हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
संन्यासी के लिए संहिता
“जिसमें समस्त सम्पत्ति को दक्षिणा रूप में देते हैं ऐसे प्राजापत्य यज्ञ को अनुष्ठान कर और उसमें कथित विधि से अपने में अग्नि का आरोपकर ब्राह्मण घर से संन्यास आश्रम को ग्रहण करे।" अध्या. 6-38
"जो सब प्राणियों को अभय देकर गृह से संन्यास ले लेता है, वह ब्रह्मज्ञानी तेजोमय लोक होता है। अर्थात् वह उन लोकों को प्राप्त करता है।" अध्या. 6-39
"जिस द्विज से जीवों को लेशमात्र भी भय नहीं होता, शरीर से विमुक्त हुए उस द्विज को कहीं से भी भय नहीं होता।" अध्या. 6-40
1. मनुस्मृति, अध्याय 6 श्लोक 209
“पवित्र कमण्डल, दंड आदि से युक्त मौन धारण किया हुआ घर से निकला हुआ और उपस्थित इच्छा प्रवर्तक वस्तु में निःस्पृह होकर संन्यास ग्रहण करे । ” अध्या. 6-41
“अकेले सिद्धि को देखता हुआ द्विज दूसरे किसी का साथ न करके अकेला ही मोक्ष के लिए चले, इस प्रकार वह किसी को नहीं छोड़ता है और न उसे कोई छोड़ता है।" अध्या. 6-42
"लौकिक अग्नि से रहित, गृह से रहित, शरीर में रोगादि होने पर भी चिकित्सा आदि का प्रबंध न करने वाला, स्थिर बुद्धिवाला, ब्रह्म का मनन करने वाला और ब्रह्म में भी भाव रखने वाला संन्यासी भिक्षा के लिए ग्राम में प्रवेश करे। " अध्या. 6-43
"खपरा, पेड़ों की जड़, पुराना व मोटा या वृक्ष के वल्कल कपड़ा, अकेलापन, ममता और सबमें समान भाव, ये मुक्ति के लक्षण हैं। " अध्या. 6-44
"मरने या जीने की चाह ने करे किन्तु नौकर जिस प्रकार वेतन की प्रतीक्षा करता है, उसी प्रकार काल की प्रतीक्षा करता रहे।" अध्या. 6-45
“ब्रह्म ध्यान में लीन योगासनों में बैठा हुआ, अपेक्षा से रहित, मांस की अभिलाषा से रहित और शरीर मात्र सहायक से युक्त मोक्ष सुख को चाहने वाला इस संसार में विचरण करे।" अध्या. 6-49
"चमत्कार और शकुन विचार, नक्षत्र विद्या, हस्तरेखा विज्ञान के चातुर्य, अंगविद्या, अनुशासन आदि के सहारे किसी भी प्रकार की भिक्षा लेने की इच्छा न करे।" अध्या. 6-50
“बहुत से वानप्रस्थों या अन्य साधुओं, ब्राह्मणों, पक्षियों, कुत्तों या दूसरे भिक्षुओं से युक्त घर में न जाए ।" अध्या. 6-51
“बाल, नाखून और दाढ़ी-मूंछ कटवाकर, भिक्षापात्र, दण्ड तथा कमण्डल को लिये हुए, किसी प्राणी को पीड़ित न करता हुआ सर्वदा विचरण करे।" अध्या. 6-52
“उसके भिक्षापात्र धातु के न हों, छिद्र रहित हों, उनकी शुद्धि यज्ञ में चमस के समान केवल पानी से होती है। " अध्या. 6-53
“तुम्बा, लकड़ी, मिट्टी, बांस के पाच्यतियों के हों ऐसा स्वायंभुव पुत्र मनु ने कहा है।" अध्या. 6-54
"संन्यासी जीवन निर्वाह के लिये दिन में एक बार ही भिक्षा ग्रहण करे, तथा उसको भी अधिक प्रमाण में लेने में आसक्ति न करे, क्योंकि भिक्षा में आसक्ति रखने वाला संन्यासी विषयों में भी आसक्त हो जाता है।" अध्या. 6-55
“घरों में जब धुआं दिखाई न पड़ता हो, मूसल का शब्द न होता हो, आग बुझ गयी हो, सब लोग भोजन कर चुके हों, और खाने के पत्तल बाहर फेंक दिये गये हों, तब भिक्षा के लिए संन्यासी सर्वदा निकले।" अध्या. 6-56
“भिक्षा न मिलने पर विषाद और मिलने पर हर्ष न करे। जितनी भिक्षा से जीव निर्वाह हो सके, उतने ही प्रमाण में भिक्षा मांगे। दण्ड, कमण्डल आदि की मात्रा में भी आसक्ति न करे।" अध्या. 6-57
"विशेष रूप से आदर-सत्कार के साथ मिलने वाली भिक्षा की सर्वदा निंदा करे, क्योंकि पूजापूर्वक होने वाली भिक्षा प्राप्ति से मुक्त भी संन्यासी बंध जाता है।' अध्या. 6-58
“विषयों की ओर आकृष्ट होती हुई इन्द्रियों को थोड़ा भोजन और एकांतवास के द्वारा रोके । ” अध्या. 6-59
“इन्द्रियों को अपने-अपने विषयों से रोकने से, राग और द्वेष के त्याग से और प्राणियों की अहिंसा से मुक्ति के योग्य होता है।" अध्या. 6-60
“जब विषयों में दोष की भावना से सब विषयों से निःस्पृह हो जाता है, तब इस लोक में तथा परलोक में नित्यसुख को प्राप्त करता है।" अध्या. 6-80
"इस प्रकार सब संगों को धीरे-धीरे छोड़कर तथा सब द्वंद्वों से छुटकारा पाकर ब्रह्म में ही लीन हो जाता है।" अध्या. 6-81
