और इसके संबंधियों को उनकी पुत्री के बदले क्षमता भर सम्पति देता था और पुत्री को भी धन दिया जाता था। आर्ष और आसुर विवाह के मध्य कोई अंतर नहीं था। दोनों में पुत्री बेची जाती थी। अंतर मात्र इतना था कि आर्ष में पुत्री का मूल्य निश्चित किया जाता था जबकि आसुर विवाह में मूल्य निश्चित नहीं किया जाता था।

     गंधर्व विवाह से आशय यह है जिसमें अधार्मिक तथा इन्द्रिय सुख हेतु परस्पर सहमति से विवाह होता था। राक्षस विवाह उसे कहते थे जब किसी कन्या को वर पक्ष वाले बरबस उठा ले जाते थे। जब यह सहायता के लिए रोती-चिल्लाती थी तो उसका घर ध्वस्त करा दिया जाता और उसके परिजन और उनके मित्रों को युद्ध में आहत कर दिया जाता था अथवा उनका वध कर दिया जाता था ।

     पिशाच विवाह का अर्थ है किसी कन्या के साथ बलात्कार, जबकि वह निद्रामग्न हो अथवा उसे अतिमादक मदिरा पिलाकर उसकी बुद्धि का हरण कर लिया गया हो।

     हिन्दू विधान के अनुसार तेरह प्रकार के पुत्र होते थे। 1. औरस 2. क्षेत्रज, 3. पुत्रिका पुत्र, 4. कानीन 5. गुह्मज, 6 पुनर्भव, 7. सहोदज, 8. दत्तक, 9. कृत्रिम, 10. क्रीत 11. अपविध, 12. स्वयंदत्त, और 13. निषाद ।

     औरस पुत्र । वे होते थे जो किसी व्यक्ति द्वारा अपनी वैध पत्नी से उत्पन्न किए जाते थे।

     “पुत्रिकापुत्र" " से आशय है, पुत्री से उत्पन्न पुत्र । इसका महत्व यह है कि इस प्रथा के अनुसार कोई पिता, जिसका अपना पुत्र नहीं होता था, वह अपनी पुत्री से किसी व्यक्ति द्वारा पुत्र उत्पन्न कराता था । यदि इस शारीरिक संबंध के कारण उस कन्या को पुत्र प्राप्त हो जाता था तो वह बालक पुत्रीका पुत्र कहा जाता है। किसी व्यक्ति को यह अधिकार प्राप्त था कि अपनी पुत्री का विवाह कर देने के पश्चात् भी पुत्र प्राप्ति हेतु उसे विवश कर सकता था कि उसकी पुत्री उसके द्वारा पुरुष के साथ संभोग करे। इसी कारण यह चेतावनी दी जाती थी कि उस कन्या के साथ विवाह न किया जाए, जिसके भ्राता न हों।

     क्षेत्रज के शब्दार्थ और भावार्थ समान हैं। इसका अर्थ है- क्षेत्र से उत्पन्न पुत्र - क्षेत्र का अर्थ है पत्नी। हिंदू आदर्शों के अनुरूप स्त्री खेत के समान है और पति उस खेत का स्वामी है। यदि पति की मृत्यु हो जाती थी अथवा वह जीवित होता था परन्तु नपुंसक होता था अथवा उसे असाध्य रोग होता था तो उसका भ्राता अथवा अन्य सपिण्ड व्यक्ति उससे पुत्र उत्पन्न कर सकता था। इस प्रथा को “नियोग" कहते थे। इस प्रकार उत्पन्न पुत्र " क्षेत्रज" कहलाता था ।

     यदि कन्या अपने पिता के घर अवैध संबंधों के कारण गर्भवती हो जाती और किसी पुत्र को जन्म देती और यदि फिर उसका विवाह हो जाए तो विवाह पूर्ण जन्मे पुत्र पर उसके पति का अधिकार हो जाता है जो " कानीन" कहलाता था।

"गुह्मज" वे पुत्र होते थे, जब किसी स्त्री के अपने पति से संबंध तो हों, परन्तु यह समझना कठिन हो कि पुत्र उसी का है अर्थात् जहां यह संदेह हो कि पुत्र अनाचार का परिणाम है। जब इस बात का साक्ष्य न हो तो अनुमान के आधार पर वह पुत्र उस स्त्री के पति का होता है। वह इसी कारण 'गुह्मज' कहलाता है कि उसका पिता संदिग्ध है।

