हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
वानप्रस्थ के लिए संहिता
“कृषि द्वारा अर्जित समस्त प्रकार के आहार तथा समस्त संपत्ति को छोड़कर वन में जाने की इच्छा नहीं करने वाली अपनी पत्नी को पुत्रों के उत्तरदायित्व में सौंपकर तथा वन में साथ जाने की इच्छा करने वाली अपनी पत्नी को साथ में लेकर वन को जाए ।" अध्या. 6-3
"पवित्र अग्नि और यज्ञ पात्र आदि लेकर ग्राम से बाहर वन में जाकर जितेन्द्रिय होकर रहे।" अध्या. 6-4
“तापस योग्य विविध पवित्र खाद्य पदार्थ, कंद-मूल, फल आदि से पूर्वोक्त पंचमहायज्ञों का विधिपूर्वक पालन करता रहे।” अध्या. 6-5
"मृग आदि का चर्म या पेड़ों का वल्कल धारण करे, सायंकाल तथा प्रात: काल स्नान करे और सर्वदा जटा, दाढ़ी, मूंछ एवं नख को (उच्छेदन रहित ) धारण करे। " अध्या. 6-6
"जो भोज्य पदार्थ हो, उसी से बलि करे, सामर्थ्यानुसार दान दे, भिक्षा दे और जल, कंद तथा फलों की भिक्षा देकर आये हुए अतिथियों का सत्कार करे।" अध्या. 6-7
“सर्वदा वेदाभ्यास में लगा रहे, ठंडा-गर्म, सुख-दुख, अपमान आदि द्वंद्वों को सहन करे, सबसे मित्रभाव रखे, मन को वश में रखे, दानशील बने, दान न ले, सब जीवों पर दया करे" अध्या. 6-8
“दर्श, पौर्णमास पर्वों को यथासमय त्याग नहीं करता हुआ विधिपूर्वक तीन अग्नियों के साथ अग्निहोत्र करता रहे।" अध्या. 6-9
“नक्षत्रेष्ठि, आग्रहायण याग, चातुर्मास्य याग, उत्तरायण याग और दक्षिणायन याग को श्रोतस्मार्त विधि से क्रमशः करे।" अध्याय 6-10
“वसन्त तथा शरद ऋतु में पैदा हुए एवं स्वयं लाये गये पवित्र मुन्यन्नों से पुरोडश तथा उबले अन्न करूको शास्त्रानुसार अलग-अलग तैयार करे।” अध्या. 6-11
“वन में उत्पन्न अत्यंत पवित्र और हविष्यान्न से देवों के उद्देश्य हवन कर बचे हुए अन्न का भोजन करें तथा स्वयं बनाये हुए लवण को काम में लायें।" अध्या. 6-12
“भूमि तथा जल में उत्पन्न शाकों (सब्जियों), पवित्र पुष्प, मूल तथा फल को, और पवित्र वृक्ष - उत्पादों और अरण्य-फलों से शोधित तैल का भोजन करे।" अध्या. 6-13
“मधु, मांस, पृथ्वी में उत्पन्न छत्रांक, भूस्तृण, शिग्रक और लसोड़े के फूल का त्याग करे |" अध्या. 6-14
“पूर्वसंचिता मुन्यन्न, पुराने वस्त्र और शाक कन्द एवं फल का आश्विन मास में त्याग कर दे। " अध्या. 6-15
“वन में भी हल से जुती हुई भूमि में उत्पन्न या किसी के फेंके हुए अन्न को तथा ग्राम में उत्पन्न मूल और फल को क्षुधा पीड़ित होकर भी न खाए । " अध्या. 6-16
'अग्नि में पकाये हुए अन्न आदि को खाने वाला बने, अथवा नियम समय पर पकने वाले पदार्थों को खाने वाला बने अथवा पत्थर से पीस कर या दांतों से चबाकर खाने वाला बने।" अध्या 6-17
“भोजन पात्रों को वह खाने के बाद तुरंत धोए या एक मास का संग्रह रखे, अथवा छः मास या वर्ष पर्यंत का समुचित प्रबंध करे।" अध्या. 6-18
“यथाशक्ति अनन को लाकर सायंकाल या दिन में या एक दिन पूरा उपवास कर दूसरे दिन सायंकाल या तीन रात उपवास कर चौथे दिन सायंकाल भोजन करे। " अध्या. 6-19
'अथवा शुक्ल तथा कृष्णपक्ष में चान्द्रायण के नियम से भोजन करे, अथवा अमावस्या तथा पूर्णिमा को दिन या रात्रि में केवल एक बार पकाई हुई ययागूका भोजन करे।" अध्या. 6-20
“अथवा वैखानस आश्रम में रहने वाला सर्वदा वेवल समय पर पके और स्वयं गिरे हुए फल मूल से ही जीवन निर्वाह करे। " अध्या. 6-21
1. मनुस्मृति, अध्याय 6 श्लोक 38-45
2. वही अध्याय 6 207
3. वही अध्याय 6, 208
“भूमि पर लेटे तथा टहले या पैर के अगले भाग पर दिन में कुछ समय तक खड़ा रहे या बैठा रहे तथा प्रातः काल मध्याह्नकाल तथा सायंकाल में स्नान करे। " अध्या. 6-22
“अपनी तपस्या को बढ़ाता हुआ ग्रीष्म ऋतु में पंचाग्नि ले, वर्षा ऋतु में खुले मैदान में रहे और शीत ऋतु में गीला कपड़ा धारण करे।" अध्या. 6-23
"तीनों समय स्नान करता हुआ देवताओं, ऋषियों तथा पितरों का तर्पण करे और कठोर तपस्या करता हुआ अपने शरीर को सुखा दे । ” अध्या. 6-24
“वानप्रस्थाश्रम के नियमानुसार वैतानिक अग्नि को आत्मा में रखकर वन में भी अग्नि और गृह का त्यागकर केवल मूल और फूल को खाये। " अध्या. 6-25 “सुख साधक साधनों में उद्योग को छोड़कर ब्रह्मचारी भूमि पर सोने वाला निवास-स्थान में ममस्वरहित हो पेड़ों के मूल को घर समझ कर निवास करे। " अध्या. 6-26
"जीवन निर्वाह के लिये केवल तपस्वी वानप्रस्थाश्रमियों के यहां भिक्षाग्रहण करे और उनका भी अभाव होने पर वन में निवास करने वाले अन्य गृहस्थ द्विजों से भिक्षा ग्रहण करे।" अध्या. 6-27
“उन वनवासी गृहस्थों का भी अभाव होने पर वन में ही निवास करता हुआ ग्राम से वृक्ष - पत्रों में या सकारों के खंडों में अथवा हाथ में ही भिक्षा को लाकर केवल आठ ग्रास भोजन करे। " अध्या. 6-28
“वन में निवास करता हुआ ब्राह्मण इन नियमों को तथा शास्त्रोक्त नियमों का पालन करते हुए और आत्मसिद्धि के लिए उपनिषदों तथा वेदों में कथित वचनों का अभ्यास करे।" अध्या. 6-29