“यह सब परमात्मा में ध्यान से होता है। अध्यात्म ज्ञान से शून्य ध्यान का फल कोई भी नहीं प्राप्त करता है।" अध्या. 6-82
"यज्ञ तथा देव के प्रतिपादक वेदमंत्र को, जीवन के स्वरूप के प्रतिपादक वेदमंत्र को और ब्रह्मप्रतिपादक वेदान्त में वर्णित मंत्र को जपे । " अध्या. 6-83
“वेदार्थ को नहीं जानने वाले के लिए यही वेद शरण है, और वेदार्थ जानने वाले के लिए स्वर्ग चाहने वालों के लिए भी वेद शरण है।" अध्या. 6-84
"इस क्रम से जो द्विज संन्यास लेता है वह इस संसार में पाप को नष्ट कर उत्कृष्ट ब्रह्म को प्राप्त करता है।" अध्या. 6-85
वानप्रस्थ की संन्यास से और गृहस्थाश्रम की संन्यास से तुलना करने पर इनके मध्य स्पष्ट साम्यता का पता चलता है। जब वानप्रस्थ की संन्यास से तुलना करते हैं तो उनके अनुसार जीवनयापन में बहुत कम अंतर मिलता है। प्रथम यह कि वानप्रस्थ अपनी पत्नी और सम्पत्ति के अधिकार का त्याग नहीं करता है। परन्तु संन्यासी को दोनों का त्याग करना पड़ता है। दूसरी बात यह है कि वानप्रस्थ का निवास स्थायी होता है, चाहे वह वनवास ही क्यों न हो। किन्तु संन्यासी का आवास स्थायी नहीं होता, यहां तक कि वनों में भी उसे स्थान-स्थान पर रमण करना होता है। तीसरे यह कि संन्यासी के लिए शास्त्रों की व्याख्या करने पर प्रतिबंध है, जबकि वानप्रस्थ के लिए ऐसी कोई शर्त नहीं है। जहां तक अन्य बातों का प्रश्न है, वे एक समान हैं।
गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थाश्रम के बीच भी बहुत साम्य है। मूलरूप से वानप्रस्थी गृहस्थ ही है जैसे वानप्रस्थी का वैवाहिक जीवन जारी रहता है। गृहस्थी के समान वह सम्पत्ति का स्वामी रहता है। गृहस्थ की भांति वह संसार का त्याग नहीं करता । वह वैदिक धर्म का पालन करता है। गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थ के बीच तीन बातों का अंतर है: (1) गृहस्थ के भोजन और वस्त्र पहनने में कोई सादगी नहीं है, जबकि वानप्रस्थ के लिए ऐसी व्यवस्था है, (2) गृहस्थ समाज के मध्य रहता है, जबकि वानप्रस्थ को वनों में रहना होता है, (3) वानप्रस्थी, वेदांत का अध्ययन कर सकता है, जबकि गृहस्थ वेदों तक ही सीमित रहता है। शेष बातों में साम्यता है ।
गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थ तथा संन्यास आश्रम के बीच इतनी सारी साम्यताओं के रहते हुए, यह समझना कठिन है कि मनु ने गृहस्थाश्रम और संन्यास के बीच वानप्रस्थ की रचना क्यों की, क्योंकि एक आश्रम दूसरे से बिल्कुल भिन्न होता है। वास्तव में केवल तीन आश्रम हो सकते थे - ( 1 ) ब्रह्मचर्य, ( 2 ) गृहस्थ, ( 3 ) संन्यास । शंकराचार्य का मत भी ऐसा ही लगता है, जिन्होंने अपने ब्रह्म सूत्र में, संन्यास को सही बताते हुए पूर्व मीमांसा परम्परा के विपरीत तीन ही आश्रमों की बात कही है।
मनु को वानप्रस्थाश्रम की बात कैसे सूझी ? उनको प्रेरणा कहां से मिली ? जैसा कि पहले कहा जा चुका है, ब्रह्मचर्य के पश्चात् गृहस्थाश्रम अनिवार्य नहीं था। ब्रह्मचारी गृहस्थाश्रम अपनाए बिना सीधा संन्यासी बन सकता है। परन्तु मानव का अन्य भी एक चरण था। जो ब्रह्मचारी तुरन्त विवाह नहीं करना चाहता था, वह अरण्यमानस' (वनवासी) बन सकता था। वे ऐसे ब्रह्मचारी थे, जो अविवाहित रहकर अध्ययन जारी रखना चाहते थे। ये अरण्यवासी आबादी से दूर वनों में रहते थे। जिन वनों में अरण्य तापस बसते थे, वे आरण्यक कहलाते थे। यह स्पष्ट है कि मनु का वानप्रस्थ दो भिन्नताओं के कारण मौलिक अरण था। 1. वह वैवाहिक जीवन में प्रवेश करने से पूर्व स्वबंधित ' अरण' था और 2. यह अरण अवस्था, द्वितीय अवस्था के स्थान पर तृतीय अवस्था कहलाती थी। मनु का पूरा कार्यक्रम इस सिद्धांत पर आधारित था विवाह अनिवार्य है। कोई ब्रह्मचारी यदि संन्यासी बनना चाहता है तो उसे वानप्रस्थ में जाना होता था और वानप्रस्थ बनने के लिए गृहस्थ बनना अनिवार्य था अर्थात् उसे विवाह करना चाहिए। मनु ने विवाह से मुक्ति को असंभव बना दिया। क्यों ?
1. राजा कुमुद मुकर्जी एशिएंट इंडिया एजूकेशन, पृ. 6