     “सहोदज" वे पुत्र होते थे जब कोई कन्या अपने विवाह के समय गर्भवती होती थी और यह निश्चय नहीं होता था कि पुत्र उसके पति का है जिसके उस कन्या के साथ पहले से ही शारीरिक संबंध होते थे अथवा वह किसी अन्य व्यक्ति का बीज है। परन्तु यह निश्चिंत था “सहोदज" उस गर्भवती स्त्री से उस व्यक्ति का उत्पन्न पुत्र माना जाता था जिसके साथ उस कन्या का विवाह होता था । " पुनर्भव" उस स्त्री का पुत्र है जिसे उसके पति ने त्याग दिया हो और वह अन्य के साथ सहवास के पश्चात् पुनः अपने घर आ गई हो। इससे ऐसी स्त्री के पुत्र का भी बोध होता है जो एक नपुंसक, अस्पृश्य, अथवा पागल या मृत पति के बाद दूसरा पति चुन लेती है।

     “पारासव”¹ वे पुत्र होते थे जो किसी ब्राह्मण द्वारा शूद्र नारी से उत्पन्न किए जाते थे। शेष पुत्र गोद लिए गए पुत्र होते थे जिन पर पितृत्व अधिकार होता था ।

     "दत्तक" ऐसा पुत्र है जिसे उसके माता-पिता किसी को दे देते थे। उसे प्राप्तकर्ता का पुत्र माना जाता था।

     "कृत्रिम " पुत्र का अर्थ है केवल प्राप्तकर्ता की इच्छा से प्राप्त पुत्र । 'क्रीत' ऐसा पुत्र, जिसे उसके अभिभावकों से क्रय किया जाता था ।

     "अपविध" ऐसा पुत्र है जिसका उसके जनक परित्याग कर दे और पुनः गोद ले लें और अपना पुत्र मान लें।

     "स्वयंदत्त " ऐसा पुत्र है जिसे उसके जनक त्याग दें और वह किसी से यह कहकर आश्रय मांगे कि "मुझे अपना पुत्र बनाओ" । यदि स्वीकार कर लिया जाता है तो पुत्र माना जाता है।

     यह उल्लेखनीय है कि विवाह की कई प्रणालियां शील भ्रष्टीकरण और बलात्कार की प्रियाक्तियां हैं और कई पुत्रों का अपने पिता से कोई रक्त संबंध नहीं होता था । मनु के समय तक ये विभिन्न प्रकार के विवाह और पुत्र वैध माने जाते थे और मनु ने जो परिवर्तन किए हैं वे मामूली हैं। जहां तक विवाहों का संबंध है मनु² ने उन्हें अवैध घोषित नहीं किया। उन्होंने मात्र इतना कहा है कि आठ में से प्रथम छह ब्रह्म, देव, आर्ष, प्रजापात्य, असुर, गंधर्व - राक्षस और पिशाच, क्षत्रिय के लिए वैध हैं और तीन-असुर, गंधर्व और पिशाच वैश्य और शूद्र के लिए वैध हैं।


1. उसमें निषाद भी है। जीमूतवाहन पारासव और निषादों को भिन्न मानता है । पारासव शूद्र कन्या से ब्राह्मण द्वारा उत्पन्न है और निषाद ब्राह्मण द्वारा शूद्र पत्नी से उत्पन्न है।
2. मनु, 3.23


     इसी प्रकार वे बारह प्रकार के पुत्रों में से किसी की भी श्रेणी विलग नहीं करता । इसके विपरीत वे उन्हें परिजन स्वीकार करते हैं। उन्होंने मात्र इतना परिवर्तन किया है। कि उत्तराधिकार - नियम को बदल दिया है और उनके दो वर्ग कर दिए : 1. उत्तराधि कारी तथा परिजन, और 2. परिजन, किन्तु उत्तराधिकारी नहीं। वह कहते हैं ¹:

     159. किसी का वैध पुत्र वह है जो उसने अपनी पत्नी से उत्पन्न किया हो, दत्तक पुत्र ही मान लिया गया पुत्र हो, गुह्य पुत्र, और उत्पन्न कराया गया पुत्र हो । यही छह उत्तराधिकारी या परिजन होने के पात्र हैं।

     160. एक अविवाहित किशोरी से उत्पन्न पुत्र, पत्नी के साथ सहवास से प्राप्त पुत्र, पुनर्विवाहिता स्त्री से उत्पन्न पुत्र, स्वयं प्राप्त पुत्र और शूद्र स्त्री से प्राप्त पुत्र ऐसे पुत्र हैं, जिन्हें उत्तराधिकार प्राप्त नहीं होता किन्तु सगोत्री हैं।

     162. यदि किसी पुरुष के दो उत्तराधिकारी पुत्र हैं और एक पुत्र उसकी पत्नी से उत्पन्न हुआ है, प्रत्येक (दोनों पुत्रों में से) दूसरे के वंचित हो जाने पर अपने पिता की सम्पत्ति का अधिकारी है।

     163. किसी व्यक्ति का पुत्र ही पैतृक सम्पत्ति का अधिकारी है किन्तु कटुता से बचने के लिए दूसरे को निर्वाह उपलब्ध कराए जाएं।


1. मनु. 9.159-60 162-63: पृ. 359-60